बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शनिवार, 14 सितंबर 2013

कोलकता में हिंदी का ठाठ



 







प्रतिमा सिंह ’आरजू’ की क़लम से .
हिंदी और उसके विकास में  अहिन्दी भाषी प्रदेश बंगाल का वाहिद महानगर कोलकता  का भी बड़ा योगदान रहा है। शताब्दियों से हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में अहिन्दी भाषी प्रदेश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस क्षेत्र में हम बंगाल के अवदान को नकार नही सकते। बंगाल में हिंदी के विकास चाहे आजादी से पहले हो या बाद में।  उसके प्रचार-प्रसार में कोई कमी नही आई  है और अभी भी यह इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योग दे रहा है। बंगाल ने हमेशा  हिंदी जगत को बड़े बड़े आलोचक, गजलकार, कथाकार, कहानीकार, कवि आदि से सुशोभित किया है। इसराइल, प्रभा खेतान ,  डॉ शम्भुनाथ, अमरनाथ, जगदीश्वर चतुर्वेदी, अलका सरावगी और मधु कांकरिया, विमलेश त्रिपाठी , सुलेखा सिंह और जीवन सिंह जैसे   जैसे आलोचक, लेखक, कथाकार और कवि सरे फेहरिस्त हैं, जिन्होंने  हिंदी साहित्य को समृद्ध  किया  है।  इस सिलसिले में बंगाल में कार्यरत  हिंदी सेवी संस्थाओ को हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। जिनमें  बंगीय हिंदी परिषद, भारतीय भाष परिषद्, अपनी भाषा, समकालीन सृजन, सूत्रधार आदि संस्थाए प्रमुख हैं।

बंगीय हिंदी भाषा परिषद्
बंगाल में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत संस्थाओ में सबसे पुरानी संस्था  बंगीय  हिंदी परिषद है। जिसकी स्थापना सन १९४५ में आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल ने की थी।  इसकी स्थापना के उद्देश्य  से पहली मीटिंग जयपुरिया कॉलेज में हुई और बाद में इसे कॉलेज स्ट्रीट में स्थित कॉफ़ी हाउस में स्थापित कर  दिया गया। इस साहित्यिक संस्था  की सबसे बड़ी देन हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने में है।  सन १९४९ में जब संविधान सभा की बैठक हुई और हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने की बहस चल रही थी तो उसी समय संस्था  की मंत्री कमला देवी गर्ग ने ३५० पेज की एक पुस्तक ’हिंदी ही क्यूँ ‘ छापकर  के संसद के सभी सदस्यों को दिया।  जिसेके आधार पर हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के मत को स्वीकार किया गया और हिंदी राष्ट्र भाषा बन गई।
इस संस्था का योगदान आज कल प्रचलित जन्मशती को मानाने की शुरुआत करने में भी है। बंगीय हिंदी परिषद का मूलभूत उद्देशय  हिंदी का विकास ही है।  नए आलोचकों, कवियो, लेखको का समाज से परिचय करना है। अपने इसी ध्येय से उत्प्रेरित होकर संस्था ने  सन १९७३ में ’जनभारती पत्रिका ‘’का प्रकाशन शुरू  किया।  परन्तु जिस प्रकार हर क्षेत्र पर अर्थ की मार  पड़ी उसी तरह इस संस्था पर भी अर्थ और पाठक की कमी का व्यापक असर पड़ा और यह पत्रिका बंद हो गई। हिंदी के पाठको के लिए यह संस्था पुस्तको का प्रकाशन भी करती  रही  है और अब तक ३० से ३५ पुस्तको को प्रकाशित कर चुकी  है। अभी यह संस्था  अर्थ की मार  को झेलते हुए भी हिंदी को उन्नत बनाने में लगी  है।  मंझे और नए कवियों  के लिए हर महीने  पहले शनिवार को ’कविकल्प ‘ में कविता पाठ का आयोजन करती है। यह दुर्भाग्य की बात है जिस संस्था  से बड़े-बड़े साहित्यकार नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह जैसे लोग जुड़े हो उसकी  दशा बदतर है।


