बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

ब्लास्ट का दोषी साबित होने पर कर दूंगा भाई का क़त्ल

फ़ोटो : मीर वसीम

एक विचारधारा  ने कैसे बदल दिया रंग-रोगन करने वाले मज़दूर का रंग

पटना ब्लास्ट के चार आरोपियों के गाँव हेड कोचा सिठियो से

धुर्वा से लोदमा जानेवाली सड़क सोमवार को बेहद खामोश थी। जगह-जगह समूह में युवा व बुजुर्ग जरूर खड़े मिले। पर किसी भी अनजान चेहरे को देख वह आपस में सिमट जाते। आंखों में बेचारगी और खौफ। उनकी आंखें इम्तियाज, तौफीक, तारीक और नुमान के प्रति उनके आक्रोश को बयां कर रही थी। लोदमा-कर्रा सड़क से दक्षिण की ओर कच्ची सड़क पर हेटकोचा है। आम लोग इसे नीचा मोहल्ला कहते हैं। सड़क के अंत में बने टी प्वाइंट के बायीं ओर सौ साल पुरानी मस्जिद है। यहां के इमाम हाफिज शौकत अली कहते हैं, 'इन लड़कों ने मजहब के साथ हमारे गांव को भी बदनाम कर दिया। खुदा जाने उन्हें रास्ते से भटकाने वाले कौन सा इस्लाम पढ़ाते हैं।'  दरअसल उनका इशारा एक कट्टरवादी विचारधारा की ओर था। जिसकी पुष्टि सरना स्थल के पास पान गुमटी पर खड़े युवाओं ने भी की।
एचईसी में मजदूर नसीम कहते हैं, चार सालों से इन लड़कों का मिलना-जुलना अहले हदीस के लोगों से था। वे अक्सर हमारी धार्मिक परंपरा-व्यवहार के विरोध में बातें करते। गांव में दो मस्जिद है, इनमें अधिकतर लोग देवबंदी स्कूल को मानने वाले हैं। कुछ लोग  बरेलवी विचारधारा के हैं। लेकिन इन लड़कों को कोई तीसरी विचारधारा के लोग प्रभावित करने में लगे थे। करीब तीन साल पहले जब गांव में बड़ा जलसा हुआ, तो मुख्य वक्ता मौलाना ताहिर गयावी से इन लोगों का वाद-विवाद भी हुआ था। जिसपर गांव के लोगों ने इम्तियाज की पिटाई भी की थी।
इन चारों लड़कों से गांववालों ने बातचीत बंद कर दी थी। वहीं उनके घरवाले भी उनसे कटे-कटे से रहने लगे। यहां तक के, जब सड़क दुघर्टना मे मारे गए संझले बेटे के इंश्योरेंस और दूसरे बेटों के पैसे से एचईसी से रिटायर्ड मो. कमालउद्दीन ने दो मंजिला मकान बनवाया, तो इम्तियाज को अलग कमरा दे दिया गया। कम उम्र का लड़का तौफिक इम्तियाज का ही सगा भतीजा है। गांव के स्कूल में ही आठवीं में पढ़ रहा है। अतीउलाह का कम उम्र बेटा तारीक और सुल्तान अंसारी का लड़का नुमान भी इनके गिरोह में शामिल हो गया।
कहने को इनमें से कुछ मकानों में रंग-रोगन, तो कुछ बिजली मिस्त्री का काम करते। लेकिन इनके दिलों-दिमाग को कोई और ही रंग रहा था। लेकिन घर व गांववाले समझते रहे कि यह लड़के उनकी अपेक्षा अरबी व उर्दू अधिक जानते हैं। इसलिए संभव है, धर्म की अधिक जानकारी रखते हों। कुछ लोगों ने उस कट्टरवादी विचारधारा के लोगों पर मासिक ढाई हजार रुपए देकर इन लड़कों को बिगाडऩे का आरोप भी लगाया। गांव के ज्यादातर लोगों से हुई बातचीत के बाद इस आशंका को बल मिलता हैं कि कहीं ये विचारधारा रांची में जिहाद के नाम पर युवाओं की एक नई बेल तो तैयार नहीं कर रही?

ग्राम प्रधान शंकर कच्छप कहते हैं कि उनके गांव में आदिवासी व मुसलमानों की लगभग बराबर आबादी है। लेकिन आज तक इनके बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। फरार तारीक के बड़े भाई मौलाना तौफीक आलम मस्जिद कमेटी के सेके्रट्री हैं। वह कुछ भले न बोले। पर उनके ही भाई तौहीद आलम ने कहा, अगर सच में उनका भाई दोषी निकला, तो वे लोग उसे मार डालेगे। सदर हाजी हसन अली की चुप्पी भी इन लड़कों के कारण हुई गांव व कौम की शर्मिंदगी बता रही थी जबकि इम्तियाज के घर पर मातमी सन्नाटा था। समाजिक कार्यकर्ता साजिद अंसारी का कहना है कि गांव के लोग अब उस विचाधारा के लोगों को गांव में घुसने ही नहीं देंगे। उनकी बात का खुर्शीद अंसारी ने भी समर्थन किया।

भास्कर के लिए लिखा गया 29 अक्टूबर 2013 के अंक में सम्पादित अंश प्रकाशित   

read more...

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

अज़ीज़ नाज़ां की क़व्वाली आपने सुनी ही है, पढ़िए उनकी संगिनी की ग़ज़लें



 








मुमताज़ नाज़ां की आठ ग़ज़ल


1.
हवा ए सर्द से चिंगारियां अक्सर निकाली हैं
 मेरे महबूब की यारो अदाएं भी निराली हैं

चलो देखें हक़ीक़त रंग इन में कैसे भरती है
तसव्वर में हज़ारों हम ने तस्वीरें बना ली हैं

मोहब्बत का दफीना जाने किस जानिब है पोशीदा
 हज़ारों बार हम ने दिल की जागीरें खंगाली हैं

कहाँ रक्खें इन्हें इस चोर क़िस्मत से बचा कर अब
गुज़रते वक़्त से दो चार जो ख़ुशियाँ चुरा ली हैं

परस्तिश आँधियों की अब हर इक सूरत ज़रूरी है
 तमन्नाओं की फिर इक बार जो शम'एं जला ली हैं

हवा भी आ न पाए अब कभी इस ओर माज़ी की
 कि अपने दिल के चारों सिम्त दीवारें उठा ली हैं

बड़ा चर्चा है रहमत का तो देखें अब अता क्या हो
 मुक़द्दर साज़ के दर पर तमन्नाएं सवाली हैं

ज़रा सा चूक जाते हम तो ये हस्ती बिखर जाती
 बड़े मोहतात हो कर हम ने ये किरचें संभाली हैं

उम्मीदें हम को बहलाती रहीं लेकिन यही सच है
 अभी तक तार है दामन अभी तक हाथ खाली हैं

गिला 'मुमताज़ ' अब क्यूँ है कि फ़ितने सर उठाते हैं
 जहाँ में हम ने ही नफरत की बुनियादें भी डाली हैं

2.

हवस हर लम्हा बढती जाती है अब ग़म फनाओं की
 बहारों के लहू से प्यास बुझती है खिज़ाओं की

मेरी गुफ़्तार की क़ीमत चुकानी तो पड़ी मुझ को
 खमोशी भी तो तेरी मुस्तहक़ ठहरी सज़ाओं की

कोई आवाज़ अब कानों में दाख़िल ही नहीं होती
 समा 'अत अब तलक तालिब है तेरी ही सदाओं की

मुक़द्दर की ये तारीकी सफ़र ये तेरी यादों का
 चमक उठती हैं राहें रौशनी से ज़ख़्मी पाओं की

मरज़ ये लादवा है, अब क़ज़ा के साथ जाएगा
मरीज़~ए~जिंदगी को अब ज़रुरत है दुआओं की

मैं हूँ मायूस राहों से तो राहें सर~ब~सजदा हैं
 के मंजिल चूमती है धूल बढ़ के मेरे पाओं की

कड़कती धूप को हम ने किया है सायबाँ अपना
किसे होगी ज़रुरत ऐ शजर अब तेरी छाओं की

हमें 'मुमताज़ ' अब रास आ गई आखिर ये महरूमी
 नज़र अब हम उतारा करते हैं अपनी बलाओं की

3.

मैं जीने का बहाना चाहती हूँ
तुम्हें तुम से चुराना चाहती हूँ

ज़रा यादो मुझे तनहा भी छोडो
 मैं दो पल मुस्कराना चाहती हूँ

ये गर्दिश ही निभा पाई न मुझ से
 मैं इस से भी निभाना चाहती हूँ

ये दौलत ज़िन्दगी की रायगाँ है
 मैं अब इस को लुटाना चाहती हूँ

तराशी जाती है क़िस्मत मुझे
और मैं वो पैकर पुराना चाहती हूँ

बसा है काबा-ए-दिल में जो अब भी
 वो बुत मैं अब गिराना चाहती हूँ

ज़रा कुछ ख्वाब तो तामीर कर लूं
 मैं इक बस्ती बसाना चाहती हूँ

घडी भर की भी राहत के लिए मैं
 हर इक क़ीमत चुकाना चाहती हूँ

हूँ वाकिफ तो सभी चालों से लेकिन
 मैं तुम से मात खाना चाहती हूँ

मिटाती है मुझे क़िस्मत की रेखा
 और इस को मैं मिटाना चाहती हूँ

जो बिखरी है अभी 'मुमताज़ ' हर सू
 उसे महवर पे लाना चाहती हूँ

4.

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, मेरी जान-ए-ग़ज़ल
दो क़दम राह-ए-मोहब्बत में मेरे साथ भी चल

दो घड़ी बैठ मेरे पास, कि मैं पढ़ लूँ ज़रा
तेरी पेशानी प् लिक्खा है मेरी ज़ीस्त का हल

एक उम्मीद प् उलझे हैं हर इक पेच से हम
 हौसला खोल ही देगा कभी तक़दीर के बल

वक़्त की गर्द छुपा देती है हर एक निशाँ
संग पर खींची लकीरें रहें कितनी भी अटल

टूटे ख़्वाबों की ख़लिश जान भी ले लेती है
ख़्वाब दिखला के मुझे ऐ दिल-ए-बेताब न छल

जी नहीं पाता है इंसान कभी बरसों में
ज़िन्दगी करने को काफ़ी है कभी एक ही पल

नूर और नार का मैं रोज़ तमाशा देखूं
खूँ चकां शम्स को तारीक फ़िज़ा जाए निगल

मार डाले न कहीं तुझ को ये तन्हाई का ज़हर
 दिल के वीरान अंधेरों से कभी यार निकल

नौहा ख्वाँ क्यूँ हुए "मुमताज़" सभी मुर्दा ख़याल
 मदफन-ए-दिल में अजब कैसा ये हंगाम था कल

5.

एक गुनह बस छोटा सा, इक लगज़िश नीम गुलाबी
दिल पर दस्तक देती है इक ख़्वाहिश नीम गुलाबी

लम्हा-लम्हा पिघली जाती है हसरत आवारा
 दहके दो अंगारों की वो ताबिश नीम गुलाबी

पल भर में पैवस्त हुई है दिल के निहाँ ख़ानों में
बोझल-बोझल पलकों की इक जुम्बिश नीम गुलाबी

लूट लिया बहका कर मेरी राहत का सरमाया
दिल ने नज़रों से मि कर की साज़िश नीम गुलाबी

सुलगा जाए जिस्म का संदल, महके फ़ज़ा बातिन की
 जलती है अब रूह तलक इक आतिश नीम गुलाबी

भीग गया जज़्बात का जंगल, फूट पड़ी हरियाली
बरसों बाद गिरी दिल पर ये बारिश नीम गुलाबी

रोग है या आसेब है ये, कोई तो बताए मुझ को
रह-रह के होती है क्यूँ इक लर्ज़िश नीम गुलाबी

हम भी दौलतमंद हुए, दिल ने भी ख़ज़ाना पाया
 वो दे कर "मुमताज़" गया इक बख़शिश नीम गुलाबी

6.

गुनाहों से मुकरता जा रहा है
ज़मीर इंसाँ का मरता जा रहा है

ये मुझ में कौन है जो चुपके-चुपके
 जुनूँ के पर कतरता जा रहा है

ये अच्छा है, जिसे देखो, हमीं पर
हर इक इल्ज़ाम धरता जा रहा है

जुनूँ की हद ये कैसी है कि अब ये
हर इक हद से गुज़रता जा रहा है

उतरता शम्स भी फ़नकार है क्या
 उफ़क़ पर रंग भरता जा रहा है

तो अब "मुमताज़" भी है मसलेहतख़्वाँ
 ये दरिया अब उतरता जा रहा है

7.

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी
 जाने क्यूँ बेचैन रक्खे सब को दानाई मेरी

कोई साया भी पड़े मुझ पर तो दम घुटता है
अब मुझ को तन्हा एक पल छोड़े न तनहाई मेरी

जिस जगह मैं हूँ, वहाँ कोई नज़र आता नहीं
 क़ैद मुझ को रात दिन रखती है यकताई मेरी

कोई क्या समझे मेरे दिल की तहों के ज़ाविए
ख़ुद मुझे कब नापनी आई है गहराई मेरी

वक़्त आया तो किसी दीवार का साया न था
 हाँ, यही दुनिया रही बरसों, तमाशाई मेरी

उस का वादा था दुआ मक़बूल करने का मगर
 मांगती हूँ, तो नहीं होती है सुनवाई मेरी

रास्ता लंबा है, मंज़िल का निशां कोई नहीं
 चलने दे लेकिन न मुझ को आबलापाई मेरी

आज भी "मुमताज़" मुझ को वो ज़माना याद है
 जब हुआ करती थी अंजुम से शनासाई मेरी

8.

