बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 30 अगस्त 2010

हिन्दुत्व की अवधारणा ही आतंकी है










अमलेंदु उपाध्याय  की क़लम से
कांग्रेस के साथ आरंभ से दिक्कत यह रही है कि वह किसी भी मुद्दे पर कोई भी स्टैण्ड चुनावी गुणा भाग लगाकर लेती है और अगर मामला गांधी नेहरू खानदान के खिलाफ न हो तो उसे पलटी मारने में तनिक भी हिचक नहीं होती है। उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर देश में सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतें अपना विस्तार करती रही हैं और कांग्रेस फौरी नुकसान देखकर अहम मसलों पर अपने कदम पीछे हटाती रही है जिसका बड़ा नुकसान अन्तत: देश को उठाना पड़ा है। कुछ ऐसा ही मामला फिलहाल 'भगवा आतंकवाद' के मसले पर हुआ जब राज्य पुलिस महानिदेशकों के एक तीन दिवसीय सम्मेलन में गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने धयान दिलाया कि देश में भगवा आतंकवाद भी है। बस भगवा गिरोह ने जब शोर मचाना शुरू किया तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई और चिदंबरम से उसने अपना पिण्ड छुड़ा लिया। नतीजतन हिन्दुत्ववादी  आतंकवादियों  के हौसले बुलन्द हैं।
     यहां सवाल यह है कि क्या वास्तव में भगवा आतंकवाद जैसा कुछ है? और क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है? जाहिर सी बात है कि समझदार लोगों का जवाब यही होगा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और न कोई रंग होता है। लेकिन चिदंबरम ने जो कहा उससे भी असहमत होना आसान नहीं है। चिदंबरम के शब्द प्रयोग में असावधानी हो सकती है लेकिन भावना एकदम सही है। जिस आतंकवाद की तरफ चिदंबरम ने इशारा किया उसकी आमद तो आजादी के तुरंत बाद हो गई थी और इस आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली। उसके बाद भी यह धीरे धीरे बढ़ता रहा और 6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।
     हाल ही में जब साध्वी प्रज्ञा, दयानन्द पाण्डेय और कर्नल पुरोहित नाम के दुर्दान्त आतंकवादी पकड़े गए तब यह फिर साबित हो गया कि ऐसा आतंकवाद काफी जड़ें जमा चुका है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी का चिदंबरम के बयान पर हो- हल्ला मचाना 'चोर की दाड़ी में तिनका' वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
     पहली बात  तो यह है कि भगवा रंग पर किसी राजनीतिक दल का अधिकार नहीं है और न करने दिया जाएगा। यह हमारी सदियों पुरानी आस्था का रंग है। लेकिन चिदंबरम के बयान के बाद भाजपा और संघ यह दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं गोया भगवा रंग उनका ही हो। अगर ऐसा है तो भाजपा का झण्डा भगवा क्यों नहीं है?
     अब संघी भाई कह रहे हैं कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता। बात सौ फीसदी सही है और हम भी यही कह रहे हैं कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता और आतंकवादी गतिविधिायों में जो आतंकवादी पकड़े गए हैं या अभी पकड़ से बाहर हैं वह किसी भी हाल में हिन्दू नहीं हो सकते वह तो 'हिन्दुत्व' की शाखा के हैं। दरअसल 'हिन्दुत्व' की अवधारणा ही आतंकी है और उसका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। कोई भी धर्मग्रंथ, वेद, पुराण, गीता रामायण हिन्दुत्व की बात नहीं करता न किसी भी धर्मग्रंथ में 'हिन्दुत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है।
हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचार धारा है जिसकी बुनियाद फिरकापरस्त, देशद्रोही और अमानवीय है। आज हमारे संधी जिस हिन्दुत्व के अलम्बरदार बन रहे हैं, इन्होंने भी इस हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर से चुराया है। जो अहम बात है कि सावरकर का हिन्दुत्व नास्तिक है और उसकी ईश्वर में कोई आस्था नहीं है। जबकि हिन्दू धर्म पूर्णत: आस्तिक है। उसकी विभिन्न शाखाएं तो हैं लेकिन ईश्वर में सभी हिन्दुओ की आस्था है। लिहाजा ईश्वर के बन्दे आतंकी तो नहीं हो सकते पर जिनकी ईश्वर में आस्था नहीं है वही आतंकी हो सकते हैं। 
     जो अहम बात है कि हिन्दू धर्म या किसी भी धर्म के साथ कोई 'वाद' नहीं जुड़ा है क्योंकि 'वाद' का कंसेप्ट ही राजनीतिक होता है जबकि 'हिन्दुत्व' एक वाद है। और आतंकवाद भी एक राजनीतिक विचार है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंकवाद है उसके पीछे राजनीति है। दरअसल आतंकवाद, सांप्रदायिकता के आगे की कड़ी है। जब धर्म का राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हथियार की तरह प्रयोग किया जाता है तब सांप्रदायिकता का उदय होता है और जब सांप्रदायिकता के जुनून को पागलपन की हद तक ले जाया जाता है तब आतंकवाद पैदा होता है। 
 भारत में भी जिसे भगवा आतंकवाद कहा जा रहा है वस्तुत: यह 'हिन्दुत्ववादी आतंकवादहै, जिसे आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन पालते पोसते रहे हैं। संघ की शाखाओं में बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षित किए जाते हैं जहां उन्हें लाठी- भाला चलाना और आग्नेयास्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। दशहरे वाले दिन आतंकवादी अपने हथियारों की शस्त्र पूजा करते हैं।
     फिर प्रतिप्रश्न यह है कि भाजपा और संघ को चिदंबरम के बयान पर गुस्सा क्यों आता है? 'मजहबी आतंकवाद', 'जिहादी आतंकवाद' और 'वामपंथी उग्रवाद' जैसे शब्द तो संघ के शब्दकोष की ही उपज हैं न! अगर मजहबी आतंकवाद होता है तो भगवा आतंकवाद क्यों नहीं हो सकता? अगर वामपंथी उग्रवाद होता है तो दक्षिणपंथ का तो मूल ही उग्रवाद है। अगर 'जिहादी आतंकवाद' और 'इस्लामिक आतंकवाद' का अस्तित्व है तब तो 'भगवा आतंकवाद' भी है। अब यह तय करना भाजपा- आरएसएस का काम है कि वह 'किस आतंकवाद' को मानते हैं?


