बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 31 जुलाई 2013

वासवी पर लगा एक पुस्तक से सामग्री टीपने का आरोप

1957 की  पुस्तक  से 2008 में ली गयी  सामग्री
 
















झारखंड महिला आयोग  की  सदस्य हैं वासवी

वासवी बोस/ वासवी/ वासवी भगत और अब वासवी किडो। झारखंड के बौद्धिक व सामाजिक जगत का बेहद चर्चित नाम। कई संगठनों से जुडी रहीं वासवी सम्प्रति  झारखंड महिला आयोग  की  सदस्य हैं। यह चर्चित एकटीविस्ट किसी न किसी बहाने हमेशा सुर्ख़ियों में रहती हैं। ताज़ा मामला एक किताब से जुड़ा है।  उनपर एक  पुस्तक  से सामग्री टीपने का  आरोप लगा है। झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत शीर्षक  से इंस्टीट्यूट फ़ॉर  सोशल डेमोक्रेसी, दिल्ली  से दो खंडों में उनकी  पुस्तक सन 2008 में प्रकाशित हुई। साझी विरासत पुस्तिका सीरीज़ के तेहत इसका प्रकाशन हुआ था। इस पुस्तक  पर बतौर संचयन वासवी भगत का  नाम अंकित है। खबर है कि  इन संग्रहों  की  सारी सामग्री हूबहू अनुवाद समेत जगदीश त्रिगुणायत द्वारा संकलित पुस्तक  ‘बांसरी बज रही’ से ली गई। बस अनुक्रम की थोड़ा-बहुत उलट-फेर  है। हर खंड में कुल 33 -3 3 गीत हैं, सभी 'बांसुरी बज रही' से लिये गए हैं।   (त्रिगुणायत  की  यह पुस्तक  1957 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने  प्रकाशित की थी। महाकवि निराला, सुमित्रा नंदन पंत और बाबू शिवपूजन सहाय के वक्तव्यों से सजी इस पुस्तक  की  भूमिका  में त्रिगुणायत जी ने गीतों के संकलन, इसके  अनुवाद समेत प्रूफ-संशोधन तक के लिए  सहयोग के प्रति नाम के साथ  सभी का आभार व्यक्त किया है। वही लगभग ढाई सौ गीतों के इस वृहद् संग्रह के अंत में उन्होंने सहायक ग्रंथ सूची भी  है। जबकि  वासवी का  दोनों संग्रह 72-72 पृष्ट का  है। दोनों में  संपादकीय वरिष्ठ पत्रकार फ़ैसल अनुराग ने लिखा है। जिसमें उन्होंने  लिखा है - ‘वासवी ने इन गीतों का संग्रह एवं संचयन किया है।’ लेकिन कहीं भी मूल संग्रकर्ता और अनुवादक के  नाम का  उल्लेख नहीं है। न ही उनका आभार जतलाया गया है।  क्या ऐसा करना कहाँ तक जाइज़ है।

मैंने अब तक  पुस्तक नहीं देखीःवासवी
झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत  की संपादिका वासवी का इस संबंध  में कहना है कि उन्होंने अब तक  2008 में प्रकाशित अपना यह संकलन नहीं देखा है। गीतों का  संकलन मैंने त्रिगुणायत  जी के अलावा और भी संकलनकर्ताओं की  पुस्तकों से किया होगा। इसमें जरूरी नहीं कि हम तमाम लोगों का  आभार व्यक्त करें।

आरोप साबित होने पर होगी वापस : फ़ैसल  अनुराग

झारखंड लोक गीत-मुंडा लोक गीत में प्रका शित संपादकिय नोट के  लेखक फ़ैसल अनुराग कहते हैं कि संकलन कहीं से भी किया जा सकता है। अगर साबित हो जाता है कि जगदीश त्रिगुणायत  की  पुस्तक  से हूबहू सामग्री ली गई है, तो पुस्तक  वापस ले ली जाएगी। वासवी का यह कहना गलत है कि उन्हें पुस्तक नहीं मिली। उन को मैंने स्वयं ही संग्रह  की प्रतियां दी थीं।