है एक सा सब का लहू फिर क्या है ये मेरा-तेरा
हिन्दू तेरे, मुस्लिम तेरे, काशी तेरी, काबा तेरा

बैठे हुए हैं आज तक, तू ने जहाँ छोड़ा हमें
हम पर रहे इल्ज़ाम क्यूँ, रस्ता नहीं देखा तेरा

जीने का फ़न, मरने की ख़ू, सौ हसरतें टूटी हुईं
 क्या-क्या हमें तू ने दिया, एहसान है क्या-क्या तेरा

फिर इम्तेहाँ का वक़्त है, साइल है तू दर पर मेरे
 उलफ़त का फिर रख लूँ भरम, ला तोड़ दूँ कासा तेरा

ये रब्त भी अक्सर रहा तेरे-मेरे जज़्बात में
 आँखें नहीं भीगीं मेरी, दामन नहीं सूखा तेरा

जलती हुई बाद-ए-सबा, भीगी हुईं परछाइयाँ
 ऐ सुबह-ए-ग़म, कुछ तो बता, क्यूँ रंग है काला तेरा

शोला-सा इक लपका था कल शब की सियाही में कहीं
 "कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा "

तन्हा रही 'मुमताज़' कब मैं ज़िन्दगी की राह में
 अब तक मेरे हमराह है, तेरी महक, साया तेरा

(रचनाकार -परिचय :
जन्म: 11 अप्रेल सन 1964 को कानपुर के  एक ब्राह्मण खानदान में हुई
शिक्षा:  बीएससी, अदीब कामिल और मोअल्लिम का तरबियती कोर्स
सृजन:   उर्दू -हिंदी के कई पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें । एक संकलन भी प्रकाशित।  ग़ज़लों का एक एल्बम भी आ  चुका है।  दो फिल्मों में भी गीत लिखे, जिस में एक कुवैत में बनी और रिलीज़ हुई, और एक रिलीज़ न हो सकी।
ब्लॉग:   परवाज़
संप्रति:  कुछ अरसा तक लखनऊ दूरदर्शन में  एनाउंसर और  मुंबई में  अमरीकन फ़र्म में प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर रहीं। फिलवक्त  स्वतंत्र लेखन 
संपर्क: naza.mumtaz@yahoo.com)
    

read more...

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

हिंदी साहित्य को जाति व धर्म से निकलना होगा














फ्रैंक हुज़ूर @ शहरोज़




रांची के सेंट जेवियर कॉलेज के छात्र रहे मनोज कुमार  अब फ्रैंक हुज़ूर बन चुके हैं। लंदन में इनके लेखन के दीवानों की कमी नहीं हैं। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान पर लिखी उनकी किताब 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी' बेस्टसेलर हो चुकी है। पिछले वर्ष आई 'इमरान खान द फाइटर' भी अंग्रेजी जगत में खूब चर्चा में रही। यह युवा लेखक कभी 'हिटलर इन लव विद मडोना' नाटक के कारण विवादों में आया था। इन दिनों पोर्न सिनेमा पर केंद्रित अंग्रेजी व हिंदी में हिंदी युग्म  से आई उनकी औपन्यासिक कृति 'सोहो : जिस्म से रूह तक का सफर' ने शोहरत की नई बुलंदी तय की है। इधर फोन पर उनसे लंबी बातचीत हुई। कहा कि रांची शहर उन्हें खूब याद आता है। सेंट जेवियर जैसा कॉलेज कैंपस उन्होंने कहीं नहीं देखा।

छह महीने के थे कि मां गुजर गईं: मां की गोद महज छह माह नसीब हुई। उसके बाद उनका देहांत हो गया। मां के ममत्व से छुटपन से ही वंचित रहा। इमरान वाली पहली किताब मां को ही समर्पित की है। पटना में रह रहे पिता से सालों साल मुलाकात नहीं हो पाती है। इधर के पांच वर्षों में मैं मुंबई, दिल्ली, लाहौर व लंदन में डोलता रहा हूं। पिता लेखक बनने के फैसले से असंतुष्ट थे। वह मुझे आईएस या आईपीएस देखना चाहते थे। लेकिन अब मेरे लेखन की अहमियत को समझने लगे हैं।

रांची में हुआ मैच्योर: 92 में पहली बार कविता लिखी, उसे याद करते हुए। शुरुआत से ही अभिव्यक्ति का माध्यम अंग्रेजी रहा।मनोज खान के नाम से इंग्लिश में कविताएँ  पत्र-पत्रिकाओं में शाया हुई। लेकिन मुझे लगा कि अंदर में एक लेखक सांस ले रहा है, उसे तवज्जो देना चाहिए। जेवियर की रिच लाइब्रेरी ने मेरे मानस को गहरे तक प्रभावित किया। मैंने जमकर यहां की दुर्लभ किताबों का फायदा उठाया। सच कहूं, तो मेरा स्टंडर्ड यहीं मैच्योर हुआ।

हिटलर इन लव विद मैडोना पर मिली धमकियां: मेरे नाटक 'हिटलर इन लव विद मैडोना' को काफी पसंद किया गया। पर उसपर विवाद भी  हुआ। मेरे पुतले जलाए गए।  पुस्तक तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दी गयी।  दरअसल मैंने देश में मौजूद धार्मिक कट्टरता को दिखाने की कोशिश की थी। इस कट्टरता के पीछे एक राजनीतिक दल का हाथ रहा है। न सिर्फ मुझे बल्कि नाटक के कलाकारों को भी उस दल के कार्यकर्ताओं ने धमकियां दीं।

इमरान ही क्यों:  बचपन से क्रिकेट का दीवाना रहा हूं। इमरान की जिंदगी ने प्रभावित किया। सियासत में आने के बाद भी आम जन के प्रति उनके सरोकारों को देख मैं चकित हुआ। दर्जनों बार इमरान व जेमिना से मिलने के लिए लंदन और पाकिस्तान के चक्कर लगाए। चार सौ पेज की फाल्कन एंड फाल्कन, लंदन से छपी ' इमरान वर्सेस इमरान' में इमरान की जिंदगी के बहाने पाक की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों का भी चित्रण है। इसके उर्दू संस्करण की रिकार्ड बिक्री हुई। हिंदी में जल्द ही आने वाली है।

झारखंड पर भी लिखेंगे: सपा प्रमुख मुलायम सिंह पर लिखने का मन बना चुके हैं फ्रैंक। बिहार व झारखंड पर कहते हैं कि यहां विकास का जितना प्रचार है, हकीकत उतना नहीं। हां! बदलाव जरूर आया है। लेकिन विकास की सही तस्वीर बननी बाकी है। झारखंड व बिहार की बदहाली पर खूब ध्यान जाता है। बेचैनी भी होती है। कल के दिनों में इनपर भी जरूर लिखूंगा।

हिंदी के वाल्तेयर राजेंद्र यादव: उर्दू शायर फैज अहमद फैज बेहद पसंद हैं। हिंदी लेखकों में राजेंद्र यादव का लेखन खूब भाता है। राजेंद्र जी हिंदी के वाल्तेयर हैं। लेकिन अंग्रेजी साहित्य में गालिब की वुस्अत यानी विस्तार और फैलाव है। इंद्रधनुषी रंग है उसमें। ऑस्कर वाइल्ड और मार्कोज जैसा कल्पनाशील और धाकड़ रचनाकार हिंदी में नहीं हुआ। हिंदी समाज धर्म और जाति जैसे फिजुल बातों में बंटकर लेखन का बंटाधार कर रहा है। कुछ अपवाद सभी जगह हैं, उनमें एक हैं, राजेंद्र यादव।

खुशवंत का हास्य पसंद: मिड नाइट चिल्ड्रेन में सलमान रुश्दी की प्रतिभा तो दिखती है, पर सटैनिक वर्सेस में आकर वह डगमगा जाते हैं। अरुंधति राय निसंदेह गंभीर लेखक हैं। उनके लेखन व संघर्ष दोनों का मैं कायल और प्रशंसक हूं। खुशवंत सिंह भारतीय अंग्रेजी लेखन के अहम स्तंभ हैं। उनके हास्य-व्यंग्य  का जवाब नहीं। चेतन भगत चमकते हुए भारत की तस्वीर दिखा रहे हैं। कैफे और कॉल सेंटर की जमात उनके पाठकों में है। जबकि समूचा देश इंडिया और भारत में बंटा हुआ है। महज दो फीसदी लोग उस चमकते चेहरे में शामिल हैं।



 फ्रैंक हुजूर : परिचय
जन्म: 21 जनवरी 1977 को बक्सर (बिहार) में
शिक्षा: सेंट जेवियर कॉलेज रांची व दिल्ली से
सृजन : नाटक 'हिटलर इन लव विद मडोना, बायोग्राफी 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी, 'इमरान खान द फाइटर और औपन्यासिक कृति 'सोहा:जिस्म से रूह तक का सफर
संप्रति: स्वतंत्र लेखन
संपर्क:  frankhuzur@gmail.com 

(चर्चित युवा लेखक फ्रैंक हुज़ूर  से शहरोज़ की बातचीत भास्कर के झारखंड संस्करणों में 23 अक्टूबर 2013 के अंक में प्रकाशित )   







read more...

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

दंतेवाड़ा के दौर में


 











अदनान कफ़ील की क़लम से


 दूर क्षितिज के पार

उदित हुआ है अंतर्मन में सहसा एक विचार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार
निर्मम धागों से अब तक है, गुथी हुई यह काया
भाग रहा हूँ कब से जाने, फिर भी हूँ भरमाया
समय पाश से बच न पाया, घोर अँधेरा छाया
चिंतन करता,मंथन करता,क्या खोया क्या पाया
अनुत्तरित प्रश्नों को तुझसे अब भी है दरकार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा दूर क्षितिज के पार.
छवि तो तेरी अब भी है, अंतर्मन की गहराई में
मसल गयीं हैं खिलने से पहले कलियाँ अमराई में
दुनिया से बेग़ाने बच्चे खेल रहे मैदानों में
ख़ुद भी यूँ ही दिख जाता हूँ चेहरे से अनजानों में
जीवन मदिरा जिसने पी ली, क्यूँ जाता मैख़ानों में
टीस मारती अब भी बातें, मन के विस्तृत वीरानों में
नहीं कोई है सच्चा प्रेमी, नहीं कोई है यार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार.
 
 स्मृतियाँ

इक भींनी ख़ुश्बू यादों की, अंतर में घुसती जाती है
उषा की मोहक लाली-सी, मन-नभ पे छिटती जाती है.
इक शून्य व्याप्त हो जाता है, मन मानों पर पा जाता है
गुज़रे लम्हों के जंगल में, मानो खोता-सा जाता है.
मन विकल-विकल हो जाता है, वह क्षण ज्वलंत हो जाता है
स्मृतियाँ कोमल स्वप्नों-सी, नयनों में बंधती जाती हैं.
अम्मा! अम्मा! चिल्लाता है, लय टूट-टूट भर्राता है
वह स्वर अनंत तक जाता है,' औ फिर थक के गिर जाता है.


 मेरी उदासी

तुम फुर्सत के क्षणों में मेरे आस-पास हो
मैं जब भी यादों के फूल चुनता हूँ
तुम ख़ुश्बू बन कर घुल जाती हो.
जब भी कोहरे से ढकी राहों पर
अकेला चलता हूँ
तुम्हें अपनी लड़खड़ाहटों में
महसूस करता हूँ.
जब भी किसी पत्थर पर बैठ कर
अपनी धड़कनों को सुनता हूँ
तुम कानों में कोई
निराशा का गीत
गुनगुना जाती हो.
मैं हमेशा तुमसे दूर भागता हूँ
पर तुम सामने प्रकट हो
मानो
मेरी खिल्ली उड़ाती हो.
आखिर तुम मुझसे
इतनी आसक्त क्यूँ हो ?
जो तुम मेरी
कलम की स्याही तक में घुल गयी ?
ऐ मेरी उदासी-
जवाब दो !

बर्बरता और ईसा

प्रिये !
आज ये हृदय
अति व्याकुल है
'औ सदियों से खड़ी
ये हांड-मांस की प्रतिमा
जर्जर हो चुकी है
संसृति की इस
बर्बरता से.
प्रिय ! मेरा रक्त
जो शायद अब भी लाल है
रिस रहा है
संभवतः
मुक्ति की अभिलाषा में .
पैबंद लगे मेरे वस्त्रों से
सड़े मांस की
बू आती है
और नीच भेड़िये
मेरा रक्त पी रहे हैं.
क्या इस दंतेवाड़ा के दौर में
मेरा अस्तित्व संभव है?
और कितनी सदियों तक
मैं आहार बनता रहूँगा
इन वहशी दरिंदों का ?
और आख़िर कब तक
मरियम जनती रहेगी
एक नए ईसा को ?
कब तब
कील ठोंके जायेंगे
मेरे इस वजूद में ?
कब तक ?
आखिर कब तक ?
लेकिन शायद
ये इस बात से अनभिज्ञ हैं
कि मेरी
उत्कट जिजीविषा
और मेरे
बाग़ी तेवर
कभी ठन्डे नहीं पड़ सकते.
यूँ ही ईसा
पैदा होता रहेगा
चाहे हर बार उसे
सूली ही क्यूँ न चढ़ना पड़े.

आवाज़
  
मैं तो आवाज़ था,
गूंजता ही रहा,
तुम दबाते रहे ,
हर घड़ी टेटुआ,
तुम सताते रहे ,
पर मिटा न सके,
मैं निकलता रहा ,
इक अमिट स्रोत से,
तेरी हर चोट पे.
तुम कुचलते रहे ,
मैं उभरता रहा,
तुम सितम पे सितम ,
मुझपे ढाते रहे,
लब को सिलते रहे,
अश्क ढलते रहे.
मैं बदलता रहा ,
हर घड़ी रूप को,
तुम तो अनपढ़ रहे ,
मुझको पढ़ न सके,
मेरी चुप्पी में भी ,
एक हुंकार थी ,
मुझमें वो आग थी ,
जो जला देती है,
नींव ऊँचे महल की ,
हिला देती है,
मुझमें वो राग है ,
मुझमें वो साज़ है,
जो जगा देती है ,
इक नया हौसला,
और बना देती है,
इक बड़ा क़ाफ़िला,
एक स्वर ही तो हूँ ,
देखने में मगर,
पर अजब चीज़ हूँ ,
तुम समझ न सके.

माफ़ करना
  
ऐ उर्वशी !!
आज तुम मेरी आँखों में
न देखो
और न मुझसे अपनी मासूम
स्वप्नों की दुनिया में
प्रविष्ट होने का आग्रह
करो.
और न मुझसे
किसी गीत की आशा रखो.

