बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 21 मई 2013

कारखानों की प्यास बुझाते सूख गयीं जलथल नदियाँ














रश्‍मि शर्मा की क़लम से 


संदर्भ झारखंड उर्फ़ गाँव की गलियाँ 


नदि‍यां जीवनदायि‍नी हैं। हमारे अस्‍ति‍त्‍व की पहचान भी। सरकार कभी नदि‍यों को जोड़ने के फि‍राक में रहती है तो कभी बांटने के। नदि‍यों के बारे में मैं हाल का एक अपना नि‍जी अनुभव आप सबों को बताना चाहूंगी। परीक्षा के बाद हुई बच्‍चों की छ़ुटटि‍यां में मैं उन्‍हें अपने गांव लेकर गई....इस वादे के साथ कि‍ इस बार उन्‍हें अपने गांव की उस नदी में नहाने दूंगी, जि‍समें बचपन में मैं नहाया करती थी और उससे जुड़े सैकड़ों कि‍स्‍से उन्‍हें सुनाती थी। बच्‍चे उत्‍साहि‍त थे कि‍ कम से कम इस बार तो उन्‍हें गांव में नहाने का मौका मि‍लेगा। वादे के मुताबि‍क गांव पहुंचने के बाद मैं उन्‍हें अगले ही दि‍न नदी पर ले गई। यह क्‍या........जि‍स नदी से जुड़े अंतहीन कि‍स्‍से मेरी जेहन में कुलबुलाया करते थे...उसका तो कहीं अस्‍ति‍त्‍व ही नहीं बचा। मेरे गांव में फूलों से भरे-भरे पेड़ों के बीच छोटी-पतली सी, रम्‍य और साफ नदी बहती थी, जि‍से हम दोमुहानी नदी के नाम से जानते थे...उसका वजूद ही खत्‍म हो गया। उस नदी को बांध दि‍या गया है। और ऐसा बांधा गया कि‍  नदी अब नदी न लगकर ठहरे पानी की तरह हो गया था। जहां कलकल बहती साफ-स्‍वच्‍छ पानी  हुआ करता था....वह इतना गंदा नजर आ रहा था कि‍ मैंने बच्‍चों को उसे छूने की इजाजत भी नहीं दी। वह नदी जि‍सके पानी में मैं बचपन में घंटों छपाछप करती थी....खो गई।

बच्‍चे कहने लगे.....यही वो नदी है न मां..जहां तुम नहाया करती थी अपनी सहेलि‍यों के साथ....और छोटी-छोटी मछलि‍यां भी पकड़ा करती थी। कहां है कोई मछली...और छि:..इतने गंदे पानी से नहाती थी तुम...मैं नि‍रूतर हो गई। बड़ी मुश्‍कि‍ल से बच्‍चों को यकीन दि‍लाया कि.....हां ये वही नदी है, जि‍समें मैं तैरा करती थी....शाम को सखि‍यों संग ठंढी हवा का आनंद लेने के लि‍ए इसके कि‍नारे बैठा करती थी। अब तो...सब खत्‍म हो गया। बस उसका कि‍नारा वही है....जहां हम स्‍वच्‍छ हवा का आनंद ले सकते हैं क्‍योंकि‍ गांव का वातावरण उतना दूषि‍त नहीं हुआ है।
वाकई बहुत मलाल हुआ.....लगा..बचपन की खूबसूरत अनुभवों की कड़ी से एक कड़ी खत्‍म हो गई। उसे आज से जोड़कर देख पाना मुश्‍कि‍ल है। ऐसा नहीं कि‍ यह मेरे गांव के नदी की बात है। अब तो झारखंड की सभी नदि‍यां जहरीली होती जा रही है। स्वर्णरेखा, दामोदर, बराकर, करकरी, कोयल,अजय, कनहर, शंख  जैसी नदियां मृत होने की राह पर हैं। गर्मियों में तो यहां का पानी सूखने लगा है। लोग त्राहि‍माम करने लगते हैं। कई मील दूर जाकर पानी ढो कर लाना पड़ता है।  ऊपर से स्टील, पावर प्लांट और अन्य कारखानों की गंदगी को नदियों में छोड़ा जा रहा है। फलतः राज्य की सभी नदियां मृतप्राय होने पर हैं। नदियों के किनारे बालू निकालने के कारोबार ने तो नदियों की हालत और भी खराब कर दी है। लोग अंधाधुंध नदि‍यों को दोहन कर रहे हैं। कोई मात्रा तय नहीं कि‍ कि‍स नदी के कि‍नारे से कि‍तनी बालू ि‍नकाली जाए। फलस्‍वरूप नदि‍यां कटतीं जा रही है। जब पानी को रोककर, अपने अंदर समेटकर रखने वाले बालू ही नहीं बच रहे तो पानी का संचय कैसे होगा। उपर से जंगल का अस्‍ति‍त्‍व भी खतरे में हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। यहां तक ि‍क फोरलेन के नाम पर  अब तक प्राप्त सूचना के अनुसार 80,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं। और कभी कटेंगे। बदले में पौधों का रोपण भी नहीं कि‍या जा रहा। बारि‍श के पानी के संचय की भी व्‍यवस्‍था सरकार नहीं कर पाई है अब तक।

