बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 30 मार्च 2015

कोई अश्क आँख से ढल गया, कोई आरज़ू सी मचल गयी















अभिषेक श्रीवास्तव की क़लम से


1.

एक सरापा जुस्तज़ू और कुछ करम हासिल ना हो
मेरी क़िस्मत ये जहाँ तक शौक़ हो मंज़िल ना हो

ज़िंदगी की ग़ालिबन तफ़सील ही मुश्किल में हैं
और मुश्किल ये कि मुश्किल हो अगर मुश्किल ना हो

वो कि बेजा कशमकश में अब तलक है मुब्तिला
मेरी तब थी इल्तजा  अब क्या पता कि दिल ना हो

एक ये आशिक़ कि जीते जी उसे संगदिल कहें
एक वो बामन कि उसका संग भी संगदिल ना हो

चल पड़े हम सर झुकाये बात आधी छोड़कर
सर को उसने भी झुकाया यूँ कि वो ग़ाफ़िल ना हो


2.

अजब ये दर्द के मारों की दुनिया
अना के चंद बीमारों की दुनिया

यहाँ हर शय के दाम तयशुदा है
यहाँ हर गाम बाज़ारों की दुनिया

डराते हो मुझे क्यूँ आख़िरत  से
यहीं क्या कम है आज़ारों की दुनिया

हर एक भगवान् को प्यारी लगे है
डरे सहमे से लाचारों की दुनिया

अना के साथ जीने की सज़ा है
हमारे हक़ पे इन्कारों की दुनिया


3.
वो आये मगर जाने किधर देखते रहे
हम ग़ौर  से बस उनकी नज़र देखते रहे

हाँ बात वो अंजाम तक पहुँची नहीं मगर
हम उसका हशर सारी उमर देखते रहे

हौले से मुस्कुरा दिये जो हमने यूँ कहा
क्या हम नहीं थे आप जिधर देखते रहे

जो चुप रहे तो हाल-ए-जिगर पूछते रहे
जो कह दिया तो तल्ख़ नज़र देखते रहे


4.
ख्वाब का बह गया महल शायद
लौट आँखों मे आया जल शायद

फिर उसी इक सवाल पे अटके
सबसे मुश्किल है जिसका हल शायद

हाय वो पल हमारे मिलने का
अब मिलेगा नहीं वो पल शायद

बात जिस कल पे मुल्तवी कर दी
हो गया मुल्तवी वो कल शायद

रात आँखों से खून आया था
हसरतों का है ये अमल शायद

आस्तां पे तुम्हारे बैठे हैं
हमको आयेगा इससे कल शायद

5.
और जो चाहा किये थे पा गये
जुस्तजू से पर तेरी उकता गये

इक वो पहले इश्क़  की तशना-लबी
और कुछ हम फ़ितरतन घबरा गये

थरथराते लब थे झुकती सी नज़र
पास जितने लोग थे धुँधला गये

एक मोमिन यूँ हुये दिल आशना
बस निगाहों से करम फ़रमा गये

उम्र भर के तजरुबे सब इक तरफ
इक तरफ तुम शेख जी टकरा गये

6.
हमने जाँ पर बेतरह पाले हैं ग़म
बस गए हैं रूह पर जाले हैं ग़म

ज़िंदगी जो ज़िंदगी थी क्या हुई
सिर्फ काली रात है काले हैं ग़म

हम ग़मों से भागकर जायें कहाँ
जीते जी जाने कहाँ वाले हैं ग़म

कैद में मैं ज़िंदगी की मर गया
बाब पर लटके हुए ताले हैं ग़म

इल्तेज़ा मिन्नत गुज़ारिश क्यूँ करें
इन सदाओं ने कहाँ टाले हैं ग़म


7.

सोचते हैं कि भूल जायें उसे
सोच के भूल कैसे पायें उसे

उसको भूले तो किस तरह भूलें
आप जब ज़िंदगी सा चाहें उसे

आप गर आप हैं तो मुमकिन है
आप एक रोज़ याद आयें उसे

इश्क करिये मगर ये ख़तरा है
खो भी दें और कभी ना पायें उसे

हम तो सब कुछ लुटा के आयें हैं
आप जायें, खरीद लायें उसे


8.
किसी हसरत पे, दिल को प्यार से, फुसला दिया जाये,
बड़ा मायूस हो बैठा, चलो समझा दिया जाये

दवा उसकी यही होगी, जो गुमसुम है खयालों में,
उसी का दर्द, उसके मुहं से अब कहला दिया जाये

मैं मुंसिफ उस अदालत का, जहाँ ये हाल है हरद
मेरे हालात का मुजरिम मुझे ठहरा दिया जाये

वो ज़िंदा है तेरे बिन, और इतनी उम्र है बाकी
सिवा इसके तेरे मुजरिम पे क्या फतवा दिया जाये

यहाँ हर शख्स की आंखों में इक मंज़र उदासी का
बड़े महंगे हैं चारागर, इन्हें समझा दिया जाये

किसी के नर्म हाथों से, किसी के दीदा-ए-तर से
मेरे ज़ख्मों की ख्वाहिश है, उन्हें सहला दिया जाये

अगर साहिब की मर्जी हो, अगर हज़रत इजाज़त दें
कतल तो हो चुका हूँ मैं ,मुझे दफना दिया जाये

9.
यूँ बहार अबकी गुज़र गयी, कि खिज़ा ही रंगत बदल गयी
मेरे ग़म अगर्चे ना कम हुये, और वस्ल की रात भी ढल गयी

तेरे ग़म से जब था आशना, तुझे क्यूँ मैं करता कुछ बयाँ
तू शमा थी, बाइस-ए-नूर थी, जो दयार-ए-गैर में जल गयी

जो विसाल में मेरा हाल था, तेरे बिन तो जीना मुहाल था
तुझे दिल में ऐसे बसा लिया, घड़ी मुश्किलात की टल गयी

जो पढ़ा किये वो किताब थी, तू गये जनम का सवाब थी
जो लकीर थी मेरे हाथ की, वो लकीर कैसे बदल गयी

मेरा हाल कोई बुरा नहीं, तेरा नाम सुनके हुआ यही
कोई अश्क आँख से ढल गया, कोई आरज़ू सी मचल गयी

10.

बड़े मायूस रहते हैं, बड़े खामोश रहते हैं
चलो बेहतर कि अब सदमों से हम बेहोश रहते है

कभी नज़रों से मेरी उसको देखो तब ये जानोगे
कि बस एक मय नहीं हैं , जिसमें सब मदहोश रहते हैं

मैं मुद्दत से खुशी की बात पे भी खुश नहीं होता
मेरी आँखों में कुछ दरिया हैं, जो रू-पोश रहते हैं

वो बचपन में मेरे मिट्टी के कुछ घर तोड़ गया था
वगरना लोग मेरी उम्र के पुर-जोश रहते हैं

फिराक़-ओ-ग़ालिब-ओ-मख़दूम से बचपन की निस्बत है
मेरे कूचे में अब तक फ़ैज़ हसरत जोश रहते है

(रचनाकार-परिचय
जन्म : २० जून, १९८०
शिक्षा : सांख्यिकी और गणित में स्नातक, लखनऊ विश्वविद्यालय, एमसी एए बीटीआई कानपुर
सृजन : वर्चुअल स्पेस में सक्रिय लेखन 
संप्रति :  गुडगाँव में निजी संस्थान में सॉफ्टवेर डिज़ाइन प्रोफेशनल
संपर्क : abhihbti@yahoo.com )



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बुधवार, 25 मार्च 2015

कहानी : दहलीज़

 युवा कवि की पहली कहानी 












संजय शेफर्ड की क़लम से 

यह लड़कियां भी ना ? ना जाने किस परिवेश और संस्कार में पलती- बढ़ती और बड़ी होती हैं ? एक अधेड़ 
व्यक्ति ने खुद से मन ही मन में प्रश्न किया और उस चौदह वर्षीय लड़की की आवश्यकता से थोड़ी ऊंची उठ 
रही  स्कर्ट के अंदर झांकने की कोशिश की। लड़की उस अधेड़ व्यक्ति की नज़रों को भांप थोड़ी सकपकाई और 
असहज महसूस करते हुए करीब छह इंच की दूरी बनाते हुए बगल में खड़ी हो गई। अब उस अधेड़ की नज़र 
सीधे- सीधे लड़की की छातियों के आसपास से घूमती हुई कुछ देर बाद लड़की के उन उभारों पर जा टिकीं जहां 
एक अधोवस्त्र के आलावा कुछ भी नहीं था। लड़की की सकपकाहट बेचैनी में परिवर्तित होने लगी थी और 
असहजता बौखलाहट का रूप लेकर अब फूटे क तब फूटे। परन्तु वह अधेड़ उस लड़की की इन तमाम 
स्थितियों से बेखबर उसकी देह के तमाम हिस्सों में अपनी नज़र इस कदर गड़ाए जा रहा था कि मानों उसकी 
देह के तमाम छिद्रों को अपनी वासना से भर देगा। लड़की की मानसिक व्यथा बढ़ने के क्रम में दैहिक पीड़ा में 
परिवर्तित होने लगी। लड़की को लगा उसकी देह के तमाम छिद्रों में एकाएक किसी ने हजारों की संख्या में 
तलवार घुसेड़ दिया है। उसकी देह की कराह चीख में परिवर्तित होकर उठी और उसके मन की कब्र में जा 
समाई।