तुम सोच रही होगी
आज मुझे ये क्या हो गया ?
हाँ, मुझे कुछ हो-सा गया है
आज मेरे सुर खो गए हैं
मेरे साज़ भग्न हैं
जहाँ मेरे स्वप्नों की बस्ती थी
वहां अब बस राख
और धुआं है.
मेरी आँखों में विभीषिका के
मंज़र हैं
मत देखो मेरी तरफ
शायद डर जाओगी
इन स्थिर नयनों में
डरावने दृश्य अंकित हैं-
कोई स्त्री चीत्कार और
रोदन कर रही है
तो कोई बच्चा भूख से व्याकुल
स्थिर तर नयनों से
न जाने क्या सोच रहा है ?
जहाँ कोई तथाकथित रक्षक
भक्षक का नंगा भेस लिए
अपने शिकार की टोह में
घूम  रहा है.
तुम इन आँखों में
निरीह बेचारों को भी
देख सकती हो
जो एक मकड़-जाल में
उलझे
सहायता की गुहार
लगा रहे हैं.
यहाँ तुम उन मासूमों को भी
पाओगी जिन्हें
हक के बदले गोली देकर
हमेशा के लिए
सुला दिया गया
या कारे की तारीकियों में
फेंक दिया गया
असभ्य और जंगली कह कर.
तुम यहाँ उन बेबस माओं
को भी देख सकती हो
जिनके बेक़सूर चिरागों को
दहशतगर्द कह कर
हमेशा के लिए बुझा दिया गया.
तुम कुछ ऐसे भी दृश्य
देख सकती हो जो
अत्यंत धुधले हो चुके हैं
शायद उनपर समय की
गर्द बैठ गयी है.
क्या गीता,कुरान और
गुरु-ग्रन्थ की आयतें
नष्ट हो गयीं ?
क्या बुद्ध की शिक्षाएं
अपने अर्थ खो चुकीं ?
मालूम होता है उन्हें
दीमकों ने चाट लिया है
फिर बचा ही क्या है
यहाँ ?
मैं नहीं जानता
कहो प्रिये !
मैं कैसे इस कड़वे यथार्थ को
भूल कर
स्वप्नों में विचरण करूँ ?
कैसे प्रणय के गीत रचूं ?

अंतिम फैसला

हमारी मेहनत हमारे गहने हैं,
हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी कीमत?
तुम हमें अपना हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,
तुम डरते हो हम निहत्थों से,
तुम मुफ्त खाने वाले हो,
तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो-
लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठायें,
तो हम दमन नहीं,
फैसला करेंगे.
  
अँधेरा और चिंगारी

मैं कुछ भी नहीं था
हाँ,शायद कुछ भी नहीं
मेरी बातें साफ़ और
सपाट थीं
बिलकुल बारिश से धुले
आकाश की तरह
जिन्हें तुम अतिबौद्धिक
दार्शनिक,उन्मादी,सनकी
न जाने क्या क्या नाम देते थे.
मेरा आक्रोश कोई
क्षणिक उत्तेजना,कत्तई नहीं थी
मैं तो उन वर्षों तक की
दबी,कुचली भावनाओं की
एक प्रतिध्वनि मात्र था
मैं तो भोर की ठंडी हवा
के एक झोंके की तरह था
एक नई सुबह की
एक हलकी-सी लकीर भर था
हाँ,मैं कोई रौशनी का चिराग
नहीं था
मैं तो एक चिंगारी मात्र था
जिसे अँधेरा हर वक़्त
खा जाने की जुगत में
लगा रहता है
लेकिन मुझे अपने तुच्छ
होने का
ज़रा भी दुःख नहीं था
क्योंकि मैं फिर भी
अँधेरे से लाख गुना
बेहतर था.
  

मौत के सौदागर
 

ऐ मौत के सौदागरों !
मैं तुम्हें खूब पहचानता हूँ
वो जो तुम्हारे तोपों,बमों और मिसाइलों
को देख कर
तालियाँ पीटते हैं उन्हें भी
खूब जानता हूँ
तुम्हारा ये घिनौना प्रदर्शन
मुझे अखरता है
क्योंकि मैं तुम्हारी खेंची लकीरों को
नहीं मानता
तुम्हारे बटवारे को नहीं मानता
तुम्हारे ओछे और निकृष्ट
राष्ट्रवाद को नहीं मानता
क्योंकि वो इंसानियत के खिलाफ है
सारी खराबियों की जड़ है
वो विध्वंसकारी है
हमें उनकी कोई दरकार नहीं
तुम रक्षक की खाल में
छिपे भेड़िये हो
वक़्त आने दो जनरल !
हम अपने परचम
तुम्हारे सीनों में गाड़ेंगे
और
तुम्हारे ये हथियार,गोले, बारूद
तुम्हारी कब्र में......



(कवि-परिचय:
 जन्म: ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में जुलाई  30, 1994
संप्रति: अभी दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस आनर्स में स्नातक की पढाई कर रहे
सृजन: बचपन से ही शायरी और कविता का शौक़, छिटपुट प्रकाशन 
संपर्क: thisadnan@gmail.com)

read more...

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

विकास की अंधी दौड़ में आम छत्तीसगढ़िया ग़ायब














ज़ुलेख़ा जबीं की क़लम से

आदिवासी और स्त्रियों के बहाने
तेजी से विकसित होते भारत में भौतिक विकास तो चरम की तरफ है मगर नागरिक विकास में भारत लगातार पिछड़ता जा रहा है। आज से 12 बरस पूर्व (लगभग 1करोड़ 55लाख 98 हजार की आबादी वाले छग में 66 लाख 36 हजार औरतें, और 67लाख 11 हजार मर्द ) जब एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का उदय हुआ, तो उसकी बड़ी वजह भूगर्भीय खनिज संपदा के साथ ही इस क्षेत्र की विशेष सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान के साथ ही यहां की आदिवासी बहुलता भी थी। छत्तीसगढ़ की 32 फीसद आबादी आदिवासियों की है। विकास के नाम पर राज्य में आदिवासियों/आम जनता खासकर औरतों की जमात को जिस तरह लाठी, गोली और फौज से दबाया जा रहा है, जिस तरह से औरतों/बच्चियों पर किए जा रहे उत्पीड़न, शोषण, हिंसा व अत्याचारों में नित नए आपराधिक (नौकरशाही, राजनीतिज्ञों) आयाम जुड़ रहे हैं, सरकारी हिंसा के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह के नाम पर जिस तरह खामोश किया जा रहा है, राज्य में जिस तरह भू-गर्भीय संसाधनों की लूट खसोट मची है, और खूनी अ-सामाजिक तत्वों की जो नस्ल पैदा की जा रही है उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले कई दशक आदिवासियों के खात्मे और अगली पीढ़ीयों के लिए संकट भरे होंगे।

प्रदेश के लिए कृषि तीन चैथाई आबादी का जीवनआधार है। यह अकल्पनीय लगता है कि राज्य की नदियों का पानी खेती को सींचने के बजाए उद्योगों के लिए मुनाफा पैदा कर रहा है और इसके लिए खनिजों की अंधाधुंध खुदाई करके जंगलों की जैव विविधता का खात्मा किया जा रहा है।  राज्य में करीब 70,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एमओयू किए जा चुके हैं, ताप विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।  (जबकि 2012 की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में पीक लोड 5800 मेगावाट अनुमानित है.) इसके लिए 70,000 एकड़ जमीन, 33करोड़टन कोयला, खनन के लिए 1.5 हेक्टेयर वनभूमि,  और 2669 घनमिलियन पानी प्रतिवर्ष खर्च होगा जिससे राज्य मंे 5.33 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती है (कमेटी आन इन्टीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर डेव्हलपमेंट रिपोर्ट-छग सरकार) यहां विकास का मतलब बड़े बड़े विद्युत प्लांट, इनके अफसरों के लिए आलीशान रिहाइशी कांप्लेक्स,चमचमाती चैड़ी सड़कें, आलीशान शापिंग माल, हर समय उपलब्ध रहने वाली बिजली, उससे चलने वाले उपकरण, सभी चीजें आसानी से मुहैया कराई जा रही है. ताकि अमीरों को मुनाफा कमाने के रास्ते फराहम किए जा सकें। इसके लिए थोक में लोगों को जबरदस्ती उनकी जमीन, जंगल, जल से उन्हें बेदखल किया जा रहा है, जो विरोध कर रहे हैं उन्हें नक्सली, राजद्रोही बताकर खामोश करने की कोशिशें की जा रही हैं, जो इससे भी नहीं डरते उन्हें फर्जी मुठभेड़ों में मार गिराया जा रहा है। इन परिवारों की औरतों से निपटने के लिए उनपे शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न, यौन शोषण, बलात्कार, हत्या जैसे औज़ार इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

आइये देखें छग में जन विकास का सच दिखाती सरकारी रिपोर्टस क्या कहती हैं
जीडीपी में पिछड़ापन-छत्तीसगढ़ का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 2012 में 46.743 था जबकि इसके साथ ही वजूद में आए उत्तराखंड का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 79.940रुपए है। तमाम दावों के बावजूद हकीकत ये है कि 2000 में नए बने 3 राज्यों में छत्तीसगढ़ दूसरे नंबर पर है, जबकि देश का औसत प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन 61,564 रु है। ये और बात है कि छग के सकल घरेलू उत्पादन की विकासदर अच्छी है लेकिन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अगर हम पिछडे हुए हैं तो केवल विकासदर (18.36)अधिक होने से कुछ नहीं होगा।
सर्वाधिक मदद पाने के बावजूद गरीबों का बढ़ना-  रिजर्व बैंक के मुताबिक देश में सर्वाधिक आर्थिक मदद (1,540रु) पाने वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ भी शामिल है लेकिन राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली जनसंख्या बढ़ती ही जा रही है।  रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक केंद्र से झारखंड (1,556) और उड़िसा(1,688) के साथ ही छग (1,540) को भी प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति यह अनुदान मिलता है। उक्त तीनों राज्यों को प्रति व्यक्ति औसत अनुदान सबसे अधिक दिया जाता है, मगर छग में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में छग की 40.1 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे वास कर रही है जबकि राज्य में वनसंपदा तथा प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं. राज्य में  38,200मिलियनटन कोयला है। 30,500मिलियनटन लौह अयस्क है। 30,500 मिलियनटन चूना पत्थर है,  600 मिलियनटन डोलोमाइट है। 96 मिलियनटन बाक्साइट है। इन सबके अलावा राज्य में हीरा, एलेक्जेंड्राइट, सोना और कोरंडम भी प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है। छग सरकार का दावा है कि सरकारी राजस्व का सिर्फ 32 फीसदी प्रशासन पे खर्च किया जाता है। बाक़ी का 68फीसदी विकास पे खर्च किया जाता है। लेकिन हकीकत में सरकार का ये दावा छग की (40.01फीसदी) गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की लगातार बढ़ती जनसंख्या के सामने कोरा झूठ साबित हो रहा है. (जबकि इस समय देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी महज 27.5फीसद है).
पीडीएस की स्थिति- एनएसएस के आंकड़ों के मुताबिक जहां 2004-05 में केवल आधे गरीब परिवारों से पास ही बीपीएल कार्ड था।  वहीं इस बरस के दौरान छग में आधा अनाज ही लोगों तक ही पहुंचता था. जिस राज्य की कम से कम दो तिहाई आबादी गरीबी में जी रही हो उस राज्य की विधानसभा में 23 करोड़पति विराजमान हों और 37 लाख गरीब परिवारों के लिए सस्ते अनाज की योजना राज्य में गरीबी की व्यापकता को व्यक्त करती है।
वित्तीय समावेशन में पिछड़ापन- वित्तीय सेवाओं के मामलें में छत्तीसगढ़ अच्छी हालत में नही है अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो वित्तीय समावेशन के नजरिए से छग राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। हकीकत ये है कि राज्य के रहवासियों की बैंक, बीमा, पेंशन तक में पहुंच औसत से काफी कम है.(अंतिम पांच में) देश के सभी राज्यों में छग की रेटिंग 32 वीं है और सूचकांक 27 है. यानि राज्य में प्रति 100 लोगों में 27 लोगों की ही पहुंच वित्तीय सेवाओं तक है. विशेषज्ञों का मानना है कि छग में वित्तीय संस्थाओं तक मात्र 27फीसदी लोगों की पहुंच है तो सरकारी योजनाओं को उन तक कैसे पहंचाया जा सकता है? मतलब साफ है छग वर्तमान विकास के माडल के साथ अपना सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है।


बाल अपराध में देश का पांचवां राज्य
देखा जाए तो राज्य में हो रहे विकास की लहर बच्चों तक नहीं पहुंची है और वे इस विकसित समाज में अमानवीय अत्याचार के शिकार हैं।  जिसमें राजधानी रायपुर का नाम देश में आठवें नबर पे लिया जा सकता है। और छ.ग बाल अपराधों में देश में पांचवे नंबर पर है। केंद्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरों की रिपोर्ट पे नजर डालें तो 2012 में बच्चों के खिलाफ विभिन्न थानों में दर्ज अपराधों की संख्या 1881 हैं। (जिसमें शिशु हत्याएं, बलात्कार, हत्या, अपहरण, आत्महत्या के लिए उकसाना, परित्याग करना, देह व्यापार के लिए बच्चियों की खरीद-फरोख्त और भू्रण हत्या शामिल है- इनमें अकेले राजधानी रायपुर में 204 अपराध और एजुकेशन हब कहलाने वाले दुर्ग में 268 अपराध दर्ज हुए हैं) राज्य में हो रहे इन बाल अपराधों के 10.2 फीसदी मामलों की जांच अभी तक बाकी है।
 बेटियों की क़त्लगाह  बनता छग
यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक दुनिया में औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा में भारत 5वें नंबर पे है। पाकिस्तान जैसे देश से भी पीछे है. छग में बलात्कार की बढ़ती हिंसा पर नजर डालें तो 2010 में 1012 बलात्कार के प्रकरण विभिन्न थानों में दर्ज किए गए (बावजूद इसके कि एफआईआर करवाना कितना मुश्किल है) जहां पीड़िताएं गुमनाम हो चुकी हैं या मौत को गले लगा चुकी है और उनके अपराधी आजाद घूम रहे हैं, ऐसे आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक होनहार महिला खिलाड़ी को उसके ही कोच की बदनीयती का शिकार बनना पड़ा। बात खुलने पर कोच पर अपराध दर्ज होना तो दूर उसे बचाने की सरकारी स्तर पर सरगर्मियां किसी से छुपी नहीं है। उच्च शिक्षा में महिलाओं के शोषण का आलम ये है कि इकलौती सेंटरल यूनिवर्सिटी में एक महिला व्याख्याता कुलपति द्वारा शारीरिक, मानसिक शोषण किए जाने की गुहार पिछले दो वर्षों से लगातार लगा रही है मगर आज तक संबंधित थाने ने उनकी एफआईआर नहीं लिखी और न ही किसी तरह की जांच शुरू की गई। राष्ट्रपति तक मामला सुबूतों और गवाहों सहित पहुंचाया गया मगर राज्य के मुख्यमंत्री के प्रिय और केंद्र सरकार के चहेते कुलपति आज भी अपने पद में रौब के साथ बने हुए हैं। शोधार्थी छात्राओं के साथ होने वाले यौन शोषण में जिस तरह बढ़ोतरी हो रही है उससे तो लगता है कि बहुत जल्द राज्य महिला शिक्षार्थियों के यौन शोषण में भी अव्वल नंबर की श्रेणी में गिना जाने लगेगा।

