बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 13 मई 2013

ज्यों मिली आह, वैसे 'वाह' मिले












धीरेन्द्र सिंह की क़लम से 



मेरी बात की बात कुछ भी नहीं है
कहूँ क्या सवालात कुछ भी नहीं है

तुम्हारी नज़र में ये दुनिया है सब कुछ
हमारे ये हालात कुछ भी नहीं है?

गमे- ज़िन्दगी में अगर तुम जो हो तो
सितारों की सौगात कुछ भी नहीं है

ख़ुशी हो कि गम हो यहाँ एक ही सब
लिखूं क्या ख़यालात कुछ भी नहीं है

सदा खिस्त जैसे हो तुम पेश आये
दिलों के ये जज़्बात कुछ भी नहीं है

कहें भी तो क्या क्या कि क्या हार आये
मिली है जो ये मात कुछ भी नहीं है

गमे- हिज्र इक ज़िन्दगी भर जिया है
जुदाई की ये रात कुछ भी नहीं है


2

सुना है बहुत ये कि मशहूर हो तुम
हो मशहूर तब ही तो मगरूर हो तुम
नहीं आये फिर तुम बुलाने पे मिलने
वही फिर वजह है कि मजबूर हो तुम

मिरे पास आओ ठहर जाओ कुछ पल
बहुत दिन हुए कि बहुत दूर हो तुम

कभी चाँद जैसी कभी फूल जैसी
बहुत ख़ूबसूरत कोई हूर हो तुम

भले दिल भी टूटे भले जां भी जाए
हो कुछ भी, मुझे फिर भी मंजूर हो तुम

3

धीरे- धीरे हो रहा बर्बाद सब कुछ ऐ ख़ुदा.
आ रहा है हमको अब तो याद सब कुछ ऐ ख़ुदा
.
याद पंछी को नहीं है घोसले वाला शजर,
भूल बैठा शाम के वो बाद सब कुछ ऐ ख़ुदा.

मैं कहूँ की, तुम कहोगे मामला- ऐ- बेख़ुदी,
मेरे मरने पर हुआ आबाद सब कुछ ऐ ख़ुदा

अब तो अपनों को भी अपने भूलते से जा रहे,
हो गया है बे- तरह आज़ाद सब कुछ ऐ ख़ुदा.

आजकल के शायरों से क्या कोई उम्मीद हो?
हो गयी जिनके लिए 'दाद' सब कुछ ऐ ख़ुदा.

4

जरा सी बात हो जाए तो शायद दिल बहल जाए
है मुमकिन कि  हों बातें और ये मौसम बदल जाए

बहुत बेहाल हैं हम अब, तुम्ही बतलाओ कुछ ग़ालिब
तुम्हें पढ़ ले तो हो शायद, ये शायर कुछ संभल जाए

नशे भी अब मुसीबत मारने का दम नहीं रखते
कोई तरक़ीब है जिससे कि मेरा दम निकल जाए?

तुम्हारी बात भी कुछ- कुछ मिज़ाजे- वक़्त जैसी है
कब आये, और कब आकर रुके, ठहरे, निकल जाए

सभी हो जाएँ गर अंधे कहो क्या ख़ूब हो जाये
खरे सिक्कों में मिल जाए तो ये खोटा भी चल जाए

5

कम से कम अब तो कोई राह मिले.
ज्यों मिली आह, वैसे 'वाह' मिले.

हर ख़ता की उसे सज़ा दूंगा,
उसको पकडूँगा बस गवाह मिले.

कुछ नही ना सही मगर उससे,
मशविरा और कुछ सलाह मिले
.
मैं भी बह लूँगा बर्फ़ की तरह,
उसकी बाहों में जब पनाह मिले.

उजली रंगत पे रंग तेरे चढ़े,
आरज़ू और थोड़ी चाह मिले.


(परिचय:

जन्म:  १० जुलाई १९८७ को क़स्बा चंदला, जिला छतरपुर (मध्य प्रदेश) में

शिक्षा: इंजीयरिंग की पढाई  अधूरी
सृजन: 'स्पंदन', कविता_संग्रह '  और अमेरिका के एक प्रकाशन  'पब्लिश अमेरिका' से  प्रकाशित उपन्यास 'वुंडेड मुंबई' जो काफी चर्चित हुआ।

शीघ्र प्रकाश्य: कविता_संग्रह  'रूहानी' और अंग्रेजी में उपन्यास   'नीडलेस नाइट्स'
सम्प्रति: प्रबंध निदेशक, इन्वेलप  ग्रुप
संपर्क: dheerendrasingh@live.com, यहाँ- वहाँ भी )



  

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2 comments: on "ज्यों मिली आह, वैसे 'वाह' मिले"

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत ही उम्‍दा गजल हैं...बधाई

DR. PAWAN K. MISHRA ने कहा…

वाह वाह वाह वाह

लेकिन असली वाह आह के बाद ही मिलता है.

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