बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 24 जून 2012

क़लम की मजदूरी करने वाला निपनिया का किसान उर्फ़ अरुण प्रकाश



हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया....







 




















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

सितम्बर की कोई तारीख. साल २००८.रायपुर को मैं अलविदा कर चुका था. देशबंधु के प्रबंधन से ऊब थी, वहीँ दिल्ली आकर कुछ अलग कर गुजरने का ज्वार रह-रह कर उबल रहा था. 'भासा' के राजेश व उसके साथियो की तरह दिल्ली अपन भी फतह करना चाहते थे. दोपहर ढल आई थी. पंडित जी (कथादेश के संपादक हरिनारायण जी) कनाट प्लेस के दफ्तर गए थे. उनके एक अफसर मित्र की पत्नी ज्योतिष की पत्रिका निकालती थीं. जिसका दफ्तर एक बड़ी इमारत में था. वहीँ कथादेश को एक कोना नसीब हो गया था. दोपहर बाद पंडित जी वहीँ चले जाते. पन्त जी (लक्ष्मी प्रसाद पन्त , सम्प्रति भास्कर जयपुर में सम्पादक) ने कथादेश को बाय कर दिया था. विश्वनाथ त्रिपाठी की बदौलत मार्फ़त विष्णु चन्द्र शर्मा  जी उनकी जगह मैंने ले ली थी. खैर! दस्तक हुई दरवाज़े पर!  दिलशाद गार्डेन का सूना पहर. मैंने झांकर देखा. लहीम शहीम एक शख्स  बाहर खडा है. सरों पर हलकी सुफैदी ..बदन पर लंबा सा कुर्ता और पाजामा. भदेस सज्जन जान मैंने दरवाज़ा खोला. नमस्कार किया. शाइस्तगी  से लबरेज़ जवाब पाकर मेरी झुर-झुरी कम हुई.
आप नए आये हैं..
जी.....
कहाँ के हैं...
बिहार..
वहाँ कहाँ के..
..गया.
..अरे वाह! मैं बेगुसराय का एक किसान हूँ. कलम की मजदूरी करता हूँ.
 इस मासूमियत पर कौन न मर मिटे! हिचकते हुए नाम पूछ बैठा...अरुण प्रकाश! सुनते ही मैं खिल उठा. उनकी कुछ कहानियां,  उन जैसे ही किरदारों का कोलाज़ झिलमिलाने लगा. इस अनूठे लेखक से यह हमारा पहला साबका था. बाद में लोगों से उनके आत्मकेंद्रित रहने, बहुत कम खुलने.. की बात मैं आज तक नहीं हज़म कर पाया..उनकी अपनी सी लगती कहानियों का मैं दीवाना तो पहले से ही था. पहली मुलाक़ात ने लव इन फर्स्ट साईट सा जादुई असर किया था. जिसका यथार्थ मेरे लिए कभी कटु न रहा.

पहले अरुण जी, फिर भाई साहब उन्हें कहने लगा.वो कब मेरे भैया बन गए मुझे पता ही न चला. दिल्ली के इस दूसरे प्रवास में करीब दस बारह सालों तक कंक्रीट के जंगलों में मुझे बेतहाशा गुज़ारने पड़े. कभी कहीं ठौर मिली. कहीं चाँद गोद में भी आया. इस अवधि में अरुण जी से मिलना कई बार हुआ. महेश दर्पण जी के बाद मैंने उन्हें सबसे ज्यादा श्रम करते देखा. मुझे लगता है कि वह संभवत चार से पांच घंटे ही विश्राम ले पाते होंगे. सुबह उठ कर टहलने निकल जाते. इस प्रात:भ्रमण में उनके साथ रहते विश्वनाथ त्रिपाठी जी. युवा व्यंग्यकार रवींद्र पाण्डेय, उन्हीं की तरह दूसरे मसिजीवी रमेश आज़ाद आदि. सूरज के ज़रा परदे से निकल आते ही उनका घर आना होता. फिर हलके नाश्ते के बाद जो अपनी स्टडी( तब बालकोनी को ही घेर कर उन्होंने अपना अध्ययन कक्ष बना लिया था) में जाते. फिर लिखना,  लिखना और लिखना. कागजों पर जो उतरता जाता. उसमें किसी अहम किताब का अनुवाद होता. किसी सीरयल की पटकथा होती. संवाद होता..या नई कहानी का पुनर्लेखन.