2011 की जनगणना के मुताबिक जहां देश में औरतों का अनुपात प्रति 1000मर्दा की तुलना में 940 है।  वहीं छग का औसत 991 लेकिन राज्य के बड़े शहरों में यह जसं 956 हैं. तो 0-6बरस की उम्र का लिंगानुपात यहां 964 और 932 है. (रायपुर,बिलासपुर,दुर्ग कोरबा,रायगढ़ ). जबकि ग्रामीण इलाकों में 1000 पे 1004 औरतें हैं. तो वहीं 0-6 बरस उम्र की बच्चियों की संख्या आज भी 972 है.(बस्तर, दंतेवाड़ा, महासमुंद, राजनांदगांव, धमतरी, कांकेर, जशपुर) मतलब साफ है राज्य के बड़े शहरों में तथाकथित विकास का उन्माद बेटियों का खात्मा करने पे उतारू है. यानि आदिवासी (विकास की नजर में असभ्य)आज भी अपनी बेटियां को जिन्दा रखने में गर्व महसूसते हैं। ताजा आंकड़े यही दिखा रहे हैं कि राज्य के बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों में बेटियों का अनुपात ज्यादा है। बेटियों को भ्रूण  में मार डालने का सभ्य धंधा इन बड़े शहरों में पिछले एक दशक से खूब फलफूल रहा है यहां बंगाल और उड़िसा की बेटियां के भ्रूण  भी चिंहाकित करके मार दिए जाते हैं। नालियों में मिलने वाले स्वस्थ्य मादा भ्रूण  की तादाद भी कुछ कम नहीं, .(सुबूतों के साथ शिकायतों के बावजूद)मजाल है जो सरकार ने ऐसे किसी भी सेंटर पे आज तक कोई कड़ी कार्रवाई की हो।

बलात्कार -नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हर दिन तीन औरतें बलात्कार का शिकार होती हैं। औरतों के साथ बलात्कार की घटनाओं की अपराधदर 8.41 फीसद से राज्य देश में सातवें स्थान पे चमक रहा है। 2013 के ताज़ा आंकड़ों पे नजर डालें तो राज्य 2012 में कुल 1034 औरतें बलात्कार की शिकार हुई हैं (350 औरतों के अपहरण के मामले और 980 घरेलू हिंसा में पति/रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ना के मामले दर्ज किए गए) जबकि 2011 में 1053 औरतें बलात्कार की शिकार दर्ज की गई। यहां भी एजुकेशन हब कहलाने वाले दुर्ग जिले (शहरी)में बलात्कार का क्राइम रेट 13.50 है तो राजधानी रायपुर में ये दर 11.76 है. शीलभंग की कोशिश में पिछले बरस 1601दर्ज मामलों के साथ यह राज्य देश में सातवें नंबर पे हैं. और इसका दुर्ग शहर पांचवे नंबर पे दर्ज है।
हत्या-राज्य में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का ये आलम है कि सालभर(2012) में हत्या के 320 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए जिसमें महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है अकेले रायपुर में 97 मामले थानों में दर्ज हुए जिसमें 34 महिलाओं का कत्लेआम किया गया।
आदिवासी बालाओं के साथ हिंसा- चूंकि छग मातृपधान सत्ता वाला आदिवासी बहुल राज्य है यहां आदिवासी महिलाओं के साथ चिंहाकित अलग तरह की हिंसा चिंतित करने वाली है जैसे- छग के बस्तर संभाग (संपूर्ण आदिवासी )का कांकेर जिला के नरहरपुर ब्लाक के झालियामारी गांव के एक प्राइमरी आदिवावी कन्या आश्रम जहां 46 छात्राएं ( 5से 12 वर्ष की)रहती हैं- पिछले 2 बरस से यहां की 11 बच्चियांे के साथ वहीं के शिक्षाकर्मी और चैकीदार बलात्कार, यौन शोषण करते हुए, मारपीट कर किसी से न बताने के लिए उन्हें धमकाते रहे हैं। औचक निरीक्षण में पहुंची स्थानीय कलेक्टर से आश्रम की पीड़ित बच्चियों ने अपने साथ की जा रही घिनौने अपराध की जानकारी दी तब मामला बाहर आया और आनन फानन में सिर्फ चैकीदर की गिरफतारी की गई और शिक्षा कर्मी फरार घोषित हो गया. अधिकारी स्तर पर कोई जवाबदेही, जिम्मेदारी या कार्रवाई अब तक निल है। इसके साथ ही आदिवासी औरतों के साथ यहां तैनात राज्य एवं केंद्र सरकार के सेना बल द्वारा विभत्स यौन हिंसा व उत्पीड़न की घटनाएं अंजाम दी जाती है. साथ ही हिरासत में इन औरतों के साथ बलात्कार यौन उत्पीड़न, शोषण राज्य में कोई मुददा ही नहीं है. पुलिस हिरासत में, एसपी की मौजूदगी में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर घुसेड़े गए जिसपर न महिला आयोग और न अदालतें सुनवाई करने को तैयार हैं।

2008-2009 के आंकड़ों के मुताबिक 20 हजार आदिवासी लड़कियां सरगुजा और जशपुर जिलों से गायब हो चुकी हैं। राज्य से 3000 लड़कियां की गुमशुदगी का इकरार खुद सरकार 2 बरस पहले ही विधानसभा में कर चुकी है लेकिन अभी तक इनमें से ज्यादातर अपने परिजनों तक नहीं पहुच पाई हैं। राज्य से मानव तस्करी व्यवस्थित तरीके से जारी है जिसमें बड़ी तादाद औरतों और नाबालिग बच्चियों की है मगऱ इन्हें रोकना तो दूर पिछले नौ बरसों में सरकार इनके ठेकेदारों और दलालों पर भी हाथ नहीं डाल पाई है क्योंकि इन गिरोंहों के सरगना छग और दिल्ली में बैठे रसूख वाले (गैर आदिवासी)मंत्री और राजनीतिज्ञ हैं।

 38.47फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार

कुपोषण के मामले में देश के पूर्वाेत्तर राज्यों के हालात छग से बेहतर है। बच्चों में खून की कमी का आंकड़ा 2012 में 70 फीसदी था।  केंद्र सरकार के आंकड़े देखें तो छग में 38.47फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. जबकि देश में सबसे कम 2फीसद कुपोषण अरूणाचल प्रदेश में दर्ज की गई है.(जबकि इन राज्यों को गरीब/पिछड़ा माना जाता है) लेकिन कुपोषण और एनीमिया के मामलों छग उनसे पिछड़ा हुआ है।
स्वास्थ्य- एओआई की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की बड़ी कमी है.. रिपोर्ट में साफ लिखा है कि ग्रामीण इलाकों के वंचित तबकों में भी औरतों और बच्चियों के स्वास्थ्य के लिए सरकारी सुविधाओं की बड़ी कमी सामने आई है। दंतेवाड़ा जिले के सिर्फ 59 गांवों में ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं।  सरकारी अस्पतालों में बढती अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, डाक्टरों की लापरवाही, स्वास्थ्य सुविधाओं और संसाधनों की कमी के चलते मरीजों की मौत के मामले बढ़े हैं. रायपुर के गरियाबंद में 36 मरीजों की मौत जिसमें आधी संख्या औरतों की है चिंता करने लायक है।
सरकारी नेत्र शिविरों में आए दिन गरीब बूढ़ों के अंधे होने की खबर अब किसी को नहीं चैंकाती हैं। पिछले बरस करीब 70 लोग अंधे हो गए और 4 की मौत हो गई।
 नेशनल इंस्टीटयूट आफ न्यूट्रीशन के मुताबिक 18से 29 वर्ष के भारतीयों को 2,320 कैलोरी भोजन की रोज जरूरत पड़ती है, लेकिन छग में 1900 कैलोरी भोजन भी एक छत्तीसगढ़िया को मयस्सर नहीं है। यहां राज्य सरकार अपने नागरिकों को पर्याप्त कैलोरी युक्त भोजन भी नहीं दे पा रही है। जबकि मंत्रियों के बाहर निकलते हुए पेट फट पड़ने को बेताब हैं. ऐसे में पति को परमेश्वर मानने वाले समाज में जहां 80 फीसदी गरीबी है उस राज्य में औरतों को कितना कैलोरी में भोजन मिलता होगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।
गए बरस राज्य के बस्तर जैसे (धुर आदिवासी) इलाकों में रेडक्रास जैसी संस्था पे सरकार ने रोक लगा दी है। इन इलाकों में सरकारी सुविधाओं की बेहद कमी की वजह से कुपोषण, एनीमिया, औरतों की स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मौतों की संख्या बढ़ी है। यह इलाका माओवाद से प्रभावित है और सरकार जहां एक तरफ आपरेशन ग्रीनहंट जैसे कार्यक्रम चला रही है वहीं सलवा जुड़ुम जैसी जन मिलेशिया द्वारा उद्योगपतियों के हित में आदिवासियों का सफाया कर रही है।  अतः पहले से ही यहां स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी रही है तब भी यहां काम कर रही संस्थाओं को भी भगाया जा रहा है. ’’डाक्टरर्स विदाउट बार्डर’’ और ’’रेडक्रास’’ पर 2011 पर माओवादियों का इलाज करने का आरोप लगाकर रोक लगा दी गई है।

शिक्षा-79फीसदी आदिवासी आबादी वाले दंतेवाड़ा जिले की साक्षरता दर देश में सबसे कम है वहीं जिले के 1220 में से 700 गांवों में विद्यालय नहीं हैं, यहां के 600 से भी अधिक गांवों के तीन लाख से भी ज्यादा लोग पिछले नौ बरसों में सशस्त्र संघर्ष की वजह से विस्थापित हो चुके है। राज्य में प्रायमरी स्तर की कक्षा में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चों में से 16 हजार 386 बच्चे प्रतिवर्ष ड्राप आउट होते हैं, तो अनुसुचित जाति के 2हजार 582 बच्चे स्कूलों से बाहर हो जाते हैं। यही नहीं ओबीसी के 7हजार 60 बच्चे और सामान्य वर्ग के 2हजार 243 बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। मात्र प्राथमिक स्तर पर हमारे नौनिहाल इतनी बड़ी मात्रा में स्कूल से बाहर जा रहे हैं तो इनके कारणों की पड़ताल करना ही जरूरी नहीं है बल्कि उन विसंगतियों को दूर किया जाना भी जरूरी है जिनकी वजह से ये बच्चे बाहर का रास्ता नाप रहे हैं।  शिक्षा विकास का पहला कदम है और उस पहले कदम के लिए राज्य में मजबूत जमीन अब तक नहीं बन पा रही है।
रोजगार- रोजगार गारंटी योजना के तहत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 में राज्य में 43 लाख 92 हजार 789 परिवारों के पास मनरेगा जाब कार्ड था। जिसमें से 27 लाख 26 हजार 377 परिवारों ने काम मांगा था। कुल26 लाख 26 हजार 54 परिवारों को काम मिल सका। उनमें से भी पूरे 100 दिनों का काम महज 2 लाख 39 हजार 43 परिवारों को ही मिल पाया। गौरतलब है कि इस कानून के सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं। एक तरफ जहां इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा जिसका सीधा फायदा उस परिवार को पहुंचेगा। जब घर में पैसा आएगा तो भोजन के साथ ही परिवार की मूल जरूरतें पूरी होंगी. कितनी हास्यास्पद बात है कि जिन कुल परिवारों के पास मनरेगा जाब कार्ड था (जबकि मजदूरी 155रू प्रति दिन थी) अगर सभी को 100 दिन की काम और मजदूरी मिलती तो उक्त परिवारों के पास (68,08,83,69.000)अड़सठ अरब रूपए आते।  अगर कार्य मांगने वाले सभी 27,26,377 परिवारों को 100दिनों का रोजगार दिया जाता तो छग में बयालीस अरब(42,25,43,500) रूपए आते.मगर सिर्फ 2,39,430 परिवारों को ही 100 दिनों का काम मिल पाया अतः सिर्फ तीन अरब रूप्ए (3,67,41,66,500)ही राज्य में आ पाए मगर भ्रष्ट नौकरशाही ने वो भी आज तक पूरी तरह मजदूरों तक नहीं पहूंचाए हैं।

कृषि- राज्य बनने के बाद कृषि रकबे में लगभग 10 लाख हेक्टेयर की कमी आई है और इतने ही किसान भूमिहीनों और सीमांत श्रेणी में शामिल हो कर गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में जा चुके हैं। धान का कटोरा कहलाने वाला छग आज देश के अठारह राज्यों की सूची में अठारहवें नंबर पे है। विकास करते देश भारत के लिए ये कम शर्मनाक बात है कि 2001की जनगणना में जहां छग में कुल कामकाजी लोगों में किसानों की जनसंख्या 44.54 फीसदी थी वह 2011 में घट कर 32.88 फीसदी रह गई. जबकि इसके विपरीत खेतीहर मजदूरों की जनसंख्या में आश्चर्य करने लायक बढोत्तरी हो गई।  2001 में जहां कुल कार्मिकों में 31.94 फीसद खेतिहर मजदूर थे लेकिन 2011 में इन्हीं खेतिहर मजदूरों की जनसंख्या बढकर 41.80 फीसद हो गई। जिससे लाखों किसान मजदूर बन गए. भारत सरकार की कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी)  की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ की इस हालत की जिम्मेदार राज्य सरकार की नीतियां है।

