बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 11 सितंबर 2013

आदिवासी के नाम पर बने विवि से आदिवासी ही नदारद











श्रीधरम की क़लम से

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय का सच

आदिवासी समाज को ऊच्च शिक्षा से जोड़ने और वैश्वीकरण की  दौड़ में उन्हें उन्नति के रास्ते पर लाने के उद्देश्य से अमरकंटक (म.प्र) में  2008 में  इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय खोला गया था। लेकिन आदिवासियों के लिए बने देश के इस पहले विश्वविद्यालय का कुलपति गैर-आदिवासी को बनाया गया।  जिसका बडा नुकसान यह हुआ कि पाठ्यक्रमों के निर्माण से लेकर बहाली तक में आदिवासी और आदिवासी-संस्कृति को हाशिये पर रख गया। विश्वविद्यालय की  वेबसाइट पर इसके लक्ष्य और उद्देश्य में कहा गया है,  “आदिवासी लोग सांस्कृतिक विरासत, कला और शिल्प के कौशल से समृद्ध होते हैं। ” लेकिन विश्वविद्यालय के लिए जो भवन बनाए जा रहे हैं, उसमे आदिवासी वास्तु-कला और शिल्प का नामोनिशान नहीं है। आदिवासी भाषाओं के सर्वेक्षण-संवर्धन के लिए विश्वविद्यालय द्वारा अब तक क्या किया गया,  इसकी कोई जानकारी नहीं है। आदिवासी समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समीक्षा कर योजना आयोग को फ़ीडबैक देना भी इस विश्वविद्यालय का दायित्व था,  जो नहीं किया गया।

गैर आदिवासी वर्चस्व के कारण यह विश्वविद्यालय अपने लक्ष्य से भटक कर हर मोर्चे पर विफल रहा है। इसके अध्यापकों के चयन में कुलपति के स्वजातीय ठाकुर-वर्चस्व को देखा जा सकता है। इससे पूर्व के कुलपति प्रो. सी.डी सिंह, जो वर्तमान में फ़िर से कुलपति बनने के लिए जी-तोड कोशिश कर रहे हैं। उन पर आरोप है कि उसने शैक्षिक और गैर शैक्षिक कर्मचारियों की भर्ती में अपने स्वजातीय और सगे-रिश्तेदारों की नियुक्ति कर इस विश्वविद्यालय को जनजातीय विश्वविद्यालय से ‘ठाकुर विश्वविद्यालय’ बनाकर रख दिया है।  सीडी सिंह पर छह करोड रुपये के भ्रष्टाचार की जाँच केंद्रिय सतर्कता आयुक्त कर रहा है।  फ़िर भी चयन समिति ने उसे अंतिम सूची में रक्खा है।  इस व्यक्ति द्वारा किए गए नियुक्ति और अन्य कार्यों में किए गये भ्रष्टाचार के विरुद्ध उच्च-न्यायालय में ममला लंबित है।
शहडोल की आदिवासी सांसद राजेश नंदिनी सिंह ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मानव संसाधन विकास  मंत्री को लिखे पत्र में पूर्व कुलपति पर गंभीर आरोप लगाते हुए ज़ाँच की माँग की है। राजेश नंदिनी के अनुसार:

 प्रो.सीडीं सिंह ने सगे भाई के दामाद, साला आदि को बिना ‘नेट’ के सहायक प्रोफ़ेसर बनाया। गैर शैक्षणिक पदों के १७ पदों में से नौ पदों पर अपने स्वजातीय राजपूतों की बहाली की। अपनी भतीजी कुमारी श्रेया सिंह को हेराफ़ेरी कर टाप करवाया। तमाम नियमों को ताक पर रखकर कम्प्यूटर की खरीददारी में करोडों रुपयों का वारा-न्यारा किया। सीडीं सिंह पर महिला शिक्षकों पर भी अभद्रता का आरोप है।

सांसद  के पत्र के अनुसार प्रो.सीडी. सिंह का यह भी कहना है कि उसके आदमी हर जगह हैं।  जिसके कारण वह अपने खिलाफ़   हर शिकायत को गायब करवा  देता है।