ग़ज़ल का तगज्जुल

ग़ज़ल गो रामनारायण स्वामी( तब वो अन्क़ा नहीं हुए थे) के पहले ग़ज़ल संग्रह रौशनी की धुंध की चर्चा के लिए सादतपुर में महफ़िल जमी.  वीरेंद्र जी (जैन) के यहाँ हुई उस दोपहरी गोष्ठी में  स्वामी जी की गजलों पर आधार आलेख मैंने ही पढ़ा. सादतपुर के लेखकों के अलावा अरूण जी, जानकी प्रसाद जी, इंडिया टुडे वाले अशोक जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद, कुबेर जी आदि ढेरों लोग थे. लेकिन अरुण जी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा, ग़ज़ल पर यदि शहरोज़ जी न कहते तो उसकी तगज्जुल न रहती. या खुदा! इतने बड़े बड़े दक्काक के रहते इन्हें क्या हुआ..जबकि हिंदी समाज में उर्दू के प्रमाणिक शख्स जानकी जी मौजूद हैं. अरूण जी ने जिस सहजता से मेरी बातों को सराहा, असहमति भी जतलाई. ऐसे लोग मुझे दिल्ली में कम ही मिले. बमुश्किल दो-चार नाम ऐसे स्मरण में हैं. सर्दी की एक दोपहर हम सभी कृषक जी की छत पर जमा हुए. यहाँ भी दिलशाद से अरूण जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद पहुंचे.  मेरी 'अकाल और बच्ची' कविता उन्होंने दो बार सुनी. इस कविता में अकाल के इलाके से रोज़गार की तलाश में परिवार दिल्ली आया है. उस परिवार की बच्ची के बचपन को मैंने शब्द देने की कोशिश  की है. ये अकारण नहीं हुआ होगा. दिल्ली हो, कोलकता या मुंबई उनके साथ उनका गाँव निपनिया हर दम साथ रहा. उनकी कहानियों में भी यह ज़मीनी सोंधापन मिलता है. हिंदी में ऐसे कथाकार आज़ादी के बाद कम हुए,  जिन्होंने हाशिये के लोगों को अपना केंद्र बनाया हो. उनकी अधिकाँश कथाओं में घर से बेघर नयी जगह में आसरा तलाश करते लोगों की ज़िंदगी को उन्वान मिला है. भैया एक्सप्रेस हो, या मझदार,विषम राग हो या नहान, भासा आदि कहानियां गौरतलब हैं.

शेरघाटी पर उपन्यास लिखो
कथादेश के पहले युवांक में मेरी पहली कहानी 'पेंडोलम' छपी. मैं राजकमल में था. उनका फोन आया.
यार! कहानी भी लिखते हो..बताया ही नहीं कभी! 
जी..भैया ..
दूसरी लिखो तो बताना. यूँ इस कहानी को विस्तार दो. आप (तुम कहते कहते वो आप बोल जाते..) अपने घर- कस्बे शेरघाटी को केंद्र में रख कर एक उपन्यास प्लान कीजिये. मुस्लिम जीवन अब हिन्दी में न के बराबर आ रहे हैं. आपसे उम्मीदें हैं.
जी! कोशिश करूँगा..
लेकिन ग़म-ए-रोज़गार ने इतनी मोहलत ही न दी कि मैं उपन्यास कलम बंद करता. यूँ उन्होंने एक-दो बार याद भी कराया, 'शहरोज़ जी क्या हुआ..कुछ बात बनी.' मेरे नफी में सर हिलाने पर थोडा तुनक भी जाते..'पहचान सिर्फ एक कहानी से नहीं बनती..'