भारतीय भाषा परिषद
इस संस्था की स्थापना सन १९७५मे अंग्रेजी भाषा के बढ़ाते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओ के बीच आदान-प्रदान, संपर्क, सहयोग और अनुवाद को बढ़ावा देने के लिए सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र भागीरथ कनोडिया ने की थी। संस्था का मुख्या उद्देश्य  हिंदी को देश की सशक्त भाषा बनाना है। अपने इस मक़सद  को पूरा करने के लिए यह संस्था निम्नलिखित कार्य करती है:
(क)  संस्था समय-समय पर साहित्यिक प्रदर्शनिया तथा साहित्य और कला के कार्यक्रमों के लिए सम्मलेन, गोष्ठियों तथा भाषण मालाओ का आयोजन करती है।
(ख) भारत की अन्य भाषा में लिखित लेख, काव्य, कहानी का हिंदी भाषा में अनुवाद कर उसे प्रकाशित करती है।
(ग) साहित्यिकरो और विद्वानों को आर्थिक और अनन्य सहायता देकर उनकी कृतियो का प्रकाशन करती है।
(घ) लेखक-लेखिकाओ को उनके कार्य के लिए प्रोत्साहित कर उन्हें सम्मानित भी करती है।  अभी हल ही में डॉ प्रतिभा अग्रवाल उनकी कृतियो के लिए सम्मानित किया गया।
( च) छात्र छात्राओं  के लिए समय-समय पर कविता,निबंध,वाद विवाद आदि प्रतियोगिताओ का आयोजन करता है और योग प्रतिभागी को सम्मानित और पुरुस्कृत भी करता है


वागर्थ पत्रिका
भारतीय भाषा परिषद्  हिंदी को घर-घर में पहुंचाने  के लिए इस पत्रिका का प्रकाशन करती है। आज साहित्य-संस्कृति की  हिंदी की अहम पत्रिका है।  एकांत श्रीवास्तव और कुसुम खेमानी के संपादन में साहित्य की  विविध विधाओ का प्रकाशन करती है। भाषा परिषद् में आयोजित प्रतियोगिता में पुरुस्कृत सर्वश्रेष्ठ रचना को भी प्रकाशित किया जाता है। इस  पत्रिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि  इसमें पाठको को भी स्थान मिला है। लोकमत नामक  स्तंभ में पाठक अपने विचार प्रकट करते है। .इतना ही नही “झरोखा” नाम के कोलम में  पुस्तकों के मूल्य और उसके प्राप्त करने के स्थान का भी उल्लेख रहता है जो हिंदी के पाठको के लिए बहुत ही उपयोगी है। वागर्थ पत्रिका हिंदी और हिंदी की समस्त विधाओ को जीवित रखने में मील का पत्थर सिद्ध हो रही है। .इस पत्रिका में वयोवृद्ध कवि , लेखको से लेकर नए कवि और लेखको को स्थान  दिया जाता है और उनके फोन नंबर और पता देना भी इस पत्रिका का अलग रूप है।

अपनी भाषा
हिंदी के विकास को गति देने में ‘अपनी भाषा’ का भी  महत्वपूर्ण योगदान है। यह एक साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन है। संस्था का मूल उद्देश्य  समस्त भारतीय भाषाओ के बीच सेतु स्थापित कर उनके अन्दर समानता के सूत्र खोजना है। इसी कड़ी में प्रत्येक वर्ष यह संस्था एक  साहित्यकार को ‘जस्टिस शारदाचरण मित्र स्मृति भाषा सेतु सम्मान' से  अलंकृत करती है। यह संस्था प्रत्येक नागरिको को अपनी भाषा के साथ भारत की एक अन्य भाषा सीखने के लिए प्रेरित करती है।  विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती है तथा ज्वलंत विषयों पर बुलेटिन और पुस्तक आदि का प्रकाशन करती है। संस्था की ओर से अनियतकालीन पत्रिका ‘भाषा विमर्श ’का भी प्रकाशन होता है।

