बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 8 जून 2014

रास्ता बनाती हुई रोशनी


 










जसिंता केरकेट्टा की कविताएं



नदी और लाल पानी

कोका-कोला बनाकर
तुमने उसे ''ठंडा का मतलब'' बताया
तो अब दुनियां को भी बताओ
सारंडा के नदी-नालों में बहते
लाल पानी का मतलब क्या है?
नदी के तट पर चुंआ बनाकर, पानी
छानते-छानते थक चुकी जुंबईबुरू की
सुकुरमुनी को तुम क्या समझाओगे?
कौन सी उपमा देकर
नदी के इस लाल पानी की ओट में
अपने गुनाहों के रंग छुपाओगे,
पीकर जिसे मौत को गले लगा रही सोमारी
उसकी लाल आंखें सवाल पूछती हंैं तुमसे
कादो से सना लाल पानी
उतार देने को उसके हलक में
और कितने साल की लीज तुमने ले रखी है?
वो लोग भी कहां चले गए, जो कल तक
खूब करते थे लाल पानी की राजनीति
कितनी सशक्त थी वो रणनीति कि
आज तक रंग पीकर बह रही नदी
सवाल पूछ रही है उस शक्स से भी
जो सारंडा के विकास का दावा ठोक रहे,
देवियों की नग्न कलाकृति देखकर हुसैन को
तुम देश निकाले की सजा सुनाना चाहते थे
तो इंसानों की जिंदगी विकृत कर देने वाली
ऐसी हरकतों के लिए क्या दे सकोगे
सारंडा निकाले की सजा?

गुमनाम गांव

आदिकाल का वक्त समयचक्र पर चढ़कर
मानो लुक-छुप कर गिरती किरणों के सहारे
फिसल कर उतर आया है देखो
सारंडा के बिहड़ जंगलों के अंदर, तभी
इस काल में आदिवासी आज भी
झाड़-झंकड़ साफ कर पूर्वजों की तरह
सर छुपाने को बना रहे मिट्टी के घर
कोड़ कर पथरीली जमीनें बना रहे खेत
खा रहे हैं जो कंद मूल और फल फूल
हर रोज चल-चलकर पैरों से खुद
पहाड़ों पर बना रहे पगडंडियां
ऐसे गुमनाम गांव जिसने कभी देखी नहीं
जंगल के बाहर की दुनियां
सांसे जो चलती हैं अंधेरे में चुपचाप
छोड़ती हैं देह का साथ
अनजानी बीमारियों के हाथों कत्ल होकर
देखती है साथ छूटे उन देहों को
बहती हुई लाश बनकर लाल नदी में
इससे बेखबर
उसी सारंडा के जंगलों में घूमती -फिरती
आती है सरकार सिर्फ चंद चिंहित गांवों में
रास्ता बनाती हुई सोलर लैंप की रोशनी में
और खनिजों के होने के सही निशान
ढूंढ निकालती है बड़ी आसानी से जाने कैसे
पर इन्हीं जंगलों में नहीं खोज पाती
उन गुमनाम कई गांवों का पता ।।

प्रकृति और स्त्री

सदियों से तुम डरते रहे प्रकृति से
सोचकर, वो है सृजन के साथ विनाश की भी देवी
तुम उसे कभी समझ नहीं पाए, जैसे
कभी समझ नहीं पाए तुम स्त्री को भी
औजार और सत्ता हाथ में आते ही
पहले किया प्रकृति को तबाह
करने को उन पर एकक्षत्र राज
कभी न सुनी स्त्री की भी आह
सृजनशाीलता की जादुई डिबिया में बंद
कैद रह गयी हमेशा उनकी आवाज,
तुमने स्थापित किया देवियों को
घर से बाहर, बनाकर मंदिर
तुम्हारी बनायी विकसित दुनिया में
ताकि, हमेशा के लिए उन मंदिरों में
पुरातन सभ्यता की देवियां, रह जाएं बंदी,
‘मातृसत्तात्मकता’ के शब्द जाल में कैद
ये देवियां हर साल अलग-अलग नामों से
तुम्हारे ही हाथों से लेती हैं आकार
तुम्हीं उतारते हो उनकी आरती
फिर करते हो
अपने ही हाथों उनका अंतिम संस्कार,
तुमने धरती को खोद डाला
उसके गर्भ से निकालने को
आर्थिक वर्चस्व के लिए संपदा अपार
पीढि़यों पर करने को अपना अधिकार
तुमने अनसुनी कर दी स्त्री की चित्कार
फिर आज कौन सी ताकत तुम्हें
खींच लाती है इन देवियों के दर
वो है सिर्फ और सिर्फ
प्रकृति और स्त्री से तुम्हारा डर।।

टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां

पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
यहां लीज पर
लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
होता है हर रोज विस्फोट
एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को,
हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से,
पहाड़ टूटते हैं पर कुछ बोल नहीं सकते
जो बोल सकते हैं वो अपना मुंह नहीं खोलते
बस देखते हैं टुकुर-टुकुर कैसे कोई
पहाड़, जंगल, जमीन को ट्रकों पर लादकर
ले जा रहा एक मजबूत घर जमाने को
जो कहते हैं खुद को रखवाले, कैसे वो लोग
इन जंगलों-पहाड़ों की खूबसूती देकर किसी गैर को
देखो हाथ हिलाते हुए निकल जाते हैं हर साल
देश के दूसरे भागों में पहाड़ी सैर को ।।


क्यों नहीं होता मलाल

हर साल इस देश की गलियों से निकलकर
हजारों लोग जाते हैं विदेश रंगीन सपने लिए
किसी भारतीय को अगर किसी गोरे ने मार दी चाकू
मानवता चीखती है अपने देश के हर कोने से
देशभक्ति की लहू टपकती है इस देश के सीने से
छिड़ जाती है बहस भारतीयों की सुरक्षा पर
हर कोई टिप्पणी करता है गोरों के नस्लभेदी रवैये पर,
हमारे गांव से निकलकर फूलो भी जाती है
अपने ही देश के किसी शहर में, जहां
चाकू से गोद दिया जाता है उसका चेहरा
बिगाड़ दिया जाता है इंसानी शरीर का नक्शा
इसी देश में नस्लभेदी, संवेदनहीन लोगों द्वारा,
मसल दिया जाता है उन पलाश के फूलों को
जो बिखरी होती है महानगर के हर घर में
जंगल से निकल कर मेहनत के रंग से
उनके घर की चारदिवारियेां को रंगती हुई,
खरीद लिया जाता है उसका कोख
एक ही घर के सारे मर्दो द्वारा
जलाने को चिराग अपने वंश का
उस फूलो की जिंदगी की लौ बुझाकर
लौट आती है वो अपने घर वापस
जब नुचे-खुरचे, चिथड़े-चिथड़े हो चुके
अपनी आत्मा के टुकड़ों को समटते हुए
किसी जिंदा लाश की तरह चलती हुई
तब देश के कोने-कोने से नहीं उठता
ऐसी ही हजारो फूलो की सुरक्षा पर सवाल
नस्लभेदी, संवेदनहीन देश के लोगों को
क्यों नहीं होता अपनी करतूतों पर मलाल ।।
 
तुम्हारे योद्धा होने की कहानी

ओ सांवरी,
तुम्हारे माथे पर ये जख्म कैसा
कोई गाढ़ा लाल सा
जैसे जम गया हो रक्त
माथे पर तुम्हारे न जाने
कई सदियों से पुराने घाव सा
और तुम उसपर डाले फिरती हो
डहडहाता लाल रंग का सिंदूर
जिससे छुपा सको जख्म अपने
और तुम खुश हो जमाने को
देकर अपने सुहागन होने का प्रमाण,

देखो न गौर से सांवरी
उनके बदन पर तुम्हारे लिए
कौन-कौन से और कितने प्रमाण हंै ?
क्या कोई पुरानी निशानी
रख छोड़ी है उसने ?
जिसपर जमे परतो को खुरचकर
तुम्हारी नई पीढि़यां पढ़ सके, कभी
तुम्हारे योद्धा होने की कहानी,

