बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

इवा का कुनबा यानी मुकम्मल भारत

सैयद एस क़मर की क़लम से

जमशेदपुर से लौटकर



जमशेदजी टाटा ने जब कोल्हान के  इस अनाम सी जगह में इस्पात काररखाने की  बुनियाद डाली तो हिदुस्तान के  कोने- कोने से लोग आये। बंगाली,मराठी,कन्नड़,तेलुगु,मलयाली,मुस्लिम,हिदू,सिख,ईसाई और पारसियों का कुनबा। रंग-बिरंगे फूलों की  चटख दूर तक  महसूस की  जाती थी। बीच में सन 54,79 और 92 में कुछ लोगों ने इस तेवर को  अवरुद्ध करने की  नाकाम कोशिशें की  ज़रूर लेकिन शहर की  गंगा-जमुनी स्प्रिट ने इस कुहासे को  चीर डाला। यह है टाटा शहर। लेकिन शहर में एक  घर ऐसा है,जिस गुलदस्ते में देश -विदेश के कई  खूबसूरत फूल सजे हैं। यहाँ सिर्फ टाटा ही नहीं मुकम्मल भारत बस्ता है। हम बात कर रहे हैं इवा बोयल उर्फ़ इवा शमीम के  कुनबे की ।


किस्सा गंगा-जमनी संस्कृति की  ताबीर का

यह किस्सा सिर्फ इवा का  नहीं है। किस्सा है मोहबबत का । किस्सा है कभी ना मिट सकने वाली गंगा-जमनी तहज़ीब का ,और सदियों पुरानी वसुधव कुटुम्बकम की  ताबीर का । आयरिश वंश की  ईसाई लड़की  पटना में मुंगेर के  रहने वाले एक  मुस्लिम डाक्टर  से दिल हार बैठती है। सातवें दशक की  शुरुआत  है। डॉ. मोहम्मद शमीम अहमद पटना मेडिकल कालेज में थे। इवा विमेंस कालेज में पढ़ती थी। चीन-भारत जंग हो चुकी  थी। लोगों से चंदे इ·ट्ठे किये जा रहे थे। इसी दरम्यान दो दर्दमंद खुशमिजाज की  मुलाकात होती है। और बकौल डॉ शमीम पहली नजऱ में...यानी वह इवा की  मेघा,तीक्ष्नता ,और खूबसूरती के  दीवाने हो जाते हैं। इवा की  कै फियत भी कुछ वैसी ही रहती है। सन 69 में टाटा आकर चर्च में शादी करने के  बाद दोनों निकाह कर लेते हैं।

डॉ शमीम की  बात पर एतबार न करने का  सवाल नहीं उठता। लेकिन तब समाज इतना गलोबल भी न था। इनहें विरोध का  सामना कम करना पड़ा। उनका तर्क  : इवा अहलेकिताब थी (यानी कुरआन  के  मुताबिक  बाइबल,तौरैत ,ज़ुबूर आदि आसमानी किताब के  माने वालों से शादी की  जा सकती है)। उनकी  मामी भी ईसाई थीं। कैथोलिक  परिवार की  इवा की  माँ काग्रेस के  आदि अध्यक्षों में से एक  सी बी बनर्जी के  परिवार से थीं। इवा की  बहन सिलि ने डॉ शमीम के  भाई डॉ नसीम से बयाह रचाया था। पांच बचचों को  जनम देने के  बाद दोनों का  एक  के  बाद एक  देहावसान हो गया। उनके  पांच बचचों के साथ इवा के  घर पर कुल आठ बचचों की  किलकारियां गूंजी। अब सभी पढ़-लिख चुके  हैं। कुनबे की  सद्भाव भरी परंपरा को  परवान चढ़ा रहे हैं।

अतिथी देवो भव: और गुमसुम लड़की

पुरलिया रोड स्थित जब हम उनके  घर पहुंचे। इवा हमें टैरेस  में ही खड़ी मिल गयीं। बिना समय लिए हमने दस्तक  दी थी। बावजूद उनहोंने बेहद गर्मजोशी के  साथ हमारा ख़ैर मकदम किया। भारत यानी अतिथि देवो भव: । ज़ीना चढ़ते हुए हम ग्रॉउंड फ्लोर पर पहुँच चुकु  थे। तेज़ी के  साथ वह आगे बढ़ चुकी  थीं। हम बेधड़क  एक  खुले दरवाज़े से कमरे में दाखिल हुए। एक  बचची के  संकेत पर। दूसरे कमरे से निली टीशर्ट धारी एक  गुमसुम लड़की  ने हमें दूसरे कमरे की  जानिब पहुंचाया। तस्वीर खींचने से पहले उसने चुन्नी ओढ़ ली थी। यह सालिहा है उनकी  छोटी बिटिया। डेंटिस्ट की  पढ़ाई कर  रही है। पति-पत्नी के  एकात के  बीच यही लड़की  सागर की  एक  बूंद है । हलचल संवाद की । इवा काग्रेस की  नेता हैं। चुनावी समर में भी जोर आश्माइश कर चुकी  हैं। खूब बतियाती हैं। अपनी मोहबबत,बचचों की  चुहल,उनके  अफ़साने,पारसियों की एकांतप्रियता। शहर, मुल्क के  समय, इतिहास और सन 64,79 और 92 की  खटास। विषय का  उनके  पास टोटा नहीं रहता।



