बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 30 जून 2014

तुमने बदले हम से गिन-गिन के लिए

दो शाइर और एक ग़ज़ल 













रजनीश ‘साहिल’ की क़लम से

"दो जुदा शाइरों की अलग-अलग ग़ज़लों से शेर चुनकर बनी एक तीसरी मुकम्मल ग़ज़ल", अगर कोई ऐसा कहे तो क्या आप क्या कहेंगे? थोड़ा अटपटा लगता है सुनने में, पर जो है, सो है. यह सुनकर शायद और अटपटा लगे कि इसमें चोरी-वोरी का कोई मामला भी नहीं है. और यह भी नहीं है कि जिसके मार्फ़त तीसरी ग़ज़ल हम तक पहुंची उसने नादानी में ऐसा कर दिया होगा. क्योंकि न तो दोनों शाइर और न ही वह तीसरा शख्स, कोई भी ग़ज़ल की दुनिया का अनजाना नाम नहीं है. जो भी ग़ज़ल पढ़ने-सुनने का शौक रखता है वो तीनों को बखूबी जानता है. तो ग़ज़ल के रू-ब-रू होने से पहले ज़रा इन तीनों की ही बात कर लेते हैं. शुरुआत शाइरों से करते हैं. एक ही समय के दो अलग-अलग शायर. एक लखनऊ में पैदा हुए, दूसरे दिल्ली में. इंतकाल दोनों का एक ही जगह हुआ, हैदराबाद में.
पहले शाइर हैं 1828 में लखनऊ में जन्म लेने वाले अमीर अहमद मीनाई, जो ग़ज़ल की दुनिया में भी अमीर मीनाई के नाम से ही मशहूर हुए. इस्लामिक क़ानून और न्यायशास्त्र के ज्ञाता अमीर मीनाई 1856 में लखनऊ पर हुए ब्रिटिश हुकूमत के हमले के बाद बेघर-बेदर हुए और बरास्ता काकोरी रामपुर रियासत पहुंचे जहाँ वे तत्कालीन शासक नवाब युसूफ अली खान के उस्ताद हुए. सन 1900 की शुरुआत तक वे रामपुर ही रहे फिर अपनी ‘अमीर-उल-लुग़त’ के बाकी हिस्सों के शाया होने की हसरत लिए वे हैदराबाद कूच कर गए, जहाँ 13 अक्टूबर 1900 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा.
दूसरे शाइर हैं 25 मई 1831 को दिल्ली में जन्मे नवाब मिर्ज़ा खान, जिन्हें उर्दू अदब की दुनिया में दाग़ देहलवी के नाम से जाना जाता है. शेख मोहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ और मिर्ज़ा ग़ालिब की शागिर्दी में रहे दाग़ 1956 में दिल्ली में हुई उथल-पुथल के बाद रामपुर रवाना हुए और नवाब युसूफ अली खान के शासनकाल में सरकारी मुलाज़िमत हासिल की. 1888 में दाग़ हैदराबाद पहुँचे और मुशाइरों की जान हो गए. 1891 में वे हैदराबाद दरबार के शाइर और छठवें निज़ाम के उस्ताद हुए.
यूँ तो शाइरी के मामले में दिल्ली और लखनऊ की अपनी-अपनी रवायत है और ऐसे कई किस्से हैं जब बाज़ दफ़ा दोनों ही रवायतों के शाइरों ने एक-दूजे के लिए अपनी नापसंदगी ज़ाहिर की और चुटकियाँ लीं. बावज़ूद इसके दाग़ देहलवी और अमीर मीनाई बहुत ही अच्छे दोस्त थे. ज़ाहिर बात है कि दोस्ती का यह पौधा रामपुर में पनपा होगा जो दोनों की आख़िरी साँस तक हैदराबाद की ज़मीं पर भी हरा रहा. 1900 में जब अमीर मीनाई हैदराबाद पहुँचे तो वे दाग़ के साथ ही रहे. बहुत मुमकिन है कि जिन शेरों के ज़िक्र से यह बात निकली है वह भी दोनों ने एक ही वक़्त पर एक ही कमरे मैं बैठकर कहे हों. दोनों ग़ज़लों को पढ़कर लगता भी ऐसा ही है. बहरहाल, अमीर के बाद 17 मार्च 1905 को दाग़ भी इस दुनिया को अलविदा कह गए.
अब बात करते हैं उस तीसरे शख्स़ की जिसने इन दोनों शाइरों को एक ही ग़ज़ल में साथ ला दिया. ग़ज़ल के सुनने वालों के बीच इस शख्स का नाम बड़ा ही मक़बूल है और वह है – जगजीत सिंह. 8 फ़रवरी 1941 को राजस्थान के श्री गंगानगर में जन्मे और 1965 में फिल्मोद्योग में अपनी जगह बनाने की ख़्वाहिश लिये मुंबई पहुँचे जगजीत सिंह ने 10 अक्टूबर 2011 को अपनी आख़िरी साँस लेने तक के वक़्त में ख़ुदा-ए-सुखन मीर तक़ी ‘मीर’ और ग़ालिब से लेकर निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र और इस दौर के न जाने कितने ही शाइरों को अपनी आवाज़ के ज़रिये हमारे सामने ला खड़ा किया है. ग़ज़ल, जो किसी वक़्त में मुश्किल समझी जाती थी उसे अपनी मौसिक़ी से आसान बनाने और हर दिल तक पहुँचाने में उन्हें जो कामयाबी मिली उसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो ग़ज़ल और गीत का फ़र्क भी नहीं जानते वे भी उनकी गाई ग़ज़लों के दीवाने हैं. जवाँ दिल अपनी उदासी अक्सर उनकी ग़ज़लों से बाँटते हैं.
अब चुन-चुन कर एक से एक बेहतरीन शाइर की अच्छी ग़ज़ल गाने वाले जगजीत सिंह से यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि वे दाग़ देहलवी की शेरों को गाते-गाते यूँ ही बेख़याली में अमीर मीनाई के शेर गुनगुना गए होंगे, भले ही बहर एक है तो क्या! असल में सुरों में उतारने से पहले दाग़ और अमीर की ग़ज़लों के शेर बड़ी ही ख़ूबसूरती से चुने गए. एहतियात के साथ चुने गए कि सुनते वक़्त किसी को अहसास तक न हुआ कि कोई शेर किसी और शाइर का भी हो सकता है. हर शेर की एक-सी ज़बान, एक-सा अंदाज़-ए-बयां, एक-सा अहसास. इसीलिए तो हर सुनने वाले को यह अपने आप में एक मुकम्मल ग़ज़ल लगी. दो शाइरों के शेरों को चुनकर बनी तीसरी मुक़म्मल ग़ज़ल. जिसने जानने की कोशिश न की उसे कभी पता न चला कि इस ग़ज़ल का, इसके शेरों का ख़ालिक कोई एक नहीं दो जुदा शख्स हैं.
इतनी लम्बी तम्हीद जिस मक़सद से की, अब भी अगर उसका ज़िक्र न किया यानी अब भी अगर उस तीसरी ग़ज़ल पर न आए, तो ये नाइंसाफ़ी होगी. इसलिए रू-ब-रू होते हैं उस ग़ज़ल से, हर शेर के साथ उसके शाइर की मौजूदगी में...
 
तुमने बदले हम से गिन-गिन के लिए
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिए
 
  ...(दाग़ देहलवी)

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए
   ...(अमीर मीनाई)

वो नहीं सुनते हमारी क्या करें
माँगते हैं हम दुआ जिनके लिए 
   ... (दाग़ देहलवी)

चाहने वालों से गर मतलब नहीं
आप फिर पैदा हुए किन के लिए 
  ...(दाग़ देहलवी)

बागबाँ कलियाँ हों हल्के रंग की
भेजनी हैं एक कमसिन के लिए 
  ...(अमीर मीनाई)

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(लेखक-परिचयः
जन्मः मध्य प्रदेश के अशोकनगर ज़िले के ग्राम ओंडेर में 5 दिसंबर 1982 को।
शिक्षाः स्नातक।
सृजनः जनपथ, देषबंधु, दैनिक जनवाणी, कल्पतरु एक्सप्रेस व कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं, वेब पोर्टल्स में रचनाएँ प्रकाशित
संप्रतिः स्वतंत्र पत्रकार व ग्राफिक आर्टिस्ट
ब्लाॅगः ख़लिश
संपर्कःsahil5603@gmail.com  09868571829)

