बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 12 मई 2015

धर्मांतरण बनाम घर वापसी

चित भी उनका, पट भी उनकी











पंकज साव की क़लम से

आगरा में हुई कथित 'घर वापसी' की खबर मीडिया के लिए भले बासी हो चुकी है। लेकिन उसके अर्थ व भाव भारतीय लोक चेतना को रह-रहकर उद्वेलित करते रहेंगे। क्योंकि इस घटना को स्वाभाविक मान लेना बौद्धिक भोलेपन के सिवा कुछ नहीं है। कुछ घटनाओं की कड़ियां जोड़ने पर यह बात साफ हो जाती है कि इसे हवा देने में उन्हीं तत्वों का हाथ है, जो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह धर्मांतरण के खिलाफ कानून बन जाए ताकि उनका 'हिन्दू राष्ट्र का सपना' साकार हो सके। पिछली सरकारों की दूरदर्शिता अथवा हिन्दुत्ववादी ताकतों के सत्ता पर उतनी मजबूत पकड़ (जो अब है) से दूर होने के कारण इस तरह का कानून बनाना अब तक संभव नहीं हो सका था।

आठ दिसंबर को आगरा के 57 गरीब मुसलमानों ने हिन्दू धर्म अपना लिया। यह धर्मांतरण की घटना थी, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अन्य हिन्दूवादी संगठन घर वापसी कहते हैं। आरएसएस के ही एक विंग धर्म जागरण समिति की इसमें मुख्य भूमिका थी। यह समिति देश के बहुत से हिस्सों में अन्य धर्मों के लोगों को हिन्दू बनाने का काम कई सालों से कर रही है, पर गोपनीय तरीके से। लेकिन, इस बार इसी समिति के एक नेता ने आगरा की घटना के बाद घोषणा कर दी कि क्रिसमस के दिन पांच हजार ईसाइयों को हिन्दू बनाया जाएगा। केंद्र ने राज्य सरकार के पाले में गेंद डालते हुए खुद को मामले से दूर कर लिया, मगर बयानबाजी जारी रही।

पिछले वर्ष मई में देश में मोदी सरकार बनने के सात महीने के अंदर आगरा में ऐसा हुआ और संसद से सड़क तक बहस छिड़ गई। इसमें मीडिया की भूमिका अहम रही। संसद में भाजपा नेताओं की ओर से धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाने की वकालत के पीछे उनके मातृ संगठन की ही बरसों पुरानी मांग है। संसद के बाद देश भर में योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, अमित शाह के बयान यह साबित करने के लिए काफी हैं कि धर्मांतरण को चर्चा में लाने में वे सफल हो गए हैं। मिला-जुलाकर उनकी बातों का यही मतलब बना कि या तो घर वापसी (जो वास्तव में धर्मांतरण ही है) का विरोध बंद कर दिया जाए या फिर धर्मांतरण के खिलाफ कानून बना दिया जाए। आरएसएस-भाजपा के लिए ये दोनों ही स्थितियों में 'चित भी उनका है और पट भी उनकी'

आरएसएस शुरू से धर्मांतरण का विरोधी रहा है। इसके खिलाफ कानून बनाने की उसकी मांग पुरानी है। कानून बनवाने में सक्षम नहीं होने पर हिन्दुओं की घटती आबादी का ढिंढोरा पीटते हुए उसने आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का जवाब देने के लिए वनवासी आश्रम, वन बंधु परिषद, एकल विद्यालय जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए। लेकिन मिशनरियों की सेवा भावना, आधुनिक सोच, संसाधनों की ताकत के आगे उनकी कोशिशें बौनी ही रहीं। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देश के बड़े इलाके में आधुनिक स्कूलों, हॉस्पिटल्स, रोजगार प्रशिक्षण केंद्रों के फैले जाल ने मिशनरियों को जो ताकत दी है, उसका सत्ता की बदौलत संघ मुकाबला करना चाहता है। उसके इस मिशन में भाजपा बहुत चालाकी से साथ देती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने 'झुंझलाहट' में पद छोड़ने की जो चेतावनी दी थी, उसमें सच्चाई खोजना हमारी भूल होगी। धर्मांतरण की चर्चा का एक और फायदा सरकार को और हुआ है कि जनता और मीडिया का ध्यान उन जमीनी मुद्दों से भटका, जिन पर नई सरकार कुछ उल्लेखनीय कर पाने में नाकाम रही है।

(लेखक-परिचय :
जन्म: 8 अक्टूबर 1986 को हज़ारीबाग (झारखंड) में
शिक्षा : संत कोलंबा कॉलेज, हजारीबाग से कला स्नातक तथा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि, भोपाल से MA in Mass Communication
सृजन : छिटपुट यत्र-तत्र लेख, रपट प्रकाशित
2011 से पत्रकारिता की शुरुआत
संप्रति : रायपुर में दैनिक भास्कर डॉट कॉम से संबद्ध
संपर्क : pankajsaw86@gmail.com )




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1 comments: on "धर्मांतरण बनाम घर वापसी"

sudhir sharma ने कहा…

देश के लुटेरों को जो आदर्श मानकर आज भी उसकी महिमा गाते फिरते है वो इस देश के शुभचिंतक तो नहीं हो सकते. भारत के मुसलमानों के लिए आज भी बाबर और औरंगजेब जैसे लुटेरे श्रद्धा का केंद्र है. वे आज के भारत को इन मुग़ल लुटेरों के बाद का ही मान बैठे है, जब की भारत स्वयं में एक सनातन विचारधारा का प्रवाह रहा है. हां कुछ लुटेरों ने तलवार और बलात्कार के माध्यम से कुछेक हिन्दुओं को इस्लाम में जबरन प्रवेश करा दिया और वो ही आज भारत में इस्लाम का झंडा बुलंद करने की कोशिश कर रहे है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी जो ये स्वीकार रहे है की वे मूल रूप में हिन्दू ही है, और ऐसे लोग पुनः घर वापसी कर रहे है. लेकिन पंकज जी को ये एक साजिश का हिस्सा नजर आता है.
वे हिन्दुत्वादी शक्तियों को इसाई मिशनरियों के आधुनिकता और सेवा कार्यों में बाधा मान रहे है, जो की उनके अल्पज्ञान का परिचायक है, पंकज जी अगर देश में मिशनरियों के कथित सेवा कार्यों का अध्ययन करेंगे तो पाएँगे की वे शुद्ध रूप से धर्मान्तरण के एजेंडे पर काम कर रही है.
रही बात आरएसएस की तो उसकी देशभक्ति पर तनिक भी संदेह नहीं किया जा सकता. देश में हमारे विचारों का प्रसार हो इसकी आज़ादी हमें संविधान भी देता है. हिंदुत्व की विचारधारा देश को जोड़ने का काम कर रही है ओवैसी के जैसे तोड़ने का नहीं.

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