 नदि‍यों में इतना प्रदूषण है कि‍ जि‍न नदि‍यों से पहले लोग पीने का पानी भी लाते थे.....अब नहाना भी कठि‍न हो गया है। और इसके कारण केवल हम है...हमारा स्‍वार्थ है। हमने नदि‍यों का उपयोग, उपभोग तो पूरा कि‍या..मगर न तो स्‍वच्‍छता का ख्‍याल रखा और न ही प्रदूषि‍त करने वाले हाथों को रोका। नदि‍यों में हर तरह के कूड़े-कचरे फेके जाते हैं। यहां तक कि‍ हम हिंदू लोग पूजा की वस्‍तुओं को भी नदी में प्रवाहि‍त करते हैं। यह भी तो गंदगी का ही रूप है। कल-कारखानों का कचरा सीधे नदी में गि‍रता है। 

जमशेदपुर इलाके के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत सीतारामपुर बांध भी मिल के बिना उपचारित जल के बांध में जाने से प्रदूषित होता जा रहा है। झारखंड की उषा मार्टिन की स्टील निर्माण इकाई से फैलते प्रदूषण ने न केवल आसपास के निवासियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है बल्कि समीपवर्ती कृषि भूमि को भी बंजर बना दिया है। उपर से कई जगह तो नदी के कि‍नारे ही बसेरा बनाकर उनका अस्‍ति‍त्‍व खत्‍म कि‍या जा रहा है। झारखंड की प्रमुख नदि‍यों...दामोदर और स्‍वर्णरेखा समेत छोटे-बड़े सभी तरह के नदी-नाले जहरीले हो गए हैं। उनमें आक्‍सीजन का स्‍तर शून्‍य हो चुका है।  फलत: जलजीवों का अस्‍ति‍त्‍व भी संकट में है। यहां तक कि‍ मछलि‍यां भी जहरीली हो रही हैं। इससे अप्रत्‍यक्ष रूप से मछुआरों की जीवि‍का पर भी असर पड़ रहा है और इसका सेवन काने वाले लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी। नदि‍यां भी अतिक्रमि‍त हो रही हैं। उन्‍हें कूड़ा-कचरा डालकर भरा जा रहा है। ऐसे तो कुछ वर्षों पश्‍चात उनकी पहचान ही गुम हो जाएगी। हालांकि‍ नदि‍यों को बचाने के लि‍ए स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयास चल रहे हैं। मगर ये नाकाफी हैं। सरकार को और गंभीरता से इस पर वि‍चार करना चाहिए। झारखंड सरकार की प्रस्‍तावित जल नीति‍ में नदि‍यों के जल के इसतेमाल को लेकर मानक तय कि‍ए गए हैं। परंतु इसका सख्‍ती से अनुपालन नहीं कि‍या गया तो कोई खास परि‍णाम और सुधार  नजर नहीं आएंगे। और नदि‍यां इसी तरह मैली..जहरीली होती गई तो मानव अस्‍ति‍त्‍व को भी संकट में डाल सकती है।