 [ लेखक-परिचय:  
जन्म : 18,मई १९७० को बदायूं  में 
शिक्षा: एक सभ्य सुसंस्कृत और शैक्षणिक परिवार से होने के बावजूद अमलेंदु जी कहते हैं कि  लेकिन मैं स्वयं शिक्षित नहीं [हँसना मना है !]
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन साथ ही समाचार पोर्टल  ]     
 http://hastakshep.com/   के संपादक
संपर्क: amalendu.upadhyay@gmail.com ]

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32 comments: on "हिन्दुत्व की अवधारणा ही आतंकी है"

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

'जिहादी आतंकवाद' और 'वामपंथी उग्रवाद' जैसे शब्द तो संघ के शब्दकोष की ही उपज हैं न! अगर मजहबी आतंकवाद होता है तो भगवा आतंकवाद क्यों नहीं हो सकता? अगर वामपंथी उग्रवाद होता है तो दक्षिणपंथ का तो मूल ही उग्रवाद है। अगर 'जिहादी आतंकवाद' और 'इस्लामिक आतंकवाद' का अस्तित्व है तब तो 'भगवा आतंकवाद' भी है। अब यह तय करना भाजपा- आरएसएस का काम है कि वह 'किस आतंकवाद' को मानते हैं?

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

भारत में भी जिसे भगवा आतंकवाद कहा जा रहा है वस्तुत: यह 'हिन्दुत्ववादी आतंकवाद' है, जिसे आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन पालते पोसते रहे हैं। संघ की शाखाओं में बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षित किए जाते हैं जहां उन्हें लाठी- भाला चलाना और आग्नेयास्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। दशहरे वाले दिन आतंकवादी अपने हथियारों की शस्त्र पूजा करते हैं।

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

जिस आतंकवाद की तरफ चिदंबरम ने इशारा किया उसकी आमद तो आजादी के तुरंत बाद हो गई थी और इस आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली। उसके बाद भी यह धीरे धीरे बढ़ता रहा और 6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।

smyazeer ने कहा…

जिस आतंकवाद की तरफ चिदंबरम ने इशारा किया उसकी आमद तो आजादी के तुरंत बाद हो गई थी और इस आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली। उसके बाद भी यह धीरे धीरे बढ़ता रहा और 6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।

smyazeer ने कहा…

भारत में भी जिसे भगवा आतंकवाद कहा जा रहा है वस्तुत: यह 'हिन्दुत्ववादी आतंकवाद' है, जिसे आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन पालते पोसते रहे हैं। संघ की शाखाओं में बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षित किए जाते हैं जहां उन्हें लाठी- भाला चलाना और आग्नेयास्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। दशहरे वाले दिन आतंकवादी अपने हथियारों की शस्त्र पूजा करते हैं।

