बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शनिवार, 16 अगस्त 2014

संजय शेफर्ड की कविताएं













टूटने का मर्म   

यक़ीनन जब भी कुछ टूटता है
हमारे अंदर
सबसे पहले यक़ीन टूटता है
खुद का का, खुद से
विश्वास करना मुश्किल हो जाता है
स्वयं पर, स्वयं से

महज़ एक बार टूटने के बाद से ही
हमारा अनुभव स्वयं कर लेता है
अच्छे- बुर, अपने-पराये की पहचान
अनायास ही !
अनायास ही होता है ?
बाक़ी  बाद का सबकुछ
आख़िर उसने विश्वास ही तो तोड़ा था ?

बाक़ी का, ना जाने कैसे
किस आंधी के डर से बिखर गया ?
बिना किसी तूफ़ान के
ज़ार-ज़ार  हो गया सपनों का वह घर
जिसे हमने कभी रेत
कभी ग्लास से बनाया था
विश्वास आख़िर एक शीशे का मकान ही तो है ?

कभी-कभी खुद को भी समझाना पड़ता है
अपने ही टूटे हुए दिल को
टुकड़ों- टुकड़ों में टूट जाने के बाद भी
नहीं टूटने का यक़ीन दिलाना पड़ता है
और इसी जद्दोजहद में
विश्वास फिर से अपनी उम्र क़ायम करता है।


तुम उदास हो !

जैसे कोई लम्हा टूट गया हो
अंदर ही अंदर
जैसे किसी ने तुम्हारे सकून भरे पलों पर
दर्द की बुझी हुई
एक ऐसी ढ़िबरी रख दिया हो
जो सिर्फ
दर्द, तड़प, सिहरन और तरल आंसुओं से जलती है

उस बुझे हुए दिए को
जलाने की मनाही नहीं है
पर क़तरे-क़तरे   रौशनी के लिए
खुद को मारना ; खुद को तड़पाना और
खुद को जलाना होगा

अंधेरा जितना तुम्हारी उम्र के इस पार है
उतना ही उम्र के उस पार है
और तुम बीचोबीच खड़ी हो
अपने दुपट्टे के एक छोर से अतीत
दूसरे छोर से भविष्य को थामें
एक ऐसे वर्तमान में जिसका होना नगण्य है

जिसके होने और नहीं होने का अर्थ
सृष्टि के जीवों के लिए संदेहास्पद रहा है
जिसका होना और नहीं होना
अक्सर हम मनुष्यों को
आश्चर्यचकित और विस्मित करता रहा है

आश्चर्यचकित नहीं ; आज मैं विस्मित हूं
और यह जानते हुए भी कि विस्मय में पूछे गए सवाल
इंसान की भावनाओं को रक्तरंजित
देह को लहुलुहान कर देते हैं
फिर भी मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं

अगर मैं तुम पर पत्थर फेंकू तो
कहां गिरेगा ?
अतीत में ? भविष्य में ?
या फिर उस वर्तमान में जो होता ही नहीं !
जिसका होना महज़  आभासी है
जो अतीत की खिड़की से
अक्सर भविष्य में झांका करता हैं
खुद को वर्तमान कहकर
कभी दर्द ; कभी आंसू ; कभी तड़प बनकर

आखिर तुम उस खिड़की को आज बंद क्यों नहीं कर देती ?


स्वछंद प्रेम  

मुलाक़ात  के पहले ही दिन
एक पुरूष ने
मुट्ठी भर रेत स्त्री की हथेलिओं पर रखा
और कहा, लो ! यह 'प्रेम' है
इसे तुम हमेशा संभाल कर रखना

पल भर के लिए उसे खो देने का डर
स्त्री के हृदय - आत्मा - देह में उतर आया
दिल धड़का, अंगुलियां कांपी,
सांसे रुकने लगी
शायद यह पल उसका था
यह डर भी उसी का दिया हुआ

दूसरे पल उस लम्हे से  आज़ाद होते ही
वह स्त्री ज़ोर-ज़ोर से हंसी
और अपनी हथेलियों की रेत को
आसमान में बिखरा दिया
वह पल दो पल स्तब्ध देखता रहा
और फिर चलता बना