ज्ञात रहे कि‍ नदि‍यां ही सभ्‍यता की पहचान होती है। इसलि‍ए हमारा दायि‍त्‍व है कि‍ हम नदि‍यों को प्रदूषि‍त होने से बचाएं। कारखानों के
कचरे के नि‍स्‍तारण के अन्‍य उपाय कि‍ए जाए न कि‍ उन्‍हें नदि‍यों में प्रवाहि‍त कि‍या जाए। जल संरक्षण कि‍या जाए। भूजल क्षरण और वनों की कटाई को रोकने का त्‍वरि‍त उपाय हो। ताकि‍ नदि‍यों का अस्‍ति‍त्‍व बरकरार और और आने वाली पीढ़ी सभी नदि‍यों का नाम सि‍र्फ पाठयपुस्‍तको में न देखे......वरन मौका मि‍लने पर उन्‍हें अपने आंखों से भी देखे।


(परिचय:
जन्म:2 अप्रैल, मेहसी थाना, मोतीहारी, बि‍हार में 

शिक्षा रांची वीमेंस कॉलेज से स्नातक, इतिहास में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में स्नातक उपाधि  

लेखन की शुरूआत छात्र जीवन से ही। पत्रकारि‍ता  की तरफ रूझान स्‍नातक के दौरान । यह यात्रा प्रभात खबर से शुरू होते हुए कई पत्र-पत्रि‍काओं तक पहुंची डेढ़  दशक के दौरान नौकरी भी और स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता भी। साहि‍त्‍यि‍क पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों के लि‍ए लि‍खने-पढ़ने का सि‍लसि‍ला जारी ,अध्‍ययन और शोध में संलग्‍न। साथ ही इसी बीच रेडि‍यो व दूरदर्शन में सक्रि‍य भागेदारी, अति‍थि एवं उद़घोषि‍का दोनों रूपों में। 

सृजन: कवि‍ता संग आलेख का प्रकाशन देश के वि‍भि‍न्‍न अखबारों और पत्रि‍काओं  में।  समय-समय पर कवि‍ताओं का प्रसारण 
संप्रति:स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन कार्य 
ब्लॉगजनवरी 2008 में रूप-अरूप  नाम से शुरू कि‍या 
संपर्कrashmiarashmi@gmail.com  ) 




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4 comments: on "कारखानों की प्यास बुझाते सूख गयीं जलथल नदियाँ "

शालिनी कौशिक ने कहा…

aaj paryavaran is disha me hi ja raha hai aur iske uttardayi ham hain jo apne swarth me inhe mita rahe hain .विचारणीय प्रस्तुति.सार्थक जानकारी हेतु आभार . .आभार . बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा ] साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3महिलाओं के लिए अनोखी शुरुआत आज ही जुड़ेंWOMAN ABOUT MAN

kshama ने कहा…

Ham hamare paryawaranko bhoolte chale ja rahe hain.....doorandeshi rahi hai.....mere blogpe zaroor aaye aur mer galtika ehsaas dilayen!

Sanjay Tripathi ने कहा…

जागना आवश्यक है अन्यथा ऐसा न हो कि हम अपने वजूद का आधार इन जीवनदायिनी सरित माँओं को खो बैठें और अपना अस्तित्व ही समाप्त कर लें.

Ratan singh shekhawat ने कहा…

कई नदियों को कारखाने पूरी तरह निकल गये और नदियाँ कारखानों से निकले अपशिष्ट पदार्थो का नाला मात्र बन गयी !! जो जीवन की जगह रोग बाँट रही है !!

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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