हमज़बान पर रजनीश पहले भी

 
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रविवार, 29 जून 2014

हिंदी साहित्य में कहाँ हैं मुसलमान



संदर्भ मुस्लिम परिवेश और हिंदी उपन्‍यास














सुनील यादव की क़लम से

मुस्लिम परिवेश और हिंदी उपन्‍यास पर बात करने से पहले साहित्य और समाज विशेषकर उपन्यास और समाज और रिश्ते की पड़ताल इसलिए जरूरी हो जाती है कि ''साहित्‍य की जड़ें समाज में होती हैं । वह स्‍वयं एक सामाजिक उत्‍पादन है । वह अपनी सामाजिक भूमिका के कारण ही मानवीय परंपरा का अंग बन सका है । इसी कारण साहित्‍य में निहित स्थितियों की व्‍याख्‍या और मूल्‍यांकन केवल सौंदर्य रसानुभूति के क्षेत्र में सीमित नहीं होते, उनका सामाजिक अर्थ और प्रभाव बड़ा व्‍यापक होता है ।’’i साहित्य मनुष्‍य और उसके समाज को समझने का सूत्र मुहैया कराता है । ''समाज शास्‍त्र में मनुष्‍य की सामाजिकता की पहचान के अनेक रास्‍ते हैं । उनमें से जो रास्‍ता साहित्‍य संसार से होकर गुजरता है, वह सबसे सुगम और विश्‍वसनीय तब होता है जब वह उपन्‍यास के रचना संसार से गुजरता है, क्‍योंकि वहाँ न तो कविता की तरह आत्‍मपरकता की फिसलन होती है और न नाटक के यथार्थ का मायालोक होता है । उपन्‍यास की कला में मौजूद मनुष्‍य के समाज संबद्ध और इतिहास सापेक्ष रूप को आसानी से पहचाना जा सकता है ।’’ii आज के समय में सिनेमा को सर्वाधिक प्रतिनिधि कला रूप माना जाता है क्‍योंकि वह नए मानव की आवश्‍यकताओं को पूरा करता है, उसकी आशा, आकांक्षाओं को व्‍यक्‍त करता है, इस नए मनुष्‍य की तूफानी दुनिया को चित्रित करता है । लेकिन रैल्फ फॉक्स लिखते हैं कि ''इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक काफी बड़ी हद तक सिनेमा ऐसा करने में सफल हो सकता है किंतु मेरी समझ में वह पूर्णतया ऐसा नहीं कर सकता । कारण कि उपन्‍यास का पलड़ा इस मायने में सदा भारी रहेगा कि वह मानव का कहीं अधिक पूर्ण चित्र प्रस्‍तुत कर सकता है, तथा उस महत्त्वपूर्ण आंतरिक जीवन की झाँकी दिखा सकता है जो मानव के निरे नाटकीय क्रियाशील रूप से भिन्‍न होती है और जो सिनेमा की क्षमता से बाहर की चीज है ।’’iii इस तरह साहित्‍य एवं समाज के अंतर्संबंध पर बात करते हुए यह कहा जा सकता है कि उपन्‍यास मनुष्‍य के जीवन के सबसे नजदीक साहित्यिक विधा है ।
हिंदी उपन्‍यास अपने उदय के ऐय्यारी और तिलिस्‍म के दौर से चलकर एक लंबी यात्रा तय कर चुका है । उसने भारतीय समाज के विविध पहलुओं को छुआ है । अब उपन्‍यास के जनतंत्र में ऐसे लोग जगह पा रहे हैं जो कभी हाशिए पर ढकेल दिए गए थे । यह हिंदी उपन्‍यास की चौहद्दी का विकास ही है कि आज मुस्लिम, दलित एवं आदिवासियों के जीवन पर उपन्‍यास लिखे जा रहे हैं । हिंदी उपन्‍यास की सीमाओं को रेखांकित करते हुए श्‍यामाचरण दुबे ने लिखा कि ''हिंदी उपन्‍यास की उल्‍लेखनीय सफलताओं के बावजूद भारत सामाजिक यथार्थ के आकलन में उसकी सीमाएं और न्यूनताएँ चुभने वाली हैं ।...भूमिहीन खेतिहरों, बंधुआ मजदूरों और औद्योगिक श्रमिकों पर जो लिखा गया है । वह नाकाफी है और संतोष भी नहीं देता । आदिवासियों व दरिद्र समाज का दर्द भी अभिव्‍यक्ति नहीं पा सका है ।’’iv 1991 ई. में व्‍यक्‍त की जा रही डॉ. श्‍यामाचरण दुबे की इस चिंता को हिंदी उपन्‍यास ने आज कुछ हद तक अपने अंदर समेट लिया है और दलित, आदिवासी, खेतिहर मजदूर, किसान इत्‍यादि पर उपन्‍यास लिखे जा रहे हैं । डॉ. श्‍यामाचरण दुबे जैसे समाजशास्‍त्री ''देश विभाजन की त्रासदी पर सशक्‍त और हिला देने वाले''v उपन्‍यास की माँग तो करते हैं पर उनकी नजर से भी देश विभाजन के बाद का मुस्लिम जीवन का व्‍यापक परिवेश छूट जाता है ।
शानी ने सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि हिंदी उपन्‍यास में मुसलमान कहाँ हैं? 'समकालीन भारतीय साहित्‍य' पत्रिका के 41 वें अंक में नामवर सिंह से बात करते हुए शानी ने सवाल उठाया था कि ''क्‍या किसी भी देश का भौगोलिक, सांस्‍कृतिक और साहित्यिक मानचित्र 12-15 करोड़ मुस्लिम वजूद को झुठलाकर पूरा हो सकता है?...नामवर जी कई वर्ष पहले आपने कहा था कि हिंदी साहित्‍य से मुस्लिम पात्र गायब हो रहे हैं । मुस्लिम पात्र जब थे ही नहीं तो गायब कहाँ हो रहे हैं । प्रेमचंद में नहीं थे, यशपाल में आंशिक रूप से थे । ...गोदान जो लगभग क्‍लासिकी पर जा सकता है और हमारे भारतीय गाँव का जीवंत दस्‍तावेज है, उसमें गाँव का कोई मुसलमान पात्र क्‍यों नहीं हैं? क्‍या अपने देश का कोई गाँव इनके बिना पूरा हो सकता है? प्रेमचंद फिर भी उदार हैं, जबकि यशपाल के 'झूठा सच’ में नाम मात्र के मुस्लिम पात्र नहीं हाड़-मांस के जीवंत लोग हैं । लेकिन उसके बाद? अज्ञेय, जैनेन्‍द्र, नागर जी या उनकी पीढ़ी के दूसरे लेखकों में क्‍यों नहीं? और उससे भी ज्‍यादा तकलीफ़देह यह है कि आजादी के बाद के मेरी पीढ़ी के कहानीकारों में और उसके बाद के कहानीकारों में भी नहीं हैं । ...हिंदी में ही क्‍यों नहीं हैं? जबकि तेलुगू में हैं, असमिया में हैं, बँगला में हैं ।’’vi
इस प्रकार हम देखते हैं कि शानी इस बात को गंभीरता से महसूस कर रहे थे कि हिंदी उपन्‍यास में मुस्लिम जीवन का चित्रण बहुत कम हुआ हैं । उनकी इसी चिंता का परिणाम था उपन्‍यास 'कालाजल' (1965), जिसमें उन्‍होंने बस्‍तर जैसे पिछड़े क्षेत्र की मुस्लिम मध्‍यवर्गीय जिन्‍दगी का प्रामाणिक चित्रण किया है । यह उपन्‍यास दो मुस्लिम परिवारों की तीन पीढ़ियों की कहानी कहता है । यह मुस्लिम परिवार एक अजीब से ठहराव के बीच जी रहा है, बिल्‍कुल मोतीतालाब के काला जल की तरह सब कुछ ठहरा हुआ है, हालांकि समय चल रहा है, समय कभी रुकता भी नहीं, इन्‍द्रा नदी के बहाव की तरह । बहाव और ठहराव को मिलाकर शानी एक ऐसा कन्‍ट्रास रचते हैं कि मुस्लिम जीवन का पूरा परिदृश्‍य हमारे सामने खुलने लगता है । 'कालाजल' का समाज, उसका आचार व्‍यवहार, रूढ़ियाँ, अंधविश्‍वास, आपसी रिश्‍ते बिल्‍कुल वही हैं जो दूसरे भारतीय क्षेत्रों के होंगे लेकिन वहाँ देश के स्‍वतंत्रता आंदोलन की हलचल न के बराबर है । ''प्रत्‍यक्षत: यह दो मुस्लिम परिवारों के लगातार टूटने और उनकी घुटन के सघनतर होते जाने की मार्मिक कहानी है । मध्‍यवर्गीय मुस्लिम परिवारों की त्रासदी तथा मुस्लिम मानसिकता और संस्‍कृति का उद्घाटन करने वाला यह अद्भुत उपन्‍यास है ।’’vii यह डॉ. श्‍यामाचरण दुबे की उस समाजशास्‍त्रीय माँग को भी पूरा करता है, जो उपन्‍यास विधा को मात्र 'साहित्यिक संरचना' तक ही सीमित न कर उसे 'सामाजिक संरचना' में पढ़े जाने की आग्रह करती है ।
'कालाजल' से पहले शानी का उपन्‍यास 'कस्‍तूरी' 1960 में प्रकाशित हुआ था, जो बाद में संशोधन-परिवर्द्धन के साथ 'साँप और सीढ़ी' नाम से प्रकाशित हुआ यह उपन्‍यास आजादी के बाद संक्रमण के दौर से गुजर रहे आदिवासी जीवन को लेकर लिखा गया है इसमें मुस्लिम परिवेश नहीं है । शानी का दूसरा उपन्‍यास 'पत्‍थरों में बंद आवाज' (1964) जो बाद में 'एक लड़की की डायरी' नाम से भी आया । इसमें बानू और अनीसबाजी नामक दो स्त्रियों की दास्‍तान है, जो अपनी जिन्‍दगी की जद्दोजहद से गुजरती हैं । इन दोनों का संबंध मुस्लिम परिवारों से है पर यह मुस्लिम परिवेश वाला उपन्‍यास नहीं है । दांपत्य संबंधों की त्रासदी पर आधारित शानी का उपन्‍यास 'नदी और सीपियाँ' (1970) मुस्लिम परिवेश का उपन्‍यास नहीं बल्कि स्‍त्री-पुरुष संबंधों को प्रश्‍नांकित करने वाला उपन्‍यास है ।
शानी के बाद मुस्लिम परिवेश को चित्रित करने वाले दूसरे महत्त्वपूर्ण उपन्‍यासकार राही मासूम रज़ा हैं। इस्‍लामी राष्‍ट्रवाद और भारतीय मुसलमान के रिश्‍ते की पड़ताल करते हुए विभाजन की समस्‍या के ऊपर राही मासूम रज़ा का पहला उपन्‍यास 'आधा गाँव' सन्1966 में आया । 'आधागाँव' चलती हुई जिन्‍दगी की एक रील है जिसमें हर चीज़ जो घटने वाली है, उसका चित्रण साफ-साफ होता है । आजादी और विभाजन से पहले तथा उसके बाद के दौर में एक शिया मुस्लिम बहुल गाँव में हो रही हलचलों के साथ पूरी जिन्‍दगी के बहाव को कथाकार ने उठा लिया है । कहीं कुछ भी जोड़ा गया नहीं लगता, वे हाड़-मांस के लोग अपने गाँव में अपने तरीके से जिंदगी को जी रहे हैं, अपने तमाम दुर्गुणों के साथ, तत्‍कालीन राजनीति गाँव में कैसे घुसती है और उसके खिलाफ गाँव के लोगों के तर्क अपने हैं, ये घटनाक्रम, ये तर्क कथाकार के थोपे हुए तर्क नहीं हैं । इस प्रकार सामंतवाद तथा जमींदारी के विघटन के बाद भी सामंतवादी सोच और ठसक के साथ लोग जी रहे हैं, रखैलें रख रहे हैं क्‍योंकि उनके लिए स्‍त्री सिर्फ एक वस्‍तु है । उसका कोई नाम नहीं है । झंगटिया चमाइन, दुलरिया भंगिन के साथ मियाँ लोग सो सकते हैं, लड़के पैदा कर सकते हैं पर उनके हाथ का खाना नहीं खा सकते, उन्‍हें बीबी का दर्जा नहीं दे सकते । इस पितृसत्तात्‍मक सोच के साथ ‘आधागाँव’ में अशराफ एवं अजलाफ के विभाजन को भी साफ-साफ देखा जा सकता है । ''राही जहाँ अपने उपन्‍यास में मुस्लिम समुदाय की समरसता व भाईचारे के मिथक का भेदन करते हैं, वहीं अशराफ व सैय्यद वर्ग की नस्ली श्रेष्‍ठता व इस्‍लामी पवित्रता के छद्म को भी उघाड़ते हैं ।’’viii
‘आधा गाँव’ के बाद राही के 'टोपी शुक्‍ला' (1969) और ‘हिम्‍मत जौनपुरी’ (1969) उपन्‍यास आते हैं । राही ‘टोपी शुक्‍ला’ में हिंदू-मुस्लिम संबंधों को सही संदर्भ में देखने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में वे इन संबंधों की त्रासद परिणतियों तक भी जाते हैं । 'हिम्‍मत जौनपुरी' एक ऐसे मुसलमान की कहानी है जो जीवन भर जीने का हक माँगता रहा, सपने बुनता रहा परंतु आत्‍मा की तलाश में सपना और यथार्थ के संघर्ष में उलझकर रह गया । 'ओस की बूँद' (1971) राही का एक छोटा उपन्‍यास है जिसमें ''एक ऐसे अंतर्विरोध पूर्ण समय की कहानी है जब आदमी आदमी न रहकर निखालिस हिंदू या मुसलमान बन जाता है और मुल्‍लाओं-महंतों तथा राजनीतिज्ञों द्वारा फैलाए गए धार्मिक उन्‍माद और झूठ के फलस्‍वरूप सारी मानवीय संवेदनाओं को तिलांजित कर वहशी बन जाता है ।’’ix 'दिल एक सादा कागज' (1973) मूलत: मुसलमानों के मोहभंग की कहानी है । 'सीन 75' (1977) में मुंबई महानगर के उस चकाचौंध भरे जीवन को विविध कोणों से देखने और उभारने का प्रयत्न है, जिसका एक प्रमुख अंग फिल्मी संसार है । 1975 में इंदिरा गांधी के द्वारा देश में लगाए आपातकाल तथा उसके बाद के राजनीतिक वातावरण से प्रभावित हो रहे जन जीवन को राही मासूम रज़ा ने 'कटरा बी आर्जू'(1978) में दिखाया है । 'असंतोष के दिन' (1986) उपन्‍यास में राही मासूम रज़ा ने साम्‍प्रदायिकता के खूंखार चरित्र को उजागर किया है । हिंदू-सिक्‍ख, हिंदू-मुस्लिम साम्‍प्रदायिकताएं इस उपन्‍यास के केन्‍द्र में हैं । ‘नीम का पेड़’(2003) उनका अंतिम उपन्यास है, इसमें राही ने नीम के पेड़ के बहाने विभाजन तथा उसके बाद के हिंदुस्तान में तेजी से परिवर्तित होते राजनीतिक,सामाजिक समीकरणों के बीच मानवीय संबंधों की त्रासद स्थितियों को चित्रित किया है।
भीष्‍म साहनी का ‘तमस’ (1973) और उससे पहले यशपाल का ‘झूठासच’ मूलत: सांप्रदायिक विभीषिका का चित्रण करने वाले उपन्‍यास हैं । इन उपन्‍यासों में मुस्लिम परिवेश उभर कर नहीं आ पाता । ''यशपाल हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की ऊपरी सतह को खुरचकर उन कुरूप सच्‍चाइयों को उजागर करते हैं जिनके बिना विभाजन के आख्‍यान को नहीं समझा जा सकता ।’’x जबकि साहनी 'तमस' में सांप्रदायिकता की जड़ तलाशते हुए अंग्रेजों की 'फूट डालो, राज करो’ की नीति तथा मुस्लिम लीग के द्विराष्‍ट्रीयता के सिद्धांत तक जाते हैं । इसी विषय को अपने कथा-विन्‍यास में विन्‍यस्‍त करते हुए सांप्रदायिकता का आख्‍यान रचते हैं । ''तमस उस अंधकार का द्योतक है जो आदमी की आदमीयत और संवेदना को ढक लेता है और उसे हैवान बना देता है ।’’xi
मेहरून्निसा परवेज अपने उपन्‍यासों 'आँखों की दहलीज' (1969) और 'कोरजा' (1977) में मुस्लिम समाज का चित्रण करती हैं । इसमें चित्रित मुस्लिम समुदाय धार्मिक दृष्टि से उदार है पर उसमें पितृसत्तात्‍मक प्रवृत्ति गहरी धंसी हुई है । 'कारेजा' में मेहरून्निसा परवेज यह दिखाती हैं कि शोषण के तरीके हर धर्म में समान हैं, चाहे वह मुस्लिम औरत हो या हिंदू पितृसत्तात्‍मक तथा धार्मिक आडंबर की प्रताड़ना दोनों को झेलनी पड़ती है ।
मुस्लिम जीवन के चित्रण में शानी तथा राही मासूम रज़ा की परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण नाम बदीउज्‍जमाँ का भी है । बिहार से पूर्वी पाकिस्‍तान गए मुसलमानों के मोहभंग तथा उनके जीवन से घटित होती विडंबनाओं का चित्रण बदीउज्‍ज़माँ ने 'छाको की वापसी' में किया है । ‘छाको की वापसी’ का एक पात्र कहता है कि ''...यह एक बहुत तकलीफदेह हकीकत है लेकिन है हकीकत कि बिहारी मुसलमानों की बंगाली मुसलमानों के साथ गुजर नहीं हो सकती । बड़ा ही जानलेवा एहसास है यह कि हम जिन आदर्शों को सीने से लगाए हुए थे और जिनसे हमारे दिल और रूह को ताजगी और सुकून मिलता था उन्‍होंने अचानक जहरीले साँपों की तरह डसना शुरू कर दिया है । मैं सच कहता हूँ कि बिहार के हिंदू इन बंगाली मुसलमानों से यकीनन बेहतर थे... । xii इस प्रकार 'छाको की वापसी', 'आधागाँव' का एक तरह से विकास है । बदीउज्‍ज़माँ के दूसरे उपन्‍यास 'सभापर्व' (1994) में मुस्लिम जीवन को इस्‍लामी संस्‍कृति के हजारों वर्षों के इतिहास के आइने में प्रस्‍तुत किया गया है ।