गया गया मिल गया
प्रेमचंद जी की जयन्ती पर हंस द्वारा सामयिक विषय पर कई सालों से गंभीर विमर्श का आयोजन होता आया है. राजेन्द्र जी जिसके कर्ताधर्ता हों, उस मजमे में भीड़ न जुटे. मैं उन दिनों रमणिका जी की पत्रिका युद्धरत आम आदमी से जुड़ा हुआ था. वहाँ से निकलते निकलते थोड़ा विलम्ब हो गया. जैसे ही राजेन्द्र भवन पहुंचा. संजय सहाय पर नज़र पडी तो मैं उधर ही लपक गया. उन्होंने दोनों हाथ फैला दिए. और हम यूँ मिले जैसे बिछुड़े हुए हों. मुद्दत बाद मिलना भी हो रहा था.
'गया गया मिल गया!' जानी पहचानी आवाज़ से हम अलग हुए. अरुण जी पास मुस्कुरा रहे थे. उनकी यही मुस्कान दूसरों की ज़िंदगी बख्शती रही. उनकी जीवटता से हम उर्जस्वित होते रहे. बाद में उनसे बहुत कम मिलना हुआ. दिनों बाद फोन पर बात हुई. लेकिन उन्होंने एहसास ही न होने दिया की वो बेहद अस्वस्थ हैं. जबकि गौरीनाथ से उनकी दिनों दिन बदतर होती तबियत का मुझे इल्म हो गया था.आज ढेरों कह रहे हैं कि काश  सिगरेट छूट जाती तो शायद उनकी उम्र ....



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सोमवार, 18 जून 2012

....... तो गायक होते सुरजीत पातर


 
 
 
 
 
 
 
सुरजीत पातर मार्फ़त ऋतु कलसी 



पाश के बाद पंजाबी कवि सुरजीत पातर सबसे ज्यादा पढ़े गए हैं. उनके लबो लहजे की ताजगी दायम है आज भी. जालंधर, पंजाब के एक गांव में १४ जनवरी 1944 को उनका जन्म हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ है। कविताओं की उनकी  दर्जनों किताबें हैं .साफगोई और बेबाकी के लिए मशहूर पातर की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। पद्मश्री  के अलावा देस-दुनिया के कई सम्मानों से  उन्हें नवाज़ा जा चुका है.अँधेरे में सुलगती वर्णमाला के लिए 1993 का साहित्य अकादमी और २००९ में लफ़्ज़ों की दरगाह के लिए सरस्वती  सम्मान से वे समादृत हुए. युवा पत्रकार संजीव माथुर से एक संवाद  में उन्होंने  कहा  था : मैं कवि नहीं होता तो गायक होता.उन्हीं की बातें उन्हीं से जानिये:
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण किया। एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है.मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओ तो दुख छोटे पड़ जाएंगे। मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है :
मुझमें से नेहरू भी बोलता है, माओ भी
कृष्ण भी बोलता है, कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।

सुरजीत पातर की दो कविता

मेरे शब्दों

मेरे शब्दों
चलो छुट्टी करो, घर जाओ
शब्दकोशों में लौट जाओ

नारों में
भाषणों में
या बयानों मे मिलकर
जाओ, कर लो लीडरी की नौकरी

गर अभी भी बची है कोई नमी
तो माँओं , बहनों व बेटियों के
क्रन्दनों में मिलकर
उनके नयनों में डूबकर
जाओ खुदकुशी कर लो
गर बहुत ही तंग हो
तो और पीछे लौट जाओ
फिर से चीखें, चिंघाड़ें ललकारें बनो

वह जो मैंने एक दिन आपसे कहा था
हम लोग हर अँधेरी गली में
दीपकों की पंक्ति की तरह जगेंगे
हम लोग राहियों के सिरों पर
उड़ती शाखा की तरह रहेंगे
लोरियों में जुड़ेंगे

गीत बन कर मेलों की ओर चलेंगे
दियों की फोज बनकर
रात के वक्त लौटेंगे
तब मुझे क्या पता था
आँसू की धार से
तेज तलवार होगी

तब मुझे क्या पता था
कहने वाले
सुनने वाले
इस तरह पथराएँगे
शब्द निरर्थक से हो जाएँगे