 प्रो. सीडी. सिंह के खिलाफ अवधेश प्रताप सिंह विश्व विद्यालय, रीवा में भ्रष्टाचार के आरोप की जांच चल रही है।  उनकी प्रोफेसर पद पर पदोन्नाति विश्वटविद्यालय में लागू नियमों के खिलाफ की गई।  जिस पर म.प्र. राज्यीपाल एवं कुलाधिपति द्वारा अवधेश प्रताप सिंह विश्व विद्यालय, रीवा के कुलपति को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया तथा उनके एवं अन्य की पदोन्नति को अनुमति देने वाली याचिका म.प्र. उच्चअ न्याकयालय में लंबित है। याचिकाकर्ता द्वारा यह विषय भी उठाया गया है कि केंद्रीय विश्व.विद्यालय के कुलपति जैसे पदों पर नियुक्ति करते वक्तक प्रो. सीडी. सिंह के विगत पांच वर्षों के गोपनीय अभिलेखों को विचार में क्यों नहीं लाया गया? यह हैरत की बात है कि भ्रष्टागचार के इतने संगीन आरोपों के बावजूद चयन समिति ने फिर से सी.डी. सिंह को अंतिम सूची में रखा है।

इस बीच गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, म.प्र. के दाद दिल सिंह मरकाम ने 28 अगस्त को मानव संसाधन विकास मंत्री, डॉ. पल्लम राजू को पत्र लिखकर प्रो.  सिंह द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की जांच और किसी आदिवासी कुलपति के चयन की मांग की गई है। 'ऑल इंडिया ट्राइवन फोरम' के अध्यीक्ष श्री हरिराम मीणा ने भी दिनांक 01 सितंबर, 2013 को माननीय राष्ट्रपति को एक पत्र लिखकर पूर्व वीसी पर लगे आरोपों की जांच कराने के साथ-साथ किसी आदिवासी स्कॉलर को इंदिरा गांधी ट्राइबल नेशनल विश्वविद्यालय का कुलपति बनाने की मांग की है। हरिराम मीणा ने राष्ट्रलपति से यह भी अनुरोध किया है कि भविष्य में इस विश्वविद्यालय में तुलनात्मतक आदिवासी भाषा विभाग' आदिवासी लोकगीत विभाग, आदिवासी संगीत एवं नृत्य् विभाग, आदि खोलने का सुझाव दिया ताकि इस विश्वविद्यालय को बनाने का लक्ष्यं प्राप्त किया जा सके। वर्तमान में देश भर के सैकडों विश्वविद्यालय मे एक भी आदिवासी कुलपति नहीं हैं। या फ़िर उन्हें इस लायक शायद समझा ही नहीं गया? ब्राह्मण,क्षत्रिय,वै­श्य आदि के लिये देश के तमाम विश्वविद्यालय हैं। कम से कम सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी आदिवासी समुदाय के किसी व्यक्ति को ‘इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय’ का अगला कुलपति बनाया जाना चाहिये, ताकि यह विश्वविद्यालय अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके।


(लेखक-परिचय:
 जन्म: 18 नवंबर, 1974, चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
शिक्षा:  एम.ए. (हिंदी), एम.फिल., पी-एच.डी. (जेएनयू)
सृजन: मैथिली एवं हिंदी दोनों भाषाओं में समान रूप से कहानी, आलोचना, लेख आदि का लेखन। प्रतिष्ठित   पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं चर्चित।
 स्त्री : संघर्ष और सृजन (2008),  स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न और नागार्जुन के उपन्यास (2011)  प्रकाशित। चंद्रेश्वषर कर्ण रचनावली का पांच खंडों में संपादन।
विदेशी छात्रों के लिए कई हिंदी पाठ्यपुस्ततकों का निर्माण एवं संपादन।
नवजात(क) कथा (कहानी-संग्रह) शीघ्र प्रकाश्य।
संप्रति : दिल्ली विश्वंविद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापन।
             मैथिली पत्रिका अंतिका के साथ-साथ हिंदी की चर्चित पत्रिका कथादेश, बया आदि से संबद्ध।
संपर्क : sdharam08@gmail.com)




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- अल्लामा जमील मज़हरी

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