बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

ख़्वाजा अहमद अब्बास को याद करते उनके नवासे

 आज़ाद  क़लम का  आख़िरी पन्ना














मंसूर रिज़वी की क़लम से
मेरी परवरिश बंबई के उसी घर में में हुई,जहां बाबा रहा करते थे। अब्बास साहब को हम मुहब्बत से ‘बाबा’ ही पुकारा करते थे । जुहु के उनके मकान में सन सत्तासी तक रहा, जोकि अफसोस से उनके इंतक़ाल का साल भी था। बाबा को हमेशा उस इंकलाबी शख्सियत के तौर पर याद करता हूं… जो लकवे का झटका बर्दाश्त कर भी पहली मुहब्बत क़लम पर कायम रहे। उन मुश्किल दिनों में आप साप्ताहिक बिलिट्ज़ के लिए हिंदी व अंग्रेजी मजमून लिख रहे थे। आप मरते वक्त तक वहां ‘आज़ाद  क़लम’  नाम से ‘आख़िरी पन्ना’ कालम लिख रहे थे। 
बहुत सी फीचर फिल्मों को बनाने के अलावा बाबा ने वतनपरस्ती जज्बे को जगाने वाली खास फिल्में भी बनाई। अब्बास साहेब वतन को लेकर बहुत गंभीरता से सोंचा करते थे। आप जज्बा-ए-वतन अर्थात देशभक्ति के जबरदस्त पैरोकार थे। आपकी लघु फिल्म ‘दो दोस्त’ में मेरे अलावा एक मजदूर के बेटे ने भी काम किया
था। कहानी में अमीर व  ग़रीब लडकों की तस्वीर-ए-जिंदगी के बरक्स पनप रही गहरी दोस्ती को विषय बनाया गया। इनकी प्यारी दोस्ती बन रही इमारत के पूरा हो जाने के  साथ जज़्बाती अंत को पा गयी। अम्मी आपको
मामूजान कहकर बुलाया करती थी। हम भी आपको कभी कभी मामूजान कहा करते थे। आप यकीन ना करें लेकिन अमिताभ भी अब्बास साहेब को इसी नाम से पुकारा करते। अमिताभ बच्चन से मिलना मुझे अब भी याद है। शहंशाह रिलीज होने की खुशी में एक महफिल जमा हुई थी। उन दिनों बाबा बहुत सख्त बीमारी से गुजर रहे थे। अमिताभ साहेब ने हमारी फिक्रों को साझा किया| आपको बताऊं कि अस्पताल के खर्च की जिम्मेदारी अमिताभ उठा रहे थे|
एकता के जज्बे को सलाम करते हुए बाबा ने ‘Naked Fakir’ डाक्युमेंट्री बनाई थी । महात्मा गांधी की इज्जत में सदर विंस्टन चर्चिल के इस्तकबाल ‘Naked Fakir’ के नाम से महात्मा गांधी पर फ़िल्म बनाई । बाबा परवरदिगार को अपनी इबादत व अकीदत अदा करने के लिए उसके किसी घर से परहेज नहीं करते थे । धर्म के संकीर्ण भेदभाव से विरोध का यह नायब तरीका था|