MUKANDA ने कहा…

नेहरु परिवार जिसने धर्म को अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल किया सम्मान के लिए नहीं...अमलेंदु जी, यह मानकर चलिये कि कांग्रेस ने विभाजन की नींव रख दी गयी है… कुछ प्रदेशो में जिस तरह के हालात बनवा दिये गये हैं, वही पूरे देश में बनाये जा रहे हैं. राजनीतिबाज जो करते हैं वह तो करते ही हैं, लेकिन इस देश की अवनति का पूरा श्रेय काग्रेस के नाम होगा जो सत्ता की आड़ में अपने स्वार्थ सिद्ध करती हैं… ...हिन्दू एकता का रोदन करने वालो पहले जाति प्रथा तोड़ कर हिन्दुओं को एकता के मैदान में तो ला कर दिखाओ, तब हिन्दू एकता का सपना देखना .750 से 1192 ई तक उत्तरी भारत में 52 गढ़ थे वो सभी हिन्दू थे और आपस में भंयकर युद्धों में लिप्‍त थे जिन्होंने भारत को अनहद गुलामी में धकेल दिया ..ये ही देशद्रोही हिन्दू राजा महाराजा इस हिंदुत्व आतंकवाद के प्रेरणा दायाक है तो फिर सत्यानाश क्यों ना होगा .किसी भी सभ्यता, समाज या राष्ट्र को उर्जा, शक्ति और मार्गदर्शन उसे उसके अतीत या इतिहास से मिलता है.आप इतिहास उठा कर देखिये कि देश को बेच देने पर उतारू शासक किस तरह विदेशी आक्रमणकारियों को न्यौता देते रहे ..

शिक्षामित्र ने कहा…

किसी भी प्रकार का अतिवाद अस्वीकार्य होना चाहिए।

Syed Y ने कहा…

हाल ही में जब साध्वी प्रज्ञा, दयानन्द पाण्डेय और कर्नल पुरोहित नाम के दुर्दान्त आतंकवादी पकड़े गए तब यह फिर साबित हो गया कि ऐसा आतंकवाद काफी जड़ें जमा चुका है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी का चिदंबरम के बयान पर हो- हल्ला मचाना 'चोर की दाड़ी में तिनका' वाली कहावत को चरितार्थ करता है।

Syed Y ने कहा…

अब संघी भाई कह रहे हैं कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता। बात सौ फीसदी सही है और हम भी यही कह रहे हैं कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता और आतंकवादी गतिविधिायों में जो आतंकवादी पकड़े गए हैं या अभी पकड़ से बाहर हैं वह किसी भी हाल में हिन्दू नहीं हो सकते वह तो 'हिन्दुत्व' की शाखा के हैं। दरअसल 'हिन्दुत्व' की अवधारणा ही आतंकी है और उसका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। कोई भी धर्मग्रंथ, वेद, पुराण, गीता रामायण हिन्दुत्व की बात नहीं करता न किसी भी धर्मग्रंथ में 'हिन्दुत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है।

Suman ने कहा…

आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली.

ali ने कहा…

चिंतनपरक !

Shah Nawaz ने कहा…

आतंकवादी किसी धर्म के अनुयायी नहीं होते हैं, हाँ इनको धर्म के व्यापारी अवश्य ही कहा जा सकता है. ऐसे व्यापारी जो अपने फायदे के लिए धर्म का दुरूपयोग करते हैं. विचारणीय लेख!

नईम ने कहा…

आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली.

नईम ने कहा…

6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।

Suresh Chiplunkar ने कहा…

:) :) :)

कोई नई बात नहीं बताई आपने… यह प्रचार तो काफ़ी सारे पत्रकार कर रहे हैं…

वैसे आपने एक बड़ी कॉमिक बात कही… साध्वी प्रज्ञा आदि को "दुर्दान्त आतंकवादी" कह दिया…। मोहम्मद गोरी से लेकर कसाब और अफ़ज़ल गुरु तक सभी नादान, मासूम, बेगुनाह ही होंगे शायद, आपकी नज़र में…।

"दुर्दान्त"(?) शब्द का अर्थ पता भी है आपको?