हिंदी मेला
बंगाल में हिंदी के विकास में यदि  हिंदी मेला का जिक्र न किया जाये तो पूरी की पूरी चर्चा ही अधूरी रह जाएगी। यह 'समकालीन सृजन' की ओर  से प्रत्येक  वर्ष आयोजित किया जाता है।  यह कार्यक्रम आठ दिनों का होता है,  जिसमे साहित्य के सभी विधाओ को समाहित किया जाता है और साहित्य में रूचि लेने वाले समस्त हिंदी  प्रेमिओ का खुले मंच पर स्वागत करता है। ये आठ  दिन कोलकता में निवास  करने वाले हिंदी  प्रेमियों के लिए किसी उत्सव से कम नही। जहा सभी बड़े-बच्चो को अपनी प्रतिभा दिखने का अवसर प्राप्त होता है और उन्हें सम्मानित भी किया जाता है।  इस कार्यक्रम  में भाग लेने मात्र से छात्र-छात्राए स्वयं को गोरवान्वित महसूस करते है।


सदीनामा, साहित्यिकी, भाषा मंच, सूत्रधार आदि कई  संस्थाए हैं,  जो हिदी के विकास में निरंतर सक्रीय हैं।  समय-समय पर हिंदी के विकास के लिए कार्यक्रमों  का आयोजन करती रहती हैं।  छात्र-छात्राओं  को हिंदी और अन्य भाषा में प्राप्त उपलब्धि  के लिए पुरस्कृत भी करती हैं।
इन संस्थाओ के इतर कुछ पुस्तकालय भी है, जो हिंदी के विकास  और बंगाल में हिंदी पाठको को बनाये रखने में अहम् भूमिका निभा  रहे है। इनमे कुमारसभा  पुस्तकालय, राजाराम पुस्तकालय, राममंदिर पुस्तकालय  और हनुमान पुस्तकालय है जोहिंदी पुस्तको को उप्लाब्ध कराने के साथ  साहित्य संगोष्ठी, चर्चा, कवितापाठ, कबीर, तुलसी जयंती का आयोजन करती है। जिससे  हिंदी जगत के लोगो का ज्ञानवर्धन होता है।
इतना ही नही हिंदी के विकास में समाचार पत्रों का भी बड़ा योगदन है।  जनसता, दैनिक जागरण, छपते छपते, सन्मार्ग, राजस्थान, विश्वामित्र, प्रभात खबर आदि यहां के प्रमुख पत्र हैं। यह अख़बार  समय-समय पर हिंदी के वरिष्ठ  लेखको के लेख, साक्षात्कार, नए लेखको की रचनाओ को छापकर  हिंदी जगत को उनसे परिचित कराते है.पुस्तक समीक्षा, कहानी, गजल, कविता को छापहिंदी साहित्य को उन्नत करने के प्रयास में महनीय भूमिका अदा कर रहे है।



(लेखक-परिचय:
जन्म : 20 सितंबर 1985, अकबरपुर, उत्तर प्रदेश
शिक्षा : प्रारंभिक और उच्च कोलकता में रहकर
सृजन: वर्चुअल जगत में सक्रिय, स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कुछ प्रकाशित
संप्रति: कोलकता के एक कालेज में लेक्चरर
संपर्क:singhpratima121@gmail.com}
           

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2 comments: on "कोलकता में हिंदी का ठाठ"

Lalit Chahar ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 15/09/2013 को ज़िन्दगी एक संघर्ष ..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः005 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | सादर ....ललित चाहार

kshama ने कहा…

Achha laga is aalekh ko padhke!

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