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एक नदी

एक नदी आई
ऋषि के पास
दिशा माँगने

उस नदी को ऋषि की
प्यास ने पी लिया
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पंजाबी की चर्चित युवा कहानीकार ऋतु कलसी पिछले लगभग दस साल से विभिन्न समाचार पत्रों के लिए फ्रीलांसिंग कर रही हैं.आपका संक्षिप्त परिचय है:

शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:
पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य 
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से
युवाओं की पत्रिका ‘जी-नैक्स’  का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
संपर्क:


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रविवार, 10 जून 2012

आओ तनिक नाटक से प्रेम करें

ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा






 
















विभा रानी
सैयद शहरोज़ कमर से संवाद

लेखक किसी किरदार को जीता है..उसे किसी चित्रकार सा कागज़ ए कैनवास पर उतारता है..लेकिन लेखक ही उस किरदार को अपने अभिनय में डूबती आँखों जीवंत कर दे ...कली सी मुस्कान दे..पहली बारिश सा भिगो दे..प्राय:ऐसे रचनाकार इतिहास में मिलते हैं.लेकिन हिंदी व मैथिली में स्थापित विभा रानी ऐसी ही नाट्यकर्मी और लेखक हैं. एकपात्रीय नाटकों को उन्होंने नई ज़िंदगी अता की है. संजीव कुमार को तो वक्फा मिलता होगा ..कई रीटेक हुआ होगा..लेकिन एक ही मंच पर समानांतर बच्चा, युवा और बुज़ुर्ग की अदायगी.आप विभा के अभिनय को देख कर उंगली दबा लेंगे दांतों में...झारखंडी साहित्य संस्कृति अखडा की दावत पर ६ जून को उन्होंने रांची में बुच्ची दाई का मंचन किया. दूसरी दोपहर अखडा के दफ्तर में उनसे मिलना होता है..बिना किसी औपचारिकता के बात तरतीब पर आती है. आइये उनसे बतियाते हैं.

रंगमंच की शुरुआत
स्कूली दिनों से ही। तब पांचवी या छठवीं में रही होगी। मां स्कूल हेडमास्टर थीं। सन 1969 में महात्मा गांधी की सौवी जयंती मनाई जा रही थी। स्कूल में हो रहे नाटक में मैं हिस्सा लेना चाहती थी। मां ने मना कर दिया। आखिर मेरी जिद के आगे वह मान गईं। जब मैं एक सिपाही की भूमिका में मंच पर आई, तो अपना संवाद ही भूल गई।  मां ने पीछे से कहा, तो हड़बड़ी में अपना डॉयलाग बोल पाई। तब एकांत और और भीड़ में बोलने का अंतर समझ में आया। दर्शकों का सामना इतना आसान नहीं, जितना अपन समझते थे। इस सीख के बल पर इंटर में दस लड़कियों के साथ कई कार्यक्रम किया। जब एमए में आई। दरभंगा रेडियो के लिए कई नाटक किया। कई कार्यक्रम किये। बड़े मंच पर सन 1986 में पहली बार राजाराम मोहन पुस्तकालय, कोलकाता में नाटक का मंचन किया। शिवमूर्ति की कहानी कसाईबाड़ा का यह नाट्य रूपांतर था। खूब पसंद किया लोगों ने। उसके अगले ही वर्ष 1987 में मशहूर नाटककार एमएस विकल के दिल्ली नाट्योत्सव में हिस्सा लिया। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवा, पोस्टर, कसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म चिट्ठी में काम किया। फिर एक्टिव रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007 में पुन: एक्टिव थिएटर में आई। मुंबई में मिस्टर जिन्ना नाटक किया। इसमें फातिमा जिन्ना की भूमिका निभाई।

