बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 15 अगस्त 2010

पंद्रह अगस्त यानी किसानों के माथे पर पुलिस का डंडा















युसुफ़ किरमानी की क़लम से

























हाँ ! किसानों को पीटा अंग्रेज़ी नहीं देसी पुलिस ने  
दो की जान गयी 


भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी।[खबर है कि किसान और पुलिस के संघर्ष में दो किसान और पीएसी के जवान की मौत हो गयी है.-माडरेटर ] सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी। आंदोलन कोई नया नहीं था और महीनों से चल रहा था लेकिन पुलिस वालों की नासमझी से 14 अगस्त की शाम को हालात बिगड़े और जिसने इस पूरी बेल्ट को झुलसा दिया। यह सब बातें आप अखबारों में पढ़ चुके होंगे और टीवी पर देख चुके होंगे।

अपनी जमीन के लिए मुआवजे की ज्यादा मांग का आंदोलन कोई नया नहीं है। इस आंदोलन को कभी लालगढ़ में वहां के खेतिहर लोग वामपंथियों के खिलाफ लड़ते हैं तो कभी बिहार के भूमिहीन लोग सामंतों के खिलाफ लड़ते हैं तो हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न इलाकों में वहां के किसान शासन के खिलाफ लड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में यह तेंदुपत्ता माफिया के खिलाफ लड़ा जाता है।

लेकिन मुद्दा हर जगह किसान या खेतिहर मजदूरों की जमीन का ही है, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़ा करना चाहती है या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) के पालन-पोषण का जरिया बनाने के लिए सौदा किया जाता है। कतिपय लोग विकास, रोटी-रोजी का वास्ता देकर इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क सुनने वाला कोई नहीं है कि जिस किसान से उसकी जमीन छीनी जा रही है वह उसके बाद क्या खाएगा और कैसे जिंदा रहेगा। आपके कुछ लाख रुपये कुछ समय के लिए उसका लाइफ स्टाइल तो बदल देंगे लेकिन उसके मुंह में जिंदगी भर निवाला नहीं डाल सकेंगे।

मैं ही क्या आप तमाम लोगों में से बहुतों ने देखा होगा कि इस तरह का पैसा किस तरह किसानों को या उस इलाके की आबादी के हालात को बदल देता है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली के शहरीकृत गांवों और एनसीआर के तमाम गांवों के किसानों को बड़ा मुआवजा मिला और देखते ही देखते उन गांवों में लैंड क्रूजर और पजेरों पहुंच गई। मुखिया और उनके बेटे शहर में आकर बार में बैठने लगे और कुछ ने होटल में कमरा लेकर कॉलगर्ल भी बुला ली। यह सब गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, बहादुरगढ़, लोनी में हुआ। और अगर दिल्ली के गांवों की बात करें तो जौनापुर, जैतपुर, पल्ला, मुनीरका, महरौली के किसानों के साथ भी यही बीता। इन इलाकों के गांवों में आप चले जाएं तो पाएंगे कि दरवाजे पर पजेरो खड़ी है, पूछेंगे कि आपका बिजनेस क्या है तो जवाब मिलेगा कि हम तो पुराने जमींदार हैं। तगड़ा मुआवजा मिला है, उसी को खर्च कर रहे हैं। या फिर किसी ने ब्लूलाइन बस खरीद ली है और उसको चलवा रहा है।

फरीदाबाद के ग्रेटर फरीदाबाद या नहरपार इलाके में चले जाइए, आपको सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े अपार्टमेंट नजर आएंगे, लेकिन जैसे ही आप इन इलाकों के गांवों में जाएंगे तो घरों के सामने कोई न कोई गाड़ी खड़ी नजर आएगी। पता चलेगा कि घर का मुखिया सुबह से शराब पी रहा है और लड़का अपनी अलग मंडली लगाए हुए हैं। जिन किसान परिवारों का पैसा खत्म हो चुका है वे कब को जमीन पर आ चुके हैं और उस घर का लड़का अब उसकी जमीन पर बने अपार्टमेंट में या तो तीन हजार रुपये वेतन पाने वाला चौकीदार बन चुका है या फिर किसी की गाड़ी की धुलाई करके दो हजार रुपये कमा रहा है।

मैं चाहता तो इन तथ्यों को तमाम आंकड़ों औऱ नामों की चाशनी के साथ पेश करके बड़े ही गंभीर किस्म की रिपोर्ट बना सकता था लेकिन मैं यहां किसी नई रिसर्च रिपोर्ट को पेश करने नहीं आया हूं। यह हकीकत मेरे सामने की है इसलिए बयान कर रहा हूं। मुझे इन तमाम गांवों में जाने का मौका मिलता रहता है और हर बार कुछ नई जानकारी किसी न किसी परिवार के बारे में मिलती रहती है। यह ऐसे गांव हैं जहां टीवी भी उपलब्ध है और अखबार भी।