केंद्र सरकार द्वारा आबंटित बजट- केंद्र सरकार, सुरक्षा संबंधी व्यय योजना के तहत नक्सल उन्मूलन अभियानों पर राज्य सरकारों(वर्तमान में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 9 राज्यों अर्थात आंध्र प्रदेश, बिहार, छग झारखंड मप्र महाराष्ट उड़िसा) द्वारा किए गए व्यय की प्रतिपूर्ति करती है।  पिछले दस वर्षा के दौरान सुरक्षा संबंधी व्यय योजनांतर्गत उक्त राज्यों को 2002.03 से लेकर 2011.12 तक 811.09 करोड़ रूपए जारी किए गए हैं। इसके अलावा इस अभियान के लिए मुहैया कराई गई हवाई उड़ानों पर साल 2010-11 में 16.10 करोड  और 2011-12 में 13.30 करोड रूपए खर्च किए गए हैं।  इसके साथ ही पुलिस थानों के निर्माण और सुदृढीकरण ( ‘Construction/fortification of Police Stations’  )स्कीम के तहत नक्सल प्रभावित उक्त राज्यों को साल 2010-11 में 10 करोड और साल 2011-12 में 210 करोड रूप्ए खर्च किए गए हैं। इन्हीं 9 राज्यों में Special Infrastructure Scheme    के तहत साल 2008-09 में 9999.92 लाख, साल 2009-10 मे 3000 लाख , साल 2010-11 में 13000 लाख तथा 2011-12 में 18582.01 लाख रूपए दिए गए हैं. यानि  नक्सल प्रभावित 9 राज्यों में विगत 4 बरसों में Special Infrastructure Scheme   के तहत 445.81 करोड़ रूप्ए खर्च किए जा चुके हैं।
इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा शत प्रतिशत वित पोषण से नक्सल प्रभावित राज्यों लिए विशेष अवसंरचना योजना शुरू की गई है जिसके तहत 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान इस योजना में 500 करोड़ रूपए आबंटित किए गए हैं. 2008-09 में 100 करोड़,2009-10 मे 300 करोड़, और 2010-11 में 100 करोड़ रूप्ए जारी किए जा चुके हैं।
इसके यही नहीं नक्सलवाद से निपटने के लिए गृह मंत्रालय का नक्सल प्रबंधन प्रभाग लोगों को हिंसा छोड़ने के जारी विज्ञापन में पिछले दो बरसों में 10 करोड़ 80 लाख रू. जारी कर चुका है।  (2010-11 मंे 570 लाख और 2011-12 में 510.19लाख रू.)गौरतलब है कि 1 अपे्रल 2008 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकी और सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाल लोगों के परिजनों को मुआवजा देने के लिए एक योजना शरू की जिसके तहत आतंकी घटना या सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाले एवं गंभीर रूप से घायल होने वाले लोगों के परिजनों को 3 लाख रूप्ए राहत राशि देने का प्रावधान है। (केंद्र सरकार की यह योजना 22 जून 2006से नक्सली हिंसा में मारे जाने वाले लागों के परिजनों पर भी लागू है.) मगर जमीनी हकीकत ये है कि छग में किसी भी आदिवासी परिवार (महिला/पुरूष)को इस मद से कोई राशि नहीं दी गई है।

राज्य बनने के पहले से ही आदिवासियों के खात्मे की साजिश-
गौरतलब है कि छग में आदिवासियों की जनसंख्या कम करने की साजिश राज्य बनने से पहले केंद्र की एनडीए सरकार ने शुरू कर दी थी। 2001 की जनगणना में बस्तर के 564 गांव और जशपुर के 300 गांवों को वीरान बता कर उनकी गणना ही नहीं की गई थी। आज फिर 2011 की जगणना के आंकड़ों पे सवाल उठ रहे हैं।  शुरूआती आंकड़ों के मुताबिक़ छग राज्य की जनसंख्या में 22.59फीसदी वृद्धि हुई है। जहां एक तरफ कबीरधाम(मुख्यमंत्री की कांस्ट्वेंसी) की जसं में 40.06 फीसद,(रायपुर 34.59,बिलासपुर 33.02 फीसद) की वृद्धि हुई है वहीं धुर आदिवासी बस्तर के सुकमा में जसं वृद्धिदर 8.09 फीसदी,दंतेवाड़ा 11.09, बीजापुर 8.76, जशपुर14.65, कांकेर 15.01फीसदी वृद्धि दिखाई गई है. यानि आदिवासी बहुल सुकमा की तुलना में कबीरधाम की जनसंख्या 5 गुना बढ़ी है। जनगणना के इन आंकड़ों ने राज्य सरकार के विकास कार्यक्रमों पे भी सवालिया निशान लगा दिया है।
राजनीति में भागीदारी- छग देश के उन चुनिंदा राज्यों में है जहां औरतें श्रम में बराबर की भागीदार होने की वजह से निर्णयों में उनकी भागीदारी है. साथ ही चूड़ी प्रथा जैसी सशक्त सांस्कृतिक परंपरा भी छग की धरती में मौजूद है जो यहां की औरतों को मर्दा की हिंसक श्रेष्ठता और खराब शादीशुदा जिंदगी से निजात दिलाने में सहायक है।  ये और बात है कि बाहर से आए गैर छत्तीसगढ़िया सवर्ण धनाडय व्यापारी वर्ग की अय्याश प्रवृत्ति की वजह से यह स्वस्थ्य परंपरा भी औरत विरोधी दिखाई पड़ने लगी है। महिला प्रधान आदिवासी संस्कृति का द्योतक होने के बावजूद छग की राजनीति में औरतों की मौजूदगी उतनी सशक्त नहीं है जितनी होनी चाहिए। यहां महिला नेतृत्व पर पुरूषिया प्रभुत्व की वजह से नेतृत्व में  औरतों की तादाद नगण्य हैं। जबकि बहुसंख्यक आदिवासी नेतृत्व को महज चुनाव जिताने का जरिया मान लिया गया है लेकिन जीतने के बाद भी इन औरतों को वो जगह नहीं दी जा रही है. जिसकी वे हकदार हैं. महिला नौकरशाहों के साथ दुव्र्यवहार यहां आम बात है.( 32फीसदी आदिवासी बहुत राज्य में एकमात्र आदिवासी महिला मंत्री है जो अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करेंगी.)
चंद अमीरों की अय्याशी के लिए जब सारे वंचित तबक़े समाज सुनियोजित तरीके से हाशिए में ढ़केले जा रहो हैं,  तब उनकी औरतों के हालात बेहतर कैसे हो सकते हैं? राज्य में औरतें मर्दो के कांधों से कांधा मिलाकर देश विकास में कृषि, खेल (अंतर्राष्ट्रीय) जगत में शिक्षा से लेकर भारतीय सीमा पर अपनी भागीदारी दर्ज करा चुकी है। ऐसे में तेजी से विकास की ढ़लान उतरते देश, धनाडय समाज और सरकारों को-औरत होने के गुणों सहित, उनकी संपूर्ण इंसानी/संवैधानिक हक़ों की हिफ़ाज़त, संरक्षित और सुरक्षित करने की जिम्मेदारी उठानी ही पडे़गी. वर्ना वर्तमान से भी तेजी से आगामी पीढ़ियों का लहू राज्य की धरती सिंचित करेगा और सरकारें माओवादी हिंसा की आड़ में अपनी जनसंहारक अमानवीय नीतियों की पर्दादारी नहीं कर पाएंगी।
राज्य में बढ़ाई जा रही नौकरशाहों, व्यापारियों, सवर्ण राजनीतिज्ञों और सरकारी हिंसा के तौर तरीकों से आदिवासी, दलित, महिला विहीन छग की कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है। इसके अलावा राज्य में एक तरफ दक्षिण पंथियों की नफरत की राजनीति के तहत धर्मान्तरण के झूठे प्रचार और चर्च वर्सेस आरएसएस के राजनैतिक विद्वेष की आड़ में झूठे प्रचार द्वारा हिंसक हमलों का बढ़ाया जा रहा है,(इसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ) दूसरी तरफ मुस्लिम अल्पसंख्कों के खिलाफ कुत्सित पूर्वाग्रह आधारित मानसिकता से सरकारी स्कीमों से उन्हें दूर रखते हुए उनके नागरिक अधिकारों का हनन पिछले 12 बरसों से बदस्तूर जारी है।  रहे उनके बच्चे तो वे किसी गिनती में ही नहीं है।  राज्य की विधानसभा (पिछले दो टर्म से) में इकलौते मुस्लिम विधायक (कांग्रेस) हैं। छत्तीसगढ में विकास के इस चरित्र को देखते हुए बक़ौल जनकवि गोरख पांडेय के मुताबिक़ अब यहां आमजन का भविष्यगान होगा--
सुनो कि हम दबे हुओं की आह इन्क़लाब है.
खुलो कि मुक्ति की खुली निगाह इन्क़लाब है.
उठो कि हर गिरे हुओं की राह इन्कलाब है.
हमारी ख़्वाहिशों का नाम इन्क़लाब है.
हमारी ख़्वाहिशों का सर्वनाम इन्क़लाब है.
हमारी कोशिशों का इक नाम इन्क़लाब है.
हमारा आज एकमात्र काम इन्क़लाब है.

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’
(लेखिका-परिचय:
जन्म:9 अगस्त 1977, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में
शिक्षा: अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में उपाधि
सृजन: मानवाधिकार पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन, देशबंधु में कुछ वर्षों नियमित रिपोर्टिंग, कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित  
संप्रति: कई प्रमुख महिला संगठनों में सक्रिय और स्वतंत्र लेखन
संपर्क:Jabi.Zulaikha@gmail.com)
 
read more...

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

गीतकार पिता पर कवयित्री बिटिया का लिखना



प्रेम शर्मा के गीतों की फुलवारी का खिल उठना























ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस की क़लम से

 प्रेम शर्मा कबीरपंथी गीतकार और पढ़ने-लिखने के बेहद शौक़ीन।  घर के माहौल का असर ही था कि विज्ञान की छात्रा होने के बावजूद साहित्य-पठन-पाठन में अभिरुचि रही। प्रेम शर्मा यानी मेरे पापू पर लिखना मेरे लिए सबसे कठिन कार्यों में से है क्योंकि उन पर लिखना यानी उन स्मृतियों को फिर से जीना है जो मुझमें बेहद बेचैनी, झटपटाहट भर देती हैं। उनकी बेहद लाडली 'ऋतु बेटा' को वह शामें कभी नहीं भूलती जब भारत भूषण, रमा नाथ अवस्थी और कुबेर दत्त के साथ कभी-कभी कैलाश वाजपेयी घर आते थे। उस शाम घर की छत पर गीतों की फुलवारी खिल उठती थी। भाषा का संस्कार और कविता का सौंदर्य मेरे मन में यहीं से उगा । उन गीतों को सुनना अविस्मरणीय, अवर्णनीय अनुभव था मेरे लिए।
 मुझे याद है कि उन शामों में जब पापा गाते थे तो मैं जीने में दुबक जाती थी। सूफ़ियाना, फक्कड़ मिजाज़ के उनके गीतों में शायद कबीर और अन्य सन्त कवियों के तेवर कहीं गहरे तक पैठे थे जिन्हें जब वह अनहद नाद की तरह ऊंचे स्वर में गाते थे तो लगता था मानों प्राण खिंचे जाते हों ... कहीं अनंत में। पापा को सुनना मुझे बेहद भावाकुल कर देता था।रुंधा गला और आँखों से बहता आवेग ... शेष रहता था। क्यों? उस समय नहीं समझ पाती थी लेकिन अब पापा के गीत पढ़ती हूँ तो समझ समझ सकी हूँ कि उनके गीतों में लोक-कथात्मकता और लोक-जीवन की सुगंध बिखरी है वहीँ दूसरी ओर उनके गीतों में जीवन संघर्ष और जुझारूपन के साथ-साथ आध्यात्मिकता और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद भी गुम्फित हुआ है। उन्होंने जो जिया, वही लिखा ... यही वजह है कि मन की बोली-बानी में लिखी ये रचनाएं मर्म तक पहुंचती हैं। उनकी ईमानदारी, सच्चाई, मूल्यनिष्ठा और उस समय की राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियां उदात्त रूप से उनके गीतों में प्रतिबिंबित हुई हैं।
उनकी अंतिम अधूरी रचना "पुलिया पर बैठा बूढ़ा" मेरी पसंदीदा रचनाओं में से है। इस कविता को मैं जब भी पढ़ती हूँ भावुक हो जाती हूँ. उनका अकेलापन उन्हें किस कदर सालता था, उसकी बानगी है यह कविता. माँ के जाने के बाद उन्होंने हमें तो संभाला पर भीतर-भीतर यह अकेलापन उन्हें पूरी तरह तोड़ चुका था.
कभी-कभी लगता है कि शायद माँ से उनका अत्याधिक लगाव ही था जिसने उन्हें माँ के आकस्मिक देहांत के सदमे से उबरने नहीं दिया. प्रेम की पराकाष्ठा में शक्ति और निरीहता दोनों छुपी रहती हैं, शायद...
यह कविता ज्ञानोदय के सितम्बर,2003 के अंक में उनकी मृत्युपरान्त प्रकाशित हुई थी. अपनी इस आखिरी कविता को वह अंतिम स्वरूप नहीं दे सके थे. इसके अलावा "घोड़ों का अर्ज़ीनामा " और "बयान-ए-बादाकश" - जाने-माने समालोचक सुरेश सलिल के अनुसार निराला की "कुकुरमुत्ता" और मजाज़ की "आवारा" के समकक्ष रखी जा सकती है। भारत भूषण जी के शब्दों में कहूं तो, "आज के व्यावसायिक गीतकार समाज के एक पागल मन की हूक-से ये गीत भी हैं, जिनपर कभी अज्ञेय और दिनकर भी मुग्ध हुए थे।
प्रेम शर्मा
जन्म 7 नवम्बर, 1934 मेरठ
शिक्षा:  मेरठ विश्विद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर
नौकरी: 1965 से गाज़ियाबाद के शम्भूदयाल इंटर कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन, 1989  से सेवानिवृत्ति तक उपरोक्त विद्यालय के प्रधानाचार्य पद पर आसीन
सृजन: 1962  से हिंदी की श्रेष्ठ पत्रिकाओं यथा ज्ञानोदय, धर्मयुग, कादम्बिनी एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान आगि में गीति रचनाओं का प्रकाशन, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रमों में अनेक रचनाओं का प्रसारण
निधन: 7  जून, 2003  गाज़ियाबाद

पिता की कविताएँ बेटी के निकट



बयाने बादाकश !