वसुधैव कुटुंबकम

उनका  ब्रिटिश दामाद इस क्रिसमस पर टाटा आने वाला है। इस कुनबे की  निशात भी अपने पति के  साथ आयेगी। बेटा डॉ शकील ने सिख लड़की  डॉ ऋतू को  सहचरी चुना है। वहीं नियाज़ ने हिन्दू  मराठी लड़की  को संगिनी बनाया। एक  बहु बिहार के  दरभंगे की  है। मुस्लिम है। नितांत निजी इस सामाजिक  फैसले पर कहीं कोई खराश नहीं आयी। हाँ पड़ोसियों की  आँखें ज़रूर तरेरी हुयी दिखीं। पर इसका  असर गुलबुटों से लदबद इस कुनबे पर नहीं पड़ा। जबकि  आज इवा ने हज कर लिया है। बिहार के  एक  मुस्लिम संत की  शिष्या हैं। भारतीय इस्लाम के  बरेली मस्क की  समर्थक  हैं। जबकि  पति डॉ शमीम अहले हदीस के  पास -पास लगे।

परदे का  सवाल

परदे के  सवाल पर डॉ शमीम के  बोलते लब को  इवा ने रोक  दिया। कहने लगीं:हमारे चाहने के  बावजूद बचचे परदे को  नहीं मानते। परदे से इवा का  आशय कुरआन  में वर्णित  परदे से है। बुरका-नकाब से नहीं। नन सही ढंग से पर्दा करती हैं। भारत में भी परदे की  परम्परा रही है। उनहें बदलते समाज के  नए भोंडे फैशन से चिढ है। पाश्चात्य तौर-तरीके  हम भारतीयों के  लिए हर कहीं फिट नहीं हो सकते। बचचों की  आधुनिक जीवन शैली पर उन्होंने  तत्काल हस्तक्षेप करते हुए कहा:उनके  बचचे ड्रिंक  नहीं करते।



दंगा जो अब नासूर नहीं रहा

सन 79 के  दंगे की  स्मृतियाँ उनहें कचोटती ज़रूर हैं, लेकिन यह टीस नासूर सी नहीं है। जबकि  यह पति-पत्नी चश्मदीद रहे हैं। इसी इलाके  में रामनवीं जुलुस के  मार्ग को  ले·र दंगा फूट पड़ा था। उनके  घर पर ही पुलिस की  गोलियों के  शिकार कई लोग पहुंचे थे। जाते कहाँ ? डॉ शमीम का  घर कऱीब भी था और जाना-पहचाना । पांच लोगों ने इनके  कमरे में ही दम तोड़ दिया था। इवा ने कहा, इतना खून पहली और अंतिम बार देखा । उर्दू के  ख्यात प्रगतिशील लेखक  ज़कि  अनवर   साथियों के  साथ पास के  गांधी मैदान में शान्ति  के  लिए धरने पर बैठे थे। अपने ही घर में मार दिए गए। कुछ देर पहले उनहोंने पड़ोसी हिन्दू के   घर की  आग अपने कुए के  पानी से बुझाई थी। उसी कुए में उनकी  लाश कई दिनों बाद मिली। उनका  पोस्ट मार्टम डॉ शमीम ने ही किया। बेहद सहजता से बताते हैं, ज़कि साहब को  गहरी चोट लगी थी। लाठी,भाले और चाकू के निशान मिले थे।



गुमसुम लड़की  हुई मुखर; यह दंगा क्या होता है!

कोक की  चुसकियों  के  बीच जब हम चिप्स चुभला रहे थे कि  नब्ज़  पकडऩे की  कोशिशें हुईं। कभी जब शहर या देश में कहीं किसी संवेदनशील घटना की  आशंका  रहती या नौबत होती-होती, लोग घरों में राशन भर लिया करते थे। लेकिन अब जबकि  बरसों पुराने अयोध्या का  फैसला आने -आने को  है, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। बचचे उसी तरह स्कूल  जा रहे हैं। काम पर जाने से पहले पत्नी उसी तरह उसे टिफिन सौंप रही है। खा लेने की  ताकीद के  साथ। ऐसा नहीं लगता कि  आज की  पीढ़ी के लिए दंगे -फसाद बेमानी हों चुके  हैं। हमलोगों की  बातें सुन रही सालिहा तुरंत मुखर होती है : यह दंगा क्या  होता है?यह पोलिटिकल खेल है। जिसे आज का  यंगस्टर जान और समझ चुका  है। फिजूल कामों के  लिए उसके  पास टाइम नहीं है। उसे पढऩा है। करियर बनाना है। आगे बढ़ना है।

चाहते हैं ज़िंदगी  शायराना

इस कुनबे में कोई शायर नहीं है। पर इनके  सलीके ,अंदाज़,पुरलुत्फ ज़िंदगी के  आदाब यही कहते हैं कि चाहते हैं ज़िंदगी  यह शायराना। न मज़हब की  दीवार, न ही जाति की  चौधराहट, न बोली-बानी की  भिनभिनाहट। अपनी स्वायत्ता में ठेठ डेमोक्रेटिक ।

(यह लेखन अयोध्या फैसले से ठीक एक दिन पहले का है.और भास्कर के  रांची संस्करण के पहले पेज पर फैसले के दिन छपा था  )
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3 comments: on "इवा का कुनबा यानी मुकम्मल भारत"

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति

ali ने कहा…

सही जा रहे हैं ! शुक्रिया !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति है आपकी।

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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