बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 11 अगस्त 2014

दावेदारी फिर अनुरोध












रजनी त्यागी की कविताएं

तुम्हारी सदाशयता पर शक नहीं

तुमने कहा, सुरक्षा
लड़की ने सुना, क़ैद
क्या सचमुच तुमने सुरक्षा कहा
या सचमुच तुमने क़ैद कहा था
नहीं ! तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं
क्योंकि तुमने लड़की को धन भी कहा था
और वो भी पराया

फिर लड़की ने क्यों सुना क़ैद ?
शब्द उसके कानों तक पहुँच कर बदल कैसे गए?
या फिर वो ही बदल गई है?
लड़की बड़ी मुश्किल में है
जब से एक दिन उसने झाँक लिया
अनगिनत परिंदे उड़ते हैं उसके भीतर
पंख फड़फड़ाते और भी बड़ा आकाश चाहते हैं
लड़की इधर-उधर दौड़ती
हांफ-हांफ जाती है
इन्हें पकड़ने के लिए
बस में नहीं आते कम्बख़्त !
लड़की को चैन से बैठने नहीं देते
धन नहीं होने देते
एकदम ज़िंदा रखते हैं
पंखों की फड़फड़ाहट और इनकी चायं-चायं ने ही
ख़राब कर दिए हैं लड़की के कान
तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं!
तुम तो कहते हो 'सुरक्षा'
और लड़की सुनती है 'क़ैद '

8 मार्च : दावेदारी फिर अनुरोध

वैसे दिन तो सभी मेरे भी थे
पर दावेदारी के लिए एक दिन तो मिला
वैसे दावेदारी करना मेरे जीने का ढंग था ही नहीं कभी
मेरे जीने का ढंग तो प्रेम और मित्रता था
प्रेम का अनुवाद तुमने दासता किया
और दासों से कैसी मित्रता
चढ़ते गए तुम प्रभुता के पायदानों पर
मै क्योंकर रोकती
और पहुँच भी गए तुम सबसे ऊपर

सुनो, आज के दिन मैं तुमसे कहती हूँ
बहुत सन्नाटा है प्रभुता के शिखर पर
वहां का अकेलापन लील देगा तुम्हें
सुनो, वापस लौट चलो
ये कोई दावेदारी नहीं किसी दिन पर
मित्रता का अनुरोध है प्रेम भरा
क्योंकि मेरे जीने का ढंग प्रेम और मित्रता है

ऊर्जा की संभावना

तुम्हारे भौतिक जीवन में यदि मेरी कोई भूमिका होगी
तो मैं ज़रूर मिलूंगी तुम से ..एक दिन
क्योंकि प्रकृति का नियम है
जो विज्ञानियों ने खोज निकला है
पदार्थ के बनने को अणु करते हैं
इलेक्ट्रान का लेन-देन और जुड़ जाते हैं
तब तलक हमारी संवेदनाओं की ऊर्जाएं
मिलती रहेंगी स्वाभाविक बहाव में
क्योंकि ऊर्जा पदार्थ की मोहताज  नहीं होती.

आभार

रोज़ चली आती हो
बिना नाग़ा
नियम की बहुत पक्की
बहुत कर्मठ हो तुम
रास्ते हज़ार रोके कोई
हों कितने भी दरवाज़े बंद
अपनी मंज़िल पहुँच
जम ही जाती हो तुम
कई बार सोचा, नहीं दूँ ध्यान तुम पर,
पर तुम ज़िद्दी जमी हुई अपनी जगह
मुंह चिढ़ाती और भी जम जाती हो
दिलाती हो मुझे मेरा निक्क्मापन याद
धूल तुम्हें धन्यवाद् !!

जानती हूँ..तुम हो मेरे आस-पास

सुनहरे तिलिस्म का सागर है
दूर तक लहराता हुआ
असंख्य लहरें
व्यस्त हैं अपने रोज़मर्रा के कामों में
तूफ़ान और शान्ति दोनों को
एक साथ समेटे
इस किनारे बैठ जब छूती हूँ इन्हें
खरगोश सा स्नेह मेरी हथेलियों पर
आ फुदकता है
जानती हूँ किसी किनारे पर
तुम बैठे हो

रूह पर स्वामित्व कैसे हो

वो जो रौशन थी परिधि
वो नूर रूह का ही था
तुम घूमते रहे, उलझते रहे
परिधि से बारहा
वर्ना मुझ तक पहुँचने का रास्ता
कितना सीधा सा था
उस रास्ते में तुमको
अपने खो जाने का था शुबहा
सो परिधि पर ही चिन लिया
तुमने क़िला अधिपत्य का
मैं दे भी देती रूह को राजस्व में तुमको
मगर रूह के स्वामित्व का पट्टा कभी बना न था

लम्हों की प्रतिध्वनियां

साथ बिताये लम्हों की प्रतिध्वनियां
नई-नई व्याख्याएँ पेश करती हैं
उस दिन साथ बैठ कर खाते हुए
एक कौर मेरे मुंह के पास लाकर
तुमने निर्देश दिया, आ!
तुम्हारी उपस्थिति की तरंगों में सराबोर
तुम्हारी आँखों के तिलिस्म में डूबी मंत्रमुग्ध सी
एकदम यंत्रवत मैंने भी पालन किया
और मुझे छलते हुए तुमने
झट से कौर अपने मुंह में रख लिया था
ठगी हुई, आहत सी मैं हैरान हुई पहले
फिर तुम्हारी मज़बूत बाज़ू पर
ढेरों मुक्के बरसाए
और तुम हंस रहे थे बेसाख़्ता
मैं तो इसे प्रेम की
चुहलबाज़ी समझी थी
क्या इसी से मुझे समझ लेना था
कि दरअसल छल करना ही
तुम्हारा असल मिजाज़ है ..