इक दीदा-ए तर
इक क़तरा-ए नम,
इक हुस्ने-ज़मीं
इक ख्वाबे-फ़लक
इक जद्दोजहद
इक हक़ मुस्तहक़
मेरी ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी...
मेरा इश्क़ है
मेरी शायरी,
मेरी शायरी
शऊर है,
ज़मीर है,
गुमान है,
ग़ुरूर है,
किसी चाक गिरेबाँ
ग़रीब का,
किसी दौलते-दिल
फ़क़ीर का,
मैं जिया तो अपने ज़मीर में
मैं मिटा तो अपने ज़मीर में.
मैं कहूँ अगर
तो कहूँ भी क्या?
मैं तो बादाकश,
मैं तो बादाकश! 


घोड़ों का अर्ज़ीनामा

हुज़ूरे आला,
पेशे ख़िदमत है
दरबारे आम में
हमारा यह अर्जीनामा -

कि हम थे कभी
जंगल के आजाद बछेरे.
किस्मत की मार
कि एक दिन
काफ़िले का सौदागर
हमें जंगल से पकड़ लाया.
उसके तबेले में
बंधे पाँव
कुछ दिन
हम रहे बेहद उदास.


रह-रह कर
याद आये हमें
नदी-नाले
जंगल-टीले-पहाड़,
रंगीन महकती वादियाँ,
हरे-भरे खेत
औ ' मैदान
वे सुनहरे दिन
वे रुपहली रातें
जब मौजो-मस्ती में
बेफ़िक्र हम
मीलों निकल जाते थे,
जब
धरती और आसमान के बीच
ज़िन्दगी हमारी
आज़ादी का
दूसरा नाम थी.
*
तो हुज़ूर
कैदे आज़ादी के एहसास से
कुछ कम जो हुई
आँखों कि नमी
तो भूख-प्यास जगी
जो भूख-प्यास जगी
तो मजबूरन
हमने
अपना आबो-दाना कुबूल किया.
फिर
सधाया गया हमें
सौदागरी अंदाज़ में,
सिखाई गयी चालें
हुनर और करतब,
घोड़ों की जमात में
अब
हम थे नस्ले-अव्वल
बेहतरीन-जाबाज़ घोड़े.

फिर
एक दिन
किया गया पेश
हमें
निज़ामे-शाही के दरबार में.
पुरानी मिस्लों में
दर्ज़ हो शायद
हमारी वह दास्तान
कि जब
सूरज गुरूब होने तक
बीस शाही घुड़सवार
लौटे थे नाकाम
हमें पकड़ पाने में
तो अगले रोज़
आला-हुज़ूर ने
सौ दीनार के बदले
हमें ख़रीदा था,
थपथपाई थी
हमारी पीठ.

उसके बाद
तो हुज़ूर
राहे-रंगत ही
बदल गयी
हमारी ज़िन्दगी की.
अब हम
आला-हुज़ूर की
सवारी के
खासुल-खास
घोड़े थे.
सैर हो कि शिकार
या कि मैदाने जंग,
दिलो-जान से
अंजाम दी हमने
अपनी हर खिदमत.
आला हुज़ूर का
एक इशारा पाते ही
हम
दुश्मन के
तीर-तलवारों
तोप-बंदूकों
बर्छी-भालों की
परवाह किये बिना
आग और खून के
दरिया को चीरते हुए
साफ़-बेबाक
निकल जाते थे.
गुस्ताखी मुआफ,
आला हुज़ूर के
आसमानी इरादों को
कामयाबी
और फतह का
सेहरा पहनाने में
हमारा भी
एक किरदार था
तवारीख के
सुनहरे हाशियों से अलग.

हुज़ूर
कभी-कभी हमें
याद आते हैं
वे शाही जश्नों-जलूस,
लाव-लश्कर,
राव-राजे,
शहजादे
फर्जी और प्यादे,
राग-रंग की
वे महफिलें,
वो इन्दरसभा
वो जलवागाह
कि जिस पर
फरिश्तें भी करें रश्क़.
क्या ज़माना था, हुज़ूर,
क्या रातबदाना था.
***

हुज़ूर
दौरे-जहाँ में
देखा है ज़माना हमने
वतनपरस्तों की
सरफरोशी का.
फिर
देखा है मंज़र
उस
सियासी आज़ादी का
जो
बंटवारे की कीमत पर
सदियों पुराने भाईचारे
और इंसानियत के
खून में नहाकर
आई थी.

फिर
देखी है शहादत
उस बूढ़े फ़कीर की
जिसके सीने को
चाक कर गयीं थीं
तीन गोलियां
मौजूद है जो
हमारे
क़ौमी अजायबघर में.

हुज़ूर,
सुनी हैं तकरीरें
हमने
साल-दर-साल
रहनुमाओं की,
देखें हैं ख्वाब
अमनपसंदी
और खुशहाली के
एक जलावतन
बादशाह की
लाल महराबों से.

हुज़ूर,
अस्तबल से ख़ारिज
हादसे-दर-हादसे
ज़िन्दगी हमारी
कुछ इस तरह गुज़री
कि फिलवक्त हम
मीरगंज की रेहड़ी में
जुते घोड़े हैं
ज़िन्दगी से बेज़ार
पीठ पर
चाबुक की मार
जिन्स और असबाब
सवारियाँ बेहिसाब,
भागम-भाग,
सड़ाप!
सड़ाप!!

हुज़ूर,
ज़िन्दगी औ'  ज़िल्लत में,
जुर्म औ' सियासत में,
अब
ज्यादा फर्क
नहीं रहा.

आखिरत
ये इल्तिजा है  हमारी
कि हमें
गोली से
उड़ा दिया जाये
ताकि हमारी
जवान होती नस्लें
देख सकें हश्र
हमारी
बिकी हुई आज़ादी का,
खिदमत गुजारी का.

हुज़ूर
बाद सुपुर्दे ख़ाक
लिखवा दिया जाए
एक पत्थर पर
दफ़्न हैं यहाँ
वे घोड़े
जो हवा थे
आसमान थे
हयाते दरिया की
रवानी में
मौत ज़िन्दगी का
मुकाम सही
ज़िन्दगी
मौत की गुलाम नहीं. 

युग संध्या
(एक शोक गीत)

वही
कुहाँसा,
              वही अँधेरा,
वही
दिशाहारा-सा जीवन,
                     इतिहासों की
                     अंध शक्तियां,
जाने हमें
कहाँ ले जाएँ.
***
                     अट्टहास
                     करता समुद्र है
                     जमुहाई लेते पहाड़ हैं,
एक भयावह
जल-प्रवाह में
समाधिस्थ होते कगार हैं,
                      दुविधाग्रस्त,
                      मनास्थितियाँ हैं,
                      विपर्य्यस्त है जीवन-दर्शन,
एक घुमते
हुए वृत्त पर
ऊंघ रही अनथक यात्राएं .
***
चन्दन-केसर,
कमल-नारियल,
शायद अब निर्वश रहेंगे,
                      गूंगी होंगी
                      सभी ऋचाएं,
                      अधरों पर विष-दंश रहेंगे,
रोंदे हुए
भोजपत्रों पर
सिसक रहे सन्दर्भ पुरातन ,
                       बूढ़े
                       बोधिवृक्ष के नीचे
                       रूधिरासिक्त हैं परम्पराएं.
***
अन्धकार में
डूब चुकी हैं
सूर्य-वंशजा अभिलाषाएं,
                       हम सबके
                       शापित ललाट पर
                       खिंची हुई हैं मृत रेखाएं ,
मरणासन्न
किसी रोगी-सा
अस्तोन्मुख सांस्कृतिक  जागरण
                       ठहर गयी हैं
                       खुली पुतलियाँ
                       जड़ीभूत हैं रक्त-शिराएं.
('साप्ताहिक हिंदुस्तान', १८ अप्रैल, १९६५)

हम जाने या राम !

कैसे बीते
दिवस हमारे
हम जाने या राम!
*
                         सहती रही
                         सब कुछ काया,
                         मलिन हुआ
                         परिवेश,
                         सूख चला
                         नदिया का पानी,
                         सारा जीवन
                         रेत,
उगे काँस
मन के कूलों पर
उजड़ा रूप ललाम.
**
                        प्यार हमारा
                        ज्यों इकतारा ,
                        गूँज-गूँज
                        मर जाय,
                        जैसे निपट
                        बावला जोगी
                        रो-रो
                        चित उडाय ,
बात पीपल
घर-द्वार-सिवाने
सबको किया प्रणाम .
***
                        आँगन की
                        तुलसी मुरझाई,
                        क्षीण हुए
                        सब पात,
                        सायंकाल
                        डोलता सर पर,
                        बूढा नीम
                        उदास,
हाय रे! वह
बचपन का घरवा
बिना दिए  की शाम.
****
                       सुन रे जल
                       सुन री  ओ माटी
                       सुन रे
                       ओ आकाश,
                       सुन रे ओ
                       प्राणों के दियना,
                       सुन रे
                       ओ वातास,
दुःख की
इस तीरथ याश में
पल न मिला विश्राम.
('कादम्बिनी', फरवरी, १९९६)

तू न जिया न मरा !

तू न जिया
न मरा,
                       ज्यों कांटे
                       पर मछली,
प्राणों में
दर्द पिरा.
*
                       सहजन की
                       डाल  कटी ,
                       ताल पर
                       जमी काई,
                       कथा अब
                       नहीं कहता
                       मंदिर वाला
                       साईं,
दुःख में
सब एक वचन
कोई नहीं दूसरा.
**
                       औषधि
                       जल
                       तुलसीदल
                       सिरहाने
                       बिगलाया,
                       ईंधन कर दी
                       अपनी उत्फुल काया,
धरती पर
देह-धरम
आजीवन हुक-भरा.
***
                       माथे पर
                       गंगाराज,
                       हाथों में
                       इक्तारा,
                       बोला
                       चलती बिरियाँ
                       जनमजला
                       बंजारा,
वैष्णवजन
ही जाने
                       वैष्णवजन का
                       दुखड़ा!
 ('धर्मयुग', १५ फरवरी, १९७०)

सुन भाई हर्गुनिया, निर्गुनिया फाग

जल ही
जल नहीं रहा,
                     आग नहीं
                     आग.
सूरत बदले
चेहरे,
                     सीरत बदला
                     जहान,
पानी उतरा
दर्पण,
                     खिड़की-भर
                     आसमान,
ढलके
रतनार कंवल ,
                     पूरते
                     सुहाग.
जीते-
मरते शरीर,
                     दुनिया
                     आती-जाती,
जूझते हुए
कंधे,
                     छीजती हुई
                     छाती,
कल ही
कल नहीं रहा,
                     आज नहीं
                     आज,
सुन भाई
हर्गुनिया,
                     निर्गुनिया
                     फ़ाग.
 ('साप्ताहिक हिंदुस्तान', १३ फरवरी, १९७७)

 बापू के देश !

ऋण को
ऋण से भरते
मूंज हुए केश,
                   अपनी
                   तक़दीर रहन
                   उनके आदेश.

ग़ुरबत की
हथकड़ियाँ\
बचपन में पहना दीं,
                  हमको
                  बंधक  सपने
                  उनको दी आज़ादी,
उनको
सब राज-पाट
हम तो दरवेश.

                  राम भजो
                  रामराज
                  समतामूलक समाज,
पातुरिया
राजनीति
ऒखत सत्ताधिराज,
                  चिथड़ा
                  चिथड़ा सुराज
                  बापू के देश.
 ('कादम्बिनी', जनवरी, १९६२)

अग्नि प्रणाम

बूढा बरगद
छाँह घनेरी,
                   मंदिर
                   घाट
                   नदी के,
आसमान
धूसर पगडण्डी,
                   कब से तुझे
                   पुकारे,
लौट न आ रे
लौट न आ रे…
*
सौदागर
नगरी में जाकर,
                   क्या खोया
                   क्या पाया,
भोला मुखड़ा
सपन सजीले ,
                   हीरा
                   कहाँ गंवाया,
कहाँ गया
तेरा इकतारा,
                   राम
                   कहाँ बिसराया ,
कुछ तो कह
ओ राम बावरे
                   कुइच तो गा रे !
**
कंचन नगरी
छत्र बिराजै,
                   मंदिर बरन
                   मदिरा-सुख साजै,
कामिनी
निरत करे हमजोली ,
                   रंग अनंत
                  अनंत ठिठोली,
-ऐहिक
इंद्रजाल उरूझानी
                  हिवड़ा
                  हुडुक-हुडुक हलकानी,
माहुर-धार
कटार सरीखी,
                  तृष्णा
                  मृगतृष्णा रे,
मातुल
पितुल कहाँ रे !
***
प्राण-पुहुप
जननी हम तेरे,
                  पुनरपि जन्मम
                  हेरे-फेरे,
निपट अजोग,
ललाट लिखाने,
                  हम हीरा
                  अनमोल बिकाने,
टूटा
रुनक-झुनक
इकतारा,
                   ना हम जीते
                   ना जग हारा,
लीजो
अग्नि-प्रणाम हमारे,
                   कीजो
                   हमें क्षमा रे !
 ('साक्षात्कार', अगस्त, १९९८) 

जीव गान

नाहिन चाहिबे
नाहिन रहिबे
हंसा व्है उड़ि जइबे रे !
*
काया-माया
खेल रचाया
                 आपु अकेला
                 जग में आया
भीतर रोया
बाहिर गाया
नाहिन रोइबे
नाहिन गाइबे
तम्बूरा चुपि रहिबे रे !
**
सब सुख सूने
सब दुख दूने
                 पात पडंता
                 मरघट-धूने,
नेह बिहूने
गेह बिहूने
                 अगिन पंख
                 झरि जइबि रे,
नाहिन जीइबे
नाहिन मरिबे
मरन-कथा क्या कहिबे रे !
('गगाचांचल', जनवरी-मार्च, २०००)


पुलिया पर बैठा एक बूढ़ा

पुलिया पर
बैठा एक बूढ़ा
काँधे पर
मटमैला थैला,
थैले में
कुछ अटरम-सटरम
आलू-प्याज
हरी तरकारी
कुछ कदली फल
पानी की
एक बोतल भी है
मदिरा जिसमें मिली हुई है,
थैला भारी.