सही मायने में यह स्थिति लड़की के संयम के दायरे से बाहर की थी फिर भी लड़की ने अपने अथाह दर्द और 
उफनते आवेग पर कायम रखते हुए थोड़ी और दूरी बनाकर खड़ी हो गई। पर उसे यह दूरी उस अधेड़ की नज़र 
से ज्यादा नहीं ले जा पाई। इस बार उसकी नज़र लड़की के वक्ष से नीचे उतर नाभि के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई 
थी।  लड़की ने उस अधेड़ की चुभती हुई नज़र को दूबारा जैसे ही अपने नाभि में महसूसा, साथ ही यह भी 
महसूसा  कि अब यह नजरें नाभि के नीचे उतरने की कोशिश करेंगी उसकी बंद मुठ्ठियां खुली और एक जोरदार 
तमाचे की आवाज पूरे ठसमठस भीड़ भरी बस में गूंज पड़ी। किसी को कुछ समझ में ना आए इसका तो सवाल 
ही नहीं था। इस तरह की घटनाएं आये दिन दिल्ली के बसों में होती रहती हैं। करीब बीस सेकेंड तक पूरे बस में 
शांति छाई रही उसके बाद धीरे-धीरे कुछ आवाजें अपना-अपना मुंह खोलने लगी।

मारों साले को मारों, लड़की को ताड़ता है, तेरी मां- बहन नहीं है। इतना सुनते ही मानों भीड़ का पूरा का पूरा 
जत्था उस अधेड़ व्यक्ति पर टूट पड़ा। दो मिनट के अंदर उस पर कितने लात- जूते पड़े होंगे उसे इस बात का 
अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। लोगों की मार से उसके शरीर के तमाम हिस्से ज़ख्मी हो गए थे। उसके 
होंठ कट गए थे और नाक से खून टपक रहा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह कि उस व्यक्ति ने जरा भी 
भागने  का प्रयास नहीं किया। इतनी मार खाने के बाद भी जस का तस बस की सीट पर ही पड़ा रहा। दूसरी 
तरफ लड़की जोर-जोर से सिसक रही थी। उसके आसपास कई औरतों की भीड़ जमा हो गई थी। कोई उसके 
बालों में  हाथ फेरते हुए सन्तावना के स्वर में यह कह रहा था कि चुप हो जा बेटा- चुप हो जा। कोई उल्टे उसके 
पहनावे को दोषी ठहराते हुए कह रहा था इस तरह के कपडे पहनती ही क्यों हो जब सती - सावित्री बनती हो ? 
जितने  मुंह उतनी बात ! कोई कुछ कह रहा है तो कोई कुछ ! लोगों की कहा सुनी, आपस की घुसर-पुसर के 
मध्य यह  तिहत्तर नंबर की बस निर्माण विहार के स्टैंड पर जैसे ही पहुंची वह लड़की बस से उतर गई।

सिर्फ एक स्टेशन के बाद मुझे भी बस से उतरना था। उस लड़की के बस से उतरने के बात यात्रियों की आपसी 
सुगबुगाहट थोड़ी और तेज हो गई। कहा सुनी, आपस की घुसर-पुसर का स्वर धीरे-धीरे और ऊंचा उठने लगा। 
जो घटना महज़ पांच मिनट पहले एक घटना थी अब वह इंटरटेनमेंट से ज्यादा कुछ नहीं रह गई थी। इस बस 
में मैं करीब साल भर से सफ़र कर रही हूं। बस में अक्सर इस तरह की छेड़छाड़ की घटनाएं होती ही रहती हैं। 
और मेरे ही साथ क्या पब्लिक या फिर प्राइवेट बस में चलने वाली हर लड़की के साथ होती ही रहती हैं। फिर 
धीरे-धीरे यह घटनाएं रोजमर्रा यात्रा करने वाली लड़कियों या महिलाओं के रूटीन की एक हिस्सा बन जाती हैं। 
अब भला कामकाजी महिलाएं और लड़कियां करें भी तो क्या करें, सामान्य तरीके से अगर समझाने की 
कोशिश करें तो यह मनचले पीछे पड़ जाते हैं और असामान्य तरीके से समझाएं तो उनके जान पर ही बन 
आती है। भरी भीड़ में ही कब किस हरकत पर उत्तर आएं। और घर-परिवार ? दरअसल हम लड़कियों को 
रोटी  भी कमानी होती है और अपनी इज्ज़त भी बचानी होती है अन्यथा परिवार के लोग ही कह देंगे कि- 
नौकरी करने की कोई जरुरत नहीं घर में ही बैठी रहो ? यह कह देना सचमुच बहुत आसान है पर एक 
पढ़ी-लिखी लड़की का घर की दहलीज़ के अंदर कैद हो जाना बहुत ही मुश्किल। लेकिन मां- बाप और 
घर-परिवार वाले भी क्या करें ? उनके पास दिन- ब- दिन बढ़ते भ्रष्टाचार और सामाजिक विषमताओं ने बहुत 
ही सीमित दायरे छोड़े हैं।

दिल्ली की बसों में भीड़ एक समस्या है लेकिन आये दिन कोई ना कोई इस भीड़ का फायदा उठाकर किसी 
लड़की की कमर या छाती पर हाथ फेर ही देता है। ऐसी स्थिति में लड़कियां अपने आपको असहज महसूस 
करती हैं। पर करें भी तो क्या करें सामने वाला बंदा अपने इस कृत्य के लिए बाकायदा सॉरी भी बोलता है 
लेकिन मौका मिलते ही दुबारा कमर या पेट पर कोहनी धंसा देता है। ज्यादातर लड़कियां इस तरह कि 
घटनाओं को नज़रअंदाज करने की कोशिश करती हैं। परन्तु कुछ लड़कियां इस घटनाओं को एन्जॉय करती 
और हंसकर टाल भी जाती हैं। विस्मय तो तब होता है जब कोई 40 -45 साल का युवक 14-15 साल की 
लड़की  को छेड़ रहा होता है और बात- बात में उसकी जांघ पर हाथ रखने से नहीं चुकता। पर ऐसी घटनाओं के 
प्रति लड़कियों को गंभीर हो जाना चाहिए और कठोर लहजे में सख्त आवाज के साथ अपना विरोध दर्शना 
चाहिए।

पिछले दिनों सलोनी के साथ भी तो आखिरकार यही तो हुआ। आखिर उसने एक मुस्कराहट का जबाब एक 
मुस्कराहट से हे तो दिया। तीन लड़के करीब एक  महीने तक उस लड़की का पीछा करते-करते उसके घर और 
ऑफिस तक पहुंचते रहे थे। नौबत यहां तक आ  गई कि वह चाक- चौराहे और बाज़ार जहां भी होती वही तीन 
गिने चुके चहरे नजर आ जाते। अंतत जब वह  इस हालत से तंग आ गई तो पुलिस को फ़ोन करना पड़ा और 
तब कहीं जाकर इस मुश्किल से निजात मिल  पाई। लेकिन महिने भर भी नहीं बीते थे कि प्रतिशोधवश उन्हीं 
मनचलों ने दुबारा उसे परेशान करना शुरू कर  दिया। फिर इस बात को वह अपने घर पर भी नहीं बता पाई। 
लेकिन स्थिति जब उसके मानसिक प्रताड़ना के  रूप में असहनीय होने लगी तो एक अपने ही हमउम्र पुरुष 
मित्र के साथ पुलिस थाने पहुंच गई। उन मनचलों  के  छेड़छाड़ ने उसे सिर्फ मानसिक प्रताड़ना का शिकार 
बनाया था पर पुलिस के सवालों ने महिला सुरक्षा  कानून का बलात्कार कर दिया। कितने दिन छेड़ रहे हैं ? 
क्यों छेड़ रहें हैं ? तुम्हारे पहले से कोई आपसी  सम्बन्ध तो नहीं हैं ? सिर्फ तुम्हें ही क्यों छेड़ते हैं ? तुमने 
इतने  छोटे कपडे क्यों पहनी हो ? तुम अपने मां-बाप  के साथ क्यों नहीं आई ? तुम्हारे साथ यह पुरुष मित्र 
कौन है ?  और ना जाने क्या- क्या ?