पुस्तक वापस ले ली जाएगीः खुर्शीद अनवर

इंस्टीट्यूट फॉर  सोशल डेमोक्रेसी, दिल्ली  के  निदेशक खुर्शीद अनवर ने कहा है कि  उन्होंने  वासवी और फ़ैसल अनुराग से स्पष्टीकरण  मांगा है। जगदीश त्रिगुणायत  का सं•लन भी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से मंगवा रहा हूं। यदि आरोप सही हुए, तो उनका  संगठन माफ़ीनामे के  साथ पुस्तक़  वापस ले लेगा। उनका यह भी कहना है कि उन्हें सभी ज़बान नहीं आती है। ऐसे में कुछ अपने लोगों पर भरोसा तो किया ही जा सकता है।  

देखिये,  कौन-सा गीत त्रिगुणायत की पुस्तक के किस पेज से लिया गया है।


मुंडा लोकगीत -भाग-1 वासवी भगत ------- बांसरी बज रही - जगदीश त्रिगुणायत
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गीत नं. 1/पेज नं 6-7 ------------- गीत नं. 299/पेज नं. 460-461
गीत नं. 2/पेज नं 8-9 ------------- गीत नं. 298/पेज नं. 458-459
गीत नं. 3/पेज नं 10-11 ----------- गीत नं. 277/पेज नं. 436-437
गीत नं. 4/पेज नं 12-13 ----------- गीत नं. 324/पेज नं. 488-489
गीत नं. 5/पेज नं 14-15 ----------- गीत नं. 308/पेज नं. 468-469
गीत नं. 6/पेज नं 16-17 ----------- गीत नं. 326/पेज नं. 488-489
गीत नं. 7/पेज नं 18-19 ----------- गीत नं. 327/पेज नं. 490-491
गीत नं. 8/पेज नं 20-21 ----------- गीत नं. 329/पेज नं. 492-493
गीत नं. 9/पेज नं 22-23 ----------- गीत नं. 330/पेज नं. 492-493
गीत नं. 10/पेज नं 24-25 ----------- गीत नं. 352/पेज नं. 510-511
गीत नं. 11/पेज नं 26-27 ----------- गीत नं. 351/पेज नं. 510-511
गीत नं. 12/पेज नं 28-29 ----------- गीत नं. 339/पेज नं. 500-501
गीत नं. 13/पेज नं 30-31 ----------- गीत नं. 334/पेज नं. 498-499
गीत नं. 14/पेज नं 32-33 ----------- गीत नं. 1/पेज नं. 68-69
गीत नं. 15/पेज नं 34-35 ----------- गीत नं. 3/पेज नं. 70-71
गीत नं. 16/पेज नं 36-37 ----------- गीत नं. 7/पेज नं. 74-75
गीत नं. 17/पेज नं 38-39 ----------- गीत नं. 9/पेज नं. 76-77
गीत नं. 18/पेज नं 40-41 ----------- गीत नं. 14/पेज नं. 82-83
गीत नं. 19/पेज नं 42-43 ----------- गीत नं. 15/पेज नं. 82-83
गीत नं. 20/पेज नं 44-45 ----------- गीत नं. 19/पेज नं. 86-87
गीत नं. 21/पेज नं 46-47 ----------- गीत नं. 24/पेज नं. 92-93
गीत नं. 22/पेज नं 48-49 ----------- गीत नं. 26/पेज नं. 94-95
गीत नं. 23/पेज नं 50-51 ----------- गीत नं. 29/पेज नं. 98-99
गीत नं. 24/पेज नं 52-53 ----------- गीत नं. 31/पेज नं. 100-101
गीत नं. 25/पेज नं 54-55 ----------- गीत नं. 33/पेज नं. 104-105
गीत नं. 26/पेज नं 56-57 ----------- गीत नं. 36/पेज नं. 108-109
गीत नं. 27/पेज नं 58-59 ----------- गीत नं. 38/पेज नं. 108-109
गीत नं. 28/पेज नं 60-61 ----------- गीत नं. 40/पेज नं. 110-111
गीत नं. 29/पेज नं 62-63 ----------- गीत नं. 49/पेज नं. 122-123
गीत नं. 30/पेज नं 64-65 ----------- गीत नं. 50/पेज नं. 122-123
गीत नं. 31/पेज नं 66-67 ----------- गीत नं. 51/पेज नं. 124-125
गीत नं. 32/पेज नं 68-69 ----------- गीत नं. 52/पेज नं. 126-127
गीत नं. 33/पेज नं 70-71 ----------- गीत नं. 55/पेज नं. 130-131

