बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शनिवार, 24 मई 2014

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई: फ़हमीदा

चित्र गूगल से साभार


लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता

फ़हमीदा रियाज़ @ डॉ. शाहनवाज़ आलम

पहली नज़्म पंद्रह साल में, मजमुआ छपा जब 22 की हुई 
जब मैं पंद्रह साल की थी, तभी कालेज के दिनों में एक नज़्म लिखी थी. जिसको मेरे दोस्तों ने बहुत सराहा. दोस्तों की ही जिद़ पर मैंने यह नज़्म पाकिस्तान के उस ज़माने के मशहूर रिसाला ‘फूनून’ में छपने के लिए भेजा. जिसके संपादक मशहूर अफ़साना निगार व शायर अहमद नदीम क़ासमी थे. पहला संग्रह ‘पत्थर की ज़बान’ 1968 ईं. में छपा, तब मैं 22 साल की थी. मेरे शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे.

28 जुलाई 1946 को मेरठ में जन्म
मैं 28 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में पैदा हुई. मेरे वालिद रियाजुद्दीन अहमद जदीद दौर के माहिरे तालीम थे. उन्होंने सिंध पाकिस्तान में इस सिलसिले में ज़बरदस्त काम किया. वह वहां जदीद तालीम के बानी माने जाते हैं. जब मैं चार साल की हुई तो वालिद साहब का इंतेक़ाल हो गया. वालिदा हुस्ना बेगम ने परवरिश की. उन्होंने बड़ी ही जद्दोजहद से हम लोगों को पढ़ाया. सिंधी और उर्दू मीडियम से मैंने पढ़ायी की और इन दोनों ज़बानों में शायरी भी. बाद में मैंने फ़ारसी और अंग्रेजी भी सीखी. कालेज के दिनों में ही मैं पाकिस्तान रेडियो मंे न्यूज कास्टर की हैसियत से काम करने लगी.

शुरुआती एक नज़्म
मेरी चमेली की नर्म खुश्बू
हवा के धारे पर बह रही है
हवा के हाथों में खेलती है
तेरा बदन ढूंढने चली है
मेरी चमेली की नर्म खुश्बू
मुझे तो ज़ंज़ीर कर चुकी है
उलझ गयी कलाईयों में
मेरे गले से लिपट गयी है
वह याद की कुहर में छुपी है
सियाह खुन्की में रच गयी है
घनेरे पत्तों में सरसराते
तेरा बदन ढूंढने चली है।

जामिया और जेनयु में  विज़िटिंग प्रोफ़ेसर
ग्रेजुएशन के बाद मेरी शादी हुई. एक बेटी हुई, कुछ सालों बाद तलाक़ हो गया. उस वक्त मैं बीबीसी उर्दू प्रोग्र्राम से मुंसलिक हो गयी थी. इसी दौरान मैंने फिल्म मेंकिग में डिग्री हासिल की. कराची में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी खोली और एक उर्दू प्रकाशन ‘आवाज़’ नाम से शुरू किया. उन्हीं दिनों जफ़र अली उज़ान से मुलाक़ात हुई. वह एक लेफ्टिस्ट पॉलिटीकल कार्यकर्ता थे. हम लोगों ने एक दूसरे को पसंद किया और शादी कर लिया. इनसे दो बच्चे हुए वीरला अली उज़ान, कबीर अली उज़ान (मरहूम). हमारे पब्लिकेशन ‘आवाज़’ में लिबरल और राजनैतिक किताबों की खबर लोगों तक पहुंची. लोगों ने खूब बवाल मचाया और कई तरह के मुकदमे हम पर डाल दिए गए थे. मुक़दमे जफ़र पर भी थे. ब्रिटिश ऐक्ट 124ए के तहत मुकदमें चले. मैं आवाज़ की एडिटर और पब्लिशर थी. ज़फर जेल चले गये. हमें हमारे चाहने वालों ने जेल जाने से पहले ही जमानत पर रिहा करवाया और मैं अपने दो छोटे बच्चों और बहन के साथ हिन्दोस्तान आ गयी. बाद में जेल से छूटकर ज़फ़र भी हिन्दोस्तान आ गये. मैंने यहां सात साल गुज़ारे. इस दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर  की हैसियत से काम किया.