मैं इन्हीं सभी ख्यालों में उलझी हुई थी तभी मेरी नजर उस सीट पर पड़ी तो वह अधेड़ व्यक्ति और उसके 
बगल  वाली सीट पर बैठी महिला गायब थे। बीच में तो कोई बस स्टैंड भी नहीं आया ? लग रहा है वह व्यक्ति 
भी निर्माण विहार के उसी स्टैंड पर उतर गया जहां वह लड़की उतरी थी। क्या ? कहीं वह उस लड़की का दुबारा 
पीछा तो नहीं करेगा ? मेरे अंदर एक सवाल कौंधा परन्तु तब तक बस प्रीत विहार बस स्टैंड के करीब पहुंच 
चुकी थी। मैं बस से उतरने से पहले अपने सामान को सहेजती नजर पास में पड़े लेडीज़ बैग पर पड़ी। मैंने 
अगल बगल नजर दौड़ाई आसपास दो-चार पुरुष यात्रियों के आलावा कोई और नजर नहीं आया तो मुझे यह 
समझने में तनिक भी देर नहीं लगी की यह पर्स उस पीड़ित लड़की का ही है जो असहजता की स्थिति में 
भूलवश छोड़कर चली गई होगी। मैंने उस लावारिस बैग को उठा लिया पहले जी चाहा कि कंडक्टर को दे दे 
ताकि वह वापस ढूंढने आये तो वह लौटा दे। परन्तु फिर ख्याल आया नहीं - आजकल दूसरे का सामान भला 
कौन सहेजकर रखता और लौटाता है। और कहीं कोई जरुरी डाक्यूमेंट्स हुआ तो …?

बस से उतरने के बाद पीजी पहुंची तो घडी की छोटी सुई सात और बड़ी बारह पर थी। कनॉट प्लेस से प्रीत 
विहार पहुँचाने में करीब करीब एक घंटे का समय तो लग ही जाता है। दिन भर ऑफिस की थकान के बाद यह 
आधे घंटे की कमरतोड़ बस की यात्रा पूरे शरीर को चूस लेती है। और इस बार तो पीरियड भी पता नहीं क्यों 
पांच दिन पहले आ गया। इस ईश्वर ने भी जाने क्यों सारे दर्द हम लड़कियों के हिस्से में लिख रखे हैं ? वाशरूम 
पहुंचकर मैंने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे और वापस आकर उस बैग को टटोला ताकि ऐसा कुछ मिल जाये 
जिसके आधार पर उसे वापस लौटाया जा सके। कोई डायरी, नोट बुक, विजिटिंग कार्ड कुछ भी जिसमें अमुक 
लड़की का नाम या फिर पता लिखा हो। पर बैग में एक पैकट सैनिटरी नैपकिन, एक लंचबॉक्स और पानी की 
बोतल के आलावा कुछ दिखाई नहीं दिया। लेकिन साईड पॉकेट में हाथ डाला तो एक छोटी डायरी मिल गई। 
डायरी में कोई पता तो नहीं पर कुछ टेलीफोन नंबर जरूर थे। एक नंबर पर जिसके ऊपर पापा लिखा था मैंने 
अपने फोन से डॉयल किया तो दूसरी तरह से जो आवाज़ आई वह एक महिला की थी। मैंने बिना कोई भूमिका 
बनाए बैग के बस में मिलाने की बात बताई तो उसने धन्यवाद ज्ञापन के भाव के साथ बिना पूछे ही यह बता 
दिया हां, यह मेरी बेटी का बैग है जो 73 नंबर की डीटीसी बस में छूट गया था। मैंने फ़ोन पर ही उस महिला के 
घर का पता लिया और अगले दिन पहुंचाने का आश्वासन दिया तो उसे यह कहते देर नहीं लगी कि कोई बात 
नहीं बेटी आप अपना पता दे दो आकर मैं ही ले लूंगी। पर मैंने कोई बात नहीं कहते हुए फ़ोन काट दिया।


दूसरे दिन घर से करीब पांच बजे के आसपास घर से निकल गई। उस लड़की का घर मुख्य सड़क से दस 
मिनट  की दूरी पर एक बिल्डिंग के तीसरी मंजिल पर था। मैंने थोड़ी सी पूछताछ की और तीसरे मंजिल पर 
पहुंची। अपने आपको थोड़ा आस्वश्त किया और डोरवेल बजाकर दरवाजा खुलने का इन्तजार करने लगी। 
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला तो आवाक रह गई- यह तो वही अधेड़ आदमी था जिसे उस दिन लोगों ने बस में 
पीटा था। और उसके बगल में खड़ी महिला भी वही थी जो उस दिन इस अधेड़ के बगल वाली सीट पर बैठी थी। 
किसी अनहोनी के डर से मेरे हाथ- पैर थर- थर कांपने लगे, मुझे पल भर के लिए ऐसे लगा कि मैं किसी बहुत 
बड़ी साजिश की शिकार हो चुकी हूं। परन्तु ऐसे में अपना धैर्य खो देना किसी मूर्खता से कम नहीं था। मैंने 
अपनी आवाज़ को थोड़ा कसा तथा कठोरता और संदेह भरे लहज़े में उन दोनों की तरफ नजरे तरेरते हुए उन 
प्रश्न किया ? उन दोनों ने बिना किसी गहरे भाव के अंदर आने को कहा और एक लड़की की तरफ इशारा 
करते  हुए कहा नहीं, मेरा नहीं, मेरी बेटी का है। इसका नाम अनन्या है और यह सेकण्डरी की स्टूडेंट है।


मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ! मेरे पैर के नीचे की जमीन अब खिसके की तब खिसके। मेरे घर के अंदर 
 की तरफ बढ़ते हुए कदम अचानक दहलीज़ के बाहर ही अटक गए- क्योंकि यह लड़की भी वही लड़की थी 
 जिसने अधेड़ को थप्पड़ जड़ा था। उस वक़्त मेरे पास एक मां- एक बेटी और एक बाप के तीन चेहरे थे। मेरे मन  में उस लड़की, उस महिला, और उस पुरुष के लिए एक जोरदार समुंद्री लहर की तरह कुछ घिनौने ख्याल आए। रिश्तों के मर्म का बिना कोई परवाह किए मैं उल्टे पैर भागी। पर इन घिनौने रिश्तों से कब तक भागा जा सकता है ? इस घटना को करीब दो साल हो गए- परन्तु ऐसा लगता है कि तब से लेकर अब तक मैं एक अंतहीन रास्ते पर भागे जा रही हूं - और एक मर्दाना आवाज़ ''उस दिन जो कुछ हुआ वह महज़ एक कमजोर लम्हा था'' आज भी मेरा पीछा कर रही है। उफ्फ ! यह लम्हें भी इतने कमजोर क्यों होते हैं ? जो एक स्त्री की ढकी अथवा खुली देह में छाती, कमर और योनि तो देखते हैं पर अपनी ही बहन- बेटियों का चेहरा नहीं तलाश पाते।

 
 
 
(रचनाकार-परिचय: 
मूल नाम: संजय कुमार पाल।
जन्म: 10 अक्टूबर 1987 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद में।
शिक्षा:
स्कूली तालीम जवाहर नवोदय विद्यालय गोरखपुर से,  भारतीय मीडिया संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता व जन संचार में स्नातक, जबकि जेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन मुंबई से इसी में स्नातकोत्तर किया
कार्यक्षेत्र: एशिया के विभिन्न देशों में शोधकार्य, व्यवसायिकतौर पर मीडिया एंड टेलीविजन लेखन, साहित्य, सिनेमा, रंगमंच एवं सामाजिक कार्य में विशेष रुचि।
नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन।  25 से अधिक नाटकों का लेखन।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन व प्रसारण।
संप्रति: बीबीसी एशियन नेटवर्क में शोधकर्ता एवं किताबनामा प्रकाशन, हिन्दीनामा प्रकाशन के प्रबंध निदेशक के तौर पर संचालन।
संपर्क: sanjayshepherd@outlook.com)
 
 
 
 
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सोमवार, 23 मार्च 2015

मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू

नई पौध के तहत 10 ग़ज़लें 






 








प्रखर मालवीय  'कान्हा'  की क़लम से

1.
वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा
मर न जाऊं मैं कहीं ऐसा लगा

रेत माज़ी की मेरी आँखों में थी
सब्ज़ जंगल भी मुझे सहरा लगा

खो रहे हैं रंग तेरे होंट अब
हमनशीं ! इनपे मिरा बोसा लगा

लह्र इक निकली मेरे पहचान की
डूबते के हाथ में तिनका लगा

कर रहा था वो मुझे गुमराह क्या?
हर क़दम पे रास्ता मुड़ता लगा

कुछ नहीं..छोड़ो ..नहीं कुछ भी नहीं ..
ये नए अंदाज़ का शिकवा लगा

गेंद बल्ले पर कभी बैठी नहीं
हर दफ़ा मुझसे फ़क़त कोना लगा

 दूर जाते वक़्त बस इतना कहा
साथ ‘कान्हा’ आपका अच्छा लगा


2.

रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है
मन जैसे रूठा बच्चा हो जाता है

कितना गहरा लगता है ग़म का सागर
अश्क बहा लूं तो उथला हो जाता है

लोगों को बस याद रहेगा ताजमहल
छप्पर वाला घर क़िस्सा हो जाता है

मिट जाती है मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू
कहने को तो, घर पक्का हो जाता है

नीँद के ख़ाब खुली आँखों से जब देखूँ
दिल का इक कोना ग़ुस्सा हो जाता है

3.
ख़ला को छू के आना चाहता हूँ
मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ

मेरी ख़्वाहिश तुझे पाना नहीं है
ज़रा सा हक़ जताना चाहता हूँ

तुझे ये जान कर हैरत तो होगी
मैं अब भी मुस्कुराना चाहता हूँ

तेरे हंसने की इक आवाज़ सुन कर
तेरी महफ़िल में आना चाहता हूँ

मेरी ख़ामोशियों की बात सुन लो
ख़मोशी से बताना चाहता हूँ

 बहुत तब्दीलियाँ करनी हैं ख़ुद में
नया किरदार पाना चाहता हूँ

4.
तीरगी से रौशनी का हो गया
मैं मुक़म्मल शाइरी का हो गया

देर तक भटका मैं उसके शह्र में
और फिर उसकी गली का हो गया

सो गया आँखों तले रख के उसे
और ख़त का रंग फीका हो गया

एक बोसा ही दिया था रात ने
चाँद तू तो रात ही का हो गया ?