मंजूर एहतेशाम ने अपने उपन्‍यासों में ''भारत के सबसे बड़े अल्‍पसंख्‍यक समूह की पीड़ा, अंतर्द्वन्‍द्व व दुर्बलताओं को भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक परिदृश्‍य के साथ जिस तरह अंतरगुंफित किया है, वह गहरी रचनात्‍मक आत्‍मसंलग्‍नता के बिना संभव नहीं है ।’’xiii आजाद भारत के हिंदू मुस्लिम विमर्श की उपस्थिति के साथ उनका उपन्‍यास ‘सूखा बरगद’ (1986) स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में मूल्‍यगत टकराहट का दस्‍तावेज भी है । भारत-विभाजन की पृष्‍ठभूमि में प्रेम और अस्मिता की कहानी ‘सूखा बरगद’ में केंद्रीय तत्‍व के रूप में उपस्थित है । उपन्‍यास का यह अंत पूरे औपन्‍यासिक वृत्तांत को एक लय प्रदान करता है- ''जमशेद पुर कर्बला बना हुआ है मुसलमानों का मार-मार नाश कर डाला है । वह जो एक राइटर था-हिंदू-मुसलमान भाई-भाई की थीम पर उर्दू में जिंदगी भर कहानियाँ लिखता रहा, उसे भी निपटा दिया गया है ।’’xiv लेखक अली अनवर की इस हत्या के माध्‍यम से उपन्‍यासकार ने मुस्लिम समुदाय की हताशा को दिखाया है साथ ही साझी-संस्‍कृति, धर्मनिरपेक्षता सभी कुछ प्रश्‍नों के घेरे में है । मंजूर एहतेशाम के उपन्‍यास 'दास्‍तान-ए लापता' (1995) और 'पहर ढलते' (2007) मुस्लिम जीवन की विडंबना को चित्रित करते हैं । 'बशारत मंजिल' उनका महत्त्वपूर्ण उपन्‍यास है । इसमें मंजूर एहतेशाम दो सगे भाईयों का मुस्लिम लीगी और राष्‍ट्रवादी मुसलमान के रूप में द्वि-विभाजन करते हुए इतिहास का एक नया विमर्श रचते हैं । यह उपन्‍यास स्‍वतंत्रता आंदोलन से लेकर बाबरी मस्जिद विध्‍वंस तक के काल-खंड को अपने अंदर समेटता है । इतने लंबे कालखंड में बदलते मुस्लिम प्रश्‍न इस उपन्‍यास के केंद्र में है साथ ही हिंदू-मुस्लिम संबंधों के टूटने की त्रासद स्थिति को भी यह उपन्‍यास केंद्रीयता प्रदान करता है ।
मुस्लिम परिवेश की प्रामाणिक अभिव्‍यक्ति अब्‍दुल विस्मिल्‍लाह के उपन्‍यासों में देखने को मिलती है । मुस्लिम बुनकरों के त्रासद जीवन को अभिव्‍यक्‍त करने वाला उनका उपन्‍यास 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' (1986) काफी चर्चित हुआ । बुनकरों का शोषण, गरीबी, जहालत, मजबूरी की बेबाक प्रस्‍तुति करते हुए अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह उस सच्‍चाई का पर्दाफाश करते हैं जिसमें शोषक सिर्फ शोषक होता है वह हिंदू या मुसलमान कोई भी है, धर्म विशेष फर्क नहीं डालता । शोषित हिंदू या मुसलमान इससे शो‍षण में कोई अंतर नहीं पड़ता । यही वास्‍तविक वर्ग चरित्र है । इस शोषण से बुनकर त्रस्‍त हैं । ''यतीन को रात में नींद नहीं आती, सिर्फ विचार आते हैं- तरह-तरह के विचार जो उसे सोने नहीं देते । बीवी को टी.वी. है। उसे गिजा चाहिए । भिरस जो है, उन्‍हें साड़ी में ऐब-ही-ऐब दीखता है । सरकार जो है, वह दाम बढ़ाए जा रही है । यह जो गाड़ी है, जिंदगी की, कैसे चलेगी?''xv बुनकरों के जीवन के ताने-बाने को पूरी संश्लिष्‍टता में इस उपन्‍यास में बुना गया है । त्‍योहार, गीत, रस्‍मो-रिवाज इस उपन्‍यास के मुस्लिम जीवन को जीवंत बनाते हैं ।
अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह अपने उपन्‍यास 'मुखड़ा क्‍या देखें' में मुस्लिम समुदाय के उस वृहत निम्‍न जन को अपनी औपन्‍यासिकता का केंद्र बनाते हैं जिसकी पीड़ा के मूल में न तो पाकिस्‍तान है और न विभाजन की त्रासदी बल्कि ''सामंती ग्राम संबंधों की तार-तार होती बुनावट, परंपरागत पेशों की टूट, जाति-व्‍यवस्‍था की जकड़न, सांप्रदायिकता की अंतर्धारा, समाज के निम्‍न वर्गों में जनतांत्रिक चेतना का उभार, सामाजिक न्‍याय की अनुगूँज एवं गाँव के मुहाने पर बाजार की दस्‍तक का अत्‍यंत सहज चित्रण इस उपन्‍यास में किया गया है ।’’xvi बिस्मिल्‍लाह के अगले उपन्‍यासों 'जहरबाद' में मिर्जापुर अंचल के गाँव में रहने वाले निम्‍न मध्‍यवर्गीय मुस्लिम परिवार का चित्रण है तो 'अ‍पवित्र आख्‍यान' में मुस्लिम समाज के अंतर्द्वन्‍द्व के बहाने मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों का चित्रण । 'अपवित्र आख्‍यान' में बिस्मिल्‍लाह, राही मासूम रज़ा के 'टोपी शुक्‍ला' की तरह भाषाई अस्मिता के सवाल को भी उठाते हैं और उस प्रचलित मिथ का क्रिटिक रचते हैं कि कोई मुस्लिम संस्‍कृत या हिंदी का या हिंदू उर्दू का विद्वान नहीं हो सकता ।
नासिरा शर्मा प्रगतिशील विचारों की लेखिका हैं । उनका पहला उपन्‍यास 'सात नदियाँ एक समुन्‍दर' (1984) आधुनिक ईरान की पृष्‍ठभूमि पर अयातुल्‍ला खुमैनी की रक्‍तरंजित इस्‍लामी क्रांति पर आधारित है । उनके उपन्‍यास 'शाल्‍मली' यदि हिंदू दाम्‍पत्‍य की विडम्‍बना को चित्रित करता है तो 'ठीकरे की मंगनी' (1989) मुस्लिम समाज की स्‍त्री का मर्मांतक दस्‍तावेज है । यह उपन्‍यास मुस्लिम समाज के एक रिवाज 'मंगनी' से जुड़ा हुआ है, जिसके अनुसार जन्‍म के साथ ही किसी लड़की की मंगनी कर दी जाती है फिर शुरू होता दर्द और दमन का लंबा सिलसिला । यह उपन्‍यास उस मुस्लिम स्‍त्री की कहानी कहता है जो तमाम रूढ़ियों और घुटन से निकलकर अपनी पहचान बनाने के लिए व्‍याकुल है । नासिरा शर्मा का उपन्‍यास 'जीरो रोड' मुस्लिम परिवेश पर आधारित उपन्‍यास न होकर इलाहाबाद से दुबई तक विस्‍तृत व्‍यापार के रफ्तार की कहानी है ।
'जिन्‍दा मुहावरे' नासिरा शर्मा का एक महत्त्वपूर्ण उपन्‍यास है । भारत विभाजन के दर्द को समेटता यह उपन्‍यास, उस मुस्लिम मन की कहानी कहता है जो विभाजन के बाद या तो पाकिस्‍तान चले गए या भारत में रह गए । दोनों तरफ के मुसलमानों की दर्द भरी जिन्‍दगी का प्रामाणिक दस्‍तावेज है 'जिन्‍दा मुहावरे' । 'जिन्‍दा मुहावरे' का एक पात्र कहता है कि ''यह तजुर्बा कितना तकलीफदेह होता है कि जहाँ आप पैदा हो, जिस जमीन को आप अपना वतन समझें, उसे बाकी लोग आपका गलत कब्‍जा बताएं । कदम-कदम पर यह अहसास दिलाएं कि तुम यहाँ के नहीं बाहर के हो ।’’xvii
आबिद सुरती ने अपने उपन्‍यास 'मुसलमान' (1995) में आत्‍मकथात्‍मक पद्धति से मुस्लिम समाज की त्रासदी का वर्णन किया है । इसी क्रम में इकबाल मजीद का 'तेरा और उसका सच' (1999) उपन्‍यास उल्‍लेखनीय है जिसमें भारतीय मुसलमान की हैसियत का लेखा- जोखा प्रस्‍तुत किया गया है । आज जिस तरह भारतीय मुसलमान सिर्फ वोट बनकर रह गया है, भारतीय मुसलमान की दहशत भरी जिंदगी का कोई खिदमतगार नहीं है । इन सभी मुद्दों को यह उपन्‍यास उठाता है ।
असगर वजाहत के उपन्‍यास 'सात आसमान' के संदर्भ में ज्‍योतिष जोशी ने लिखा है कि ''मुस्लिम समाज को उसकी पूरी संरचना में जानने के लिए 'सात आसमान' की कोई दूसरी मिसाल नहीं है । एक ही मुस्लिम परिवार के चार सौ वर्षों की कहानी कहता यह उपन्‍यास ऐसे चरित्रों के लिए जाना जाएगा जो अपनी संघर्षशीलता और जिजीविषा से किसी भी तरह का समझौता नहीं करते ।’’xviii इस उपन्‍यास में असगर वजाहत उस ठहरे हुए कुलीन वर्ग की व्‍यथा कथा कहते हैं जो नवाबी एवं जमींदारी के खात्‍मे से त्रस्‍त है । इनके दूसरे उपन्‍यास 'कैसी आग लगाई' (2007) में सांप्रदायिकता, छात्र जीवन, स्वातंत्र्योत्तर राजनीति, सामंतवाद, वामपंथी राजनीति, मुस्लिम समाज, छोटे शहरों का जीवन और महानगर की आपा-धापी के साथ-साथ सामाजिक अंतर्विरोधों से जन्में वैचारिक संघर्ष का चित्रण है ।
उपर्युक्‍त उपन्‍यासों के अतिरिक्‍त हिंदी में कुछ ऐसे उपन्‍यास भी लिखे गए जिसमें मुस्लिम जीवन तो पूरी तरह नहीं उभर कर आ पाता पर, हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक संदर्भ इन उपन्‍यासों में केंद्रीय तत्‍व के रूप में उपस्थित हैं जिसमें विभूति नारायण राय का 'शहर में कर्फ्यू' (1986), प्रियंवद का 'वे वहाँ कैद हैं' (1994) भगवानदास मोरवाल का 'कालापहाड़', भगवान सिंह का 'उन्‍माद', गीतांजलि श्री का 'हमारा शहर उस बरस', दूधनाथ सिंह का 'आखिरी कलाम', मो. आरिक का 'उपयात्रा', मुशर्रफ आलम जौकी का 'बयान', कमलेश्‍वर का 'कितने पाकिस्‍तान' प्रमुख हैं । इन उपन्‍यासों में सांप्रदायिक राजनीतिक ताकतों के खूंखार मंसूबों, धर्म के ठेकेदारों के साथ-साथ दंगों से प्रभावित होने वाली जनता का चित्रण मिलता है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में बाबरी मस्जिद विध्‍वंस के बाद की मुस्लिम समाज की मनोदशा को भी इन उपन्‍यासों ने चित्रित किया है ।
इस प्रकार मुस्लिम जीवन के संदर्भ में हिंदी उपन्‍यास की विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए हम कह सकते हैं कि इन उपन्‍यासों में मुस्लिम समुदाय में विभाजन का दर्द, मुस्लिमों की भारतीय अस्मिता का प्रश्‍न, गरीबी, यातना भरी जिंदगी, व्‍यापक मुस्लिम समाज में स्‍त्री की नियति और सांप्रदायिकता के बढ़ते खूनी पंजों से नर्क में तब्‍दील होता जीवन, स्‍वतंत्र भारत में स्वार्थपूर्ण राजनीति और मुस्लिमों की उपेक्षा इत्‍यादि सवाल केंद्रीय तत्‍व के रूप में उपस्थित हैं ।


i परंपरा इतिहास, बोध और संस्‍कृति- श्‍यामाचरण दुबे, पृ.159
ii साहित्‍य के समाजशास्‍त्र की भूमिका- मैनेजर पाण्‍डेय, पृ.227
iii उपन्‍यास और लोक जीवन- रैल्फ फॉक्‍स, पृ.32
iv परंपरा इतिहास, बोध और संस्‍कृति- श्‍यामाचरण दुबे, पृ.139
v वही, पृ.139
vi समकालीन भारतीय साहित्‍य, अंक-41 (जुलाई-सितंबर 90) (सं.) शानी, पृ.194-95
vii हिंदी उपन्‍यास का इतिहास- गोपाल राय, पृ. 290
viii उपन्‍यास और वर्चस्‍व की सत्ता- वीरेन्‍द्र यादव, पृ.82
ix हिंदी उपन्‍यास का इतिहास- गोपाल राय, पृष्‍ठ, 294
x उपन्‍यास और वर्चस्‍व की सत्ता-वीरेन्‍द्र यादव, पृ.55
xi हिंदी उपन्‍यास का इतिहास-गोपाल राय, पृ. 303
xii छाको की वापसी-बदीउज्‍ज़मा, पृ.155
xiii आधुनिक हिंदी उपन्‍यास-(सं.) नामवर सिंह, पृ.32
xiv सूखा बरगद-मंजूर एहतेशाम, पृ.231
xv झीनी-झीनी बीनी चदरिया- अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह, पृ. 17
xvi अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह का कथा साहित्‍य- (सं.) चंद्रदेव यादव, पृ.92
xvii जिंदा मुहावरे- नासिरा शर्मा, पृ.101
xviii उपन्‍यास की समकालीनता-ज्‍योतिष जोशी, पृ.109





(लेखक-परिचय:
जन्म: 29 दिसंबर 1984 को गाजीपुर (उ प्र ) में
शिक्षा: आदर्श इंटर कॉलेज गाजीपुर से अरभिक शिक्षा , इलाहाबाद
विशावविद्यालय इलाहाबाद से बीए और एम ए, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय
हिन्दी विश्वविद्यालय से पी-एच डी की उपाधि (2013)(कंप्लीट है पर उपाधि
अभी मिली नहीं है )
सृजन : पहल जैसी अहम पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित
संप्रति:  इलाहाबाद में रहते हुए स्वतंत्र रूप से मुस्लिम समाज और हिंदी साहित्य को लेकर वृहद शोध कार्य में सक्रिय
संपर्क: sunilrza@gmail.com)

 
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बुधवार, 25 जून 2014

इस्लाम में कंडोम !














शहरोज़ की क़लम से 
चौंकिए मत ! मुझे कह लेने दीजिये कि इस्लाम परिवार कल्याण की अनुमति देता है.यानी कंडोम का इस्तेमाल इस सिलसिले में प्रतिबंधित नहीं है.पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल की खूब परम्परा रही है.यह अज़्ल कंडोम का ही पर्याय है.अज़्ल यानी वीर्य का बाह्य स्खलन,रोक,गर्भ की सुरक्षा.मिश्र में एक बहुत ही प्राचीन विश्वविद्यालय है जिसकी मुस्लिम जगत में मान्य प्रतिष्ठा है जामा [जामिया ] अल अज़हर ,यहाँ के ख्यात इस्लामी चिन्तक शेख जादउल हक़ अली कहते हैं:
कुरआन की तमाम आयतों के गहरे अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसमें से ऐसी कोई आयत नहीं है जो गर्भ रोकने या बच्चों की संख्या को कम करने को हराम क़रार देती हो.