DEEPAK BABA ने कहा…

बदिया लगा .....
"एक सुसंस्कृत परिवार से होने के बावजूद...."
अमलेन्दु जी, आप जैसे लोग ही ऐसा नजरिया अपनायेंगे ..... तो सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा ... कि किस समाज में अपन रह रहे हैं.

हर हिंदू देवता के पास अस्त्र-शास्त्र हैं ....... आपके हिसाब से वो आंतकवाद कि भूमिका के लिए सटीक बैठते हैं......... परन्तु क्या आप बता सकते हैं कि कितने हिंदू चाकू-या पिस्टल जैसा हथियार रखते हैं. भारतीय सभ्यता में एक लाठी जरूर इंसान के पास होती थी.... वो तक हमने छोड़ दी. बाकि इस्लाम में मोहम्मद साहेब का चित्र तो हमने देखा नहीं .... मगर ९५ प्रतिशत मुस्लिम परिवारों में हतियार जरूर मिलता हैं........ क्योंकि इस्लाम - भाईचारे कर प्रतिक है और बिना हथियार के भाईचारा नहीं होता.

सागरदीप ~ गहराई और अँधेरा और कुछ नहीं ??? ने कहा…

बात यहा हिंदू या मुसलमान कि नही है, बात अधिकारो कि है कांग्रेश ने तो यह तक कह दिया कि देश के सभी स्रोतों पर प्रथम अधिकार मुसलमानों का है इसे आप क्या कहेंगे, भारत कि एकहरी नागरिकता क्या सिर्फ़ ढोंग है आप जानते है कि आज भी 40-45 फीसदी हिंदू गरीब है फिर आरक्षण सिर्फ़ मुसलमानों को ही क्यों ? अगर हज सब्जिडी है तो अमरनाथ यात्रा के लिए क्यों नही ?? हमारे माननीय लालूप्रसाद यादव किसी मौलबी के लिए मासिक बेतन कि शिफारिश कर सकते हि तो किसी हिंदू पुजारी को क्यों नही ???? आप इनके ऊपर भी तो लिख सकते है पर नही ये तो भारत जैसे देश कि बद-किस्मती है कि यहा अपने लोग ही अपनों का साथ ना देकर उनकी जड़ें खोदते है , इसका गबाह इतिहास है, और हा में यहा सुरेश जीके बात से सहमत हूँ कि अगर ये साध्बी प्रज्ञा "दुर्दांत आतंकबादि" है तब आप या तो हिन्दी के इस शब्द का अर्थ ही नही जानते या किसी दबी हुयी हीन या प्रतिशोध भाबना बस ऐसा कह रहे है jo कुछ भी हो सकती है................मैं किसी भी पार्टी या संगठन से संबंधित नही हूँ, क्योकि में अनिबासी हूँ , में सबसे पहले एक भारतीय हूँ इसलिए मेरी बातोको किसी भी संगठन से जोड़कर ना देखा जय /***

shaffkat ने कहा…

आतकवाद तो आतकवाद है. सुविधा अनुसार इसका नामाकरण किया जाता रहा है -ग्रीन ,इस्लामिक वगेरा और अब कांग्रेस द्वारा सेफेरेन टेरेरिज्म नया नाम .लेना देना कुछ नहीं आफत बेचारे अल्पसंख्यक की.बी .जे.पी. का तुस्टीकरण राग आरंभ.यही उनकी चाल ,यही चिंतन और असली चहरा है.और कांग्रेस भी अपनी जगह सही जिसको कसम है, अल्पसंख्यक का कोई विकास मत करो बस कोई भावनात्मक नारा/बात उछाल दो और वोट चित. अल्पसंख्यक के कातिल दोनों ही हैं एक स्लो पोइसोन देता है तो दुसारा झटके में विश्वास करता है .कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं है सो अल्पसंख्यक एक साथ गुजरात बनने के बदले जीने के लिए धीमा ज़हर पिये जा रहा है .एक शेर अर्ज है
अर्जी ले के रख ली हाकिम ने सर उठ के देखा भी नहीं
मैं उस कोम का बन्दा हूँ जिसका अब खुदा भी नहीं
इस्लामिक टेरेरिज्म उछालने में बी .जे.पी.का सब से मुखर रोल रहा है अब दमन में आग लगी तो दर्द हो रहा है .बताओ इस टेरेरिज्म को क्या नाम दिया जावे हिंदी -हिंदू ,हिंदी तो रफत आलम भी है और हिंदू देश की शांति प्रिय बहुसंख्यक जनसँख्या है कोई नाम तो इन कट्टरपंथियोंको दिया जाना ही था.बी .जे.पी. को अब भगवे से परहेज़ है तो कोई और नाम इन्ही सज्जनों से पूंछा जावे.किसी तरह तो इकबाले जुर्म हो.लिखता रहू तो किताब हो जावेगी यही कहूँ
चोटी हो की दाढ़ी का मुर्दाबाद
आतंकवाद हो किसी का मुर्दाबाद
भारतीयता ज़िदाबाद/मानवता ज़िदाबाद