एकपात्रीय नाटक की ओर झुकाव
मुंबई में नाटकों के कई रंग हैं। ज्यादातर कमर्शियल नाटक होते हैं वहां। उसमें कंटेंट नहीं होता। कुछ फिल्मी नाम होते हैं। टिकट बिक जाती है। एकपात्रीय नाटक भी हो रहे हैं, लेकिन अच्छे नहीं। मेनस्ट्रीम में नहीं हैं। मैं इंटर में सबसे पहेल एकपात्रीय नाटक कर चुकी थी। उसकी कहानी एक ऐसी लड़की की थी, जो शादी में अपने घारवालों से दहेज की मांग करती है। मुंबई में मैंने इसे आंदोलन के रूप में शुरू किया। लाइफ ए नॉट अ ड्रीम। यह मेरा पहला मोनो प्ले था। फिनलैंड में इसे करना था। अंग्रेजी में लिखा और वहीं 2007 में अंग्रेजी में मंचन किया। मुंबई में भी चार शो इसके अंग्रेजी में ही किए। हिंदी में इसे रायपुर के फेस्ट में 2008 में किया। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा। मुंबई के काला घोड़ा कला मंच के लिए हर साल एक मोनो प्ले कर रही हूं। बालिका भ्रूण हत्या पर 2009 में बालचंदा, 2010 में बिंब-प्रतिबिंब, 2011 में मैं कृष्णा कृष्ण की और इस वर्ष रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी पर आधारित भिखारिन का मंचन किया।

रंगमंच की मौजूदा स्थिति
गांव, कस्बे और शहरों में भी लोग सक्रिय हैं। अपने अपने स्तर से रंगमंच कर रहे हैं। आप ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा है। यह स्थिति संतुष्ट करती है। हां! यह जरूर कह सकते हैं कि रंगमंच को वैसी स्वीकृति अभी नहीं मिली, जैसी और देशों में है। थिएटर को प्रश्रय नहीं दिया जाता है। उसे प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। कई सुविधाएं मिलती भी हैं, तो इसका लाभ महज बड़ लोग ही उठा पाते हैं।

कैदियों के बीच
कई ऐसे कैदी हैं। जिन पर आरोप साबित नहीं हुआ है। वे जेल में बंद इसलिए हैं कि कोई उनका केस लडऩे वाला नहीं होता। कई महिलाएं हैं अपने छोटे बच्चों के साथ। मेंने 2003 से उनके बीच काम करना शुरू किया। बेहद सकारात्मक असर मिला। उनके बीच साहित्य, कला और रंगमंच की बातें की। उन्हीं के साथ मिलकर नाटक किए। उनसे कहानी कविता लिखवाई। पेंटिग्स करवाई। मुंबई के कल्याण, थाणे, भायखला और पुणे के यरवदा आदि जेलों में वर्कशाप भी किया। बहुत अच्छा अनुभव मिला।

सामाजिक बदलाव में रंगमंच
रंगमंच ऐसा टूल है जो व्यक्ति को बदलता है। व्यक्ति समाजिक प्राणी ही है। वह बदलता है, तो समाज में उसका असर होता है। दूसरे लोग भी बदलने का प्रयास करते हैं। यह परिवर्ततन सकारात्मक है, तो स्वाभाविक है, उसका व्यापक असर पड़ता है।

पहला नाटक कब लिखा
सन 1996 97 का सन रहा होगा। दूसरा आदमी, दूसरी औरत। इसका मंचन मुंबई में किया।

संतोष कहां, साहित्य या रंगमंच ?
दोनों का सुख अलग है। लेकिन सच कहूं तो निश्चित ही रंगमंच में मुझे अधिक तसल्ली मिलती है। यहां आप हजारों लोगों से एक ही समय रूबरू होते हैं। अपनी बात पहुंचाते हैं। उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत ही मिल जाती है। इसका सामाजिक प्रभाव पड़ता है।

लेखन पहले मैथिली में या हिंदी में
कहानी हो या नाटक। दोनो भाषाओं में अलग अलग लिखती हूं। बुच्चीदाई पहले मैथिली  में ही लिखा। अंतिका में छपा था। बाद में
इसका हिंदी रूपांतरण नवनीत में प्रकाशित हुआ।

नया नाटक
'आओ तनिक प्रेम करें' लिखा है। इसका मंचन अगस्त में हिसार में करने जा रही हूं। इसकी कहानी दो ऐसे पति पत्नी की है, जिनकी उम्र अब साठ पर पहुंची है। पति को अब सालता आता है कि प्रेम का अनुभव उसे तो हुआ ही नहीं।