अन्यथा हरगिज़ न लें तो इस तरफ ध्यान दिलाने की गुस्ताखी करूँगा कि कहने का अर्थ कतई यह नहीं है कि भारत मे बढ़ती जनसंख्या के पीछे मुस्लिम समुदाय का योगदान खूब तर है.सच तो यह है, अब तक के तमाम सर्वे ने इस झूठ की कलई खोल दी है.जहां निरक्षरता है, उस समाज में परिवार कल्याण को लेकर जाग्रति नहीं है.ऐसा मुस्लिम समेत अन्य समुदायों में भी देखने को मिलता है.बहुविवाह को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को भी अनगिनत शोध्य ने गलत साबित किया .बहुविवाह का मुस्लिमों की अपेक्षा दूसरे समाज में अधिक चलन है.अब तो ढेरों हिन्दू भी कई शादियाँ कर रहे हैं. यह दीगर है कि इसके लिए इस्लाम का सहारा लेते हैं.खैर विषय से ज़रा इतर भाग रहे अपने घोड़े को यहीं विराम देता हूँ.
तो मैं कह रहा था कि मुस्लिम समाज में अक्सर धर्म को हर मर्ज़ की दवा बताये जाने की परम्परा है.लेकिन ऐसा कहने वाले खुद अपने धर्म के मूल स्वर या उसकी गूढ़ बातों से अनजान रहते हैं.मुल्लाओं के बतलाये मार्ग पर चलना ही तब इन्हें श्रेयस्कर लगता है.और इसका खामियाजा यह होता है कि मुस्लिम विरोधी शक्तियां सीधे इस्लाम पर ही आक्रमण करने लगती हैं.कुरआन की अपने अपने ढंग से समझने और अपने मुताबिक तोड़ मरोड़ कर आयतों के इस्तेमाल की कुपरम्परा रही है.ऐसा मुस्लिम विरोधी अक्सर करते हैं.और कभी कभी कई वर्गों में विभक्त मुस्लिम समाज के धर्म गुरुओं ने भी किया है.कईयों ने गहन अध्ययन मनन के बाद निष्कर्ष निकालने के सार्थक यास भी किये हैं.कुरआन और हदीस में किसी बात का समाधान न हो तो इस तरह के कोशिशों के लिए इज्तीहाद के परम्परा रही है.

यूँ तो हर समूह ने परिवार कल्याण के समर्थन और विरोध में कुरआन और हदीस का ही हवाला दिया है.इसके विरोध में प्राय यह कहा जाता है कि किसी जिव को जिंदा दर्गोर करना गुनाह है.कुरआन की कुछ आयतें :

अपनी औलाद को गरीबी के डर से क़त्ल न करो.हम तुम्हें रोज़ी देते हैं उन्हें भी देंगे.
[अल अनआम-६]

और जब जीवित गाडी गयी लडकी से पूछा जाएगा कि उसकी ह्त्या किस गुनाह के कारण की गयी.
[अत तक्वीर ८-9]

परिवार कल्याण के विरोध में कुछ लोग ऐसी ही आयतों को सामने रखते हैं.उन्हीं यह बखूबी ज़ेहन में रखना चाहिए कि इस्लाम से पूर्व समाज में लड़कियों को जिंदा ही ज़मीन में दफन करने की गलत परम्परा थी.मुफलिसी के कारण भी लोग संतानों को मार दिया करते थे.यह आयतें उस गलत चलन के विरोध में है.इस सिलसिले में अपन आगे और स्पष्ट करेंगे.लेकिन परिवार कल्याण के विरोधी जन इस बात को स्वीकार करते हैं कि अज़्ल या गर्भ निरोध यानी गर्भ धारण रोकने के विरुद्ध कुरआन में कोई स्पष्ट प्रतिबंध का ज़िक्र नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल का चलन था.और मुसलमान इस से अछूते न थे.और कुछ सहाबियों पैग़म्बर के समकालीन उनके शिष्यों ने ऐसा परिवार कल्याण यानी गर्भ रोकने के ध्येय से भी किया.इसकी जानकारी पैग़म्बर को भी थी लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना नहीं किया.जबकि उस समय कुरआन नाजिल हो रही थी बावजूद इसके प्रतिबंध का प्रश्न खड़ा नहीं हुआ.
कुछ हदीसों से:
एक सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने कहा कि रसूल अल्लाह के समय हम अज़्ल किया करते थे और कुरआन नाजिल हो रहा था.
[मुस्लिम,तिरमिज़ी,इब्न माजा]

आप आगे कहते हैं हवाला मुस्लिम हदीस कि रसूल अल्लाह को इस बात का पता चला तो उन्होंने हमें इस से मना नहीं फरमाया.
एक हदीस के सूत्रधार हज़रत सुफियान कहते हैं कि [जब कुरआन नाजिल हो रहा था ]यदि यह प्रतिबंधित होता तो कुरआन हमें रोक देता .

ताबायीन [सहाबियों के शिष्यों को कहा जाता है.] के समय भी अज़्ल का चलन रहा.और गर्भ धारण रोकने के लिए ऐसा किया जाता रहा.पैग़म्बर के देहावसान के काफी बाद तक ऐसी परम्परा रही.मुसलामानों के चार प्रमुख इमामों में से एक इमाम हज़रत मालिक ने भी अज़्ल को जायज़ क़रार दिया है.हाँ ! यह सही है कि पहले खलीफा हज़रत अबू बकर, हज़रत उम्र,हज़रत उस्मान बिन अफ्फान, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र आदी सहबियों और खलीफाओं ने अज़्ल को नापसंद ज़रूर किया है.लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि अज़्ल हराम है.
कईयों को शंका हो सकती है किअज्ल के बाद भी तो गर्भ जिसे ठहरना हो , आप रोक नहीं सकते.इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है जैसा कि मशहूर हदीस है कि पहले ऊँट को बाँध दो फिर अल्लाह पर भरोसा करो.यानी अपनी तरफ से बचाओ के उपाय अवश्य करो , नियति में जो लिखा है वो तो होंकर रहेगा,चिंता मत करें.लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि सुरक्षा न की जाय! अबू सईद से रिवायत है ,आपने कहा रसूल अल्लाह से पुछा गया तो आपने फरमाया : हर पानी से बच्चा पैदा नहीं होता और जब अल्लाह किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है तो उसे ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता .[मुस्लिम]
मुस्लिम,इब्न माजा,इब्न हम्बल. दारमी और इब्न शेबा जैसे हदीसों के जानकारों ने हवाले से लिखा है कि पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने गर्भ रोकने के लिए अज़्ल को बताया.
कशानी ने रसूल अल्लाह के हवाले से कहा कि आपने फरमाया औरतों से अज़्ल करो या न करो जब अल्लाह किसी को पैदा करना चाहता है तो वह उसे पैदा करेगा.

कुरआन की सूरत बक़रा की एक आयत का हवाला खूब दिया जाता है.
और स्त्री-विरोध के नाते.लेकिन इसका अर्थ इधर खुला.आयत है:
तुम्हारी बीवियां तुम्हारी खेतियाँ हैं बस अपने खेतों में जैसे चाहो, आओ.

इस आयत का अर्थ इमाम अबू हनीफा के हवाले अहकामुल कुरआन में इस तरह है :चाहो तो अज़्ल करो , चाहो तो अज़्ल न करो.
और हाँ इस सम्बन्ध में पत्नी की रज़ामंदी को वरीयता दी गयी है.अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूल ने फरमाया पत्नी की सहमती से ही अज़्ल किया जाय.
[अबू दाऊद, अबन माजा और हम्बल ]
एक और हदीस में आया है कि जब स्त्री स्तन पान करा रही हो यानी अपने बच्चे को यानी उसका बच्चा छोटा हो तब भी अज़्ल किया जाय.

गर्भ-निरोध उपाय के सम्बन्ध में अक्सर लोग तर्क देते हैं कि ऐसा करना हत्या के बराबर है.इस सम्बन्ध में कई हदीसें हैं.सिर्फ एकाध की मिसाल ही फिलवक्त पर्याप्त है.
हज़रत अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल अल्लाह से सहाबियों ने पूछा कि यहूदी तो अज़्ल को छोटा क़त्ल कहते हैं.तो अल्लाह के रसूल ने कहा ,वह झूठ बोलते हैं. [बेहक़ी,अबू दूद,इब्न हम्बल]

बेहक़ी और निसाई में भी दर्ज है कि हज़रत अली ने भी इसे हत्या मानने से इनकार कियाहै.जब तक कि यह सात मंजिल तय न कर ले.हज़रत अली ने सूरत अल मोमीनून का भी ज़िक्र किया.

मैं इस्लाम का मान्य विश्लेषक या विद्वान् नहीं हूँ.बस जो अध्ययन में सामने आया उसी के हवाले से अपनी बात रखने की कोशिश की है,कहाँ तक सफल रहा हूँ..यह निर्णय पाठक कर सकते हैं.वैचारिक मतभेद भी संभव है, लेकिन इतनी गुजारिश ज़रूर है कि तर्कों के साथ आप अपनी बात रखें.कुतर्क से बात का बतनगड़ तो हो सकता है कोई सार्थक संवाद कतई नहीं.

और हाँ यह भी सूचना बता देना अहम समझता हूँ कि तुर्की, मिश्र,इराक,पाकिस्तान, बँगला देश,इंडोनेशिया समेत सोवियत रूस से विभक्त आधा दर्जन मुल्कों सहित ढेरों मुस्लिम देशों में परिवार कल्याण योजना को स्वीकृति हासिल है.
और अपने मुल्क में भी पढ़ा लिखा मुस्लिम तबक़ा इसका पालन करता है.जैसे जैसे शिक्षा का उजास फैलेगा लोग कुरआन,हदीस और विज्ञान के प्रकाश में दीन और दुनिया को देखेंगे .

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यह लेख हमने अपने ब्लॉग पर 6 जुलाई 2010 को पोस्ट किया था. तब अमर्यादित टिप्पणियों को छोड़ आई यह कुछ प्रतिक्रियाएं।
वॉयस ऑफ द पीपुल :इस्लाम मैं अज्ल रिजक के खौफ से मना है, क्योंकि रिजक देने वाला अल्लाह है. इसमें बीवी की रजामंदी ज़रूरी है. इस्लाम मैं मुस्तकिल तौर पे (नसबंदी) औलाद का होना रोकना मना है. 7 जुलाई 2010 को 12:37 am

टीएम ज़ियाउल हक़ :हम आपको कई बार कह चुके की मज़हबी मामले में ज़रा सूझ बूझ कर लिखा करें। 7 जुलाई 2010 को 2:02 am

शहनवाज़ सिद्दीक़ी: किसी भी मुद्दे पर कोई फतवा तो केवल आलिम ही दे सकता है....... बात अगर विचार की जाए तो मेरे विचार से बच्चों को पालने की चिंता से परिवार नियोजन के तरीके इस्तेमाल करना बेहद गलत है. अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि (अर्थ की व्याख्या) "रोज़ी का ज़िम्मेदार तो वह है". हाँ किसी परेशानी अथवा बच्चों की उम्र में अंतर के लिए परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. 7 जुलाई 2010 2:24 am
सहसपुरिया: आपने अपने नज़रिए से बात कही है,मेरे ख़याल से इस मुद्दे पर आलिमो की राय भी ली जाए तो अच्छा होगा. इस बारे में कई बार बहस भी हो चुकी है. अज़हर यूनिवर्सिटी के आलिमो ने इस बारे में बहुत खोज बीन की है.सभी से गुज़ारिश है इस मसले पर तर्क से बात करें. शहरोज़ साहब की बात को समझ कर ही कॉमेंट दें.
7 जुलाई 2010 3:14 am

राकेश पाठक: bhaiya Isalam par kuch bhi likhne se pahle himmat honi chahiye....aapne wo himmat dikhayi.dhanyad..Par bhaiya agar aapne ye himat naam kamane ke liye dikhayi hai to mai ise thik nahi manta....lekin agar aap ise ek budhjiwi ki tarah dharm ka darpan dikhya hai to thik hai .... aapke samrthan me kitne haath uthte hai ab ye dekhna hai . 7 जुलाई 2010 5:54 am


ख़ालिद ए अहमद : saroj ji ne is mude par ke behesh ki surwat ki hai aur is aap aur baat honi chahiye ......kuch islamik jankaro ki bhi raye ki jarurat hai
7 जुलाई 2010 7 :26   am
डॉ अनवर जमाल ख़ान: शहरोज़ भाई ने अच्छी जानकारी दी . ये बात सही है कि इस्लाम में नसबंदी करना हरम है और परिवार कल्याण वाजिब है . परिवार का कल्याण होता है कुरआन पाक कि तालीम पर चलने से . वक्ती ज़रूरत के तहत आदमी अज़ल कर सकता है . लेकिन आजकल तो ज़िनाकारी / व्यभिचार के लिए बिक रहे है कंडोम . लोग ज़कात देने लगें तो फिर परिवार का पूरा ही कल्याण हो जायेगा। कन्या भ्रूण-हत्या आज गूगल में देख रहा था कि हिंदी दुनिया में क्या चल रहा है ? इसी दरमियान इस लेख पर नज़र पड़ गयी और मैं इसे उठा लाया आपके लिए, http://vedquran.blogspot.com/2010/07/islam-is-saviour-of-girlchild.html 
7 जुलाई 2010 7 :29  am

अविनाश वाचस्पति : मानवहितकारी विषयों पर सार्थक विमर्श सदैव होते रहने चाहिएं। इस प्रकार के विमर्श के उपरांत ही सही नतीजे प्राप्‍त होते हैं। इन्‍हें जाति इत्‍यादि के बंधनों में बांधकर गरीब नहीं बनाना चाहिए।7 जुलाई 2010 6:32 am
रंजना ठाकुर: आपका यह पुनीत प्रयास सराहनीय वन्दनीय है....शत प्रतिशत सहमत हूँ आपके विचारों से..दिग्भ्रमिता की यह स्थिति सभी धर्मो पंथों के अनुयायियों बीच है...और इसका समाधान निस्संदेह शिक्षा तथा जागरूकता ही है... 31 जुलाई 2010 3:13 am
नदीम अख्तर : शहरोज जी ने जो बात रखी है, उसका सीधा का संदेश है कि क्या मुसलमान परिवार नियोजन कर सकता है या नहीं। इसमें मिर्चई लगने का मतलब समझ में नहीं आता है। इतने सरल से विषय को पगलैती करके दूसरा मोड़ दे देना जहालत ही है।13 जुलाई 2012 12:35 am 
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सोमवार, 23 जून 2014