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4 comments: on "वासवी पर लगा एक पुस्तक से सामग्री टीपने का आरोप"

faisalanurag ने कहा…

AAP SE ES VISHYA PAR MERI JO BAAT HUYEE THEE WAH AAPNE NE NAHI LIKHA AUR JIN BAATON KO MAINE NAHI KAHA THA THA USE MERE NAAM SE LIKHA HAIN. UMMEED HAIN UN BAATON KAA PHONE CAAL DETAI HAI. AAP NIKAAL KAR PRAKHASSHIT KAREN TO ACHHA HOGA. KISI KI BAAT KO BINAA KAHE USE USKI JABAAN SE KAHLAAWANE KI KALAA MUJHE NAHI AATI. UMMEED THI AAP SACH LIKHENGEN. AFSOS AAP KAA IRAADA KYA HAI MUJHE PATA NAJI LEKIN MAINE JO KAHA WAHI LIKHIYE.

शहरोज़ ने कहा…

फैसल अनुराग जी! सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन मैं खबर लिखते समय नहीं देखता। आपने दो माह पहले जो कहा वही लिखा। हो सकता है कि शब्दों के चयन में कहीं चूक हो गयी हो, उसके लिए हमज़बान मुआफी चाहता है। यूँ मेरी उम्र इतनी नहीं कि फ़ौरी बातचीत भी भूल जाऊं। बावजूद आपका सम्मान करता हूँ, इसलिए यह लिख रहा हूँ।

आकाश खूंटी ने कहा…

इसी सीरिज की 'लोकगीत झारखंड खोरठा' नामक संकलन में घोर खामियां हैं. सम्पादक के रूप में फैसल अनुराग जी का नाम प्रकाशित है परन्तु संकलनकर्ता के स्थान पर जिन दो लोगो के नाम दिखे हैं 'अजय और लोकेश' यह काल्पनिक नाम है. इस नाम के कोई व्यक्ति खोरठा से सम्बद्ध नहीं है. संकलन की आलोचना इसलिए जरुरी है की यह पुस्तक खोरठा लोकगीत संकलन के रुप में प्रकाशित है परन्तु इसमें अधिकाँश गीत शिष्ट साहित्य से चुराए गए हैं और बेशर्मी की बात है की किसी रचनाकार का जिक्र नहीं किया गया है. और तो और इसमें कई ऐसे गीतों को संकलित कर लिया गया है जिसके ऑडियो केसेट बजाए जा रहे हैं.ये आई.एस.डी. वाले बिना जांच परख के किसी को लोक साहित्य के संकलन का भार कैसे दे देते हैं? मैं भी इस बाबत शिकायत करना चाहता हूँ पर मुझे सब एक जैसे चाटते बट्टे लगते हैं. क्या बासवी की तरह ही यह किताब भी आई.एस.डी. वापस कर खोरठा भाषियों से माफ़ी मांगेगी?

आकाश खूंटी ने कहा…

साझी विरासत पुस्तिका सीरिज-28, लोकगीत-झारखंड खोरठा.सम्पादक-फैसल अनुराग.प्रकाशन बर्ष -अप्रैल 2008. प्रकाशक- आई.एस.डी.

पुस्तक दोषपूर्ण इसलिए है की इसमें लोकगीत के नाम पर शिष्ट रचनाकारों के पूर्व प्रकाशित एवं प्रशारित रचनाओं को लोकगीत के नाम पर छाप दिया गया है. संकलन करता काल्पनिक है. मैं इस पुस्तक में प्रकाशित शिष्ट रचनाओं, रचनाकारों एवं पूर्व प्रकाशन का विवरण प्रस्तुत करने को तैयार हूँ. एक सम्मानीय संस्थान के बैनर में इस तरह की घटिया हरकत का पर्दाफास होना ही चाहिए.

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