रात भर लड़ता रहा लहरों के साथ
सुब्ह तक ‘कान्हा’ नदी का हॊ गया !!

5.
सितम देखो कि जो खोटा नहीं है
चलन में बस वही सिक्का नहीं है

यहाँ पर सिलसिला है आंसुओं का
दिया घर में मिरे बुझता नहीं है

यही रिश्ता हमें जोड़े हुए है
कि दोनों का कोई अपना नहीं है

नये दिन में नये किरदार में हूँ
मिरा अपना कोई चेहरा नहीं है

मिरी क्या आरज़ू है क्या बताऊँ?
मिरा दिल मुझपे भी खुलता नहीं है

कभी हाथी, कभी घोड़ा बना मैं
खिलौने बिन मिरा बच्चा नहीं है

मिरे हाथोँ के ज़ख्मों की बदौलत
तिरी राहों में इक काँटा नहीं है

सफ़र में साथ हो.. गुज़रा ज़माना
थकन का फिर पता चलता नहीं है

मुझे शक है तिरी मौजूदगी पर
तू दिल में है मिरे अब या नहीं है

तिरी यादों को मैं इग्नोर कर दूँ
मगर ये दिल मिरी सुनता नहीं है

ग़ज़ल की फ़स्ल हो हर बार अच्छी
ये अब हर बार तो होना नहीं है

ज़रा सा वक़्त दो रिश्ते को ‘कान्हा’
ये धागा तो बहुत उलझा नहीं है

6.
इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे
क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझसे

गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे

मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे

इक तेरा ख़्वाब ही काफ़ी है मिरे उड़ने को
रश्क करता है मेरी जान परिंदा मुझसे

यक ब यक डूब गया अश्कों के दरिया में मैं
बाँध यादों का तेरी आज जो टूटा मुझसे

किसी पत्थर से दबी है मेरी हर इक धड़कन
सीख लो ज़ब्त का जो भी है सलीक़ा मुझसे

कोई दरवाजा नहीं खुलता मगर जान मेरी
बात करता है तेरे घर का दरीचा मुझसे

बुझ गया मैं तो ग़ज़ल पढ़ के वो जिसमें तू था
पर हुआ बज़्म की रौनक़ में इज़ाफ़ा मुझसे


7.
पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं
उनकी तस्वीर को बेकार सम्हाले हुये हैं

यार इस उम्र में घुँघरू की सदायें चुनते
‘आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये हैं’

हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं

यार अब तक न मिला छोर हमें दुनिया का
रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं

जिनके पैरों से निकाले थे कभी ख़ार बहुत
हैं मुख़ालिफ़ वही, तलवार सम्हाले हुए हैं

लोग पल भर में ही उकता गये जिससे ‘कान्हा’
हम ही बरसों से वो किरदार सम्हाले हुए हैं

8.
मैं भी गुम माज़ी में था
दरिया भी जल्दी में था

एक बला का शोरो-गुल
मेरी ख़ामोशी में था

भर आयीं उसकी आँखें
फिर दरिया कश्ती में था

एक ही मौसम तारी क्यों
दिल की फुलवारी में था ?

सहरा सहरा भटका मैं
वो दिल की बस्ती में था

लम्हा लम्हा ख़ाक हुआ
मैं भी कब जल्दी में था ?

9.
सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन
कभी तो होंगे जवाबों के सिलसिले रौशन

कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन

सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन

कहो सुनो भी किसी रात अपनी-मेरी बात
करो कभी तो हमारे ये रतजगे रौशन

वगरना दिन के उजाले में खो भी सकते हो
रखो चराग़ हर इक वक़्त ज़ह्न के रौशन

रदीफ़ छुप रही है जा के एक कोने में
ग़ज़ल में बांधे हैं हमने भी क़ाफ़िये रौशन

न कर सकेगा अँधेरा कोई तुझे अँधा
‘क़लम सम्हाल अँधेरे को जो लिखे रौशन ‘

10.
कहीं जीने से मैं डरने लगा तो….?
अज़ल के वक़्त ही घबरा गया तो ?

ये दुनिया अश्क से ग़म नापती है
अगर मैं ज़ब्त करके रह गया तो….?

ख़ुशी से नींद में ही चल बसूंगा
वो गर ख़्वाबों में ही मेरा हुआ तो…

ये ऊंची बिल्डिंगें हैं जिसके दम से
वो ख़ुद फुटपाथ पर सोया मिला तो….?

मैं बरसों से जो अब तक कह न पाया
लबों तक फिर वही आकर रूका तो….?

क़रीने से सजा कमरा है जिसका
वो ख़ुद अंदर से गर बिखरा मिला तो ?

लकीरों से हैं मेरे हाथ ख़ाली
मगर फिर भी जो वो मुझको मिला तो ?

यहां हर शख़्स रो देगा यक़ीनन
ग़ज़ल गर मैं यूं ही कहता रहा तो…..

सफ़र जारी है जिसके दम पे `कान्हा
अगर नाराज़ वो जूगनू हुआ तो?


(रचनाकार-परिचय :

जन्म :  चौबे बरोही , रसूलपुर नन्दलाल , आज़मगढ़ ( उत्तर प्रदेश ) में 14 नवंबर  1992 को । 
शिक्षा : प्रारंभिक आजमगढ़ से हुई. बरेली कॉलेज बरेली से बीकॉम  और शिब्ली नेशनल कॉलेज आजमगढ़ से एमकॉम। 
सृजन : अमर उजाला, हिंदुस्तान , हिमतरू, गृहलक्ष्मी , कादम्बनी इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ।  'दस्तक' और 'ग़ज़ल के फलक पर ' नाम से दो साझा ग़ज़ल संकलन भी प्रकाशित।
संप्रति : नोएडा से सीए की ट्रेनिंग और स्वतंत्र लेखन। 
संपर्क  : prakhar29@outlook.com )




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रविवार, 22 मार्च 2015

सूफ़ियों के रंग में रँगे कैनवास


                                                                     



















मिल्लत एकेडमी,  रांची में आयोजित रंग-ए-सूफियाना में मस्त कलंदर 
की तरह थिरकती रहीं ख्यात चित्रकारों की कूचियां
चारो ओर फैलती प्रेम व सद्भाव की खुश्बू के बीच कोई मस्त कलंदर। उसके इर्द-गिर्द कहीं कबीर व तुका की ठेठ धुसरता, तो कहीं बुल्लेशाह और अमीर खुसरू की हरियाली खुशहाल। वहीं मनुष्य की विभिन्न रंगत की तरह इठलाते रंग-बिरंगे फूल। लेकिन लरियों की भांति सभी सूफीवादी जुनून में पिरोए हुए। चित्रकार विनोद रंजन ने अपने कैनवास पर इसी मंजर को एकलेरिक कलर से उकेरा। मौका था, मिल्लत एकेडमी, हिंदपीढ़ी में आयोजित "रंग-ए-सूफियाना'' नामक कार्यक्रम का। जिसमें वरिष्ठ चित्रकार दिनेश सिंह ने अंधेरे से उजाले की ओर के लिए सूफी व निर्गुण को माध्यम बनाया। उनकी पेंटिंग में हल्के रंगों का इस्तेमाल गंभीरता और रहस्यमयता को इंगित करता रहा। देश की गंगा-यमुनी संस्कृति परंपरा के नेक मकसद से "हम एक हैं'' नामक मुहिम 1993 को राजधानी में चलाई गई थी। उसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए 23 सालों बाद शहर के नामी चित्रकार स्कूली बच्चों के बीच मौजूद थे। दिन-भर सभी मजहब, बोली और काल से निरपेक्ष सूफी आध्यात्मिकता को अपनी कूचियों से सार्थक करते रहे।

बच्चों की चुहलों के बीच कबूतरों की मीठी कूक

बच्चों की चुहलों के बीच शर्मिला ठाकुर विश्व प्रेम को दो कबूतरों की मीठी कूक के दायरे में अंकित करती हुईं मिलीं। उनके रंगों में सौम्यता झिलमिलाती गई। रमानुज शेखर के चित्र में नीले और गेरुए रंग ने सूफियों की रहस्यात्मकता व आध्यात्मिकता की पहचान कराई। सपना दास इक नूर से सब उपजाया के प्रकाश में आनंदित तीन सूफियों के अंकन में तल्लीन रहीं, तो आंगन की चटख धूप में शिल्पी रमानी सारंगी की धुन में एक-दूसरे में मग्न दो आकृतियों को रंगाकार करने में व्यस्त।