तीन तलाक़ कितना हलाल












शहरोज़ की क़लम से 

 तलाक़ दे तो रहे हो, ग़ुरूर-व-क़हर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो, मेरे मेहर के साथ.
तलाक़ को लेकर भोपाल रियासत के नवाब ख़ानदान की एक अनाम विदुषी शायरा का यह शेर बहुत मक़बूल है. हालाँकि कुछ लोग मीना कुमारी को रचयिता मानते हैं. इस शेर में शादीशुदा महिला अपने पति से कहती है कि पुरुषत्व के घमंड में क्रूर-आक्रामकता के साथ उसने उसे तलाक़ दे तो दी है, तो उसके मेहर के साथ उसका यौवन भी लौटा दे. क्या ऐसा संभव है. शायद यही वजह है कि तलाक़ को बहुत बुरा बताया गया है. ' अल्लाह के लिए उन सभी चीज़ों में से, जिनकी आज्ञा दी गयी है, तलाक़ सबसे ज़्यादा नापसंद-दीदा है' (क़ुरआन सूर: 65 ). लेकिन क़ुरआन और इस्लाम की मूल भावना समझे बगैर पुरुष दाल में नमक कम क्यों? जैसी फ़िज़ूल बातों को लेकर भी अपनी औरतों के सर पर तलवार लटकाए फिरते हैं. तलाक़ के मामले में स्त्रियों के साथ विशेष कर भारत में सदियों से असमान बर्ताव किया जाता रहा है.  ताज्जुब की बात है कि मुल्ला-मौलवियों ने, न तो इसकी वाजिब और मान्य व्याख्या की और न ही इसके उचित रूप को प्रचलित किया। इसके उलट जब प्रगतिशील तबक़ा समझ भरी बातें तर्कों के साथ लेकर उपस्थित  होता है, तो उसे क़ुरआन और हदीस में दख़ल मानकर उसे ख़ारिज कर दिया जाता है. जबकि एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला की इजाज़त न क़ुरआन देता है, न ही सही हदीस।

मुसलमानों को यह ध्यान में रखना होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ही शरीयत नहीं है. और इस लॉ में पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम मुल्कों में संशोधन हो चुका है। वहीं शरीयत को लेकर भी हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई, हंबली विचार धारा में एक मत नहीं है. सुन्नी और शिया में भी इसकी व्याख्याऍं भी अलग-अलग हैं. अल्लामा इक़बाल ने अपनी मशहूर किताब ‘दि रिकन्सट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम’ में साफ़-साफ़ लिखा है कि शरीया की इन व्याख्याओं को अटल नहीं माना जा सकता है| क्या मित्रों ! समय नहीं है कि मुस्लिम उलमा इज्तिहाद से काम लेकर पर्सनल लॉ में कई ज़रूरी संशोधन करें ताकि एक बैठक में तीन तलाक़ की रिवायत ख़त्म हो. वही मेहर की ऐसी रक़म तय हो जो पति की वार्षिक आय हो.

क़रीब दो दशक पहले एक बैठक में तीन तलाक़ जैसी स्त्री -विरोधी कुप्रथा की मुख़ालिफ़त अहले हदीस के तीन विद्वान मुफ़्तियों शेख़ उबैदुर रहमान, शेख़ आताउररहमान मदनी और शेख़ जमील अहमद कर चुके हैं. हंबली और  शिया के यहां भी इस पर प्रतिबंध है. इस बात पर आम सहमति है कि यह बिदाहः (पाप) है. पैंगबर  ने तलाक के इस तरीके को बिलकुल गलत क़रार दिया था. यह तरीका, इस्लाम से पहले प्रचलित था. इस्लाम के आरंभिक दौर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को जब एक बार में तीन तलाक़ कह दी, तो पैग़म्बर मोहम्मद गुस्से से सुर्ख़ हो गए. बोले मेरा वश चलता तो मैं उसका क़त्ल कर देता। बावजूद इसके प्यारे नबी का दामन नहीं छोड़ेंगे का नारा लगाने वाले इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं.
इस्लाम में शादी दो वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच साथ जीवन गुज़ारने के लिए हुआ समझौता है, जिसे निकाह कहते हैं. इसे तोड़ने की प्रक्रिया तलाक़ कही जाती है. इस्लाम ने मर्द को तलाक़ का अधिकार अवश्य दिया है, मगर इस शर्त के साथ कि कम से कम तीन महीने की मुहलत ज़रूरी है, लेकिन दूसरी तरफ़ इसे अप्रिय भी कहा है. यदि किसी कारण वश आपसी कलह से दांपत्य जीवन नरक बन जाए और साथ रहना असंभव लगे, तो फिर ऐसे दांपत्य जीवन से बेहतर है कि पति-पत्नी सम्बन्ध -विच्छेद कर नए सिरे से अपना-अपना नया दांपत्य जीवन शुरू करें।
मुस्लिम महिला भी तलाक़ ले सकती है, इसे 'खुलाअ' कहा जाता है. वह कुछ विशेष आधारों पर अपने पति से संबंध -विच्छेद कर सकती है. (2:229). ख्यात चिंतक डॉ. असगर अली इंजीनियर लिखते हैं कि 'पवित्र पैगम्बर ने भी अपनी पत्नी जमीला का 'खुलाअ' स्वीकार किया था, क्योंकि वे उनके साथ रहना नहीं चाहती थीं. हालांकि पैगम्बर साहब, जमीला से बहुत स्नेह करते थे और उन्हें पूरा सम्मान देते थे. उन्होंने जमीला से केवल इतना कहा कि वे उस बाग को उन्हें लौटा दें जो उन्होंने जमीला को मेहर के तौर पर दिया था. इस हदीस से स्पष्ट है कि पत्नियों का खुलूअ का अधिकार संपूर्ण है और इसमें कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती. खुलूअ के लिए पति की सहमति की आवश्यकता नहीं है.'
हिन्दुस्तान में शाफ़ई, हंबली, मालिकी और अहले हदीस विचार धारा के मुसलमानों की आबादी नगण्य है. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफ़ी मुसलमानों की आबादी ज़्यादा। इनमें भी देवबंदी (तब्लीग़ी जमात), बरेलवी (कछौछवी, दावत-ए-इस्लामी ) और जमात इस्लामी जैसी गुटबंदियां हैं. शियाओं  के यहां भी आग़ा खानी और बोहरा स्कूल है. भारत में क़रीब नब्बे फ़ीसदी मुसलमान हनफ़ी हैं, जिन्हें सुन्नी कहा जाता है.  इनपर आधिपत्य के लिए  सर-फूड़व्वल जारी है. 

भारतीय सुन्नी मुसलमान एक बैठक में तीन तलाक़ को भले सही माने, जॉर्डन के सुन्नी मुसलमान इसे ख़ारिज कर चुके हैं. भारत में भी शरीयत पर सुन्नी विद्वानों के 1973 में हुए एक सेमिनार में तीन तलाक़ की आलोचना हो चुकी है. तब अहमदाबाद में मौलाना मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी की अध्यक्षता में यह सेमिनार हुआ था. इसमें शिरकत कर रहे तमाम मुफ्तियों और मौलानाओं ने अपने-अपने पेपर में क़ुरआन और हदीस के हवाले से एक साथ तीन तलाक़ को अवैध क़रार दिया था. बाद में सेमिनार के निष्कर्षों पर आधारित एक पुस्तक का भी प्रकाशन हुआ.             

18 वीं सदी के मशहूर सूफ़ी-संत शाह वली उल्लाह भी शरीयत के उस मार्ग के हिमायती थे जिसमें प्रचलित चारों विचार धाराओं हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई और हंबली के मतों को समान मान्यता मिले और एक व्यवहारिक पद्धति का निर्माण हो. ज़रुरत आज इसी की है.
आख़िर ऐसा क्यों हैं कि जिस बात की अनुमति क़ुरआन और हदीस नहीं देता, भारत में ही एक साथ तीन तलाक़ जैसी कुप्रथा लागू है.  दरअसल इसकी सुरक्षा यहां का मुस्लिम पर्सनल लॉ करता है. लेकिन जिस लॉ को शरीयत मान मुस्लिम समुदाय सबसे पवित्र दस्तावेज़ समझ रहा है, क्या ऐसी मान्यता हर काल और परिस्थिति में रही है ? 
पर्सनल लॉ को परिभाषित करने का पहला अवसर 1937 में तब आया, जब ब्रिटिश सरकार ने शरीयत एक्ट बनाने का निश्चय किया। ज़रुरत इसलिए पड़ी कि अदालतों में मुसलमानों के तलाक़, विवाह, संपत्ति और विरासत आदि से सम्बंधित मामलों की क़तार गयी. जब पर्सनल लॉ के अलग स्वरूप की चर्चा शुरू हुई तो समकालीन विद्वानों ने इसका मुखर विरोध भी आरम्भ कर दिया। इनमें मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिना और जमात इस्लामी के संस्थापक मौलाना सैयद अबुलउला मौदूदी अग्रणी थे. कथित मुस्लिम हितचिंतक होने  बावजूद जिना के विरोध का यही मतलब है कि उनकी दृष्टि में मुस्लिम समाज के लिए यह लाभप्रद नहीं था. मौलाना मौदूदी की राय थी कि मुसलमानों के दो तिहाई परिवारों में इस शरीयत एक्ट की वजह से बर्बादी आई है. यदि आप मुसलमानों का ज़रा भी भला चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें पर्सनल लॉ से आज़ाद कर दीजिये।   
इन बहसों का विदेशी हुक्मरानों पर कोई असर न हुआ.  17 मार्च 1939 को मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम बना लिया गया. लेकिन यह आज़ादी के बाद ही लागू हो सका. इस अधिनियम की धारा दो मुस्लिम महिलाओं को नौ विभिन्न आधारों तलाक़ लेने का अधिकार देती है. 1986 में मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण अधिनियम बना.


दरअसल भारतीय मुसलमानों की बड़ी समस्या अशिक्षा है. जिसकी वजह से कठ मुल्लाओं के सम्मुख वो नतमस्तक होता आया है. जबकि मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने क़ुरआन का अनुवाद करते हुए स्पष्ट लिखा कि इस्लाम ने तेरह सौ साल पहले क्रांतिकारी क़दम उठाते हुए महिला-पुरुष के बीच अधिकारों का समान वितरण किया था. लेकिन दुःख की बात है कि रूढ़िवादी सामंती समाज के असर में मुस्लिम समाज धर्म की मूल  आत्मा को न समझ सका. इस्लामी क़ानून विशेषज्ञ अय्यूब सैयद कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन का कारण इस्लामी क़ानून नहीं, बल्कि कट्टर पंथियों द्वारा उसकी गलत व्याख्या और समय के साथ अपने को न बदलने की ज़िद है. 

मुस्लिम पर्सनल लॉ का विवाद दरअसल उदार और कट्टरवादी व्यवस्था का टकराव है. एक समूह महिलाओं लिए मानववादी नज़रिये का समर्थक है,  शरीयत को आधुनिक समाज के निकट लाने का यत्न करता है, जबकि दूसरा पक्ष समय की मांग के अनुरूप अपने आपको बदलने के लिए तैयार है और समाज को पुरातन वादी मान्यताओं-परंपराओं से जकड़े रखना चाहता है. यही सबब है कि इमाम मुफ़्ती मुकर्रम तीन तलाक़ को कोई मसला नहीं मानते। वहीँ बिहार और उड़ीसा के शरई मामले के निष्पादन के लिए बनी संस्था इमारत -ए -शरिया पिछले कई वर्षों से तीन तलाक़ के अधिकांश मामले को नज़र अंदाज़ करती आई है.

एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला जैसी कुरीतियों से  ढेरों इस्लामी विद्वान सहमत नहीं हैं. वहीं पढ़े-लिखे ढेरों मित्रों का भी सुझाव इस मामले में संशोधन का है. कुछ इज्मा, तो कुछ इज्तिहाद की वकालत करते हैं.  इज्तिहाद यानी कुऱआन और हदीस का आदेश साफ़ पता न चले तो अपनी सोच-सामर्थ्य से सही रास्ता निकालना। डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया लिखते हैं कि इज्तिहाद स्वतन्त्र चिंतन का ऐसा मान्य माध्यम है, जिसके ज़रिये ज़रूरी सुधारों को लागू किया जा सकता है.और अतीत में अनेक गणमान्य न्यायविदों और धर्म वेत्ताओं ने मुख्य रूप से इसका उपयोग किया भी है. कुछ लोग इसे इज्मा कहते हैं. पर अब इज्मा की रिवायत भी क्षीण हो गई प्रतीत होती है. वरना एक बैठक में तीन तलाक़, हलाला और शौहर के लापता हो जाने पर ज़िन्दगी भर इंतज़ार करना जैसे स्त्री-विरोधी चलन पर ज़रूर लगाम लगती, पर इसे पर्सनल लॉ की सुरक्षा मिली हुई है. हमें ज़ेहन से यह निकालना होगा कि पर्सनल लॉ पूरी तरह क़ुरआन पर आधारित है. जबकि हक़ीक़त यह है कि यह 'मोहम्मडन लॉ' (अंग्रेज़ों ने यही लिखा और कहा) लार्ड मैकाले के निर्देश पर इस्लामी विद्वानों की एक टोली की व्याख्याओं पर बनाया गया था.
डॉ. असगर अली इंजीनियर ने अपने एक लेख में लिखा था कि पूरी इस्लामिक दुनिया में मुस्लिम महिलाएं विभिन्न समस्याओं का सामना कर रही हैं. भारत में उलेमा की ज़िद के चलते, मुस्लिम महिलाएं वे अधिकार भी नहीं पा सकी हैं, जो क़ुरआन उन्हें देती है. भारत, दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ उलेमा, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किए जाने तक का विरोध कर रहे हैं. संहिताबद्ध होने से कानूनों में कोई परिवर्तन नहीं होगा बल्कि उन्हें ठीक ढंग से, पूरे देश में एक समान प्रावधानों के साथ लागू किया जा सकेगा. बहर-कैफ़ मुस्लिम आलिमों को लॉ में ज़रूरी संशोधन से एतराज़ नहीं करना चाहिए। कई मुस्लिम मुल्कों जैसे तंज़ानिया, किनिया, तुर्की, टयूनिशिया, मोरक़्क़ो, इराक़, मलेशिया, इंडोनेशिया, मॉरिशश, ईरान, जॉर्डन और मालद्वीप ने भी अपने क़ायदे-क़ानूनों में बदलाव किया है. इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान ने भी 1961 में शरीयत क़ानून में ज़रूरी सुधार किये।   