इन्हीं गांवों का किसान जब उसी अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

बहरहाल, इन बातों और तर्कों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, यह ब्लॉग मेरे नियंत्रण में है तो इन विचारों को यहां जगह भी मिल गई है, चाहे आप उसे पढ़ें या न पढ़ें। वरना ऐसी सोच रखने वाले अब हाशिए पर जा चुके हैं। शहरों में रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें बड़े-बड़े मॉल्स में विकास नजर आता है, वे ऐसी तमाम बातों को खारिज करते रहे हैं और आगे भी करेंगे लेकिन वे ऐसे छोटे-छोटे आंदोलनों को अपने तर्कों से रोक नहीं पाएंगे। बेशक, उनका हिमायती, दलाल या पेड जर्नलिजम करने वाला मीडिया भी उनका साथ दे लेकिन वे समाज में आ रही चेतना को रोक नहीं पाएंगे। वह किसी न किसी रूप में फूटकर सामने आएगी। यह डरे हुए लोग लोगों को और डराना चाहते हैं। लेकिन इधर आंदोलनों का रुख बता रहा है कि इन डरे हुए लोगों के तर्क अब पब्लिक में खारिज होने लगे हैं।

अंत में एक अपील

यह लेख लिखने की सबसे बड़ी वजह वह संदेश है, जो मुझे पत्रकार और अंग्रेजी की मशहूर लेखिका अनी जैदी ( recent book - Known Turf) की ओर से मिला। उन्होंने शीतल रामजी बर्डे नामक बालिक की ओर से एक अपील इंटरनेट पर जारी की है जो दिल को हिला देती है। इस लड़की के पिता किसान थे और अब आत्महत्या कर चुके हैं। अब यह परिवार कागज के लिफाफे बनाकर अपना पेट पालता है। इस लड़की ने देशभर के लोगों से अपील की है कि वे उसे हर महीने एक पुरानी मैगजीन उसके पते पर भेजें, जिसका वह इस्तेमाल लिफाफा बनाने में कर सके। इससे उसकी मदद तो होगी ही और पर्यावरण की भी मदद होगी। प्लास्टिक की थैलियों का प्रचलन रुक सकेगा। आप नीचे उस बच्ची की अपील पढ़ें और जो कर सकते हैं करें।

From Annie Zaidi, Mumbai
One old magazine = somebody's freedom of livelihood "I was barely nine when my dear father committed suicide. My mother has worked really hard to send my brother, sister & me to school. She is still working hard to make our two ends meet... all she wants is ONE OLD MAGAZINE from you all, so she can make paper envelopes to earn & save environment... dear uncles & aunties, please-please do send us one old magazine every month to support us, so that we can go to better schools and live our lives with dignity and less suffering. 

My mother and other widow mothers like her will not hesitate to work hard to earn for us while saving the environment for the nation...I will be waiting with great expectations dear uncles & aunties for ONE OLD MAGAZINE from each one of you every month...If each one of you send one, it will become so many for my mother and other widow mothers to work hard to earn some amount every month...
A very BIG THANK YOU from my brother, sister, my mother and me...
SHEETAL RAMJI BARDE"
our address:
support 4 suicide farmers families, House No: 200 Opp: Dr. Harne's Hospital, Dhantoli Chowk Wardha: 442001


अगर मौका हो तो  इसे भी पढ़ें..


[लेखक-परिचय :
 टाइम्स के पत्रकारिता विद्यालय से सनदयाफ़्ता राजधानी दिल्ली के चर्चित युवा पत्रकार.गत कई वर्षों से नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कापी सम्पादक.इनका ब्लॉग है हिन्दी वाणी .
आप इनसे yusuf.kirmani@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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22 comments: on "पंद्रह अगस्त यानी किसानों के माथे पर पुलिस का डंडा"

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सच है की ऐसे किसानो को छला जा रहा है ...लेकिन पासे का लालच उनकी सोच को कुंड कर देता है ...बाद में जब नींद टूटती है तो हर तरफ से खुद को ठगा हुआ महसूस करता है...

शहरयार ने कहा…

कमाल का लेख लिखा है आपने!

मेरा ब्लॉग
खूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचें
http://iamsheheryar.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

शहरयार ने कहा…

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HAMZABAAN ने कहा…

भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी। सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी।

shabd ने कहा…

किसान जब अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

patriotic-poems ने कहा…

Very good article which speaks the realty.Keep up the good work.

एमाला ने कहा…

किरमानी साहब ने जिस सच की तरफ ध्यान दिलाया है..आज ऐसे ही अखबार नवीसों की ज़रुरत है.वरना आज कौन गरीब,दलित किसानों की आवाज़ उनके दुःख दर्द को सुन रहा है.

