बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 25 नवंबर 2013

ईंट उठाने वाली मज़दूर बनी यूनिवर्सिटी टॉपर


गोल्ड मेडल पाकर  कहा, नौकरी मिल जायेगी न!

पदक पाकर मुन्नावती रो पड़ी   चित्र: रमीज़ जावेद




शहरोज़
 @  मुन्नावती


बरसों रेजा मजदूरी करते बचपन से युवा होने तक जो सपना देखा था, उसके साकार होने में मात्र कुछ ही घंटे बचे थे। मन में अजब हलचल थी  कि आज मुझे ईंटें नहीं उठानी, बल्कि सोने का तमगा गले में पहनना है। मुझे यह पदक कोई और नहीं देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे स्वयं देंगे। आखिर क्यों नहीं? मैंने संस्कृत में यूनिवर्सिटी जो टॉप किया है। सूरज बाबा ने चहुं ओर अंजोर कर दिया है। सोमवार को दिन के 10 बजे हैं। मैं छोटे भैया हरख  के साथ रांची विवि पहुंची, तो अवाक् रह गई। सड़क की दोनों ओर गाडिय़ों का काफिला। फूल सी चहकती छात्राएं। छात्रों के झुंड का तेज भी जुदा-जुदा सा। दीक्षांत मंडप पहुंचते-पहुंचते मुझे गांव के आसपास लगने वाले मेले याद आने लगे। उस मेले में जाने का अवसर भी भला कहां नसीब हो पाता था। दिन-भर हाथ-गोड़ तोड़ू श्रम करने के बाद शाम को थकी-मांदी अपने गांव दोलैंचया पहुंचती थी। फिर रसोई निबटाकर पढऩे बैठ जाती। गालों पर लुढक आए आंसूओं को पोंछते मैंने मंडप में प्रवेश किया। काले-लाल गाउन में दमकती हमउम्र लड़कियों को पास देख खुशी दोहरी हुई। साथ ही ज्योतिमर्य डुंगडुंग, कुमारी अनुपमा, गुफराना फिरदौस, शमा परवीन, नुपुर , शहनवाज को करीब पाकर दिल ने जोर से कहा, जय हिंद!  हरख भैया मुझे बैठाकर इधर-उधर टहलने लगे। उनकी आंखें की पलकें भी उचक-उचक कर यहां उतर आए खुशरंग व खुशपल को निहारने लगीं। सीट पर बैठते ही पत्रकारों ने घेर लिया। हर कोई मेरी गरीबी को जानना चाहता है। लेकिन मैं हरेक से अपनी गरीबी दूर करने की विनती करती हूं। मुझे अब नौकरी मिल जाएगी न?

मेरे ठीक सामने बड़ा सा मंच है। लग रहा है कि लापुंग का खेल मैदान हो। मंच पर सजे रंगबिरंगे फूल मुझे गांव के फुटबाल(गेंदा)फूल का स्मरण कराते हैं। मंडप में भीड़ है। खुशियों का मेला है। इससे पहले इतनी भीड़ अपने गांव से चार-पांच किमी दूर डुरू जतरा में देखी थी। अचानक घोषण होती है कि अब शोभायात्रा आएगी। समय 11 बजे का है। मखमली गाउन में गुरुओं व अतिथियों का झुंड। मार्च की अगुवाई कर रहे हैं, रजिस्ट्रार डॉ. अमर कुमार चौधरी। उनके साथ राज्यपाल डॉ. सैयद अहमद, केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव, वीसी व प्रोवीसी, डीन, सिंडीकेट, सीनेट। उनके मंचासीन होने के बाद ही राष्ट्रगान के लिए सभी खड़े हो गए। समवेत स्वर में जन  गण मन से गाते ही रोम-रोम सिहर गया। उसके बाद जय-जय गुरुकुल जय रांची विवि के कुलगीत ने स्वाभिमान की ऊर्जा भर दी।

रजिस्ट्रार साहब के भाषण के बाद अतिथियों को सम्मानित किया गया। कुलपति ने अंग्रेजी में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उसके बाद गोल्ड मेडल पाने वाले छात्र-छात्राओं को सामने आने को कहा गया। मेरी धड़कनें धौकनी की तरह चलने लगीं। मंच की  बायीं ओर  हम सभी करीब लगगभ 29 विद्यार्थी पंक्तिबद्ध खड़े हो गए। इनमें 19 लड़कियां थीं। सबसे पहले मंच से संजय कुमार के नाम की घोषणा होते ही तालियों ने शोर का संग दिया। आठवें क्रम में मेरा नाम पुकारा गया। साहस बटोरते हुए मैं मंच पर पहुंची। केंद्रीय मंत्री के हाथों गोल्ड मेडल व प्रमाण पत्र पाते ही लगा कि मैं घोल जीत गई। बचपन में जतरा में अक्सर मैं घोल में हार जाती थी। मंच से उतरते ही दोनों भैया  हरख व गोवद्र्धन साहू का चरण छुआ। मेरी मजदूरी के साथ इनकी मेहनत व साथ के बल पर ही तो मेरे गले मे यह सोने का तमगा चमका है। पदक वितरण के बाद अतिथियों ने भाषण दिया। शिंदे जी की बात ने बहुत प्रेरित किया। उन्होंने भी अभाव को अपनी मेहनत व ईमानदारी से परास्त किया है। पदक को भैया बार-बार छू कर देखने लगे। मैंने किसी से पूछा, भैया यह सोना ही है ना या कि केवल पानी चढ़ा  हुआ है। यहां से मैं विभाग जाउंगी  गुरुओं का आशीष लेने। अस्पताल जाकर बीमार मां की चरणधूलि से माथे पर टीका लगाउंगी। बाबा देवीदयाल होते, तो किता खुश होते। तब इन आंखों का बादल सिर्फ हर्ष का ही होता।

भास्कर रांची के 26 नवंबर 2013 के अंक में प्रकाशित 


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4 comments: on "ईंट उठाने वाली मज़दूर बनी यूनिवर्सिटी टॉपर"

rohitash kumar ने कहा…

एक नौकरी....गरीबी से लड़ने का एकमात्र हथियार शिक्षा...पर शिक्षित बेरोजगारों की फौज डर पैदा करती है.....तमाम हौसलों को तोड़ कर रख देती है गरीबी...कई लोग इससे निजात पा जाते हैं..तो उससे कई गुणा ज्यादा इस चक्रव्यूह में ही फंसे रह जाते हैं.....गरीबी की रेखा के नीचे के लोग कम होते जा रहे हैं आकंडों में...मगर निम्म मध्यमवर्गीय लोगो को बीमारी गरीबी की रेखा के नीचे धकेल देती है...कुछ कहना मुश्किल है....पदक भी व्यर्थ अगर नौकरी न मिले तो...कड़वी हकीकत है...या तो निगलते रहें या फिर तटस्थ होकर मुर्दों की भांति जीते रहें...

सतीश सक्सेना ने कहा…

देश की असलियत है यह कहानी

pks ने कहा…

धैर्य और परिश्रम का आदर्श! बधाई!!

pks ने कहा…

धैर्य और परिश्रम का आदर्श! बधाई!!

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