शरीयत या मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप या देवबंदी-बरेलवी विवाद से परे यह देखना ज़रूरी होगा कि विश्व भर के मुसलमानों  की जिस ग्रंथ पर सर्वाधिक श्रद्धा-आस्था है, वह क़ुरआन तलाक़ के संबंध में क्या कहता है:
तलाक़शुदा औरतें अपने आपको तीन मासिक धर्मों के इंतज़ार में रोकें और उसके लिए जाएज़ नहीं है कि वह उसे छिपाएं, जो अल्लाह ने उनके गर्भ में पैदा किया है.। इस अवधि में उनके पति उनको वापस लेने के लिए ज़्यादा हक़दार हैं, अगर वह सुलह चाहें। (सूरा -2 बक़रा - 228 )

तलाक़ दो बार है। फिर (तीसरी बार ) उसे अच्छे तरीक़े से विदा करना है. या भले तरीक़े से रख भी सकते हैं. (वही, आयत-229 )


(इद्दत के समय) न तुम उन्हें उनके घर से निकालो, और न वह खुद निकलें, सिवा इसके कि वह खुद बेहयाई में पड़ गयी हों...फिर जब वह अपनी इद्दत की समाप्ति पर पहुँचने लगें, तो भले तरीक़े से (अपने निकाह में) रोके रखो या भले तरीक़े से एक दूसरे से जुदा हो जाओ. (सूरा -65तलाक़-2)

क़ुरआन के साफ़ निर्देश की भी अवहेलना करना पता नहीं यह समाज किस ज़ोम में कर रहा है. इसके अलावा भी कई आलिमों ने लिखा है कि अगर पति-पत्नी के ज़ेहन में कभी संबंध-विच्छेद का ख्याल आये तो उन्हें पहले बातचीत बंद कर देनी चाहिए। लेकिन इस दौरान यह सोचते रहें कि हमें अलग हो जाना चाहिए या साथ रह सकते हैं. गर साथ का रुझान न दिखे तो एक ही बिस्तर पर करवट बदल कर सोएं। दैहिक रिश्ते से परहेज़ करें। इस समय भी साथ या अलग रहने पर विचार करते रहें। जवाब नहीं में हो, तो फिर एक ही घर में अलग-अलग कमरे में रहना शुरू करें। तब भी अलग ही रहने की सोच प्रबल हो तो पत्नी को कुछ दिनों के लिए उसके मायके भेज दें. वहाँ से यदि पत्नी आ जाये तो पुन: विचार कर लें क्या तलाक़ ज़रूरी है तो पहली तलाक़ दें. उसके बाद क़ुरआन के मुताबिक़ दोनों अलग-अलग हो जाएँ। मेहर अगर पहले न दी हो तो उसे दे दें.  खुलाअ का भी यही तरीक़ा है.  लेकिन अगर उसके बाद आप दोनों को लगे कि तलाक़ देकर या खुलाअ लेकर अच्छा नहीं किया तो आप दोनों नयी मेहर के साथ नया निकाह कर सकते हैं. इसके लिए हलाला की कोई ज़रुरत नहीं, डॉ असग़र अली इंजीनियर और डॉ ज़ाकिर नायक भी यही कहते हैं. क्योंकि क़ुरआन में हलाला का कहीं भी ज़िक्र नहीं मिलता। न ही कोई हदीस इसके समर्थन में है. लेकिन कबीलाई और सामंती मानसिकता के तहत आज भी स्त्री-विरोधी कुप्रथा जारी है.  हलाला के हिमायती तर्क देते हैं कि यह  सज़ा है कि तलाक़ कितनी बुरी चीज़ है. क्योंकि तलाक़ के बाद अपनी पत्नी से दुबारा शादी चाहते हो तो उस औरत को पहले किसी और से निकाह  करना होगा। एक रात उसके साथ गुज़ारनी होगी। यदि अपनी इच्छा से वह दूसरा पति तलाक़ दे  तो इद्दत अवधि गुज़ारने के बाद औरत पहले पति से निकाह कर सकती है. इसे ही हलाला कहते हैं. आप ही बताएं तलाक़ दी पुरुष ने दंड स्त्री को क्यों? बहनों तुम चुप क्यों हो.

इद्दत = पहले तलाक़ के बाद चार माह की अवधि               
            



 
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बुधवार, 18 जून 2014

डुबोया होने ने, न होता तो क्या होता



 








गुंजेश की कविताएं

1.

तुम जवाब मत दो
मैं सवाल भी नहीं करूंगा
मेरा और तुम्हारा रिश्ता
बादल और धूप का हो
लोग, एक की उपस्थिती में
दूसरे को चाहें

2.

अरसा हो गया
तुमसे मिले हुए
अब तो तुम्हें याद भी नहीं होगा कि
आखरी दिन मैंने शेव किया था या नहीं
आखरी दिन तुमने कौन से रंग का सूट पहना था
अब कुछ ठीक से याद नहीं पड़ता
वैसे भी, कितने तो रंग पहन लेती थी एक साथ
इसलिए याद नहीं अब कोई भी एक
तुम मेजेंटा कहो, पर्पल कहो
मुझे तो सब आसमानी लगते हैं
...
आसमानी रंग, आसमानी ख्वाब
आसमानी साथ
......

अद्भुत तरीके से
तुम्हें
हरा, नीला और लाल
तीनों रंग पसंद थे
ताज्जुब है कि तुम
पसीने के गंध को भी रंगों में ही देखती थी
पहले झगड़े के बाद तुमने मेरे पसीने के पीले
गंध से ही मेरी उदासी पहचानी थी
और दुलार के हरे दुप्पट्टे से
पसीने का पीलापन पोछा था
उस दिन पहली बार मैंने इंद्रधनुष को चूमा था
छुआ था, जाना था.

3.

तुम पड़ी हो
मेरे यादों के बुक शेल्फ में
उस किताब की तरह
जो हर बार दूसरी को ढूँढने में सबसे पहले आती है हाथ
रख दूँ तुम्हें कहीं भी किसी भी कोने में
कुछ भी ढूंढते हुए, पहुंचता हूँ तुम्हीं तक ...


4.

इस शहर में
जहां अब हूँ
तुम्हारे साथ से ज्यादा तुम्हारे बिना
जिसके लिए कहा करता था
'तुम हो तो शहर है, वरना क्या है'
'नहीं, शहर है तो हम हैं
हम, हम नहीं रहेंगे तो भी शहर रहेगा' तुम्हारी हिदायत होती थी.
अपनी रखी हुई कोई चीज़ भूल जाने
रसोई में एक छिपकली से डर कर चाय
बिखेर देने के बावजूद
तुमने बेहतर समझा था इस शहर को
कैसे झूम कर बरसता था यह शहर, उन दिनों में
जिनको अब कोई याद नहीं करता
तुमने ही तो कहा था - 'जब बहुत उमड़-घुमड़ कर शोर मचाते हैं बादल
और बरसते हैं  दो एक बूंद ही,
तो लगता है जैसे, खूब ठहाकों के बाद
दो बूंद पानी निकली हो किसी के आँखों
से'..........


5.

हमने कुछ नहीं किया था
बस ढूंढा था
तुम्हारी हंसी को, अपने चेहरे पर
तुमने
मेरे आंसुओं को अपनी आँखों में


अब भी कुछ नहीं हुआ
हमने
पेंसिल और इरेज़र की तरह
एक दूसरे की चीज़ें
एक दूसरे को लौटा दी है .....

6.

कमरा ठीक करना भी कविता लिखने जैसा है
जब आप एक कविता लिख रहे हों तो दूसरी नहीं लिखी जाएगी
कवि ठीक नहीं कर पाते हैं
अपना कमरा
कई-कई दिनों तक
ज़रूरी नहीं कि लिख रहे हों कविता ही
मन में अ-कविता की स्थिति हो
तो भी कमरा ठीक कर पाना, बेहद मुश्किल है
कि ऐसे में आप भूल जाएंगे/जाएंगी अपनी ही रखी कोई चीज़......
कि किसी पंक्ति के बीच से गायब
हो जाएगा कोई संयोजक
और बेमेल हो जाएगी
अगली लाइन पिछली से....
कि कमरा ठीक करने के लिए उठते ही
याद आएगा
टिकट के लिए स्टेशन जाना
स्टेशन जाते ही माँ के लिए चश्मा बनवाना, दवाइयाँ ले लेना
अपनी छोटी सी भतीजी के लिए
जिसे पीला रंग इतना पसंद है कि वह पिता के चेहरे से ही पहचान लेती है
कि दिन सुनहरा पीला रहा या उदास पीला
एक बहुरंगी पीला फ्राक....
और इस तरह से रह जाएगी एक कविता
और रह जाएगा एक कमरा
ठीक होते-होते
 ......

कि कविता लिखना प्रेम करने जैसा है
कि जिसके लिए भूलनी पड़ती है सारी दुनिया
कि जिसके लिए सारी दुनिया याद करती है आपको
कि आपकी सारी दुनिया सिमट आती है आप दोनों के बीच
आपके मन-मस्तिष्क से बाहर
दो हथेलियों के बीच, उलझी हुई उँगलियों में
जैसे गद्य और पद्य की किताबें रखीं हों शेल्फ में
एक बाद एक, अपने रखे होने में बेतरतीब
अनुशासित और अनुशासनहीन दोनों एक साथ
भरे पूरे जीवन की तरह 
कि प्रेम करना जीवन को ठीक करना है.......

7.

उसने जैसा सोचा वैसा लिखा
जैसा लिखा वैसा जीया
जैसा जीया वैसा स्वीकार किया
इसलिए वह लगातार अनुपयोगी होता हुआ
पागलों में शुमार किया गया।
……

बहुत ज़रूरी था
कि, वह जैसा सोचे उसमें मिला दे थोड़ी सी
वैसी सोच जो वह नहीं सोचता
कि वह जैसा जिए उसमें मिला दे
थोड़ा सा वैसा जीना जो वह नहीं जीता
कि वह जो स्वीकारे उसमें मिला दे
वह स्वीकृति भी जो उसकी नहीं है
कुल मिला कर यह पैकेजिंग का मामला था
उसे एक पैकेट होना था
एक ऐसे उत्पाद का पैकेट जो कि वह नहीं था
बाजार के विशेषज्ञों का मानना था इससे उपभोक्ता चौंकेगा
'उपभोक्ता का चौंकना' उत्पाद से  ज़्यादा अहम था
लेकिन, वह, वह था
जिसने पहली बार प्रेम करने के बाद चौंकना बंद कर दिया था
और अब भी उसे माँ और विचार
दोनों की याद बुरी तरह परेशान कर देती थी
था, था की बहुलता से आप इस बात की तस्सली न कर लें
कि  वह आपके बीच नहीं रहा
वह है, अगर आप बर्दाश्त कर सकें उसकी असहमतियों को
तो आपके विचार के विरोध में एक विचार के रूप में
आपकी नफरतों के विरोध में एक प्रेम के रूप में
वह है, तमाम तालाबों में प्यास के रूप में
छायायों में धुप के रूप में
वह है बेटी की होटों में पुकार के रूप में ……

8.

रोज़-ब-रोज़
दर-ब-दर
सार्वजनिकता के एकांत में
बहुमत के उमस से लथपथ
भाषा के बिना अभिव्यक्त होने की आस लिए
कई शब्द हैं, दम तोड़ रहे हैं
और इधर
जो है
और जो नहीं है, उस सबके बीच
तुम्हारा होना एक पुल है
जिससे होकर सारी त्रासदियों को होकर गुज़रना है


(कवि-परिचय:
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा  गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस  में लेख, रपट, कहानी, कविता 
संप्रति: भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क:gunjeshkcc@gmail.com)




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रविवार, 15 जून 2014

महिलाओं ने रचा केरल का इतिहास

विकास का मॉडल कुदुंबश्री  















मनोरमा सिंह क़लम से 


तरक्की और विकास की पहली शर्त है लोगों का जागरूक और शिक्षित होना, केरल की साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक रही है और यही वजह है कि यह भारत के सबसे विकसित राज्यों में से रहा है। देश का सबसे शहरीकृत राज्य होने के साथ केरल की शहरी और ग्रामीण जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. राज्य के सभी जिलों की  हर पंचायत में कम से कम एक शैक्षणिक संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र जरूर होता है। लेकिन बेरोजगारी केरल की सबसे बड़ी समस्या रही है. 17वीं शताब्दी से ही यहां से  रोजगार की तलाश में प्रवास शुरू हो चुका था। लेकिन पिछले पंद्रह सालों में केरल में गरीबी हटाने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है जिसका असर अब दिखने लगा है।
कुदुम्बश्री के मार्फत केरल में न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का अव्वल तरीके से क्रियान्वयन हुआ है बल्कि पंचायती राज की अवधारणा की जड़ें भी मजबूत हुई है। धान की खेती पर निर्भर यहां के गरीब और भूमिहीन किसानों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने के लिए अस्सी के दशक में उन्हें स्वसहायता समूह के बारे में बताया गया और माईक्रोफाईनांस योजनाओं को लागू करने की शुरुआत की गई। और अगले कुछ सालों में गरीबी को समझने के साथ गरीबी उन्मूलन के लिए भी एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया गया। 1994 में इन्हीं अनुभवों के आधार पर पहली बार केरल में सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए महिला आधारित सामुदायिक संरचना विकसित की गयी। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुई व पंचायत और नगरनिगम जैसे स्थानीय स्वशासन निकाय मजबूत हुए। इसी दौरान 1998 में गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तीकरण के लिए सामुदायिक नेटवर्क के तौर पर कुदुंबश्री की शुरुआत  हुई, जिसका लक्ष्य स्थानीय स्वशासी निकायों के साथ मिलकर गरीबी उल्मूलन और महिला सशक्तीकरण  के लिए काम करना था। 1998 से अब तक कुदुंबश्री की लगातार कई उपलब्धियां रही हैं संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड इसे हासिल हुआ है। साथ ही इसे एशिया  का सबसे बडा महिला आंदोलन भी कहा जाता है।
दरअसल, कुदुंबश्री की खासियत रही है गरीबी हटाने की प्रक्रिया पर काम करना ना कि परियोजना पर। इसलिए 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, हर जिले की सभी पंचायतों के सभी वार्ड में इसकी पहुंच है। इसके तहत 1.87 लाख पड़ोस समूह हैं, सत्तरह हजार क्षेत्र विकास समाज या एडीसी हैं और 1,058 समुदाय विकास समाज या सीडीएस ग्रामीण व शहरी हैं। कुदुंबश्री के मार्फत पड़ोस समूह के सदस्यों में अब तक 2,818 करोड़ की राशि बतौर ऋण बांटी जा चुकी है। इसी का नतीजा है कि केरल में जमीन कम होने के बावजूद 47 हजार महिला किसान हैं जो लीज पर खेत लेकर धान की खेती करती हैं। पहले दस रूपए भी जिनके पास नहीं हुआ करते थे उनके अब खुद के पक्के मकान हैं। कुल सवा तीन लाख किसान इसके दायरे में हैं और लीज पर 65 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की जा रही है, इसके कारण पलायन भी रुका है। कुदुंबश्री माॅडल की एक सफलता ये भी है कि सदस्य ऋृृण वापसी के मामले में नियमित और अनुशासित हैं इसलिए निरंतरता बनी रही है अतंतः जिसका फायदा सदस्यों को ही हो रहा है।
कुदुंबश्री के द्वारा केवल महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ही काम नहीं किया गया है बल्कि युवाश्री जैसे विशेष रोजगार कार्यक्रम के जरिए साढ़े तीन सौ से ज्यादा सामुहिक और सवा तीन सौ के करीब निजी उद्यमों को शुरू किया गया। बेसहारा लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रम को 745 स्थानीय निकायों में लागू किया गया और करीब साठ हजार बेघर बेसहारा लोगों का पुनर्वास किया गया। इसके अलावा भावनाश्री गृृह लोन योजना के तहत पैंतालीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को घर बनाने के लिए ऋृृण मुहैया कराया गया।  कुदुंबश्री के मार्फत केरल में केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बेहतरीन क्रियान्वयन के कारण दो साल पहले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन ने इस माॅडल को पूरे देश में लागू किए जाने की सिफारिश की थी। फिलहाल पांच राज्यों में कुदुंबश्री माॅडल लागू किए जाने पर सहमति भी बनी है।
 


