बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

अदब के साथ ग़ज़ल का सलीका .जगजीत से एक गुफ्तगू

मौका मिला तो झारखंड के लिए जरूर गाऊंगा। मुझे तो रांची के लोगों का प्यार यहां खींच लाया। येबातें प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह ने दैनिक भास्कर  के लिए ली गयी  एक खास मुलाकात में कहीं। बश्शास चेहरे पर आई स्मित मुस्कान से सफ़र की थकान गायब थी। जब हमने उनके जवानी के उबाश दिनों को हौले से सहलाया तो उनकी गंभीरता में अनायास ही बालसुलभ मस्तीभरी चुहलता आ टपकी। जालंधर का वह कमरा, उस दौर में खाक हुए सिगरेट के धुएं सा नहीं बल्कि पूरे उजास में याद आता है उन्हें। उन्हें स्वीकारने में गुरेज नहीं कि उनमें मौजूद शायराना और अदबी अंदाज सुदर्शन फाकिर और रविंद्र कालिया के सान्निध्य की देन है। 
‘जग—जीत’ ने का हुनर जगजीत से मिलकर ही जाना जा सकता है। गजल सी नफ़ासत से जब जगजीत मुंबई को याद करते हैं, तो वहां सिर्फ संघर्ष की तपिश ही नहीं, मुहब्बत की आबशारी भी है। पल की खामोशी इस तरह लगती है, मानो चित्रा की आवाज की मिठास को रूह में पेवस्त कर चुभला रहे हों। अमिताभ और जया की फिल्म अभिमान जैसी किसी भी खलिश से वह इंकार करते हैं।

किसी एक पसंदीदा शायर का नाम लेने में परहेज तो किया, लेकिन इस फेहरिस्त में बशीर बद्र, निदा फ़ाÊाली और जावेद अख्तर जैसे नामवर के बाद जगजीत बेहिचक आलोक श्रीवास्तव जैसे नौजवान शायर का जिक्र करते हैं, जिनकी गजलें-नज्में उन्हें अच्छी लगती हैं और उसे आवाज देना इत्मिनान बख्श लगता है। इत्मिनान उन्हें इसका भी है कि हिंदुस्तान में गजल गायकी के उस ट्रेंड की परंपरा बखूबी स्वीकार की गयी, जिसे उन्होंने शुरू किया था। गजल गायकी में बड़े गुलाम अली से हरिहरण तक हुए बदलाव को वक्त की जरूरत बतलाया अवश्य, मगर गजल को फूहड़ संगीत के साथ परोसने वाले से उन्हें कोफ्त है।

जमाना रियलिटी शोज  का है तो गजल भी पीछे क्यों रहे? जगजीत मुस्कुराते हैं। जरूर जनाब। जज बनने को तो तैयार बैठा हूं, कोई बुलाए तो सही। आगे कहते हैं, बस वक्त का इंतजार कीजिए। कुछ लोगों से इस सिलसिले में सार्थक बातें हो रही हैं। इंशाअल्लाह गजल पर रियलिटी शो जल्द देखिएगा।


  भास्कर के रांची संस्करण में २४ अक्टूबर को प्रकाशित

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11 comments: on "अदब के साथ ग़ज़ल का सलीका .जगजीत से एक गुफ्तगू"

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

जगजीत सिंह जी की जादू भरी आवाज़ ने ग़ज़ल गायकी को नए आयाम दिए हैं.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जगजीत सिंह साहब की आवाज़ में ग़ज़ल ............इंसान एक अलग ही एह्सास से
दो चार होता है

shikha varshney ने कहा…

जगजीत सिंह के तो बड़े वाले पंखे ..नहीं नहीं ए सी हैं हम .उनकी आवाज़ का जादू और अंदाज ...क्या कहें.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जब से होश संभाला तब से सुन रहे हैं उन्हें...उनके बाद उनसा कोई और हुआ ही नहीं...कोशिश बहुतों ने की लेकिन उनकी छाया मात्र बन कर रह गए...जग जीतना अगर इतना ही आसान होता तो अब सिर्फ एक ही जगजीत क्यूँ हुआ?

नीरज

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जगजीत सिंह को सुनना स्वयं में एक अनुभव है।

ali ने कहा…

जगजीत सिंह साहब बहुत बडे फनकार हैं ! पर भास्कर समाचार रांची को चित्रा जी की टनटनाती आवाज में मीठापन और फिल्म अभिमान का फंडा कैसे सूझा ?

kshama ने कहा…

Jagjeet aur chitra ne gazal ko aam logon tak pahuncha diya! Ye unheen ka prayaas tha,ki,uchharan kee spasthtaa sunayi detee rahee.

शारदा अरोरा ने कहा…

गूफ्तगू अच्छी लगी ...कहने का ढंग भी अच्छा लगा ..

ALOK KHARE ने कहा…

i like to hear jagjit singh sahib

thnx for sharing

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

जगजीत साहब की आवाज़ सीधे दिल में उतर जाती है

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