गहरी जमी उदासी

कुछ इधर पड़ा है
कुछ उधर पड़ा है
मेरे भीतर का सब सामान तितर-बितर पड़ा है
उधर गिलास लुढका हुआ
कुछ घूंट जो उम्मीद थी उसमें
अब बह चली है फर्श पर
सपनों के बिस्तर पर हजारों सिलवटें हैं
अनधुले कपड़ों सा दर्द कुर्सी पर बिखरा
बिस्तर पर भी
मेज़ पर जमे बैठे हैं काम कई
टुकुर-टुकुर घूरते हैं
फर्श पर भी जम गया है कितना ही कूड़ा-कबाड़
कुछ चोटें हैं
कुछ गुस्सा है
बहुत सी खिन्नता है
मेरे भीतर का सब सामान-तितर बितर पड़ा है
म्मम्म..सोचती हूँ शुरुआत बुहारने से करूँ

स्थगित किये हुए दर्द

स्थगित किये हुए दर्द भी जागते हैं बारहा
किसी ज़रूरी काम के लिए लगाये रिमाइंडर की तरह
करते रहते हैं दावेदारी
स्थगित किये हुए दर्द भी डालते हैं असमंजस में बारहा
किसी क़ीमती याद से जुड़े क़ीमती सामान की तरह
जो टूट-फूट गया है
नहीं है किसी भी काम का
जिसे ना फेंकते बनता है ना रखते

स्‍थगित किए हुए दर्द ज्‍यादा कुछ कहते-सुनते नहीं
लेकिन वे बदलते रहते हैं
तुम्हारे जीवन की रंगत धीरे-धीरे
पायदान पर जमा होती धूल की तरह
जो बदलती रहती है उसका असल रंग
ग्रे से गहरा ग्रे, कत्‍थई से गहरा कत्‍थई, लाल से मैरून..


(रचनाकार-परिचय: 
जन्म:  26 नवंबर 1981 को दिल्ली में
शिक्षा:दिल्ली के आईपी कोलेज से इतिहास में एम. ए. और  IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 
संप्रति: दिल्ली में रहकर अनुवाद और और हिंदी साप्ताहिक आफ्टर ब्रेक के लिए लेखन
संपर्क: rajni2ok@gmail.com)  

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5 comments: on "दावेदारी फिर अनुरोध"

vandana gupta ने कहा…

स्त्री मन के भावों को बहुत सरलता से पिरोया है ………दिल को छूती शानदार कवितायें

शहनाज़ इमरानी ने कहा…

इनमें विभिन्ता है. मुझे इनकी ज़बान सबसे अच्छी लगी. साफ़गोई है. लफ़्ज़ों या मुहावरे के बनाव-सिंगार में कम, कंटेंट पर कवयित्री ज़्यादा यक़ीन करती हैं। खुद का अर्जित किया हुआ अनुभव है। हर कविता में एक सादापन है।

शहनाज़ इमरानी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
mehreen jafri ने कहा…

स्त्री मन की उधेड़बुन को बड़ी सादगी से कविताओं में पिरोया है। अच्छा लिखती हैं रजनी जी बधाई!

Dr.Ajeet ने कहा…

रजनी त्यागी जी,

आज आपकी कविताएं विस्तार से स्वर पढी। स्त्री मन पर बहुत सी मित्रों की कविताएं पढने का अवसर प्राप्त हुआ है आपकी कविताएं भले ही अधिक प्रकाशित न हुई हो मगर आपकी कविताओं में संवेदना की परिपक्वता है आप शिल्प को लेकर भी सचेत दिखाई देती है। आपकी कविताओं में महज़ भावात्मक उबाल नही है बल्कि कविता में चेतना के स्वाभाविक प्रश्नों की एक सिलसिलेवार श्रृंखला है जिनके सिरे आपसे मिले हुए है ये कविताएं अस्तित्व का सचेत उदबोधन है तथा कविताओं में ‘सेल्फ’ को लेकर विचित्र किस्म की स्पष्टता है यही वजह है कि आपकी कविताओं में स्त्री मन के बुनियादी सवाल से प्रेम के नए रुपको को स्थान मिलता है। प्राय: स्त्री विमर्श की कविताएं विद्रोह की वैचारिकी के चलते आक्रमक एवं शुष्क हो जाती है मगर आपकी कविताओं में एक रिदम है इसी वजह से कविताओं का मन पर स्थाई मनोवैज्ञानिक प्रभाव पडता है कविताएं आपको सचेतक और चैतन्य रुप में परिभाषित कर अपने अस्तित्व के सन्दर्भ में व्यापक दृष्टि से अपनी सम्वेदनाओं का आकाश तलाशती नजर आती है।

इन कविताओं में प्रेम है दर्शन है आध्यात्म भी है साथ ये कविताएं किसी भी सन्देहशील मन को यह विश्वास दिलाने मे समर्थ है कि स्त्री महज़ एक भौतिक ईकाई नही है बल्कि चेतना का एक प्रखर ज्योति पुंज हैं।

हिन्दी कविता में आपकी यात्रा निसन्देह लम्बी होने वाली है बशर्ते आप खुद को ऐसे ही साधे रखें और विमर्श के मध्य संवेदना को जीवित रखें ताकि कविता में सवाल और जवाब दोनो उपस्थित रहें।

मेरी अनंत शुभकामाएं

डॉ. अजीत

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हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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