 काम की तालाश में आए फरियादी नौजवानों को आप अपने दर से खाली नहीं लौटाया करते थे। जिंदगी की राह में इनके जुनूं को जिंदा रखना जानते थे| फिल्मों में तक़दीर आजमाने आए इन युवाओं को शायद मालूम ही था कि बाबा ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन  की तक़दीर बनाई। वो जाने अनजाने अमिताभ की किस्मत पा लेने की कोशिश में दीवाने से  थे। इंटरव्यु में इन लोगों से बाबा का सवाल रहता, आपने मेरी कौन सी फिल्में देखी? सबसे ज्यादा पसंद आने वाली फिल्म? इसका रटा रटाया जवाब ‘सात हिन्दुस्तानी’ हुआ करती थी। आगे बाबा इसी से जुडा हुआ सवाल रखते मसलन  आपको किस किरदार ने सबसे अधिक प्रभावित किया? इसका जवाब अक्सर अमिताभ बच्चन का किरदार ‘अनवर अली ‘ हुआ करता था। बहुत से लोग ऐसा ही जवाब देते तो बाबा उलटकर पूछ लेते कि सिर्फ अमिताभ ही क्यों? जवाब ...युवा इम्तिहान में लड़खड़ाने लगते| वहां मौजूद हमलोग तब हंसी रोक नहीं पाते थे! बाबा नेहरू के विचारों को कटटरता से मानने वालों में से थे। 
आप जवाहरलाल नेहरू के वक्त से नेहरू-गांधी खानदान से गहरे रूप से प्रभावित रहे। इस खानदान पर आपने बहुत सी किताबें भी लिखीं। फिर भी इमरजेंसी की वजह से इंदिरा गांधी की पालिसियों की जबरदस्त आलोचना करने से नहीं चूके । इंदिरा जी पर लिखी आपकी दो किताबें इस सिलसिले में अहम थी। एक बार बाबा मुझे आल इंडिया रेडियो की रिकाडिंग सिलसिले में साथ ले  गए थे। उन दिनों बचपन के लिहाज से दुनिया की हलचल से अनजान सा था। इंदिरा गांधी की हत्या की खबर लेकिन इस उस बच्चे को भी असर करने वाली थी| क़त्ल की खबर पर अब्बास साहेब के चेहरे की रंगत को बदलते जरूर देखा। 

हमें एक डिनर पर जाना था,लेकिन आपका मन गमगीन फिजा में डिनर की सोंच सकता था? आसपास का माहौल भी नाजुक हो चुका था। घर वापसी के रास्ते में कुछ इंतेहापसंद नौजवानों ने रास्ता रोककर इंदिरा के कातिलों को खत्म करने के लिए मदद मांगी। गाडी रोकर हमलोगों के हुलिए की छानबीन की गयी। उस वक्त उसमें अम्मी व चचीजान के अलावा मर्द की शक्ल में अब्बास साहेब भी सवार थे । इंतेहापसंद लोगों के सरों पर खून सवार था… लेकिन हमारी गाडी को पास कर दिया गया। क्योंकि एक लडके ने बाबा को पहचान लिया था..युवा अपनी धड़कन को भला नुकसान पहुंचा सकते थे ? सब बहिफाजत वापस घर में थे| बहरहाल ... खेलों में  बाबा को क्रिकेट में सबसे ज्यादा  दिलचस्पी थी। हिन्दुस्तान-पाक मुकाबलों के खासे दीवाने रहे। जानते हुए कि आपकी बहन को करांची ब्याहा गया था| यह जानने की कोशिश में कि बाबा किस टीम की हिमायत में? हम आपका पक्ष जानना चाहते थे। बाबा का जवाब दो टूक हुआ करता….कपिल देव का दीवाना हूं।
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(पेशकश सैयद एस.तौहीद)


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2 comments: on "ख़्वाजा अहमद अब्बास को याद करते उनके नवासे "

शहरोज़ ने कहा…
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शहरोज़ ने कहा…

समय के बड़े कथाकार-कवि उदय प्रकाश ने संस्मरण पढ़कर प्रतिक्रिया मेल की है:
' बहुत बहुत आभार। मेरे कज़िन उनकी दो फ़िल्मों के सिनेमेटोग्राफ़र थे- ' बंबई रात की बाँहों में' और 'सात हिंदुस्तानी'। पहली फ़िल्म पर उन्हें नेंशनल अवार्ड भी मिला था।
बचपन में हमने उनके कई क़िस्से सुने।
इस संस्मरण को हम तक पहुँचाने के लिए धन्यवाद।'

उदय जी के हम ममनून हैं. कि आपने मुहलत निकाली

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- अल्लामा जमील मज़हरी

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