आख़िर  'प्रेम' जैसी चीज को
बंद मुठ्ठियों में
कब तक रखा जा सकता है ?
उस स्त्री का 'प्रेम' कल भी उन्मुक्त था
और आज भी स्वच्छंद और आज़ाद है।


नंगा खेल

रात ख़त्म हो जाती है
एक दूसरे को नंगा करने का खेल
कभी ख़त्म नहीं होता
वह सिर्फ कपड़े नहीं उतारता है
शरीर में घुसकर देह से
एक-एक चमड़ी को अलग कर देता है

सिर्फ वक्षों को नहीं मसलता
पीठ -पेट ; कुल्हे-कोहनियों तक को
रक्तरंजीत और लहुलुहान कर देता है
बहुत ही विभत्स होता है
एक रात के लिए सौदे की शर्त पर
किया जाने वाला अंधेरी रातों का 'अवैध प्रेम'

यूं तो कुछ तितलियां
कोठे की चौखट पर कदम रखने से पहले
अपनी आत्मा और प्रेम को त्याग
अपने गर्भ द्वार को बंदकर
सिर्फ देह के साथ
अपने-अपने घरों से प्रस्थान करती हैं

फिर भी कुछ आत्माएं
देह से चिपकी रह जाती हैं
दौड़ती रहती हैं ; धमनियों, रक्त शिराओं में
रक्त कणिकाओं की तरह
गिरती रहती हैं ; नंगी धरती पर
कटे जिस्म से टपकते लहू की बूंद बन
देह के युद्बभूमि में देह से पराजित हो
हर रात की लड़ाई हारकर

उदास कराहों के बीच न जाने
कितनी सिसकियां खो जाती हैं
भूख, उन तितलिओं के परों को
सिर्फ बेरंग और बदनाम नहीं बनाती
उड़ने की हर कोशिश को बाधित करके
रक्तरंजीत और लहुलुहान भी करती है

देह में कामुकता को तलाशने वाले
हम कलाकार देह को तो उलट-पलट
पेंटिंग या फिर किताब की तरह पढ़ते है
नहीं पढ़ पाते हैं तो देह की
उन उदासिओं को जो पुलिस थाने में
पेट की भूख तो लिखा देती हैं ;
कभी देह का 'बयान' नहीं लिखा पाती।

(रचनाकार-परिचय: 
मूल नाम: संजय कुमार पाल।
जन्म: 10 अक्टूबर 1987 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद में।
शिक्षा: भारतीय मीडिया संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता व जन संचार में स्नातक, जबकि जेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन मुंबई से इसी में स्नातकोत्तर किया
कार्यक्षेत्र: एशिया के विभिन्न देशों में शोधकार्य, व्यवसायिकतौर पर मीडिया एंड टेलीविजन लेखन, साहित्य, सिनेमा, रंगमंच एवं सामाजिक कार्य में विशेष रुचि।
नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन।  25 से अधिक नाटकों का लेखन।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन व प्रसारण।
संप्रति: बीबीसी एशियन नेटवर्क में शोधकर्ता एवं किताबनामा प्रकाशन, हिन्दीनामा प्रकाशन के प्रबंध निदेशक के तौर पर संचालन।
संपर्क: sanjayshepherd@outlook.com)

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2 comments: on "संजय शेफर्ड की कविताएं "

प्रशांत विप्लवी ने कहा…

चारो कवितायें पढ़ी संजय भाई, आप संवेदना के कवि हैं -आपकी बात अंतस तक पहुँचती है | नंगा खेल को दो बार पढना पड़ा ...समझ सकते हैं क्यों ..अच्छी कवितायें मैं कई बार पढता हूँ ..आगे के लिए उसे संजोकर रख लिया है | मेरी शुभकामनाएं |

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

कवितायेँ पढ़ीं। संजय ने एक काव्यभाषा विकसित कर लेने की ओर पहले क़दम रख दिए हैं। मुझे बस यह लगता है कि थोड़े धीरज और थोड़ी सख्त प्रूनिंग तथा एडिटिंग के साथ वह इन्हें और सघन और मानीखेज बना सकते हैं। ढेरों शुभकामनाएं।

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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