नई किताब
'कर्फ्यू में दंगा' नामक कथा संग्रह अभी रेमाधव से छपकर आया है।

यह बातचीत भास्कर के लिए की गयी


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शनिवार, 9 जून 2012

कितना अपना क्रांतिकारी योद्धा बिरसा का अबुआ दिशुम

यूँ उड़तीं धरती आबा के सपनों की किरचियाँ 

फोटो गूगल से साभार





















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

उन्नीसवीं सदी के  अंत में झारखंड के पहाड़ी इलाके में एक  क्रांतिकारी  युवा ने अपने राज का बिगुल फूंक  दिया था। अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जना (अपना राज आ गया, महारानी का राज खत्म हो गया)। उसे अपने वचन पर दृढ़ विश्वास था। सूरज सा भरोसा कि हमारी रोशनी हर अंधकार को दूर कर देगी। उसके  शौर्य,  साहस और संगठन बल उसकी ईमानादारी की तरह ही अटल थे। उसके  जादुई व्यक्तित्व में समूचा इलाका झिलमिलाने लगा। खुशियों में जंगलों में हरियाली छाई। उनकी झरनों सी सांगीतिक  वाणी पर लोग जुड़ते गए। कारवां बढ़ता गया। अंग्रेजी सेना के साथ कई मुकाबले हुए। विदेशी हुक्मरानों के दांत खट्टे हुए। उसे धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। महज 25 साल की उम्र में यह रणबांकुरा रांची जेल में 9 जून 1900 को शहीद हो गया। इस बांके  बहादुर नौजवान का नाम बिरसा मुंडा था। उन्हें धरती आबा यानी भगवान  का दर्जा मिला। लेकिन इस भगवान कहे पर हमने चलना गवारा न किया। उनके ही सपनों को साकार करने के लिए झारखंड बना। लेकिन हम उनकी बातों पर कितना अमल कर पाए। सरसरी दृष्टि भी दी जाए तो परिणाम शून्य ही आता है।

धरती आबा ने कहा था

1. ईली अलोपे नुआ।
(हडिय़ा का नशा मत करो।)
2. सोबेन जीव ओते हसा बीर कंदर सेवाईपे

(जीव जंतु, जल, जंगल, जमीन की सेवा करो।)

3. होयो दु:दुगर हिजुतना रहड़ी को छोपाएपे

(समाज पर मुसीबत आनेवाली है, संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ।)

4. हेंदे रमड़ा केचे केचे, पुंडी रमड़ा केचे

(काले गोरे सभी दुश्मनों की पहचान कर उनका मुकाबला करो।)

शराब के  कारोबार में इजाफा
कहा जाता है कि हडिय़ा का सेवन आदिवासियों में आम है। कुछ लोग इसे उनकी संस्कृति  का एक अंग ही मान बैठे हैं। लेकिन धरती आबा को हडिया़ से बहुत चिढ़ थी। उन्होंने स्पष्ट इसके सेवन की मनाही की । कहा, ईली अलोपे नुआ (हडिय़ा का नशा मत करो)। लेकिन हर गांव, शहर और राजधानी तक में नशा का बाजार लगा है। नए राज्य के बनने के बाद शराब की दुकानों की संख्या सुरसा की भांति बढ़ गईं। हडिया की जगह अंग्रेजी शराब ने ले ली। इसके नतीजे में कई सड़क  हादसे, हत्या, मारपीट और छेड़छाड़ की घटनाएं आम हो गईं।

क्या गीतों में सुनेंगे कोयल की कूक
कौओं और गौरयों का  कलरव अब दुलर्भ हो गया है। कोयल की  कूक भी अब गीतों में सुनी जा सकेगी। ऐसी कल्पना करना कोई कोरी भी नहीं । ऐसा इसलिए कि जंगल ही नहीं रहे। जीव जंतुओं के आशियाने को ही उजाड़ा जा रहा हो, तो वे कहां जाएं। कइयों ने कहीं और ठौर ली। वहीं कुछ घर के बिछोह में दम तोड़ गए। दूसरों के प्राण प्रदूषण ने पखेरु कर दिए। नदियों के सूखने से कई जीव जंतुओं की जान गई। सिर्फ दामोदर और उसके आसपास पनपीं जीव जंतुओं की 100 तरह की प्रजातियां प्रदूषण का ग्रास बन गईं।