सुमो ने कहा…

तुम कोन से आतंकवादी हो मुन्ना?
इस्लामी आतंकवादी हो या वामपथी आतंकवादी?

shaffkat ने कहा…

सुमो भाई मैं तो मानवतावादी हूँ .आप जापानी हो क्या .

सुमो ने कहा…

भाई तू कोन मैं खामखाँ, पूछा तो मैंने उस मूर्ख अमलेंदु से है

जो उस प्रज्ञा ठाकुर को दुर्दांत आतंकवादी बता रहा है जिसे न तो किसी अदालत ने आतंकवादी ठहराया न कोई जुर्म साबित हुआ, बल्कि उसे तो मकोका में गिरफ्तार करके रखा है,न कोई सुनवाई, न चार्ज शीट, बस अमलेंदु जैसे लोग स्यापा करके अपनी छातियाँ लाल किये जा रहे हैं.

सुज्ञ ने कहा…

क्या करोगे ऐसा प्रचार करके?
अमलेंदु हो या इस ब्लोग के संचालक।
बार बार भगवा आतंकवाद,या हिंदु आतकवाद का नारा, देश को गलत दिशा दे देगा।
कभी सोचा है,जो चोट पहूंचाने के लिये ऐसे नारे गढ रहे हो,बार बार के उपयोग से नासूर बन जायेंगे,ठप्पा लगा रहे हो न? भविष्य में कभी हिंदुत्व द्वारा ठप्पा स्वीकार कर लिया गया तो क्या होगा? दुष्परिणाम जानते भी हो या अनावश्यक थूक उडाना प्रवृति बन गई है।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

श्रीमान अमलेंदु जी, खेद के साथ कहता हूँ कि जिस ढंग से आपने ब्लॉग पर अपना परिचय टेपा है, लेख उससे मैच नहीं खाता ! हिंदुत्व को परिभाषित करने, पढने, समझने, और समालोचना का अधिकार प्रत्येक को है चाहे वह हिन्दू है या फिर हिंदुत्व को न् मानने वाला , मगर अपने क्षणिक लाभ के लिए आपने भी वही गलती दुहराई है जो पी चिदंबरम ने की ! बिना यह सोचे समझे कि समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ! कौंग्रेस ने अपना तात्कालिक फायदा इस बयान के मार्फ़त वोट बैंक को देखा ! मगर याद करना कि अब इस कड़ी के माध्यम से भविष्य में जो इस देश के वास्तविक शत्रु आतंकी है वो किस तरह का फायदा उठाएंगे ! दो समुदायों के बीच फूट डालने के लिए ! और ये क्यों भूल जाते हो कि यदि हिन्दुओ ने प्रतिवाद स्वरुप हथियार उठाये भी है तो उन्हें मजबूर किसने किया यह सब करने के लिए ? मान लो कि कर्नल प्रोहित और साध्वी पर आरोप सिद्ध हो जाते है ( अभी सिर्फ आरोप पर ही आप जैसे महान समाज सुधारक इतना कुछ कह रहे हो आरोप साबित हो गए तो पता नहीं फिर .....) तो क्या कर्नल प्रोहित अथवा साध्वी प्रन्ज्ञा के पास एक सुखमय जीवन जीने के लिए कोई कमी थी जो वे इस तरह की जिल्लत के लिए तैयार हुए ? खैर, इस हिन्दू धर्म और देश ने बहुत से दुश्मनों को झेला है आगे भी झेल लेगा ! जो नक्सली आज देश के ही लोगों को खा रहे है, उन्हें आतंकवादी कहने में तो इन सेक्युलरों को हिचक है, लेकिन भगवा आतंकवाद कहने में नहीं !

