बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शनिवार, 3 जनवरी 2015

रण जारी है ‘भेर’ के अस्तित्व के लिए

संघर्ष कर रहा है आखिरी सिपहसालार छेदी मिस्त्री

लेखक के साथ छेदी मिस्त्री
 


























कुंदन कुमार चौधरी की क़लम से

कभी रणभेरी की आवाज से सेनाओं में जोश भर उठता था। उनकी भुजाएं फड़कने लगती थीं। जब रणभेरी बजाने वाले सेना के आगे चलते, तो उन साजिंदों की आन-बान और शान के क्या कहने। वक्त बदला, युद्ध करने के तरीके में बदलाव आया। रण चलता रहा, लेकिन अपने ‘भेर’ से जोश भरने वाले काल-कवलित होते गए। लेकिन उस पीढ़ी के आखिरी सिपहसालार छेदी मिस्त्री की जिद और जज्बे ने ‘भेर’ बनाने और बजाने की कला को जीवित रखा है। आदिवासियों के नाम पर बने झारखंड की विडंबना है कि छेदी मुफलिसी में भी इस कला के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बेटों ने सीखने से किया इंकार

रांची से 20 किलोमीटर दूर नगड़ी प्रखंड के हेथाकोटा गांव में छेदी मिस्त्री झोपड़ीनुमा घर में रहते हैं। गरीबी की मार और बीमारी से उनकी पत्नी आठ साल पहले असमय ही मृत्यु का ग्रास बनीं। छेदी ने अपने दो बेटे को इस पारंपरिक कला को सिखाने की कोशिश की। लेकिन भला ‘भेर’ की कला से पेट की क्षुधा कैसे शांत होती। छोटे बेटे ने भेर की गर्वीली आवाज छोड़ टाइल्स की खटखट में रोटी ढूंढ ली। वह शहर आकर टाइल्स लगाने का काम करता है। एक बेटा साथ रहता है और कभी कोई काम मिले, तो कर लेता है।

रोजी के लिए अब भेर ही सहारा

कभी छेदी की भेर सुनकर रातू महाराज खो जाया करते थे। उनकी शाबाशी से छेदी का सीना चौड़ा हो जाता था। जगन्नाथपुर रथयात्रा में उसकी भेर के बना रथ आगे नहीं बढ़ता था। मुड़मा मेले की शान था वह। लोगों से मिले इस सम्मान से कभी अपने ऊपर और अपनी कला पर अभिमान भी होता। पूर्वजों का आशीर्वाद मान पूजा की तरह ही भेर बजाता। अपने खानदानी साज पर उसे नाज है। अब शादी-ब्याह आदि मौकों पर गाहे-बगाहे इसे बजाने का अवसर मिलता है, कई कार्यक्रमों में भी बुलावा आता है, जिससे किसी प्रकार घर चलता है।

तांबे की जगह अब चदरे से बनता है

करीब पांच फुट लंबा भेर रणभेरी का ही झारखंडी संस्करण है। जब से सभ्यता का विकास हुआ, राजा आए और सेनाओं के बीच लड़ाई शुरू हुई, इसका उद्भव हुआ। मूलत: यह तांबे का बनता है। तांबा महंगा होने पर आजकल चदरे से भी इसे बनाया जाता है। आखिरी छोर में लकड़ी का मूठ बनाकर इसे हवा के प्रेशर से बजाया जाता है। इसमें काफी ताकत लगती है। लेकिन ताकत से ज्यादा इसे बजाने का अभ्यास है।


(लेखक-परिचय:

जन्म : 13 फरवरी, 1978
शिक्षा : बीएससी, बीजे

करीब 12 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय.
सम्प्रति: दैनिक भास्कर, रांची में फीचर एडिटर
संपर्क: kundankkc@gmail.com )


भास्कर के 2 जनवरी 2015 के अंक में प्रकाशित 











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1 comments: on "रण जारी है ‘भेर’ के अस्तित्व के लिए"

Kalyani Kabir ने कहा…

bahut behtar jaankaari ..

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
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