सूख रही हैं नदियां, 60 प्रतिशत कंठ प्यासे
इन दिनों दामोदर को बचाने के लिए आंदोलन किये जा रहे हैं। इस नदी का महत्व इसके  नाम से ही सप्ष्ट है। दामुदा का परिवर्तित रूप ही दामोदर है। दामु का अर्थ है पवित्र और दा का जल। लेकिन हम इसकी पवित्रता को कितना बचा पाए। इस नदी में हर रोज 21 लाख घन मीटर जहरीला पानी बहाया जा रहा है। प्रदेश की लगभग सभी नदियां या तो सूख गई हैं या नाले में बदल चुकी हैं। स्वर्ण रेखा, कोयल, कांची, हरमू और दामोदर जैसी नदियां इतिहास भले न बनी हों, लेकिन उस ओर बढ़ अवश्य रही हैं। कई गांवों में लोगों को तीन से चार किमी दूर पानी के लिए चिलचिलाती धूप का सफर करना पड़ता है। महज 40 फीसदी जनता को ही पीने का पानी नसीब है। यह सरकारी आंकड़ा है। दूसरे शब्दों में अपन कह सकते हैं कि 60 प्रतिशत कंठ प्यासे हैं। ऐसा इसलिए कि झरने, नदियों को हम बचा नहीं पाए। उसका अतिरिक्त दोहन किया। अब गला तर करने के लिए चंद बूंद को विवश हैं।

1 हजार हेक्टेयर जंगल सूना, सारंडा में सूरज अब सुबह आता है
सारंडा का मतलब सौ जंगल। लेकिन सौ जंगलों का सारंडा भी अब नाम भर का रह गया है। पहले यहां सूरज की  किरणें दोपहर बाद ही पहुंच पाती थीं। लेकिन अब इसका आगमन सुबह ही हो जाता है। औद्योगिकरण ने भी इसके सुखाड़ बनने में भूमिका निभाई है। सारंडा के 40 प्रतिशत भाग में उत्खनन हो रहा है। दलमा के भकुलाकोचा, भाटिन, लोहरदगा, पलामू, गुमला के ढेरों घने जंगलों में अब पौ जल्दी ही फट जाती है। हाल में ही चुट्टुपाली घाटी से हरे पेड़ गायब हो गए। धरती आबा प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें भान था कि जिंदगी की बहार के लिए हरियाली कितनी महत्व की है। सरकारी सूत्रों को ही माने लें तो 1 हजार हेक्टेयर जंगल का समूल नाश हो चुका है।

65 लाख हो गए जमीन से बेदखल
झारखंड में आदिवासी जमीन बचाने के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 मौजूद है। लेकिन उसके पालन का  हश्र यह है कि अब तक 65.5 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। वहीं 30 लाख ने पलायन किया। जिसमें खनन के  कारण 12.5 लाख, कारखानों के कारण 25.5 लाख, बांध 26.4 और अन्य कारणों से अपनी जमीन से 11 लाख लोग बेघर हुए। 70 प्रतिशत का पुनर्वास नहीं हो सका है। अगर पूर्व शिक्षा मंत्री व विधायक बंधु तिर्की की बात मानें तो सिर्फ राजधानी में ही हर रोज दस लोग अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं। जबकि सरकार हमारी है। जमीन की रक्षा के  कानून हमारे हैं। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की  वार्षिक रिपोर्ट 2004 05 के मुताबिक देश में आदिवासी भूमि अंतरण के मामले झारखंड सबसे आगे है। राज्य में आदिवासी भूमि अंतरण के 1,04, 894 एकड़ जमीन से संबंधित 86, 229 मामले दर्ज किये गए। अभी ऐसे मामले प्रदेश में विशेष रेगयूलेशन एसएलआर कोर्ट में 12739 लंबित हैं।

दैनिक भास्कर, के झारखंड के सभी संस्करणों में ९ जून, २०१२ को प्रकाशित. पेज 13



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