पीएम बनते बेनज़ीर ने बुलवा लिया
फिर बेनज़ीर भुट्टों के शादी के मौके से हम लोग पाकिस्तान गए. जब बेनज़ीर भुट्टों पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो हमें नेशनल बुक फाउंडेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया. नवाज़ शरीफ सरकार ने हमें हिन्दोस्तानी एजेंट और बहुत सारे इल्जाम से नवाज़ा. जब बेनजीर भुट्टों दूसरी बार वज़ीरे आज़म बनी तो मुझे क़ायदे आज़म एकेडमी का चार्ज दिया गया. इसी दौरान मेरा बेटा कबीर अक्टूबर 2007 ई. में अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया और स्विमिंग के दौरान हादसे का शिकार हुआ. 2008 में मैंने मौलाना रोमी की पचास नज़्मों का तर्जुमा फ़ारसी  से उर्दू में किया. यह मसनवी मौलाना जलालुद्दीन रोमी ने अपने शेख शम्स तबरेज़ को डेडीकेट किया है. मैं 2000 से 2011ई. तक उर्दू शब्दकोश बोर्ड की मैनेजिंग डायरेक्टर भी रही. मैंने सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम किया. मैंने सिंध यूनिवर्सिटी में एम.ए के दौरान छात्र राजनीति में हिस्सा लिया. मैंने यूनिवर्सिटी संविधान के खिलाफ खूब लिखा. जनरल अयूब खां के जमाने में छात्र राजनीति पर पाबंदी लगा दी गई. जनरल ज़िया उल हक़ के ज़माने में हमें बहुत ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा.

पत्थर की ज़बान से हम रिकाब तक लम्बा सफ़र
जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. कई  किताबें शाया हुईं . ‘बदन दरीदा’, पत्थर की जब़ान, ख़ते मरमूज़, गोदावरी नावेल, क्या तुम पूरा चांद न देखोगे, कराची, गुलाबी कबूतर, धूप, आदमी की ज़िन्दगी, खुले दरीचे से, हलक़ा मेरी जंजीरों का, अधूरा आदमी, पाकिस्तानी लिट्रेचर और सोसायटी, क़ाफिला परिंदो का, ये खाना-ए-आबो-गिल, दरीचा-ए-निगारिश, हम रिकाब आदि. इसमें शेरी मजमुए, नाविल, सफरनामे और तर्जुमें वग़ैरा शामिल है.

तब दंगों का बाज़ार गर्म था, आडवानी थे रथ यात्रा पर
परेशानी ही परेशानी थी, लेकिन यहां मेरे दोस्तों ने संभाला. खासतौर से जनवादियों ने डी.पी.त्रिपाठी साहब ने उस वक्त मेरी बहुत मदद की. पहले वह कम्यूनिस्ट पार्टी में थे. अब शायद पार्टी बदल ली है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों का बाज़ार गर्म था. आडवानी साहब रथ यात्रा निकाल रहे थे. गुलाम ख्बानी ताबां, डी.पी.त्रिपाठी और मैं पश्चिम उ.प्र. के दौरे पर गए. जिस तरह के खून खराबे से हम सिंधी मजबूर थे. उसी तरह के हालात पैदा हो गये थे.

ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल दौर
 मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’  लिखी।  इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रही है.
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,
जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है,
कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे,
अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,
सोचा कौन है हिन्दू, कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फ़तवा जारी,
अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,
बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
अरे बधाई बहुत बधाई

इस नज़्म को मेरे दोस्त खुशवंत सिंह जो एक सीनियर सहाफ़ी भी हैं (अब दिवंगत ) ने अंग्रेजी में तर्जुमा करके अंग्रेजी अख़बारात में प्रकाशित कराया.