प्रेम, प्रकाश और आध्यात्मिक परिवेश

पास ही वरिष्ठ चित्रकार हरेन ठाकुर बंगाल के बाउल के बहाने सूफीवाद और दिव्य प्रेम को चित्रित करते रहे। नेपाली राइस पेपर से उन्होंने कैनवास पर बरगद ही उगा दिया। अमिताभ मुखर्जी के चित्र में प्रेम, प्रकाश और आध्यात्मिक परिवेश का क्लासिकल रंग उभरा। विश्वनाथ चक्रवर्ती ने एक सूफी के मूड को अत्यंत कलात्मक और सजीव ढंग से उकेरा। प्रवीण कर्मकार के चित्र में अभिव्यक्त होती दिव्य आध्यात्मिक प्रेम की आभा सहज ही अपनी ओर आकृष्ट करती रही।

सूफी रंग पर 4 को चढ़ेगा निर्गुण राग

स्कूल के डायरेक्टर हुसैन कच्छी ने बताया कि इसी कड़ी में अगला आयोजन चार अप्रैल को गांधी प्रतिमा, मोरहाबादी के पास होगा। जहां इन चित्रों की प्रदर्शनी होगी, साथ ही लोक गायिका चंदन तिवारी का निर्गुण गायन होगा। मौके पर राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष गुलफाम मुजीबी, दूरदर्शन के निदेशक शैलेश पंडित, मधुकर, एमजेड खान, अनवर सुहैल, सुहैल सईद, रोमा राय, सबीहा बानो, आमरीन हसन, सुल्ताना परवीन, सरोश तनवीर, अशरफ हुसैन, शालिनी साबू , ओपी वर्णवाल व नदीम खान आदि मौजूद रहे।













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बुधवार, 18 मार्च 2015

कृषिप्रधान देश फ़िलहाल किसानों का क़ब्रगाह बना रहेगा !




   










कृष्णकांत की क़लम से 

सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली. कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की. भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं. 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.
महाराष्ट्र लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है. यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बीती फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती में शरद पवार के किसी ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को किसानों का हितैषी बताया. यह गौर करने की बात है कि 1995 से अब तक बीस साल में शरद पवार दस साल कृषि मंत्री रहे और सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र में मरे. जब शरद पवार के  कथित ड्रीम प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो रहा था, तब किसानों की इन मौतों का तो कोई जिक्र नहीं हुआ, कृषि को वैश्विक बाजार में तब्दील करने की घोषणा जरूर हुई. नई सरकार आने के बाद से अब तक इस सरकार ने एक बार भी किसानों को कोई सांत्वना तक नहीं दी है कि वे कर्ज और गरीबी के चलते आत्महत्या न करें, सरकार उनकी समस्याओं को सुलझाने के कुछ उपाय करेगी.
चुनाव प्रचार के मोदी हर सभा में कहा करते थे कि देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों और किसानों का है. लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनते ही अडाणी को छह हजार करोड़ का सरकारी कर्ज दिलवाना उनकी शुरुआती बड़ी घोषणाओं में से एक थी. तब से वे दुनिया भर में घूम घूम कर पूंजीपतियों को भरोसा दे रहे हैं कि उनकी सरकार पूंजीपतियों को पूरी सुरक्षा देगी. अमेरिका से परमाणु समझौते के तहत आनन फानन में भारत सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को दुर्घटना संबंधी जवाबदेही से मुक्त कर दिया और देश के खजाने से 1500 करोड़ का मुआवजा पूल गठित कर दिया. यदि पूंजीपतियों के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा सकता है तो क्या कर्ज से मरते किसानों की जान बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ रुपए की योजनाएं नहीं शुरू की जा सकतीं?  
जब संसद में सरकार किसान आत्महत्याओं की जानकारी दे रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा पर जा चुके थे. उन्होंने जाफना में श्रीलंकाई तमिलों को भारत की मदद से बने 27 हजार मकान सौंपे और इस परियोजना के दूसरे चरण में भारत के सहयोग से और 45 हजार मकान बनाए जाने की घोषणा की. मॉरीशस को  इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 50 करोड़ डॉलर का रियायती कर्ज देने की पेशकश की. इसी तरह अनुदान और कर्ज के रूप में सेशेल्स को भी 7.50 करोड़ डालर की राशि दी गई. काश प्रधानमंत्री अपने देश में मर रहे किसानों के लिए भी कुछ करते! यदि कुछ न करते तो दिलासा देने वाली कोई घोषणा ही कर देते!
मोदी एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री हैं जहां पांच करोड़ लोग बेघर हैं. इन बेघर लोगों के लिए मोदी सरकार ने कोई पहल की हो, ऐसा अभी सुनने में नहीं आया है. सरकार भूमि अधिग्रहण बिल के लिए जरूर पूरा जोर लगा चुकी है जिसके तहत किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीनें लेकर कारपोरेट को सस्ते दाम में देने की योजना है. 
यह वही देश है जो स्मार्ट सिटी बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने की बात करता है, लेकिन इस पर कोई बात नहीं करता कि उसकी कितनी आबादी बेघर है, भूखी है। पहले से चल रही खटारा ट्रेनों में पानी नहीं होते. ज्यादातर जनसंख्या को पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं है. यहां इस पर कोई बात नहीं होती कि हर साल करीब साढ़े तेरह लाख बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले मर जाते हैं. इसका कारण डायरिया और निमोनिया जैसी साधारण बीमारियां हैं. हम इन शर्मनाक आंकड़ों पर कभी शर्मिंदा नहीं होते.
जब प्रधानमंत्री उद्योगपतियों को विश्वास में लेने के लिए ताबड़तोड़ कॉरपोरेट हितैषी घोषणाएं कर रहे हैं और दुनिया भर में घूम घूम कर आर्थिक मदद बांट रहे हैं, उसी समय में स्वाइन फ्लू से अबतक 1600 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और करीब 50 हजार पर यह खतरा बना हुआ है. यदि स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी से इतनी मौतें अमेरिका या यूरोपीय देशों में ​होतीं तो क्या वहां ऐसी ही चैन की बंसी बज रही होती?
चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने किसानों को लेकर बहुत बड़ी बड़ी बातें की थीं लेकिन अब किसान उनकी चिंताओं में नहीं हैं. भाजपा ने वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा. लेकिन सरकार बनाने के बाद मोदी एंड टीम का पूरा जोर कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है. उनकी प्राथमिकता में कृषि और किसान कहीं नहीं हैं. सरकार मेक इन इंडिया के लिए तो मशक्कत कर रही है लेकिन कृषि के लिए उसके पास कोई योजना या सोच नहीं है. देश की करीब 60 प्रतशित जनसंख्या की आजीविका का आधार कृषि क्षेत्र है. लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है. जबकि कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहे हैं. चालू वित्त वर्ष (2014-15) में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान है.
कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी.बजट में किसानों के लिए कुछ खास नहीं रहा. सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है. हालिया बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया कि कॉरपोरेट टैक्स को अगले चार सालों 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किया जाएगा. मोदी सरकार की अब तक की नीतियों और केंद्रीय बजट का संदेश साफ है कि किसानों को वह सांत्वना मात्र देने को तैयार नहीं हैं. यह  कृषिप्रधान देश फ़िलहाल किसानों का क़ब्रगाह बना रहेगा !


(रचनाकार-परिचय:
जन्म:  30 अगस्त 1986 को  उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में।
शिक्षा: इलाहाबाद विवि से पत्रकारिता में एमए।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएं और कहानियां प्रकाशित
ब्लॉग : कृष्‍णकांत कहानियां लिखता है...
संप्रति:  दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में बतौर चीफ सब एडीटर कार्यरत
संपर्क : krishnkant1986@gmail.com)



 कृष्‍णकांत के और लेख हमज़बान पर ही


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मंगलवार, 17 मार्च 2015

गाँव भर में चर्चा है वो भाग गयी

नई पौध के तहत आठ कविताएं










वर्षा गोरछिया  'सत्या' की क़लम से


कार्बन पेपर
 
सुनो न
कहीं से कोई
कार्बन पेपर ले आओ
खूबसूरत इस वक़्त की
कुछ नकलें निकालें

कितनी पर्चियों में
जीते हैं हम
लम्हों की बेशकीमती
रसीदें  भी तो हैं
कुछ तो हिसाब
रक्खें इनका

किस्मत
पक्की पर्ची तो
रख लेगी ज़िंदगी की
कुछ कच्ची पर्चियां
हमारे पास भी तो होनी चाहिए

कुछ नकलें
कुछ रसीदें
लिखाइयां कुछ
मुट्ठियों में हो
तो तसल्ली रहेगी

सुनो न
कहीं से कोई
कार्बन पेपर ले आओ
 
चादरें वक़्त की

आओ दोनों मिलकर
जला दें
वक़्त की वो चादरें
बीच है जो हमारे
और
जो आने वाली है
गवारा नहीं मुझे ये
बेतुकी दलीलें वक़्त की
तुम भी कहाँ उस के
हक़ में फैसला चाहते हो
तो क्यों न मिलकर
एक साज़िश रचें
वक़्त के खिलाफ
दिलों की दियासलाई से
कुछ मोहब्बत की तिल्लियाँ निकालें
जज्बातों की परतों से
एक चिंगारी निकालें
और सुलगा दें
ये काली चादर

आओ न दोनों मिलकर
जला दें
वक़्त की चादरें

चूड़ियाँ

जानते हो तुम?
मुझे चूड़ियाँ पसंद हैं
लाल ,नीली ,हरी ,पीली
हर रंग की चूड़ियाँ
जहाँ भी देखती हूँ
चूड़ियों से भरी रेड़ी
जी चाहता है
तुम सारी खरीद दो मुझे
मगर तुम नही होते
ना मेरे साथ
 ना मेरे पास
खुद ही खरीद लेती हूँ नाम से तुम्हारे
पहनती हूँ छनकाती हूँ उन्हें
बहुत अच्छी लगती है हाथो में मेरे
कहते रहते हो तुम
कानो में मेरे चुपके से
जानते हो तुम ? 