एमाला ने कहा…

किसान जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

शेरघाटी ने कहा…

हमें पहले तय करना होगा कि यह इंडिया है या भारत यानी हिन्दुस्तान !! क्योंकि खेल के नाम पर करोड़ों रुपया किसानों का हज़म कर जाना और अब यह लो गोली!! यह क्या है!!!!

Shamshad Elahee Ansari "Shams" ने कहा…

शर्मनाक घटना है...भारतीय राज्य की निर्ममता उसकी अपनी ही आवाम के खिलाफ़ तेज़ी से बढ रही है..कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक यही कारनामे हैं..मैं इसकी कडे शब्दों में भर्त्सना करता हूँ.

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

पुंजीपतियों की गहरी साजिश चल रही है किसानों को बेरोजगार बनाने की।
हमारे गाँव की लगभग 900 एकड़ जमीन बिक चुकी है,जहां कभी हरियाली होती थी, वहां कांक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं।
मोबाईल बाईक और एटीएम संस्कृति ने किसानो एवं उनकी औलादों को कहीं का नहीं छोड़ा।
नोट पाकर एक किसान तो पागल हो गया और लोगों के घरों में नोट बांटते फ़िर रहा था।
5 करोड़ मिले थे। कहता था कहां खर्च करुंगा, रोज दारु पीने और खाने से भी खत्म नहीं हो रहे हैं।
अच्छी पोस्ट

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर न हो रोटी
उस खेत के हर खोशाये गंदुम को जला दो !!

इकबाल ने ऐसा ही कहा था न !

ajit gupta ने कहा…

अंग्रेजों ने भी ऐसे ही जमीदारी एक्‍ट लागू करके किसान की जमीन छीन ली थी और उसे मजदूर बना दिया था आज पुन: हम अंग्रेजों के दिखाए रास्‍ते पर ही चल पड़े हैं। आखिर हम कॉमन वेल्‍थ गेम्‍स जो करा रहे हैं तो गुलामी की प्रथा का तो स्‍मरण कर उसपर अमल करेंगे ही ना?

Shah Nawaz ने कहा…

किसानो और खेती की हालत पर अगर हमारी सरकार ध्यान देती तो देश की तरक्की में चार चाँद लग गए होते. सरकारी का किसानो के प्रति रूखा रवैय्या ही एक कृषि प्रधान देश में किसानी की नाज़ुक हालत का ज़िम्मेदार है.

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

न अब नेता हैं न ही वैसे लोग हैं जो किसी भी आन्दोलन को सही दिशा में ले जा सकें.किरमानी साहब ने बहुत ही अच्छा कवेरेज किया है.

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

शहरोज़ साहब कभी ओखला की बदहाली पर भी कोई खोजी खबर हो जाय !!

zeashan zaidi ने कहा…

जिस गति से देश में एक्सप्रेस वे बनाए जा रहे हैं, क्या वास्तव में उसकी ज़रुरत है? क्या अब खेतों की ज़रुरत ख़त्म हो चुकी है? खेतों को उजाड़ कर आठ लेन की सड़कें बनाना कितना उचित?

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

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girish pankaj ने कहा…

mai aksaar peeda ke sath kahataa rah hoo,ki
lok tantra sharmindaa hai
pulis ka dandaa zindaa hai..
desh aazad ha, lekin log gulaam hai ab tak. marmik rapat dene ke liye abhar...

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छा आलेख।

ALOK KHARE ने कहा…

bahut hi sharmnak bakya he, wo bhi azadi ke din, isse bura mazak aur kya ho sakta he, ki hum azad hain.... ye sabse bhadda majak he, jo ki pichhle 63 saalon is bholi bhali janta ke sath kiya ja raha he,

aapne awaj uthayi aaina dikhaya dhanyebad

Yusuf Kirmani ने कहा…

आप सभी लोगों का शुक्रिया। खासकर भाई शहरोज का, जिन्होंने यह समझा कि इसे अपने ब्लॉग हमजबान पर देने से यह ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा। वह अपनी इस कोशिश में कामयाब रहे। अगर यह लेख सिर्फ मेरे ही ब्लॉग हिंदीवाणी तक सीमित रहता तो शायद, इतनी टिप्पणियां नहीं मिल पातीं।
दरअसल, अब वक्त आ चुका है कि अगर हम सभी लोग किसी अन्याय, अत्याचार के खिलाफ न बोले तो इससे भी बड़ी-बड़ी आफतें झेलने को तैयार रहिए। मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूं और जो शहरों में नौकरी के बल पर जिंदा है। ऐसे वर्ग के अपने एक निश्चित उद्देश्य होते हैं, वह सिर्फ रोटी-रोजी के लिए जीता है, शेष दुनिया से उसे मतलब नहीं होता। यह पीवीआर-मॉल्स की रंगीनी उसे अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। लेकिन इस वर्ग के लोगों को यह समझना होगा कि हमारे इर्द-गिर्द जो हो रहा है, अगर हम लोगों ने उससे सरोकार न रखा तो सब कुछ मिट जाएगा।

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)