ओ सांवरी,
उनके कई गुनाहों की
आड़ी-तिरछी हजार लकीरें
अपने बदन पर लिए तुमने
क्यों सीख लिया उसपर
रेशमी टुकड़े डालकर उन्हें छुपाना,

देखो इन सफेद कपड़ों के पीछे
तुम्हारे बदन पर हिंसा की खरोंचें हैं
उन खरोंचों से निकलते लाल खून को
तुम अपने मन के चुल्हे का अंगार बना लो
जिसपर खुद को तपाकर गढ़ सको एक खंजर
जिससे भविष्य की पहाड़ों पर खोद सको़
तुम्हारे जीवन जंग के मैदान में
हमेशा से एक योद्धा होने की कहानी.................।।



(रचनाकार परिचय:
जन्म: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के एक छोटे से गांव खुदपोस के बांधटोली में.  पिता के बिहार पुलिस में होने के कारण बचपन बिहार और संथाल परगना में बीता।
शिक्षा: गोड्डा के ख्रीस्त राजा स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन संत जेवियर्स काॅलेज रांची से ।
सृजन:  स्कूल के दौरान रांची  से निकलने वाली पत्रिका राही में कहानी व कविता का प्रकाशन। इसके अलावा ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में रिपोर्ट, लेख, कविताएँ 
सम्मान: छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ का  2014 में प्ररेणा सम्मान
संप्रति:  प्रभात खबर, दैनिक जागरण, गुलेल डाॅट काॅम, डीएनए डाॅट काॅम के लिए रिपोर्टिंग करने के बाद वर्तमान में तहलका सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता।
संपक:  jcntkerketta7@gmail.com )

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5 comments: on "रास्ता बनाती हुई रोशनी "

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

संवेदनाओं की नदी में बहते और किसी गुमनाम गांव की तलाश में पहाड़ों पर स्त्रियों के होने की पगडंडियाँ चढ़ती कवयित्री हमारे सामने एक ऐसे लोक को उदघाटित करती है जो अपने होने के बावजूद न होने का संत्रास झेल रहा है।
शहरोज़ भाई का शुक्रिया कि वे समय-समय पर श्रेष्ट रचनाओं से रु-ब-रु कराते रहते हैं

शहनाज़ इमरानी ने कहा…

बहुत बढ़िया कविताओं के लिए बधाई

अनुभूतियों को लेकर बहुत-सी मर्मस्पर्शी कविताएँ लिखी गई हैं। आदिवासी परिवेशों को लेकर लिखी जाने वाले कवितायेँ बहुत बढ़िया हैं। नदी और लाल पानी, गुमनाम गांव सच के बहुत क़रीब ले जाती हैं।
प्रकृति और स्त्री मार्मिक कविता है। कभी न सुनी स्त्री की भी आह
सृजनशाीलता की जादुई डिबिया में बंद …साड़ी उम्र स्त्री दुखों और तकलीफों को झेलती है और, चाहे स्वयं सबको मुक्ति दिलाती है। पर खुद कभी मुक्त नहीं होती।
टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां, क्यों नहीं होता मलाल, तुम्हारे योद्धा होने की कहानी
जीवन की एक-एक अनुभूतियों को, व्यथा को दर्शाती बहुत ही बढ़िया कविताएं हैं।

शुक्रिया कि श्रेष्ट रचनाओं से रु-ब-रु कराते रहते हैं :)

Kalyani Kabir ने कहा…

ज़िन्दगी की बयानी करती कविताएँ हैं ....gr88888

keep it up!

Anwar Suhail ने कहा…

शहरोज़ भाई, हमज़बान के माध्यम से हमने इस महत्वपूर्ण कवयित्री को जाना है...आप कृपाकर जसिनता केरकेट्टा से रिक्वेस्ट करके
'संकेत' के लिए ताज़ा कवितायें भिजवायें
सादर

Priyambara Buxi ने कहा…

अंतर्मन को झकझोरती हुयी और दिल में गहरे उतरती हुई संवेदनाओं से परिपूर्ण कविताएँ … अच्छी रचनाओं के लिए बहुत बधाई

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- अल्लामा जमील मज़हरी

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