मोहब्बत का घर

याद रहे
चाहतों का ये शहर
ख़्वाबों का मोहल्ला
इश्क़ की गली
और कच्चा मकां मोहब्बत का
जो हमारा है
खुशबुओं की दीवारें हैं जहाँ
एहसासों की छतें
हंसी और आंसूओं से
लीपा-पुता आँगन
हरा-भरा
गहरी छाँव वाला
प्यार का एक पेड़ है जहां

किस्सों के चौके में
बातों के कुछ बर्तन
औंधे हैं शर्मीले से
तो कुछ सीधे मुस्कुराते हुए

कुछ बर्तन काले भी हैं
शिकायतों के धुंए से
वो हमारा मुँह ताकते हैं
कि क्यों नहीं हमने
रगड़कर उन्हें साफ़ किया

भीतर एक ट्रंक भी है
लम्हों से भरा
रेशमी चादरों में
यादों की सलवटें हैं
आले में जलता चिराग़
वो खूंटियों पर लटकते
दो जिस्म
जंगलों और खिड़कियों से
झांकते चाहतें हमारी
दरवाज़े की चौखट से
टपकती हुई
बरसातों की पागल बूँदें कुछ
हवा के कुछ झोंके

और न जाने क्या क्या
सब बिक जाएगा इक दिन
समाज के हाथों
रिवाज़ें बोलियाँ लगाएंगी
ज़ात भाव बढ़ाएगी अपना
और खरीद लेंगे
जनम के जमींदार
वो मकां हमारा

रात गुजर गई

रात गुजर रही है
कमरे की बिखरी चीजें उठाते हुए 
सब कुछ बिखरा है 
तुम्हारे जाने के बाद 
तुम्हारी चहल कदमी
घूमती रहती है आँगन में 
सांसे कुछ फुसफुसा जाती है
कानो में मेरे 
बिस्तर की सलवटें अकेली हैं 
नाराज है तुमसे 
बातों के ढेर लगे है एक एक को लपेटती जाती हूँ 
और रखती जाती हूँ अलमारी में 
गठरियाँ हैं कुछ 
मुस्कुराहटो की 
अलमारी के ऊपर रख दी है 
कमरे का फर्स ठंठा है 
गीला है मेरे आंशुओ से 
उफ़ ! बालकनी में चाँद भी तो है 
कितना कुछ बिखरा है 
थककर चूर हूँ 
कितनी यादे बगल में लेटी हैं 
नींदे माथे को चूम रही हैं 
रात गुजर गई 
कमरे की बिखरी चीजे उठाते हुए


संकरी सी उस गली में

संकरी सी उस गली में
दोनों तरफ हजारों जज्बातों की
खिड़कियां खुलती है
जुगनू टिमटिमाते है
रूई के फ़ाहों से
लम्हे तैरते हैं
शाम रंग सपने झिलमिलाते हैं
तितिलियों के पंखो का
संगीत घुलता है
रेशमी लफ्जो की खुशबू महकती है
संकरी सी उस गली में
तेरी आँखों से
मेरे दिल तक जो पहुचती है ..
 
सौदा

चलो हम ये दुनिया बेच दें
खरीद ले बदले में
वो चांदनी की रात
बुने रेशम की एक चादर
लगाए किस्मत की छत पर
सफेद बिछौना
ज़ख्मों का एक तकिया भरें
तकिया वो मेरे सिरहाने रहे
तुम मेरे सीने पे
सर रख कर सो जाओ
तो ज़ख्मों की चुभन कहाँ होगी
तेरे मेरे दर्द का
एक चकोर खाने वाला
कम्बल बुनें
एक टुकड़ा दर्द तेरा
एक टुकड़ा मेरा
चकोर खानों में दर्द भरें
एक खाना तेरा
एक खाना मेरा
ओढ़कर सो जाएं दोनों
आ मर्ज़ी का सौदा करें
ये दुनिया आज बेच दें
 
हरियाणा

गाँव भर में
चर्चा है
वो भाग गयी
बदचलन थी
कई दिनों से लक्षण ठीक नहीं थे
मटक मटक कर चलती
ओढ़नी कभी सर पे नहीं रखती
कुल को डुबो गयी

आकर देखे कोई अब
तीन हफ़्तों से
मिट्टी-तले सो रही है
कहाँ गयी
यहीं तो है
   
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(रचनाकार-परिचय :
जन्म : 14 फ़रवरी 1989 को फ़तेहाबाद (हरियाणा) में
शिक्षा : स्नातक (Bachelor in tourism management)
सृजन : पहली बार हमज़बान में
संप्रति :  स्वतंत्र लेखन
संपर्क :  varshagorchhia89@gmail.com







   

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रविवार, 15 मार्च 2015

चंद्रशेखर के मुनीश्वर भाई, सुषमा के दादा

मुनीश्वर बाबू अपनी लाडली बिटिया प्रीति (लेखिका) के साथ
स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता  मुनीश्वर प्रसाद सिंह  पर उनकी बेटी का संस्मरण


प्रीति सिंह की क़लम से



एक बार फिर सामने हूं अपने बाबूजी की कुछ यादें लेकर। वो यादें जो मुझे हर पल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं । अगर आपको कोई राह दिखाने वाला हो, तो जीवन कितना सुगम बन जाता है. यह वही जान समझ सकता है जिसे जीवन पथ पर किसी अपने का साथ मिला हो। आज जब लोग किसी का काम बिना जान-पहचान के करने को तैयार नहीं होते। वैसी दुनिया में बाबूजीजी ने कितने अंजान लोगों की सहायता की है। उनका कहना था कि हम सिर्फ निमित्त होते हैं, मदद करने वाला तो ईश्वर होता है और जब ईश्वर ने जब हमें किसी को पास सहायता के लिए भेजा है तो फिर हम उसकी मदद नहीं करके ईश्वर का अपमान करेंगे। इसीलिए हर किसी की मदद को वो हर क्षण प्रस्तुत रहते थे।


जब मोटरसाइकिल हुई खराब,  बाबूजी ने दी बेटी-पिता को लिफ़्ट
उम्दा शख्सियत वाले बाबू जी का दिल दूसरों के लिए भी कितनी दया और सहानुभूति से भरा हुआ था, इसे बताने के लिए एक कहानी काफी होगी। एक बार देर रात हाजीपुर से किसी मीटिंग में हिस्सा लेकर बाबूजी घर लौट रहे थे। उनकी पुरानी एम्बेसडर कार को भैया  चला रहा था। साथ में सरकार की ओर से मिला बॉडीगॉर्ड भी था। गांधी सेतु पर उन्होंने एक मोटरसाइकिल चालक को अपनी गाड़ी घसीटते देखा। उनके साथ दो लड़कियां भी थीं। ये देखकर बाबूजी को ये समझते देर नहीं लगी कि मोटरसाइकिल खराब हो गई है। इतनी रात में उन्हें अकेले देखकर उन्होंने  कार रुकवाई और अपने बॉडीगॉर्ड हवलदार कलक्टर सिंह को मोटरसाइकिल वाले को गाड़ी में चलने का आग्रह लेकर भेजा। अंजान लोगों की ओर से मदद की पेशकश देखकर मोटरसाइकिल चालक थोड़ा घबराए । जमाने की हवा ही ऐसी है कि किसी को किसी पर यकीन नहीं आता। आज की इस मतलबी दुनिया में निस्वार्थ मदद भी सामने वाले के मन में संदेह पैदा करती  है। असमजंस में पड़े उस शख्स को देखकर बाबूजी ने उन्हें खुद अपना परिचय दिया और देर रात पैदल दो बेटियों को अपने साथ लेकर जाने से उन्हें मना किया। भैया ने मोटरसाइकिल को कार में टोचन किया। उसको हवलदार साहब लेकर चले। जबकि कार में वो व्यक्ति और उनकी दोनों बेटियां बैठीं।  बाबूजी ने उन्हें गंतव्य पर उतार कर ही राहत की सांस ली। ऐसी कई घटनायें हैं। उन्होंने न जाने कितने लोगों को प्रोफेसर, इंजीनियर और डॉक्टर बनवाया। कितने लोगों की पढ़ाई में मदद की और न जाने कितनों को राजनीति का ककहरा सिखाया। लेकिन समय के साथ लोग आगे बढ़ते चले गए और उन्हें ही भूल बैठे।