बूढ़ा बैठा
सोच रहा है
बाहर-भीतर
खोज रहा है,
सदियों  से
ग़ुरबत के मारे
शोषण-दमन
ज़ुल्म सब सहते
कोटि-कोटि
जन के अभाव को
उसने भी
भोगा जाना है
उसने भी
संघर्ष किया है
आहत लहुलुहान हुआ है
सच और हक के
समर-क्षेत्र  में
वह भी
ग़ुरबत का बेटा है.


मन ही मन
बातें करता है
गुमसुम गुमसुम
बैठा बूढ़ा
बातों-बातों में  अनजाने
सहसा  उसके
क्षितिज कोर से
खारा सा कुछ बह जाता है
चिलक दुपहरी
तृष्णा गहरी,
थैले से बोतल निकलकर
बूढ़ा फिर
पीने लगता है
अपना कडुवा
राम-रसायन
पीना भी आसान नहीं है,
घूँट-घूँट
पीता जाता है
पुलिया पर
वह प्यासा बूढ़ा

उसकी
कुछ यादें जीवन की
शेष अभी भी
कुछ सपने हैं
जो उसके बेहद अपने हैं,
कुछ अपने थे
जो अब आकाशी सपने हैं,
उसकी भी
एक फुलबगिया थी,
प्राण-प्रिया थी
उसके संघर्षों की मीतुल
चन्दन-गंध सुवासित शीतल
अग्नि-अर्पिता है
दिवंगता है

रोया-रोया
खोया-खोया
काग़ज  पर
लिखता जाता है
कथा-अंश
दंश जीवन के
पुलिया पर
बैठा वह बूढ़ा
तभी अचानक
देखा उसने
झुग्गी का अधनंगा बालक
कौतुक मन से
देख  रहा है
सनकी बूढ़े को
बूढ़ा फिर
हँसने लगता है
बालक भी हँसने लगता है,
दोनों छगन-मगन हो जाते
थैले से
केला निकालकर
बूढ़ा बालक को देता है
उठकर फिर वह
चल देता है
उस  पुलिया से
राह अकेली
भरी दुपहरी.


(लेखिका-परिचय: 
जन्म: 27 दिसम्बर, 1973
शिक्षा: बी.एस.सी., एम.ए., बी.एड., पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा
सृजन: कई लेख, कविताएँ  और समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
ब्लॉग: ऋतु
संप्रति: दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन
संपर्क:  rituparna_rommel@yahoo.co.in)





read more...

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

सुकून का लम्‍हा कि जागती सी एक रात













रश्‍मि शर्मा की  दस कविताएँ





अभि‍शप्‍त आत्‍माओं की नींद

फि‍र बीती एक रात
ध्रुव तारे से आंख मि‍लाते
चांद को बादलों तले
देखते ही देखते छुप जाते
तुम्‍हारी भेजी नींद को
देखा रूठ कर दूर जाते

और अब सुबह
आंखों की कालि‍मा में
ढूंढ रही हूं
एक सुकून का लम्‍हा
कि जागती सी एक रात
फि‍र गुजर गई जिंदगी से

इंतजार में हूं कि
देर से जागने के बाद
कहोगे तुम
बड़ी सुकून भरी नींद आई
बस..सपने में तुम न आई

मैं हंस पडूंगी और कहूंगी
दादी कहती थी
सोए इंसान की आत्‍मा
वि‍चरती है, पूरी करती है
अतृप्‍त कामनाएं, मगर

अभि‍शप्‍त आत्‍माओं को
नींद ही मयस्‍सर नहीं होती
कि‍सी के ख्‍वाब में उतर सके
ऐसी तक़दीर नहीं होती...

 मेरे पास कोई स्‍याहीसोख नहीं

ले आई थी
एक कोरी सी डायरी
जि‍समें
मोति‍यों से अक्षरों में
लि‍खना चाहा मैंने
खूबसूरत नर्म सी सुबह
और बारि‍श के बाद
क्षिति‍ज में फैले धुंध को
मुट़ठि‍यों में समेट लेने के
अहसास से भरे
हसीन हसरतों के कि‍स्‍से

तुम्‍हारे साथ और
तुम्‍हारे बगैर गुजरे, वक्‍त के चि‍थड़े
मगर
नामालूम कैसे
खूबसूरत हर्फों के उपर
उलट पड़ी स्‍याही, मि‍ट गया सब
अब फैले हैं
नीले-नीले धब्‍बे, और
मेरे पास कोई स्‍याहीसोख भी नहीं

 जिंदगी इतनी भी रहमदि‍ल नहीं

होकर बेइख्‍़ति‍यार
छू लि‍या तुम्‍हें
एक आवारा से पल में
मेरे अहसास ने
जबकि‍ तय हुआ था
आजन्‍म
एक मर्यादि‍त दूरी
हमारे दरमि‍यां

प्रेम दंश देता है
और फूलों सा
कोमल अहसास भी
बंदि‍शें जि‍स्‍म की होती है
रूह तो
आजाद उड़ान भरती है

तुम्‍हें हक है, सहस्रबाहु बनो
देह के स्‍पंदन को
मेरी तप्‍त सांसों को
अपनी सांस में भरो
प्रेम के लाल रंग से
जीवन-भीत रंग लो

मगर न भूलना ये
सारे सपने पूरे कर दे
जिंदगी इतनी भी
रहमदि‍ल नहीं होती
एक आवारा पल की शरारत
जिंदगी की दशा और दि‍शा
बदल दि‍या करती है.........

रात की झील पर

रात की झील पर
तैरती उदास कि‍श्‍ती
हर सुबह
आ लगती है कि‍नारे
मगर न जाने क्‍यों
ये जि‍या बहुत
होता है उदास .....

ऐ मेरे मौला
कहां ले जाउं
अब अपने
इश्‍क के सफ़ीने को
तेरी ही उठाई
आंधि‍यां हैं
है तेरे दि‍ए पतवार....

कहती हूं तुझसे अब
सुन ले हाल
जिंदगी की झील पर
उग आए हैं कमल बेशुमार
उठा एक भंवर
मुझको तो डूबा दे
या मेरे मौला
अब पार तू लगा दे......
 
 वक्‍त दो वक्‍त को

सच है
मन के तार की झंकार
बि‍ना साज भी
झंकृत करती है
समूचे अस्‍ति‍त्‍व को
और
वेदना के पलों में
नाजुक संवेदनाएं
और मुखरि‍त होती हैं

हां, मैं हूं अपराधि‍नी
अनजाने ही सही
अनसुनी की मैंने
वो आवाज
जब हृदय के हाहाकार से
दग्‍ध तुम पुकार रहे थे
तुम मेरा नाम

अब जबकि
प्रति‍उत्‍तर न पाकर
दि‍ग्‍भ्रमि‍त होकर वो
कातर आवाज
वि‍लीन हो गर्इ अनंत में
और जो मुझ तक आ रही है
वो तुम्‍हारी नरम और
प्‍यारी ध्‍वनि नहीं
एक ज्‍वालामुखी है

मत करो ध्‍वस्‍त सब कुछ
वक्‍त दो वक्‍त को
धीरज धरो
मन का मौसम भीगा सही
आज हम मीलों दूर कहीं
मगर
चलेगी बासंती पुरवाई
ये यकीन अभी एक
ताजी हवा है लेकर आई.....
 
अक्‍स तेरा ही  झलकता है


मेरे
मन के आंगन में
लगे
तुलसी के बि‍रवे को
प्रेम-जल से
सींचती रही हूं बरसों

संचि‍त कर सीने में
रखा है उस एक छुअन को
जो मेरे माथे पर
सिंदुरी होंठों से
रख दि‍या था तुमने

मेरे प्राण, मेरे श्रृंगार
आईने में
जब भी रूप मेरा
दमकता है
आंखों के काजल से ले
हाथों की मेंहदी तक
अक्‍स तेरा ही
झलकता है.....

फुर्सत के पल

आकाश के
दक्षि‍ण-पश्‍चिम कोने पर
टि‍मटि‍मा रहे
चमकीले तारे ने
पूछा मुझसे......
क्‍या मैं तुम्‍हारे लि‍ए
बस एक फुर्सत का
पल हूं ?
जब दुनि‍या भर के
कामों को
नि‍बटा लेती हो
अपनों को संतुष्‍ट
और परायों को
वि‍दा कर देती हो....
तब
मेरी ओर देखकर
इतनी लंबी सांसे
क्‍यों भरती हो ?
मैं भी चाहता हूं
तुम्‍हें भर आंख देखना
तुमसे कुछ बति‍याना
और तुम्‍हारी
खि‍लखि‍लाहट को सुनना
मगर तुम
तभी आती हो
जब मैं डूबने वाला होता हूं
तुम्‍हारा आना
और मेरा जाना....
क्‍या नि‍यत है हमारा वक्‍त ?
कभी सोचा है तुमने
कि‍ मैं
तुम्‍हारे फुर्सत का पल हूं
या फि‍र
यही एक पल है
जब तुम
तुम्‍हारे साथ होती हो
और मैं
तुम्‍हारे नि‍तांत अपने पल का
एकमात्र साक्षी बनता हूं.....
 
वि‍देह हो जाना चाहता है.

बनकर खुशी
कभी नहीं रहे तुम पास मेरे
जब भी महसूस कि‍या
उमस भरी दोपहरी की तरह ही
मि‍ले तुम
एक अबूझ बेचैनी लि‍ए
दर्द से अनवरत बहते हुए
आंखों में भर आए पानी जैसे
सर के दोनों तरफ की
तड़कती नसों में घुले दर्द के साथ
हरदम आए तुम

फि‍र भी

तुम्‍हारा पास न होना
इतना दर्द देता है जैसे
रेत रहा हो आरी से
एक हरेभरे पेड़ का
मजबूत तना कोई
और दूरी का अहसास
इस तरह पागल करता है
जैसे
शरीर छोड़ने को प्राण तड़पे
मगर मुक्‍ति नहीं मि‍ले

तुम हो न हो
तुम्‍हारा दर्द कसकता, टीसता है
हरदम
फि‍र भी ये नि‍स्‍पृह देह
वि‍देह हो जाना चाहता है
अंतरि‍क्ष में एक घर बनाना चाहता है
चाहे-अनचाहे मि‍ले
सारे दर्द को समेटकर
ध्रुव तारे की तरह हरदम
तेरे-मेरे नाम से 'एकनाम' बन
चमकना चाहता है.......

अनदेखी लि‍पि‍यां

कही तुमने मुझसे
बार-बार वो बातें
जि‍नका मेरे लि‍ए
न कोई अर्थ है
ना ही अस्‍ति‍त्‍व
जो मैं पढ़ना चाहूं
तुम्‍हारे आंखों की
अनदेखी लि‍पि‍यां
कहो कौन सी कूट का
इस्‍तेमाल करूं
मैं ढूंढती रहती हूं
कोई ऐसा स्रोत
ऐसी कि‍ताब
जो आंखों की भाषा को
शब्‍दों में बदलती हो
है ये ईसा पूर्व की या
सोलहवीं सदी
की सी बात
कि हमारे बीच से
शब्‍द अदृश्‍य ही रहे हैं

अब तुम पढ़ना
मेरा मौन, सहना
मेरी अनवरत प्रतीक्षा
और मैं कूट-लि‍पि‍क बन
पढूंगी, आंखों की अनदेखी लि‍पि‍यां
 
है कोई नापना.

कि‍तनी है
आकाश की उँचाई
और धरती की गहराई
ये हम कल्‍पना कर सकते हैं
मगर
नापना चाहकर भी
नाप नहीं सकते
फि‍र
मेरे अंतस में छुपे भावों की
तुम्‍हारे प्रति
छलकते प्‍यार को
और जुड़े रहने की चाह को
क्‍यों नापना चाहते हो
बार-बार
है कोई नापना जो तुम्‍हारे पास
तो दे दो मुझे
मैं बता दूं नापकर
कि कि‍तना प्‍यार है तुमसे.........


(परिचय:
जन्म:   2 अप्रैल 1974,  मेहसी थाना, मोतीहारी, बि‍हार
शिक्षा:   इति‍हास में स्‍नात्‍कोत्‍तर बैचलर ऑफ जर्नलिज्‍म लेखन
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताओं का प्रकाशन, शब्द-संवाद व स्त्री होकर सवाल करती है जैसे  कविता संकलनों में भी रचनाएं संगृहित
ब्लॉग: रूप-अरूप
सम्मान: सीएसडीएस का  नेशनल इंक्लूसिव मीडिया फ़ेलोशिप-२०१३
संप्रति:स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन
संपर्क:rashmiarashmi@gmail.com)   








read more...