murari gupta ने कहा…

श्रीमान अमलेंदू जी. माफ करना मगर लगता है इस आइने में थोड़ी जंग लग गई मालूम लगती है। आपकी लेखनी, वाक्य विन्यास, और एक खास समूदाय से तारीफ लूटने के तरीके की मैं मन से भरपूर प्रशंसा करता हूं। मगर लेख में लगता है एक जगह आप भारत के सवोॆच्च न्यायालय से भी ऊंचे हो गए या कहूं, उसको झूंठा करार दे दिया है, जब आपने अपने तरीके से हिंदुत्व की व्याख्या की है। मगर इसमें आपका कोई दोष मुझे नजर नहीं आता. हर पढ़े-लिखे को यह अधिकार है कि वह अपने को विद्वान साबित करने और सेक्युलर कहलाने के लिए हिंदुत्व, हिंदू और मौका हाथ लगे तो हिंदुस्तान के खिलाफ लिखे. हिंदू होना तो आप जैसे विदवान लेखकों के लिए मुझे लगता है गाली जैसा महसूस होता होगा. शायद मैं गलत नहीं हूं तो. खैर आप अपनी ज्योत जलाए रखे. मगर हां, लेख में तथ्यों का ख्याल जरूर रखा जाए. जिन पर अभी तक अदालत ने आरोप तय किए हो...हो सके तो उनके बारे में लिखने से बचा जाए. इससे लेखनी में ताकत आएगी।.
शुभकामनाएं

मुरारी वासूदेव

गिरिजेश राव ने कहा…

और ज़ेहादी इस्लाम की?

saif ने कहा…

AMLENDU JI NE WAHI KAHA JO SUNA DEKHA !! AGAR LEKH ISLAM K NAM PAR HO RAHE AATANKAWAAD KA HOTA TAB BHEE YAHI KAHTE .AMLENDU HAMESHA SACH LIKHTE HAIN.
PADHNE WALE HAMESHA VISHAY SE HAT KAR HI FIJUL KEE BAHAS ME KYON ULAJH JAATE HAIN !!!

Jitendra Chaturvedi ने कहा…

इस लेख के लेखक जो कि अपने को स्वतंत्र लेखक कहते हैं भगवा विरोधी नज़र आते हैं जिन्होंने कभी संघ की शाखा के दर्शन भी ना किए होंगे. इन अधूरी जानकारीयों को पहले मे दुरुस्त करने की सलाह दुंगा इन्हैं.
हिन्दुओं में हिंसा की प्रवत्ति कभी नहीं रही न ही वे इसकी किसी को सलाह देते हैं ये जो कुछ एक लोग जो अपने क्रोध पर काबू नहीं रख पाते अस्त्र उठाकर निकल पडते हैं बदला लेने उन कुछ गिने-चुने लोगों को आतंकवाद से जोड देना असली आतंकवादियों को बच निकलने के लिए रास्ता देना है. उनको भी कब तक रोका जा सकेगा जो रोज आतंक तो देखते हैं. पर उस आतंक को कुचलने की बजाय इन नेताओं को वोट की चिंता करते हुए ही पाया जाता है आखिर खूनहै कब तक न खौलेगा ?
लेकिन याद रहे चानक्य ने भी नपुंसक राजनीतिज्ञता भरे समाज से मुक्ति के लिए श्स्त्र उठाने की बात की और उनकी शक्ति छीन ली थी पर वो समय अभी नहीं आया हैं.
हां अमलेन्दु जी जैसे पार्टी वर्कर और चिदम्बरम जैसे नेता बढते रहे तो हिन्दुओं को आखिर हथियार उठाना ही पडेगा.
भगवान करे वो दिन ना आये.

ALOK KHARE ने कहा…

आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली.

bahut hi bachkani baat keh di, Gandhi ji ke murder ko bhi aapne antakbad ka naam de diya, aapka ye article sirf ek taraf soch par chala he ki bhagva ko antankbad tehrana he, aapne is article me overral jo mudda uthaya he usse aap bhatakte se lage...

murari gupta ने कहा…

america me quran jalai ja rahi hai...jalane walo ke baare me kya kahenge aap

MALIK ने कहा…

Dear Upadhiyay je...
Apne sahi kaha ke HINDU kabhi terrorist nahi ho sakta.....Kyoki agar ye terrorist ban gaya....To duniya men anargal baat failane wale desdrohi kabhi paida nahi honge...BHARAT hamara(Sirf HINDU)
ghar hai...iske liye jaan bhi de sakte hai...Is jajbe ko koi "aatankvad" ka naam de de to usse bada bewkuf koi nahi .....

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हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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