पाकिस्तान में साहित्य ज़्यादा, पर कुछ कर रहे मज़हबी सियासत 
पाकिस्तान में अदब में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. मैं समझती हूं कि हिन्दोस्तान से ज़्यादा, क्योंकि वहां की ज़रूरत है. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है. मैंने समाजी, सियासी नाइंसाफी के खिलाफ़ खुलकर आवाज़ उठायी और बहुत कुछ लिखा. पाकिस्तान में मजहबी ग्रुप बहुत ज़्यादा हावी है. बार-बार फौज़ी हूकूमतें आ रही हैं, मार्शल ला लग रहा है, जम़हूरियत की धज्जियां बिखेरी जा रही है? हां! यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है. कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.


मज़हबी शायर की किताब का तर्जुमा
मार्कसी होने का मतलब नाज़ी के सारे फ़साने का ठुकराना हो ऐसा नहीं होना चाहिये. सज्जाद ज़हीर जब जेल में रखे गये तो उन्होंने ‘हाफ़िज़’ पर किताब लिखी, सरदार ने इक़बाल पर मैंने मौलाना रूमी पर लिखी तो कौन सी बुरी बात हुयी.

अदीबों की अमनो, अमान के लिए कोशिशें

अफगानिस्तान के हालात दूसरे हैं, अभी तो पाकिस्तान की ही हालत ठीक नहीं है. मजहबी ग्रुप हावी है. अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी.
मोजस्सेमा गिरा
मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी
दिया कई बरस तैय हुये
लिखेगा दिन को आदमी
बरंगे आबो जुस्तजू
वह हुस्न की तलाश में
वह मुन्सफ़ी की आस में
खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है
दुकां में दिलबरी नहीं
मकां में मुन्सिफ़ी नहीं
अभी तो हर बला नयी
अभी है काफ़ले रवां
गुलों मेें नस्ब है निशा।
मुजस्सेमा गिरा मगरजमीं पे
ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुई
हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.

 हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते
दोनों तरफ की अवाम अमन चाहती है. दोनों मुल्कों को चाहिये कि  आसानी पैदा करें. कश्मीर तनाज़े का शांतिपूर्ण हल निकाला जाये. दोनों मुल्क अपने सैन्य वजह में कमी करके आम जनजीवन के लिए काम करें. दोनों मुल्कों को एक दूसरे की टेक्नोलाजी से फायदा उठाना चाहिये. अंतरराष्टीय अमन और एलाक़ाई अमन के लिए सार्क मुल्कों की आपसी मशविरे और गुफ़्तगू करके एक बड़़ा मजबूत ‘नो वार पैकेट एग्रीमेंट’ करें. तक़सीने हिन्द के बाद इलाके में रहने वाले लोगों के रिश्ते सरहद के उस पर बंट गये, उसकी बहाली की कोशिश करनी चाहिये.

( यह बातचीत नवंबर 2013 में हुई थी, जब फ़हमीदा दूसरी बार इलाहाबाद आयी थीं)

गुफ़्तगू से साभार

  

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3 comments: on "तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई: फ़हमीदा"

Kalyani Kabir ने कहा…

wowwwww......vry nice words

******** ने कहा…

फ़हमीदा रयाज़ का नाम अदबी हलके में जान-पहचाना है। उनकी बेबाद लेखनी से बहु मुतासिर हूँ। अपने मुल्क की लिए और औरतों की आज़ादी के लिए उन्होंने बहुत लिखा है। यह सही है पाकिस्तान में बहुत उम्दा आदीब और शायर दुनियाँ को दिए है। फ़हमीदा रयाज़ उनमे से एक है। आपका शुक्रिया इतना कुछ उनके बारे में और बेहतरीन नज़्म पढ़ने को मिली। शाहनाज़ इमरानी

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

फहमीदा रियाज कों नाम से तो जानता था पर उनका अदब और उनके ख्याल कभी पढने का मौका नहीं मिला। वाकई जितना प्रगतिशील उनका अदब है उतने ही प्रगतिशील उनके विचार।
उनकी फिक्रमन्दियां और उनके विचार।
शहरोज भाई का शुक्रिया ... एक अहम फनकारि शख्सियत से रूबरू कराने के लिये

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