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

केशव तिवारी की कविताएँ





 









डर

डर कहीं और था
मैं कहीं और डर रहा था
डर उस जर्जर खड़े
पेड़ की छाँव में था
और मैं धूप से  डर रहा था
दुनिया भर की तमाम
पवित्र किताबें
भय और आतंक से
भरी पडी थीं
और मैं

अपने सबसे डरे समय में
उन्ही को पढ़ रहा था।

 
 मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूँ


अगर मुझे बाज की उड़ान पसंद है
तो मुझे अपनें पठारी मैदानों में होना चाहिए

तब मैं इस तंग काफी हाउस में
क्या कर  रहा  हूं

अगर मैंने पिछली सर्दी में
आलू बोना सीखा है
तो मुझे ठंडी में अपने
खेत और क्यारियों को
तैयार करना था।

मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूं

अगर मैंने अभी हाल में
कविता लिखना सीखा है
तो मुझे सबसे पहले
अपने गांव के उस
अलमस्त गडरिये को सुनना चाहिए था

मैं इन वातानूकूलित सभागारों में
क्या कर रहा हूँ।

मुझे वहां होना चाहिए
जहां कहीं नए मकान को
बनाने के बुनियादी प्रयत्न किए जा रहे हैं
इन हवाई किलों में
मेरा दम घुटता है।


जौ  भर नहीं जुमका

 पक कर तैयार है धान की फसल
दूज का चाँद पंहट कर अपनी हंसिया
फसल कटाई की शुरुआत कर रहा है

 मैं फटे कपड़ों में खुद को समेटे
खेत काटती औरतों को देख रहा हूँ
इन्हें इसी हालत में मेरे पुरखों
के पुरखों ने भी देखा था

कब से डटी हैं ये भूख के खिलाफ
इनके हिस्से है इस धरती की भूख
पर इनके समय का धंसा पहिया 
लाख कोशिशों के बाद भी

जौ भर नहीं जुमका
इनका वक्त दुनियां की घड़ियों
के बाहर है
ये धान सटक रही है
इनकी घरों की मुंडेरों पर
बैठा चांद
सुन रहा है इनकी बोलचालभर
मेरा मन समय के उस
धंसे पहिये में ही फंसा है।


 खेत जगाए जा रहें हैं

 दिवाली है
खेत जगाए जा रहे हैं
मेड़ों पर जलाए जा रहे है दिए
न धान को जड़ों भर पानी
न खेतों को कम्पोस्ट और डी .ए.पी .
भूखे प्यासे खड़े हैं खेत
मैं उनको भी जानता हूं
जो इन खेतों के साथ साथ जाग रहे हैं
और उनको भी जो लगातार
सड़ते हुए अनाज पर
गलत बयानी करते जा रहे हैं

 मैं पूछना चाहता हूं
इनकी सजा कौन तय करेगा
ये खेतों के साथ जागते लोग
या फिर एक और तीसरा आयोग

  कराहती क्यों हैं

 रात के पास क्या कोई बीन है
जो घने अंधेरे में भी
बजती है धीमे धीमे

फूल सुंघनी क्या गा गई
सुर्ख अड़हुल के कान में
कि मुंह खोले है अवाक
समुद्र के पास क्या कोई मृदंग है
जो शाम ढलते  ही
देने लगता है ताल
पेड़ों के पास तो
पत्तों की करतल धुने हैं

 सुरों में डूबी धरती
फिर कराहती क्यों है

क्या धरती के हृदय  में
कोई कांटा गड़ा हुआ है।

 मुराद अली

 मशक बीन के उस्ताद मुराद अली
गलगल हो गई शरीर पकी ढाढी
बिना दांत का मुंह
बात-बात में फूलती सांस

ऐसे  ही नहीं थे मुराद अली
जिसने देखा हो उन्हें जवानी में
मशकबीन कांख में दबाए
पैंतरा बदल बदल कर  बजाते

वही जाने क्या थे
गरीब गुरबा सेठ जमींदार
किसके कार परोजन में
नहीं गूंजी उनकी मशक  बीन

मैंने पहली बार इन्ही धुनों  पर
नाचते देखा था नइका को
नयी नयी आई थी ब्याहकर
नाम मिल गया था नइका
कुछ दिन बाद किसी और के
साथ उढर गई
उसके तोड़ की नाचने वाली

फिर नहीं देखी
आज भी याद करते हैं मुराद अली
सूना सूना कर गई गड़रियान
कुछ दिन ही टिकी पर नाम कर गई
 नाचते ही आई थे और
नाचते ही चली गई
चढी दुपरिया जब बाग़ में
टिकाई जाती बारात
सन्नाटे और घमस के बीच
गूंज उठती उनकी मशक बीन
बराती समझ जाते
रंग में मुराद अली
सुर मन में ही नहीं गदराये  आमों में

धीरे धीरे
मिठास की तरह उतर रहे होते
समय के लम्बे दौर  में वो
सक्रिय रहे अपनी मशक बीन
के सुरों के साथ
पूरे के पूरे  पवस्त में कहाँ कहाँ नहीं
उनके सुरों की छाप
हम जैसे कितने जवान हुए
उनके सुरों के साथ
बँसवारी के कितने बांस
कैची से आकाश छूने लगे
भले ही आज भोंडे शोर में
कहीं दब गए  मुराद अली
के मशक बीन के सुर
पर खूंटी पर टंगी लगभग फट चुकी
मशक बीन

यह हिलती डुलती काया
बता रही है अपने समय में
किस तरह हस्तक्षेप किया उसने।

 मोमिना

खटिया बिनती है मोमिना
गाँव- गाँव जाकर
साईकिल मिस्त्री पति नहीं रहा
सयाने होने को दो बच्चे
खटिया बीनना सीख लिया
घुरुहू गडरिया से

यूँ तो दूसरे निकाह की भी
सलाह दी  मायके वालों ने
पर लड़के बेटी का मुंह देख
उधर सोचा भी नहीं

रकम रकम के फूल काढती है
वे अपनी बिनाई  में
आप ने धूप में स्वेटर बुनती
महिलाएं देखी होंगी
नीम के नीचे खटिया बिनते
मोमिना को देखिए

सधे हाथों में बिनाई  का बाध
मछली सी चलती चपल उँगलियाँ
हाथ और चेहरे की तनी नसें
एक थकी थकी फीकी सी मुस्कान

खटिया बिनती मोमिना
मेरे गाँव की
सबसे जागती कविता है

ये जानती भी नहीं कब में
आगे बढ़कर निकल आई
परदे के बाहर
मौलवियों की तिरछी नजर से
बा खबर

गांव -गांव घूमती
जिन्दगी के चिकारे का
तना तार है मोमिना।


(कवि-परिचय:

जन्म:  4 नवम्बर 1963, प्रतापगढ़, अवध के छोटे से गाँव में
शिक्षा:  वाणिज्य स्नातक
सृजन :    देश की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कविता, समीक्षा और आलेख। ‘इस मिट्टी से बना’, ‘आसान नहीं बिदा कहना’ कविता-संग्रह प्रकाशित
सम्मान:  सूत्र सम्मान से अलंकृत
संप्रति: एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी 
संपर्क : keshav_bnd@yahoo.co.in  )

read more...

बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

बेबस समय की शहतीर सी चुभन

नौ वर्षीय बड़े साहबजादे आएश लबीब की कंप्यूटर पेंटिंग्स, जब वो 6 साल के थे 



यह बहुत बाद का समय था। पोखरण में महात्मा बुद्ध के मुस्कुराने और अयोध्या से राम के दूसरे बनवास के भी बहुत बाद। विश्व महा पंचायत के कथित मुखिया की दबंगई के स्थानीय क्लोनों को बाज़ार ने नायक बनाने के लिए अपनी सारी ताक़त झोंक दी थी। उसके खल को बूझते हुए हम थे और नहीं भी थे। खून की होली के रास में मूर्छित हमारा वजूद उसके होने और न होने के द्वन्द में विचलित था। लेकिन रूह की यह बेचैनी दिमाग के सम्मुख घुटने टेक चुकी थी। दिमाग था कि जो मित्र की नौ साल की बिटिया को भी स्त्री समझ उसके मासूम उरोजों की गोलाईयों से तुष्ट होता था। वहीं हम थे कि कानून की शिथिलता का स्यापा कर रहे थे। मंदिरों और मस्जिदों की प्रार्थनाएं और इबादतें उत्पाद में ढलकर पैकेज हो चुकी थीं। धर्म पुरातत्व का विषय था। जिसकी क़ब्रों से निकला भूत हमारी नृशंसता से कांपता वापस चला जाता। धर्मांधता का आतंक उस नायक का पेशा था। दलाली को कमीशन कहने के इस दौर में झूठों की विवशता थी। यह रंगा सियार थे। जंगल से शहर की ओर भागे शेर को मुखिया बनाने की क़वायद में तल्लीन थे। यहां धर्म की नहीं जातीय सर्वनाश की गुर्राहट थी। रंगा सियार सच की बारिश से अनजान थे। दरअसल वो धीरे-धीरे रँगे गए थे। इतना कि अपने होने का भ्रम कभी-कभार शौचालय में पल भर को लोप होता। लेकिन चातुर्य की क्रूरता से पंगु थे। जातीय हिंसा उन्हें ऊर्जा देने लगी थी। ऐसा वे खुलेआम आम कहते। विरोधी समुदाय के होश ठिकाने लगाने के लिए नरसंहार से सहमत थे। सहमत उनकी ज़ुबान तेंदुए सा लपलपा रही थी। हिटलर का नया इतिहास हिमालय की गोद में अकार पा रहा था। उसके गुणगान में कवि-लेखक-पत्रकार की टोलियाँ इसे क्रांति कहने में छाती फुलाए भोंपू थीं। मनुष्य किसी अंध कूप मे धेकेल दिए गए थे। पर उनका तेज था कि जब कभी इन भोंपुओं को निर्वस्त्र कर देता। यह थे कि अंधकार को आवरण समझ बैठे थे। वो इतिहास को भूल चुके थे कि कोई भी नस्ल तमाम रक्तिम उबाल के बाद भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हो गयी। ( रात कुछ सहयोगियों से हुए संवाद के बाद‡ परसों ही महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती है )

पेड़ों को काटने की प्रतियोगिता दर असल धरा के गर्भ में छुपे अकूत भंडार को लूटने की थी। जबकि उसका प्रायश्चित गमलों में उगा बोनसाई कर पाने में असमर्थ था। जंगलों से सिर्फ परिंदे ही नहीं इंसान को भी शहरी शेरों ने निवाला बनाना शुरू कर दिया था। ज़बान क्रांतिकारियों की भी बंद थी या वे मूक बधिर होने का ढोंग कर रहे थे!Î

तब विश्व का एक धुर्व ख़त्म हो चुका था। उसके शिराज़े बिखेरने में दूसरे धुर्व की सशक्त दख़ल थी। उसकी यही कुटिलता अन्य क़द्दावर मुल्कों के लिए घातक बनती जा रही थी। उसने दुन्या को अमीर-ग़रीब की बजाय सभ्यताओं के संघर्ष में बदलने की कोशिश की। वो किंचित सफल रहा था। उसके झूठ और अन्याय के विरुद्ध बोलने वाले का अंत उसका लक्ष्य था। अपनी हिंसक फ़ितरत को वैध ठहराने के लिए वो लोकतंत्र और विश्व शांति का ढकोसला करता। सब अपनी बारी के इंतज़ार में थे। अनजान होने का दंभ उनकी कायर सहमति में था। दूध पिलाने के बाद दहशत का सांप जब डसने लगा तो सभ्यता संघर्ष का तर्क उसके हर दुष्कर्म को ढांपने में सक्षम रहा। इधर एक शहंशाही मुल्क तेल से छनती पकोड़ियों को खाने की अय्याशी में मस्त। सच तो यह था कि विश्वव्यापी डॉन हथियारों के साथ तेल का एकक्षत्र कारोबार चाहता था। उसे शाही मुल्क में लोकतंत्र की याद कभी न आती। और वो शाही मुल्क था कि अय्याशी को छुपाने के लिए धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों को अर्थ देकर अपना आवरण तलाशता था।
विचारों के अंत की महज़ घोषणा नहीं, उसके खात्मे के साम, दाम, दंड व् भेद सारी तिकड़में थीं। खाओ पियो, मस्त रहो @ ईमानदारी पुस्तकों में अच्छी लगती हैं! खाने-पीने, सजने-संवरने और घूमने-टहलने के लिए तरह-तरह के साहित्य मौजूद थे। पत्र-पत्रिकाओं और दृश्य-भोपुओं में दरबारी गवैय्ये कवि बनकर इसका प्रचार करते। हर दिन किसी के नाम निश्चित था। संबंधों की शुचिता और उसकी आंतरिक तारतम्यता का ग्राफ बाज़ार तय करते। हर वर्ग और समाज के लिए नए-नए भगवान भी अवतरित हो चुके थे। यह साधु-संत अब कंदराओं में नहीं, रंगीन आलीशान पर्दों पर विराजमान रहते। इनमें से कुछ का कारोबार अरबों-खरबों का था। ज़माना वही है, जब ग़रीब मुल्कों की बेटियाँ अचानक विश्व सुन्दरी होने लगी थीं।
अब हर ओर सुंदरता का बोलबाला था। हॉट और सेक्सी होना सौन्दर्य का पर्याय हो चुका था। स्त्रियों की आज़ादी सिर्फ़ मनपसंद वाशिंग मशीन खरीदने में थी। आक़ा को हमारे गाँव-जवार की सड़कें जर्जर कर रही थीं। वो तुरंत दयालु हो गए! चौडी-लंबी सड़कों का जाल बिछ चुका था। इस जाल में हम समा चुके थे। अब हर पंचायत-अखड़ा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद सहज उपलब्ध थे। अब पंचायतें आधुनिक हो चुकी थीं। वहीं पुरा कालीन भी उतना ही। प्रेमियों का धड़ सर से अलग करना उनका गर्व था। उनके फ़तवे किसी मदरसे से अधिक मारक थे। किसी के सामाजिक बहिष्कार करने के फ़ैसले आउट आफ़ फ़ैशन थे। सामुदायिक हिंसा से उनका तेज बढ़ता था। इधर, विश्व का कथित मुखिया व सबसे विकसित देश में लाखों सरकारी कर्मी नौकरी से हटा दिए गए थे।

दरअसल वो सशंकित था। पहले से ही। तमाम संधियों को दरकिनार कर उसे दूर देशों के नागरिकों की चिंता दुबला किये जा रही थी। सो उसने इंसानी धर्म का पालन करते हुए कई मुल्कों में जंग को प्रेरित करना शुरू किया। उससे पहले मिटटी के किलों को गिराकर पहाड़ी मुल्क में उसके बम वर्षक विमान रोटियाँ गिरा चुके थे। यह वो ठिकाना था जहां कभी उसके गुर्रिला ट्रेनिंग दिया करते थे। ऐसा इसलिए कि उसके पडोसी की लाल नाक उसे चिढ़ाती थी। आखिर उसकी नाक तोड़ दी गयी। लेकिन जिससे तुडवाई वो मित्र से अचानक शत्रु हो गया। इस कथित शत्रु को इल्हाम हो गया कि वो तो जन्नत से भेजा गया है। वो भेज गया तो था नहीं सो वहाँ के सहिफ़े लाना भूल गया था। उधर उस शाही मुल्क को भी जन्नत लुभाने लगा था। ( इल्हाम= आकाशवाणी, सहिफ़े =ईश्वरीय सन्देश)
और हम थे कि एक भ्रम पर जान लुटाये थे। हर संकट के लिए अतीत के पन्नों पर जाकर  रुक जाते। ज़र्द वर्क़ था कि हमें ज़र्दे के नशे में क़ैद कर लेता। इसका जूनून भी अपने अतिरेक में एक तरह की हिंसा को ही जन्म देता था।

(फ़ेसबुक उवाच 30 सितंबर से एक अक्टूबर के बीच)





read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)