कुदुंबश्री की कार्यकारी निदेशक के बी वल्सला कुमारी से बातचीत

कुदुंबश्री के मार्फत केरल में काफी पहले से केरल में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। हाल के दिनों में और कौन-कौन सी शुरुआत की गयी है?
- पिछले पंद्रह सालों में कुदुंबश्री के मार्फत केरल में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार देकर और आत्मनिर्भर बनने के मौके मुहैया कराकर उनका सशक्तीकरण किया गया है। करीब 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, जो चालीस लाख परिवारों को सशक्त बना रही हैं और साबुन निर्माण व खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक करीब पचास हजार लघु उद्यमों के मार्फत आर्थिक समृृद्धि की कहानी लिख रही हैं। कुदुंबश्री के खाद्य उद्योग को इसी साल दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला में स्वर्णपदक हासिल हुआ है। हाल ही में कुदुंबश्री की ओर से पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सी सेवा शुरू की गई है,इससे पहले पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित कुदुंबश्री कैफे भी बहुत सफल रहा है. कुदुंबश्री कैफे का और विस्तार किये जाने की घोषणा हुई है। इसके अलावा हमने केरल वेटेरनरी एंड एनीमल साईंस यूनीवर्सिटी के साथ भी समझौता किया है. ताकि किसी कारण से पेशेवर उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सकीं महिलाएं पशुपालन या इससे संबंधित विषयों में डिप्लोमा हासिल कर खुद अपना व्यवसाय कर सकें। दरअसल, कुदुंबश्री की दस्तक खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक है और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तीकरण में यह बेहद कारगर साबित हो रही है। पिछले डेढ़ साल से मै इससे जुड़ी हंू और मेरे लिए ये गर्व की बात है।

इस माॅडल की संरचना किस तरह की है?
-बिल्कुल जमीनी स्तर से हमारी पकड़ है, केरल की 62 फीसद से ज्यादा आबादी  इसके दायरे में हैं। सबसे पहले समुदाय के स्तर पर ग्रामीण या शहरी इलाकों में 10 से 20 महिलाएं जुड़कर आपस में समुदाय बनाती हैं, जिसे पड़ोस समूह कहा जाता है. इस समूह के द्वारा स्वबचत की शुरुआत होती है,ं फिर बैंकों से इन्हें जोड़ा जाता है और बैंक इन्हें इनके काम के लिए लोन देना शुरू करता है। एक पंचायत या नगरपालिका में कई पड़ोस समूह होते हैं जिसे एरिया डेवलपमेंट सोसाईटी या एडीएस कहते हैं, एडीएस के उपर सीडीएस होता है। सीडीएस दातव्य न्यास के तहत रजिस्टर्ड संस्था होती है और सामाजिक न्याय व पंचायत मंत्रायल के अधीन हैं।
गरीबी उन्मूलन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं, कुदुंबश्री उसी का विस्तार है?
-पूरी तरह से ऐसा नहीं है, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से इसे फंड मिलता है पर ये एक अलग माॅडल है, केन्द्र सरकार की नारेगा और मनरेगा जैसी योजना लागू करने में केरल पूरे देश में अव्वल रहा हैं तो उसकी वजह कुदुंबश्री है, हम पंचायत स्तर पर लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देते हैं और उसे कैसे लागू कराना है इसमें मदद करते हैं। हालांकि आन्ध्र प्रदेश का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम भी बहुत सफल हो रहा है पर वो दस हजार करोड़ की ऋृण राशि के साथ एक वित्तीय माॅडल है और कुदुंबश्री 7 सौ करोड़ ऋृण राशि के साथ एक सामाजिक माॅडल। इसके तहत केवल महिला सशक्तीकरण ही नहीं बच्चों, बुढ़ों, असहायों, बेघर बेसहारा सभी के लिए योजनांए हैं और उन्हें लागू भी किया गया है। पूरे राज्य के सभी जिलों के सभी पंचायतों में इसकी मौजूदगी है फिलहाल केवल दो प्रतिशत जनसंख्या ही इसके दायरे से बाहर है।    
कुदुंबश्री को इसी हफ्ते साल 2013-14 के हडको राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया ये एक और उपलब्धि है?
-बिल्कुल, यह सम्मान कुदुंबश्री को महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम करने के लिए मिला है। कुदुंबश्री ने आमदनी सुनिश्चित करने वाली सर्वोत्तम परियोजनाएं लागू करके यह लक्ष्य हासिल किया है। हमने निर्माण क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के हुनर को तराशने और उनके लिए बेहतर संभावनाएं बनाने के लिए एरनाकूलम में कुदुंबश्री वुमैंस  कंस्ट्रक्शन ग्रुप परियोजना लागू किया, जिसे एक नयी शुरूआत कहा जा सकता है, इसके तहत निर्माण क्षेत्र में काम कर रही इंजीनियर, सुपरवाईजर और राजमिस्त्री का काम करने वाली महिलाओं को इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों के द्वारा विषेशज्ञ प्रशिक्षण मुहैया कराया गया। जिसका फायदा भी हुआ। फिलहाल इस समूह के पास 87 गृह निर्माण परियोजना का अनुबंध है।   यहां से उड़ाया


(रचनाकार परिचय:
 जन्म: 11 जनवरी 1974 को बेगुसराय (बिहार) में
शिक्षा: स्नातक, भूगोल, बीएचयू,  स्नातकोत्तर हिन्दी, दिल्ली  विश्वविद्यालय, जनसंचार और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा  इग्नू  से 
सृजन: ढेरों पत्र- पत्रिकाओं में लेख, रपट प्रकाशित
ब्लॉग: मनुलॉग   
संप्रति: सात-आठ साल दिल्ली में प्रिंट और एक टीवी प्रोडक्शन हॉउस की नौकरी करने के बाद फिलहाल बंगलूरु में रह कर   पब्लिक एजेंडा के लिये दक्षिण के चारों राज्यों की रिपोर्टिंग
संपर्क: manorma74@gmail.com) 
 
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बुधवार, 11 जून 2014

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है: बिस्मिल अज़ीमाबादी













 

سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے

دیکھنا ہے زور کتنا بازو ے قاتل میں ہے

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू -ए-क़ातिल में है।


Sarfaroshi ki Tamanna Ab Hamare Dil Me Hai
Dekhna Hai Zor Kitna Bazu-E-Qatil Me Hai






यह शेर बिस्मिल अज़ीमाबादी का है. लेकिन आज़ादी के दौरान इसके असर ने यूँ हंगामा बरपा किया कि  हर जुबां पर यह नारा बन गया. ख्यात क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने खुद इस ज़मीन पर नज़्म कही. बस यहीं से यह शेर उनके नाम मंसूब हो गया। इस संबंध में विस्तृत लेख यहां पढ़ें।


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रविवार, 8 जून 2014

रास्ता बनाती हुई रोशनी


 










जसिंता केरकेट्टा की कविताएं



नदी और लाल पानी

कोका-कोला बनाकर
तुमने उसे ''ठंडा का मतलब'' बताया
तो अब दुनियां को भी बताओ
सारंडा के नदी-नालों में बहते
लाल पानी का मतलब क्या है?
नदी के तट पर चुंआ बनाकर, पानी
छानते-छानते थक चुकी जुंबईबुरू की
सुकुरमुनी को तुम क्या समझाओगे?
कौन सी उपमा देकर
नदी के इस लाल पानी की ओट में
अपने गुनाहों के रंग छुपाओगे,
पीकर जिसे मौत को गले लगा रही सोमारी
उसकी लाल आंखें सवाल पूछती हंैं तुमसे
कादो से सना लाल पानी
उतार देने को उसके हलक में
और कितने साल की लीज तुमने ले रखी है?
वो लोग भी कहां चले गए, जो कल तक
खूब करते थे लाल पानी की राजनीति
कितनी सशक्त थी वो रणनीति कि
आज तक रंग पीकर बह रही नदी
सवाल पूछ रही है उस शक्स से भी
जो सारंडा के विकास का दावा ठोक रहे,
देवियों की नग्न कलाकृति देखकर हुसैन को
तुम देश निकाले की सजा सुनाना चाहते थे
तो इंसानों की जिंदगी विकृत कर देने वाली
ऐसी हरकतों के लिए क्या दे सकोगे
सारंडा निकाले की सजा?

गुमनाम गांव

आदिकाल का वक्त समयचक्र पर चढ़कर
मानो लुक-छुप कर गिरती किरणों के सहारे
फिसल कर उतर आया है देखो
सारंडा के बिहड़ जंगलों के अंदर, तभी
इस काल में आदिवासी आज भी
झाड़-झंकड़ साफ कर पूर्वजों की तरह
सर छुपाने को बना रहे मिट्टी के घर
कोड़ कर पथरीली जमीनें बना रहे खेत
खा रहे हैं जो कंद मूल और फल फूल
हर रोज चल-चलकर पैरों से खुद
पहाड़ों पर बना रहे पगडंडियां
ऐसे गुमनाम गांव जिसने कभी देखी नहीं
जंगल के बाहर की दुनियां
सांसे जो चलती हैं अंधेरे में चुपचाप
छोड़ती हैं देह का साथ
अनजानी बीमारियों के हाथों कत्ल होकर
देखती है साथ छूटे उन देहों को
बहती हुई लाश बनकर लाल नदी में
इससे बेखबर
उसी सारंडा के जंगलों में घूमती -फिरती
आती है सरकार सिर्फ चंद चिंहित गांवों में
रास्ता बनाती हुई सोलर लैंप की रोशनी में
और खनिजों के होने के सही निशान
ढूंढ निकालती है बड़ी आसानी से जाने कैसे
पर इन्हीं जंगलों में नहीं खोज पाती
उन गुमनाम कई गांवों का पता ।।

प्रकृति और स्त्री

सदियों से तुम डरते रहे प्रकृति से
सोचकर, वो है सृजन के साथ विनाश की भी देवी
तुम उसे कभी समझ नहीं पाए, जैसे
कभी समझ नहीं पाए तुम स्त्री को भी
औजार और सत्ता हाथ में आते ही
पहले किया प्रकृति को तबाह
करने को उन पर एकक्षत्र राज
कभी न सुनी स्त्री की भी आह
सृजनशाीलता की जादुई डिबिया में बंद
कैद रह गयी हमेशा उनकी आवाज,
तुमने स्थापित किया देवियों को
घर से बाहर, बनाकर मंदिर
तुम्हारी बनायी विकसित दुनिया में
ताकि, हमेशा के लिए उन मंदिरों में
पुरातन सभ्यता की देवियां, रह जाएं बंदी,
‘मातृसत्तात्मकता’ के शब्द जाल में कैद
ये देवियां हर साल अलग-अलग नामों से
तुम्हारे ही हाथों से लेती हैं आकार
तुम्हीं उतारते हो उनकी आरती
फिर करते हो
अपने ही हाथों उनका अंतिम संस्कार,
तुमने धरती को खोद डाला
उसके गर्भ से निकालने को
आर्थिक वर्चस्व के लिए संपदा अपार
पीढि़यों पर करने को अपना अधिकार
तुमने अनसुनी कर दी स्त्री की चित्कार
फिर आज कौन सी ताकत तुम्हें
खींच लाती है इन देवियों के दर
वो है सिर्फ और सिर्फ
प्रकृति और स्त्री से तुम्हारा डर।।

टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां

पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
यहां लीज पर
लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
होता है हर रोज विस्फोट
एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को,
हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से,
पहाड़ टूटते हैं पर कुछ बोल नहीं सकते
जो बोल सकते हैं वो अपना मुंह नहीं खोलते
बस देखते हैं टुकुर-टुकुर कैसे कोई
पहाड़, जंगल, जमीन को ट्रकों पर लादकर
ले जा रहा एक मजबूत घर जमाने को
जो कहते हैं खुद को रखवाले, कैसे वो लोग
इन जंगलों-पहाड़ों की खूबसूती देकर किसी गैर को
देखो हाथ हिलाते हुए निकल जाते हैं हर साल
देश के दूसरे भागों में पहाड़ी सैर को ।।


