बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

कौन जानता है आज़ादी के योद्धा तेगवा बहादुर को

बिहार के पूर्व मंत्री व समाजवादी नेता मुनीश्वर प्रसाद सिंह



 














प्रीति सिंह की क़लम से

"तेगवा बहादुर सिंह" के नाम से प्रसिद्ध मुनीश्वर प्रसाद सिंह का जन्म 29 नवम्बर 1921  को वैशाली जिला के महनार थाना के बासुदेवपुर चंदेल गांव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में  हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय बांकेबिहारी सिंह और माता का नाम स्वर्गीय गया देवी था। स्व. मुनीश्वर प्रसाद सिंह छ: भाई-बहनों में सबसे बड़े थे।. बचपन से मेधावी रहे. सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के संस्कार आँगन से  हासिल किया। प्राथमिक शिक्षा गाँव में, फिर जन्दाहा  हाईस्कूल  में दाख़िला लिया। लेकिन अंग्रेजी दासता से मुक्ति के उपाय नित्य दिन सोचा करते। इस बीच सन् 1937 में अंडमान-निकोबार जेल से छूट कर स्व. योगेन्द्र शुक्ल आये.  उनके भाषण ने किशोर मुनीश्वर को मानो प्रेरणा दे दी.  और वो स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़े।

रेल, डाक और तार सेवा बाधित किया
 भारत सरकार के तत्कालीन सचिव श्री डार्ननरी का रेडियो भाषण (जिसमें उन्होंने रेल,डाक और तार सेवा को बाधित नहीं करने की अपील की थी) सुनने के बाद मुनीश्वर ने क्रांतिकारी कदम उठाया और रेल,डाक औऱ तार सेवाओं को बाधित कर अंग्रेज सरकार की नींव हिलाने का निश्चय किया। फलत: अपने साथियों युगल किशोर खन्ना,   राजेन्द्र सिंह,   लाला सिंह और  बलभद्र सिंह को साथ लेकर उन्होंने उत्तर बिहार में अनेक स्थानों पर इन सेवाओं को बाधित कर दिया। इस घटना के बाद  मुनीश्वर  अंग्रेज सरकार की आंखों की किरकिरी बन गए। अंग्रेज सरकार इन्हें जोर-शोर से पकड़ने के लिए जुट गई। जल्द ही ये अंग्रेज सरकार द्वारा पकड़ लिए गए। लेकिन कुछ ही दिनों में छूटकर जेल से बाहर आये और भूमिगत होकर स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में अपना योगदान देते रहे।
 
जयप्रकाश के आजाद दस्ता में शामिल
सन् 1942 में जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित आजाद दस्ता में शामिल होकर मुनीश्वर ने हनुमान नगर, नेपाल में  गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग ली. इसके बाद  अंग्रेज सरकार की नाक में एक बार फिर से दम भर दिया। जब जयप्रकाश नारायण को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तब मुनीश्वरने  दस्ता के अपने साथियों के साथ मिलकर उन्हें जेल से बाहर निकाला।  इसी बीच दरभंगा के लहेरियासराय के अंदामा गांव में अंग्रेज दारोगा आदित्य झा की हत्या आजाद दस्ता के दरभंगा के सरदार रामलोचन सिंह के घर कुर्की-जब्ती करने जाते वक्त कर दी गई। इस मामले में मुनीश्वर को आरोपी बनाया गया।

बनारस में गिरफ्तार, लखनऊ जेल में
लेकिन युवा  तेगवा बहादुर और उसके साथी इससे तनिक न घबराए।  शहीद सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार, देवनारायण गुरमैना, अक्षयवट राय, योगेन्द्र शुक्ल , अमीर गुरुजी, सीताराम सिंह, लाला सिंह, राजेन्द्र सिंह, युगल किशोर खन्ना, बलभद्र सिंह और मुनीश्वर प्रसाद सिंह सहित आजाद दस्ता के अन्य साथियों ने 1942 से 1944 तक तिरहुत एवं दरभंगा कमिश्नरी में गुरिल्ला युद्ध के द्वारा अंग्रेज शासन की चूलें हिला दीं।
12-13 सितम्बर 1944 को आजाद दस्ता को भंग किए जाने के बाद शहीद सूरज बाबू के साथ मुनीश्वरभी  बनारस आ गये। ये दोनों बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास में रुके थे। यहां से ये दोनों क्रांतिकारी अपने आंदोलन को  गति देने लगे।  11 नवम्बर 1944 को डॉ. सम्पूर्णानंद से मिलकर छात्रावास लौटते वक्त बनारस अस्सी घाट में ये दोनों अंग्रेज सरकार द्वारा पकड़ लिए गये। मुनीश्वर प्रसाद सिंह को लखनऊ जेल में रखा गया।

बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर तलवे में बेंत से पिटा जाता
जेल में इन्हें अमानुषिक तकलीफें दी गईं। हफ्तों इन्हें भूखा रखा जाता था, ठंड की कड़कड़ाती रात में नंगे बदन ठंडे पानी में सारी रात खड़ा रखा जाता था। मारपीट तो रोज की बात थी। बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर पैर के तलवे में बेंत से पिटा जाता था, नाखून उखाड़ लिए जाते थे। इसी टॉर्चर के दौरान एक अंग्रेज सरकार ने डॉ. विजयालक्ष्मी पंडित को एक भद्दी सी गाली दे दी। जिसका मुनीश्वर  ने जबरदस्त विरोध किया। जिसके बाद अंग्रेज अफसर ने इन पर जुल्म की इंतिहा कर दी और अमानुषिकतायें अपनी सीमा लांघ गईं। फिर भी इन्होंने उफ तक नहीं की और अपने क्रांतिकारी साथियों का नाम नहीं बताया। इसी दौरान इनके सिर पर इतने डंडे बरसाये गए जिसकी वजह से मुनीश्वर बाबू की बांयीं आंख की रोशनी हमेशा के लिए कम हो गई। 

अंदामा कांड में  सुनाई गई फांसी की सजा
लखनऊ जेल में मुनीश्वर बाबू स्वर्गीय सिंह वाई. वी. चव्हाण, लालबहादुर शास्त्री, अलगू चौधरी, रफी अहमद किदवई आदि के निकट संपर्क में आये। लखनऊ जेल से मुकदमे की सुनवाई के सिलसिले में इन्हें दरभंगा लाया गया।मुनीश्वर बाबू पर  अंग्रेज सरकार ने 88 से ज्यादा मुकदमों में नामजद किया। अंग्रेज जज ब्लैक बर्न ने "अंदामा कांड" में फांसी की सजा सुनाई। लेकिन अन्य मुकदमों में सुनवाई चलते रहने की वजह से इन्हें उस वक्त फांसी की सजा नहीं दी गई। सुनवाई के दौरान इन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया। 26 जून 1946 को बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के आदेश पर इन्हें जेल से रिहा किया गया। मुनीश्वर प्रसाद सिंह सन् 1948 में वकाश्त आंदोलन में भी सक्रिय रहे।
     
समाजवादी आंदोलन को दी गति 
आजादी के बाद स्वर्गीय मुनीश्वर प्रसाद सिंह जी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। बाद में वो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गए। आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, नाथपाई, एन.जी.गोरे, एस.एम.जोशी, अशोक मेहता, मधु दंडवते, बसावन बाबू, रामानंद तिवारी, सुरेन्द्र मोहन, प्रेम भसीन, एस.एन. द्विवेदी, यमुना शास्त्री, जॉर्ज फर्नांडीस, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर , रामबहादुर सिंह, युवराज सिंह और रामसुंदर दास के साथ मिलकर मुनीश्वर प्रसाद सिंह समाजवादी आंदोलन को मजबूती प्रदान करने में लगे रहे।1974 में "जयप्रकाश आंदोलन" में जयप्रकाश जी के आह्वान पर बिहार विधानसभा की सदस्यता से 6 जून 1974 को स्वर्गीय मुनीश्वर प्रसाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया। ऐसा करने वाले ये बिहार विधानसभा के पहले विधायक थे।
 
चार बार महनार विधानसभा का प्रतिनिधित्व 
मुनीश्वर प्रसाद सिंह  ने  सन् 1962, 1972, 1977 और 1990 में वैशाली जिला के महनार विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। विधानसभा के कई महत्वपूर्ण कमिटियों के सदस्य रहे। सन् 1979-80 में बिहार सरकार के सिंचाई एवं विद्युत विभाग के मंत्री के रुप में अपनी प्रशासकीय क्षमता का उत्कृष्ट परिचय आप ने दिया। इस दौरान उनके कई फैसले अति महत्वपूर्ण और लीक से हटकर रहे। लेकिन उन्हें ज़्यादा समय राजनीतिक विडंबना ने नहीं दिया। ओछी राजनीति के तहत तत्कालीन  सरकार को अचानक गिरा दिया गया।

92 वें वर्ष में  त्यागा देह  
मुनीश्वर प्रसाद  ने आजीवन समाजवादी आंदोलन को गति देने का काम किया।  अपनी ईमानदारी, धर्मनिरपेक्षता, समाजवादी चिंतन और अक्खड़ मिजाज के लिए मुनीश्वर प्रसाद सिंह विख्यात रहे। 75-76 वर्षों के लंबे राजनैतिक-सामाजिक जीवन के बाद अपने जीवन के 92 वें वर्ष में 5 नवम्बर 2013 को इलाज के दौरान बिहार की राजधानी पटना के एक निजी अस्पताल में मुनीश्वर प्रसाद सिंह का निधन हो गया।
इसके साथ ही स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी राजनीति की एक अहम कड़ी हमेशा-हमेशा के लिए टूट गई।

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल  कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में नैमित्तिक उद्घोषक
संपर्क: pritisingh592@gmail.com)


लेखिका मुनीश्वर बाबू की सुपुत्री हैं। जल्द उनका आत्मीय संस्मरण पढ़ें।

हमज़बान पर पहले भी प्रीति सिंह को पढ़ें पटना में कामकाजी स्त्री









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2 comments: on "कौन जानता है आज़ादी के योद्धा तेगवा बहादुर को "

शहनाज़ इमरानी ने कहा…

बढ़िया जानकारी। आज़ादी के योद्दा "तेगवा बहादुर" को सलाम।

Supriya Shekhar ने कहा…


Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Grand Father, let my country awake.
Thank you Priti mausi to describe unfailing courageous life of nanaji in short and beautiful manner.

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- अल्लामा जमील मज़हरी

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