आचार्य कृपलानी का घड़ा सुचेता की फ्रिज

बाबूजी की तेज बुद्धि, निर्णय लेने की अद्भुत शक्ति, जबरदस्त उत्साह और सकारात्मक सोच का कुछ भी प्रतिशत मुझमें होता तो मैं खुद को धन्य मानती।  युवावस्था में जब बाबूजी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे तब उन्हें पार्टी के कद्दावर नेता जेबी कृपलानी को चुनाव लड़ने के लिए मनाने की जिम्मेवारी दी गई। उस वक्त तक जेबी कृपलानी  ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया था और पार्टी के तमाम बड़े नेता उन्हें मना कर थक चुके थे। उनका चुनाव लड़ना जरुरी था। क्योंकि पार्टी को इसकी जरुरत थी। उस वक्त लोग उसूलों के लिए चुनाव लड़ते थे, न कि अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए। खैर, सब ओर से हारकर हाईकमान ने बाबूजी को ये जिम्मेवारी सौंपी। बता दें कि जेबी कृपलानी देश के कद्दावर समाजवादी नेताओं में से एक थे और उनकी धर्मपत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस की नेता। सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और देश की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। लेकिन वैचारिक दृष्टिकोण अलग-अलग होने की वजह से दोनों अलग-अलग पार्टियों में थे। बहरहाल, जब बाबूजी आचार्य कृपलानी को मनाने पहुंचे तो उस वक्त भीषण गर्मी थी। बातचीत के दौरान आचार्य कृपलानी ने  फिर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। बाबूजी ने उन्हें कई तर्क-वितर्क के द्वारा मनाने की कोशिश की। अचानक बीच में आचार्य कृपलानी ने बाबूजी से पानी पीने के लिए पूछा। चूंकि मौसम गर्मी का था। प्यास बाबूजी को भी लगी थी। उन्होंने पानी के लिए हां कर दिया। इस पर कृपलानी जी ने पूछा कि तुम किसका पानी पीना पसंद करोगे, मेरा या सुचेता का? बाबूजी ने कहा कि आपका। पानी पिलाने के बाद कृपलानी जी ने एक बार फिर बाबूजी से पूछा कि आखिर तुमने मेरा पानी क्यों चुना और इस प्रश्न के पूछने के पीछे मेरा मकसद क्या था? तब बाबूजी ने बहुत शांत लहजे में कहा कि – दरअसल आप इस प्रश्न के द्वारा मेरी बुद्धिमता और मेरे मकसद को जानना चाहते थे। आपने किसका पानी पियोगे ये पूछकर पार्टी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को भी जांचा। चूंकि सुचेता जी कांग्रेस नेता और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं तो जाहिर सी बात है कि उनके पास फ्रिज होगा। जबकि आप सोशलिस्ट नेता हैं तो आपके पास घड़ा है। इसीलिए आपने पूछा कि तुम सुचेता का या मेरा पानी पियोगे? और चूंकि मैं आपके दल का कार्यकर्ता हूं और आपका अनुयायी भी। इसीलिए मैंने  फ्रिज के बजाय घड़े के पानी को पीना स्वीकार किया। कृपलानी जी बाबूजी के इस जवाब से काफी खुश हुए और उन्होंने चुनाव लड़ने की बात को मान लिया। पार्टी की ओर से उन्होंने बांका से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से विजयी हुए। कृपलानी जी ने बाबूजी की जमकर तारीफ की और आलाकमान को भी युवा नेता के तौर पर उनको पार्टी में शामिल करने करने के लिए बधाई दी।


खर्च अपना पैरवी दूसरों की किया करते थे
हालांकि सच और बेबाक बोलने की अपनी आदत की वजह से वो कई बार न होने वाले काम के लिए अपनी असमर्थता भी जता देते थे। आज-कल के नेताओं की तरह झूठे आश्वासन देकर लोगों को अपने पीछे घुमाना उन्होंने नहीं सिखा था। कई बार शुभचिंतकों ने उन्हें लोगों के मुंह पर काम नहीं होने की बात न बोलने की सलाह भी दी। लेकिन उन्होंने हर बार इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि किसी के मन में झूठी उम्मीद को जगाया जाये।  आज जहां राजनेता काम कराने के बदले रुपये लेते हैं। वहीं बाबूजीजी अपने रुपये खर्च कर उनकी पैरवी किया करते थे। बार-बार फोन करने की वजह से टेलीफोन का बिल हजारों रुपये का आता था। और-तो-और वो घरवालों को भी परेशान कर दिया करते थे। कई बार तो उनकी इस परोपकार की प्रवृति से हमलोग चिढ़ जाया करते थे। लेकिन उनका कहना था कि किसी भी सूरत में प्रत्येक इंसान का ये कर्तव्य है कि वो दूसरों की मदद करे और वो भी बिना किसी स्वार्थ के। इसीलिए शायद ये गुण जाने-अंजाने मुझ में भी आ गया। बाबूजी को देश के बड़े-बड़े राजनेताओं का प्रेम और सम्मान मिला। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने हमेशा उन्हें मुनीश्वर भाई कह कर ही संबोधित किया। तो सुषमा स्वराज उन्हें दादा कहकर बुलाती थीं। दक्षिण के वरिष्ठ राजनेता रामकृष्ण हेगड़े उनके प्रगाढ़ मित्रों में से एक थे। इन सबके बावजूद बाबूजी ने अपनी राजनीतिक पहुंच का फायदा कभी भी अपने परिवार या बच्चों के लिए नहीं उठाया। उन्हें अपनी कर्मभूमि महनार से असीम लगाव था। तभी तो पार्टी द्वारा कई बार लोकसभा चुनाव लड़ने की गुजारिश के बाद भी उन्होंने सिर्फ इसलिए महनार विधानसभा नहीं छोड़ा कि वो अपने क्षेत्र से दूर चले जायेंगे, जो कि उन्हें किसी भी सूरत में गवारा न था। लेकिन कहते हैं न कि ज्यादा प्रेम तकलीफ भी लेकर आता है। तभी तो इस क्षेत्र ने उन्हें 1995 के चुनाव में वो दर्द दिया, जो लंबे समय तक उनके जेहन में ताजा रहा। इस चोट ने उन्हें राजनीति का परित्याग करने को मजबूर कर दिया। ओछी राजनीति ने उन्हें गहरी पीड़ा दी और उन्होंने सक्रिय राजनीति से एक दूरी बना ली।

 ऐसी खुशबू कहां से लाऊंगी
बाबूजी धार्मिक रुढ़ियों को नहीं मानते थे। लेकिन अध्यात्म में उनकी गहरी रुचि थी। खाली वक्त में वो रामायण, महाभारत और गीता पढ़ते थे। हमलोगों से भी वो अक्सर कहते थे कि इन पुस्तकों को पढ़ो। धार्मिक पुस्तकें समझ कर नहीं, बल्कि ज्ञान हासिल करने के लिए। उन्हें पढ़ने का बेहद शौक था। वो पुस्तकों का गहन अध्ययन करते थे। मुझे याद है.. जब बाबू जी  विधायक थे तो मुझे विधानसभा के पुस्तकालय से अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर पढ़ने के लिए देते थे। चंद्रकांता संतति का संपूर्ण भाग मैंने जब पढ़ा था। उस वक्त मैं सांतवीं कक्षा की छात्रा थी। पटना में पुस्तक मेला से पुस्तकें लाने के लिए भी  उत्साहित करते थे और रुपये देकर पुस्तकें खरीदने भेजा करते थे। अपनी अस्वस्थता के दौर में जब वो पढ़ने-लिखने में असमर्थ हो गए थे। उस वक्त मैं उन्हें अखबार और किताबें पढ़कर सुनाया करती थी। ये दौर बेहद पीड़ादायक था। जब कोई अपना लाचार होकर बिस्तर पर पड़ जाता है तो उसके साथ-साथ पूरे परिवार को उस दर्द को झेलना पड़ता है। हालांकि बाबूजी ने कभी अपनी शारीरिक बेबसी की वजह से घरवालों को कोई तकलीफ नहीं पहुंचाई। लेकिन जो शख्स महीनों तक घर नहीं आते थे। जिनका एक-एक पल कीमती था। वो आज जिस तरह से बिस्तर पर पड़े हुए थे। ये खुद में दुखद था। घड़ी की घंटी को सुनकर वो अपने बगल में रखी हाथ घड़ी को उठाकर देखते थे और समय काटते थे। उन्हें बिस्तर पर पड़े-पड़े यूं समय काटते देख मैं कितनी बार रोई हूं। जब शाम को मैं उनके कंधे पर सिर रखकर उनके बगल में सो जाती थी। तो स्वर्ग का सुख भी उसके सामने फीका नजर आता था। हां, मेरे बाबूजी वो इंसान हैं जिनसे मैंने  जिंदगी में सबसे ज्यादा प्यार किया। वो बेमिसाल थे। हालांकि अब मुझे लगता है कि कई बार मैंने उन्हें उतना समय नहीं दिया, जितना देना चाहिए था। कई बार मैंने उनसे गुस्से में बात की और कई बार बेवजह बहस भी की। लेकिन ये हमें तब कब अहसास होता है जब हम अपनों के साथ होते हैं। उन्हें खोने के बाद ही हम उनका मोल समझते हैं। लेकिन तब पछतावे और आंसू के अलावे कुछ नहीं रह जाता। मां-बाप आपके सिर की वो छत होते हैं जो आपको हर मौसम की मार से बचाते हैं और इसका अहसास तब होता है जब सब कुछ खत्म हो जाता है। मुझे लगता है सात्विक लोगों के शरीरों से अच्छी सुंगध निकलती है। बाबूजी के कपड़ों और उनकी देह से भी ये खुशबू आती थी। उनके शरीर से निकलने वाली इस सुंगध को मैं लाखों-करोड़ों लोगों सुगंध में भी पहचान सकती हूं। वो अपनी तरह की अलग एक ऐसी खुशबू थी जिसे शायद मैं ही पहचानती हूं। ये इस कारण भी शायद संभव था। क्योंकि मैं अतिसंवेदनशील हूं।