क्यों नहीं होता मलाल

हर साल इस देश की गलियों से निकलकर
हजारों लोग जाते हैं विदेश रंगीन सपने लिए
किसी भारतीय को अगर किसी गोरे ने मार दी चाकू
मानवता चीखती है अपने देश के हर कोने से
देशभक्ति की लहू टपकती है इस देश के सीने से
छिड़ जाती है बहस भारतीयों की सुरक्षा पर
हर कोई टिप्पणी करता है गोरों के नस्लभेदी रवैये पर,
हमारे गांव से निकलकर फूलो भी जाती है
अपने ही देश के किसी शहर में, जहां
चाकू से गोद दिया जाता है उसका चेहरा
बिगाड़ दिया जाता है इंसानी शरीर का नक्शा
इसी देश में नस्लभेदी, संवेदनहीन लोगों द्वारा,
मसल दिया जाता है उन पलाश के फूलों को
जो बिखरी होती है महानगर के हर घर में
जंगल से निकल कर मेहनत के रंग से
उनके घर की चारदिवारियेां को रंगती हुई,
खरीद लिया जाता है उसका कोख
एक ही घर के सारे मर्दो द्वारा
जलाने को चिराग अपने वंश का
उस फूलो की जिंदगी की लौ बुझाकर
लौट आती है वो अपने घर वापस
जब नुचे-खुरचे, चिथड़े-चिथड़े हो चुके
अपनी आत्मा के टुकड़ों को समटते हुए
किसी जिंदा लाश की तरह चलती हुई
तब देश के कोने-कोने से नहीं उठता
ऐसी ही हजारो फूलो की सुरक्षा पर सवाल
नस्लभेदी, संवेदनहीन देश के लोगों को
क्यों नहीं होता अपनी करतूतों पर मलाल ।।
 
तुम्हारे योद्धा होने की कहानी

ओ सांवरी,
तुम्हारे माथे पर ये जख्म कैसा
कोई गाढ़ा लाल सा
जैसे जम गया हो रक्त
माथे पर तुम्हारे न जाने
कई सदियों से पुराने घाव सा
और तुम उसपर डाले फिरती हो
डहडहाता लाल रंग का सिंदूर
जिससे छुपा सको जख्म अपने
और तुम खुश हो जमाने को
देकर अपने सुहागन होने का प्रमाण,

देखो न गौर से सांवरी
उनके बदन पर तुम्हारे लिए
कौन-कौन से और कितने प्रमाण हंै ?
क्या कोई पुरानी निशानी
रख छोड़ी है उसने ?
जिसपर जमे परतो को खुरचकर
तुम्हारी नई पीढि़यां पढ़ सके, कभी
तुम्हारे योद्धा होने की कहानी,

ओ सांवरी,
उनके कई गुनाहों की
आड़ी-तिरछी हजार लकीरें
अपने बदन पर लिए तुमने
क्यों सीख लिया उसपर
रेशमी टुकड़े डालकर उन्हें छुपाना,

देखो इन सफेद कपड़ों के पीछे
तुम्हारे बदन पर हिंसा की खरोंचें हैं
उन खरोंचों से निकलते लाल खून को
तुम अपने मन के चुल्हे का अंगार बना लो
जिसपर खुद को तपाकर गढ़ सको एक खंजर
जिससे भविष्य की पहाड़ों पर खोद सको़
तुम्हारे जीवन जंग के मैदान में
हमेशा से एक योद्धा होने की कहानी.................।।



(रचनाकार परिचय:
जन्म: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के एक छोटे से गांव खुदपोस के बांधटोली में.  पिता के बिहार पुलिस में होने के कारण बचपन बिहार और संथाल परगना में बीता।
शिक्षा: गोड्डा के ख्रीस्त राजा स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन संत जेवियर्स काॅलेज रांची से ।
सृजन:  स्कूल के दौरान रांची  से निकलने वाली पत्रिका राही में कहानी व कविता का प्रकाशन। इसके अलावा ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में रिपोर्ट, लेख, कविताएँ 
सम्मान: छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ का  2014 में प्ररेणा सम्मान
संप्रति:  प्रभात खबर, दैनिक जागरण, गुलेल डाॅट काॅम, डीएनए डाॅट काॅम के लिए रिपोर्टिंग करने के बाद वर्तमान में तहलका सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता।
संपक:  jcntkerketta7@gmail.com )
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सोमवार, 2 जून 2014

कविता का कुलदीप, ग़ज़ल की अंजुम



चार कविता : चार ग़ज़ल
 
अकेले में बहुत चीखा किये है ! समंदर रात में रोया किये है !!
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
कुलदीप अंजुम की क़लम से


गुनाहगार तो मैं भी हूँ

बदलाव वक़्त की ज़रुरत है
ज़िन्दगी ने यही सिखाया है
सब बदल गए
हवा, पानी, रुत औ' फ़िज़ाएँ
शायद बदल गया

अक्से गुनाह भी ....!
सुबह दफ्तर जाते वक़्त
एक वृद्धा देखी थी
ज़र्ज़र ,मलिन, धूसरित काया
माँस कहाँ ख़त्म
हड्डियाँ कहा शुरू ..
कुछ पता नहीं !
ज़िन्दगी से इस कदर अनमनापन
स्टेशन के एक कोने में
इतना बेबसपन...
मानो खुद के वजूद को ललकारती
इंसानियत को दुत्कारती
हर मुसाफिर को घूरती
जारी थी एक अबूझ सी खोज
ना जाने कब से

आखिर मदद के हाथ
इतनी आसानी से तो नहीं मिलते ...!
मैंने भी डाली
एक बरबस सी
ठंडी निगाह......
और फिर ज़िन्दगी ने
जोर का धक्का दिया

शाम को वक़्त जब कुछ ठहरा
तन्हाई ने दामन थमा
तो आंख शर्म से झुक गयी
ना जाने क्यूँ लगा
कि
गुनाहगार तो मैं भी हूँ
उस बेरहम खुदा के साथ.........!!

2.

हमेशा गुमसुम से रहने वाले
दूसरों के लिए लगभग झक्की
अजनबी और अपने कहे के प्रति
औसतन ईमानदार
कवि को
कब चाहिए होता है
कोई ज्ञानपीठ
कोई पद्म
यहाँ तक के कोई दीवान
या रिसाला
वो तो चाहता है
के कविता
सीधे उसके कोख से उतरकर
एक मुसलसल सफर में लग जाये !
सफ़र, एक ऐसा सफ़र
जिसकी शुरुआत ही
गली के
उस आखिरी कोने से हो !

जंग ज़िन्दगी से ...

इन्सान और जिंदगी
के बीच की जंग
शाश्वत और ऐतिहासिक है |
यदि केवल कर्म ही
इस प्रतिस्पर्धा का
आधार होता
तो सुनिश्चित सी थी
इन्सान की जीत ,
मगर इस जंग के
अपने कुछ एकतरफा
उसूल हैं ,
भूख, परिवार, परम्पराएं
मजबूरी, समाज, जिम्मेदारियां
खींच देती हैं
हौसलों के सामने
इक लक्ष्मण रेखा
और फिर कर्म
का फल भी तो
हमेशा नहीं मिलता ,
लटकती रहती है
भाग्य की तलवार |
दमतोड़ देते हैं हौसले
और घट जाती है
जीवटता के जीतने की
प्रत्याशा ||

सुनो ....

उदास क्यूँ हो तुम .....
एक उचटती नज़र डालो  जरा अपने इतिहास पर
तो जानोगे कि
तुमने रची है अनेक क्रांतियों की रूपरेखा ...
तोड़ चुके हो कई बार वक़्त का ठहराव
तुमने हमेशा पैदा किया है नया हौसला
बदली हैं इंसानी सोच और तोड़े हैं सोच के दायरे
तुम्हारे खून में है तोडना बंदिशें
और एक अल्हड़पन ......
व्यापक है बहुत तुम्हारा विस्तार
तुम फैले हो रूस  से लेकर लातिन अमरीका  तक
भारत से लेकर फ़्रांस और क्यूबा तक
और आजकल तुम मशहूर हो ट्यूनीशिया  से लेकर सीरिया तक
तुम बसे हो सुकरात से लेकर कन्फ्यूशियस तक
रूसो ,वाल्टेयर से मार्क्स तक
मार्टिन लूथर से लेकर गाँधी तक
ग़ालिब से लेकर लमही के प्रेमचंद तक .......

 
और सुनो
तुमने नहीं छोड़ा कभी भी मुझे एकाकी
चलते रहे हो साथ हमेशा कदम बकदम बतौर हमसाया
निराश  मत हो
मुझे यकीन है तुम
बदल दोगे दुनिया
अपनी आखिरी सर्द आह लेते लेते ......

.............

.........

...शब्द असहाय नहीं हो तुम !

 

1.
अब हो गयी है वक़्त की पहचान बग़ावत  !
मजबूरिओं में कर रहा इन्सान बग़ावत  !!

शुरुआत में अच्छा बुरा सब इल्म उसे है !
फिर बाद उसके सबसे है अनजान बग़ावत  !!

अंजाम से आगाज़ को देखा जो पलटकर !
क्या पूछिए कितनी हुई हैरान बग़ावत  !

देखो जरा समझो भी तो मौसम का तकाजा  !
ये क्या कि हर इक बात का उन्बान बग़ावत  !

परखो जरा उनको कभी बीमारे जुनूं तुम !
करते  रहे जो  आजतक ऐलान बग़ावत  !

2. 

जिन्दगी क्या अजब मुसीबत है !
हर घड़ी कुछ न कुछ ज़रुरत है !!

जब भी सोचो की बच गए अब के !
उसके अगले ही पल फज़ीहत है !

तुम इसे छोड़ने को कहते हो !
ये मेरी एक ही तो आदत है !

सच कहा पास कुछ नहीं मेरे !
बस मेरे नाम एक वसीयत है !!

 
3.

क्या अजब काम खैरख्वाही भी !
लूट के साथ रहनुमाई भी !! 

है पशेमाँ बहुत खुदा अबके !
लोग कोसें भी, दें दुहाई भी !!

हाकिमे वक़्त ने सुना ही नही !
वक़्त रोया, कसम उठाई भी !!

क़त्ल कर कर के थक गए अब वो !
खुश कहाँ शहर के दंगाई भी !!

और क्या चाहिए तुझे उससे !
होश है , साथ लबकुशाई भी !!

 
4.

रेत पे दुनिया बसाये बैठे हैं !
नुमाइशे ख्वाब सजाये बैठे हैं !!

जिंदगी से अनमना पन देखो !
ख्वाब से दिल लगाये बैठे हैं !!

मंजिलो तक कौन ले जाये मुझे !
रास्ते सब सर झुकाए बैठे हैं !!

गर्मी ऐ बाज़ार को तो देखिये !
सब मसीहा फड लगाये बैठे हैं !!

मेरी आँखों में ही खली अश्क हैं !
बाकि सब तो मुह घुमाये बैठे है !!

हसरतो ने आके आजिज़ जान दी !
फिर भी हम हिम्मत जुटाए बैठे हैं

(रचनाकार परिचय:
पूरा नाम: कुलदीप यादव 
जन्म : 25 नवंबर 1988 को फ़र्रुख़ाबाद में
शिक्षा: बीटेक
सृजन: कविता व ग़ज़ल
सम्प्रति: .दक्षिण अफ़्रीका में  सॉफ्टवेयर इंजिनियर
ब्लॉग : राही फिर अकेला है
संपर्क: Kuldeep.yadav@standardbank.co.za)


हमज़बान पर पहले भी

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रविवार, 1 जून 2014

ऋतु दा या ऋतु दी मतलब ऋतुपर्णो घोष

रिश्तों की जटिलता का बारीक फ़िल्मकार 



 








ऋतु कलसी की क़लम से  


विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता सुनील घोष से ही मिली थी। सुनील डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो  ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया। अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

ऋतुपर्णो घोष लेखक और कवि भी थे. बंगाल के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती थी.कुछ समीक्षकों का यह भी कहना था कि उन्होंने बंगाल के साहित्य और फिल्म शैली को दुनिया तक पहुँचा कर, सत्यजीत रे की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन उनकी असमय मौत के कुछ वर्षों पहले वह फिल्म निर्माता कम और एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के प्रतीक ज्यादा बन गए थे.
ऋतुपर्णो ने सार्वजनिक रूप से क्रॉसड्रेसिंग करके, मेकअप लगाकर, पगड़ी और खूबसूरत दुपट्टों का इस्तेमाल शुरू कर पूर्वाग्रहों को चुनौती दी. अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर उन्हें एक अलग किस्म का प्रशंसक वर्ग मिला, लेकिन उनके करीबी लोगों ने उनसे कुछ दूरी भी बना ली, और उन्हें मिला एक अकेलापन, जिसे उन्होंने दुखी मन से स्वीकार भी किया.उनके बारे में अप्रिय चुटकुले बनने लगे. हालाँकि शीर्ष अभिनेत्रियाँ (राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद में) उनके साथ काम करने के लिए उतावली थीं, लेकिन फिल्म उद्योग में अंतर्निहित होमोफोबिया को समझते हुए वह इस बात को लेकर सतर्क थे कि वह मर्द कलाकारों के साथ कैसे बातचीत कर रहे हैं.
ऋतुपर्णो ने अर एकती प्रीमर गोल्पो, मैमोरिज़ इन मार्च और चित्रांगदा में उन्होंने अभिनय भी किया. उन्होंने स्त्री की तरह दिखने के लिए कुछ सर्जरियाँ करवाईं और हॉर्मोन थेरेपी का सहारा भी लिया. इन फिल्मों को बनाने और खुद को सबके निशाने पर रखा उनका व्यक्तित्व फीका और सावधानीपूर्ण हो चुका था, और वह पूरी तरह से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे थे. लेकिन वह जानते थे कि वह अपने सेलेब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल एलजीबीटी समुदाय के लिए कर सकते हैं.














फैशन शो हो या फिर पुरस्कार समारोह, ऋतु महिलाओं की पोशाक में नज़र आते थे जिसके लिए वो कई बार मीडिया में चर्चा का पात्र भी बन जाते थे. बावजूद इसके वो बिना किसी झिझक या शर्म के महिलाओं के कपड़े पहनते थे और समलैंगिकता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते थे.ऋतु की सहकलाकार रही दीप्ति नवल का कहना है अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा. उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी.
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( रचनाकार परिचय:
 जन्म: 9 सितंबर
शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से फ़िल्म की पत्रिका ‘सिने वर्ल्ड ’ का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
संपर्क:reetukalsi@gmail.com)

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