. . . और  डायरी का वो पन्ना

बाबूजी  हर दिन की अपनी गतिविधियों और विचारों को  डायरी में लिखते थे। वो हमें भी डायरी लिखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। बीमारी में जब वो लिख पाने में असमर्थ थे तो उनकी डायरी मैं लिखती थी। ये नियम था। वो अपनी बातें बताते जाते थे और मैं लिखती जाती थी। आज जब उन डायरियों को पढ़ती हूं तो सारी बातें आंखों के सामने किसी रील की तरह आकर चली जाती है। अगर आत्मा की आत्मा से भेंट होती है तो मैं मौत के बाद अपने बाबूजी की आत्मा से सबसे पहले मिलना चाहूंगी। काश कि ये दुनिया एक बार और वक्त को पलट देता तो मैं अपने बाबूजी के साथ और भी समय बिता पाती। वो सारी गलतियां जो मैंने जाने-अंजाने की। उन सभी को मैं दूर कर देती। लेकिन शायद यही जीवन है। यहां कुछ भी हमेशा नहीं रहता। रह जाती हैं तो बस यादें और वो गलतियां, जो हमें अपने बुरे बर्ताव और अपनी बेवकूफियों की याद हमेशा दिलाती रहती हैं।

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल एक संस्थान में कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में अस्थायी  उद्घोषक
संपर्क: pritisingh592@gmail.com)

हमज़बान पर पहले भी प्रीति सिंह को पढ़ें
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मंगलवार, 10 मार्च 2015

दीमापुर में क़ानून भी मरा है


कीजिये बर्बरता को सलाम! 








 





वसीम अकरम त्यागी की क़लम से

नागालैंड  के दीमापुर में जो हुआ है उसे कुछ लोग समुदाय विशेष से जोड़ कर देख रहे हैं.  उसमें हिंदू -मुस्लिम खोजा जा रहा है.  इस खोजबीन के सिलसिले में वे सवाल पीछे छूट रहे हैं जो इस प्रकार की घटना के समय उठने चाहियें। शायद यह एसी पहली घटना है जिसमें भीड़ ने जेल के अंदर से किसी व्यक्ति को निकाला और आठ किलो मीटर तक उसके घसीट – घसीट कर पीटा और फिर मार दिया गया। इस घटना ने कॉलेज की दीवार पर लिखी उस पंक्ति को गलत साबित कर दिया जिसमें लिखा था ‘पाप से डरो, पापी से नहीं’ जाने वो कैसे लोग थे जिन्होंने दीवारों पर इस इबारत को लिखा था और यह कैसे लोग हैं जो उसे पढ़ नहीं पाये, समझ नहीं पाये। हजारों की भीड़ में क्या एक भी शख्स एसा नहीं रहा होगा जिसका सीना इंसानों का हो। एक व्यक्ति को मारना, और जलील करके मारना इसमें बहुत बड़ा फर्क है यह सबकुछ पुलिस की मौजूदगी में हुआ समर अनार्य के शब्दों में कहा जाये तो ‘जाति, धर्म, लिंग, भाषा- किन आधारों पर भीड़ द्वारा दीमापुर में एक बलात्कार आरोपी को जेल, यानी सरकारी अभिरक्षा, से निकाल कर मार दिया जाना कैसे 16 दिसम्बर से कम बर्बर है? कौन है जो एजेंडा सेट करता है कि कौन से अपराध उन्माद पैदा करेंगे, किन अपराधों से उन्माद पैदा करवाया जाएगा और कौन से बस यूं ही अपवाद की तरह भूल दिए जायेंगे’ ?

भीड़ का गुस्सा तो इसको नहीं कहा जा सकता बल्कि यह तो सुनियोजित तरीके से की गई एक हत्या थी जिसमें स्थानीय प्रशासन, जेल प्रशासन और क्षेत्रीय राजनीति की भूमिका सवालों में है। अगर बलात्कार के खिलाफ यह गुस्सा था तो फिर यह गुस्सा उस वक्त क्यों नहीं जब 2012 में अंडमान निकोबार में विदेशी पर्यटकों ने दो रोटी का लालच देकर आदीवासी महिलाओं को नंगा नचाया था ? उनके कपड़े उतरवाकर उनसे डांस करवाया और फिर उसकी वीडियो भी बनाई जिसे यूट्यूब पर शेयर किया गया। उन विदेशी पर्यटकों पर किसी को गुस्सा क्यों नहीं आया ? 

बहरहाल जैसा मंजर दीमापुर का रहा है वह हम सबकी आंखों के सामने है तरह – तरह की प्रतिक्रियाऐं सामने भी आई हैं। कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है अपराध करता है उसके लिये सजा आईपीसी तय करेगी या फिर हजारों की वह भीड़ जिसने भारी सुरक्षा के बीच (भारी पुलिस बल) एक व्यक्ति को जेल से निकाला और फिर नंगा करके मारते हुऐ उसे सात – आठ किलो मीटर तक पैदल घसीटा ? जाहिर यह दूरी कोई दस पांच मिनट में तो तय नहीं हो गई होगी इसके लिये कमसे कम दो से तीन घंटे का समय लगा होगा क्या इस अंतराल में भी पुलिस का लापरवाह बने रहना उसके लिये उत्तरदायी नहीं ? अगर सबकुछ भीड़ को ही करना है तो फिर यह अदालतें, कानून की मोटी-मोटी किताबें, जज, वकील, गाऊन किसलिये हैं ? फिर इनकी जरूरत ही क्या है ? जब सब कुछ भीड़ ही करेगी तो फिर उखाड़ कर क्यों नहीं फेंक दिया जाता इन संस्थानों को जिनकी ओर पीड़ितों की आंखें न्याय मिलने की बांट में सूखी जा रही है ? दीमापुर की घटना महज एक घटना ही नहीं बल्कि इसने यह साबित किया है कि संविधान की दुहाई देने वाले राज्यों में कानून के प्रति लोगों की आस्था ही नहीं है, कुछ पुलिस बल का सहारा लेकर कुछ भी किया जा सकता है ?
तुर्रा यह कि सैयद फरीद बंग्लादेशी था यह कैसी अजीब विडंबना है मृतक के प्रति लोगों की सहानूभूति को विदेशी कहकर कम किया जा रहा है। क्या नागा काउंसिल  इस बात का जवाब दे सकती है कि अगर फरीद बंग्लादेशी था तो 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद होने वाला उसका भाई सैयद इस्लामुद्दीन भारतीय सेना में कैसे पहुंच गया ? जिस पचास रुपये का तर्क नागा काउंसिल की तरफ से दिया गया है कि पचास रुपये में भारतीय नागरिकता मिल जाती है,  वह कितना भौंडा है! क्या पचास रुपये खर्च करने के बाद ही कोई विदेशी भारतीय सेना में पहुंच जाता है ? फिर पचास रुपये की ‘लाज’ के लिये अपनी जान भी देश के लिये दे देता है ? फरीद के पिता भी वायू सेना में रहे, यानी पिछली दो पीढ़ियों से यह परिवार सेना में रहा उसके बावजूद भी संविधान और राष्ट्र से ऊपर होते दिख रहे नागा काउंसिल को मृतक बंग्लादेशी नजर आया। 

कई बार दिमाग में यह सवाल आता है कि जब झूठा बलात्कार करने की सजा वह थी जो फरीद को मिली,  फिर उन पुलिसकर्मियों को जिनकी आंखों के सामने यह सबकुछ हुआ, बलात्कार का आरोप लगाने वाली युवती, व फरीद की क्रूरतापूर्वक हत्या करने वाले उन लोगों को कौनसी सजा दी जायेगी ? जिन्होंने खुद को देश के संविधान से बड़ा साबित किया है।


(रचनाकार -परिचय:
जन्म :  उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में एक छोटे से गांव अमीनाबाद उर्फ बड़ा गांव में 12 अक्टूबर 1988 को ।
शिक्षा : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता व  संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और स्नताकोत्तर।
सृजन : समसामायिक और दलित मुस्लिम मुद्दों पर ढेरों  रपट और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
संप्रति :  मुस्लिम टुडे में उपसंपादक/ रिपोर्टर
संपर्क : wasimakram323@gmail.com

हमज़बान पर वसीम अकरम त्यागी के और लेख
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