बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 4 अगस्त 2010

शहर आया कवि गाँव की गोद में















कमाल अहमद की कवितायें


शाम नहीं बन जाती है माँ
माँ को सबकुछ याद रहता है
ठीक मेरी नानी की तरह...

देखता हूँ की वह अपनी यादों की बची हुई
रोटियां रख आती है चाँद की रोशनी में
...
और चुपचाप करवटें बदलती
सुबह बन जाती है

मेरी ओर देखती हुई
पल्लू से अपने पसीने को पोंछती
पैर के दर्द की टीस को
अपने चेहरे से छुपाकर
वह मुस्कुरा रही होती है
सुबह सुबह

माँ माँ होती है
और हमेशा माँ ही बनी रहती है
माँ को कभी किसी ने शाम बनते नहीं देखा
 
गाँव की भाषा
 एक ग्रामीण कवि के लिए
 सिमरिया एक गाँव है
सायटिका एक रोग
शशिधर एक कवि है
दुर्दिनों का एक मित्र भी
जो कभी कभी शहर आता है
और जब कभी होती है मुलाक़ात
शहर डूब जाता है गाँव में .
 
कल भी आया था अपनी गठरी के साथ
कहने लगा :
साहबजी के द्वारे पर
बांके मोची को बैठाकर
खुद चला आया है उस नगर में
जहाँ हाट नहीं लगते .
 
सुबह तोड़ लाया था नीम का दातुन
थूकता रहा शहर की बेहोशी पर
महसूस करता रहा
सूरज के अंखुवाने के संगीत को.
 
जब मेरी नींद खुली
सौंफ और अजवाइन की महक टकराई
कहने लगा : बोझ से दब गयी है कविता.
 
अखबार पर चलती हुई नज़र
मेरे चेहरे पर आ ठिठक गयी
कहा ; स्सालों ने बेच ही दिया
उसकी नसें फड़क रही थीं
एक उच्छ्वास ..
देखो, देखो
सिमरिया की सड़कें
अपने संसाधनों को ढोती हुई
सैन फ्रांसिस्को  की ओर जा रही है.....
 
मैंने उसे बहुत समझाया
वह नहीं माना
कहने लगा :तुम्हारी चेतना
सोवियत संघ की तरह बिखर चुकी है
जानते हो
शहर की एक ऊँचाई  होती है
अलग इतिहास और भूगोल भी
गाँव का अपना आकाश होता है
अपनी मिट्टी और महक भी
तुम नहीं समझ सकते
गाँव की भाषा .
 
हाजीपुर
 
वर्ष १९९२ का था..
विश्व के प्रथम गणतंत्र का वर्तमान मुख्यालय  
केलों के लिए बहुत प्रसिद्ध है
गौतम बुद्ध को लोग भूल चुके होंगे
आम्रपाली को ज़रूर जानते होंगे
गंगा और गंडक के संगम पर बसा यह शहर
गज और ग्राह के युद्ध का प्रत्यक्ष गवाह रहा था कभी.
 
एक सुसज्जित रथ पर
आडवानी का प्रकट होना
इस शहर को बदल गया
बहुत जल्द ही लोग
मस्जिद चौक को महावीर चौक
और बागमली  को बजरंग बली चौक
पुकारने का अभ्यास करने लगे
और देखते ही देखते रामभक्तों द्वारा
पवनसूत हनुमान  की मूर्ति
इन चौकों पर रोप दी गयीं .
 
रथ गुज़र जाने के महीनों बाद
एक नए चलन के रूप में
एम.चौक और बी.चौक
अस्तित्व में आया
लोगों ने सोचा
हम अपनी सुविधा से
इन शब्दों का इस्तिमाल कर लेंगे.
 
पर आज भी
मस्जिद चौक के आस-पास रहनेवाले
लोगों के जीवन में
अज़ान की आवाज़ बहुत मायने रखती है और
बागमली चौक पर स्थित
अनजान पीर के मज़ार पर
लोगों का तांता
इस बात का सबूत है कि
लोग अभी जिंदा हैं.
 
[कवि-परिचय जन्म 1.मार्च, 76 बिहार में .
शिक्षा :हाजीपुर और पटना से एम ए [हिंदी] करने के बाद जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय, दिल्ली से से पी-एच.डी
सृजन :
ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में कविता,समीक्षा और समसामयिक लेखों का प्रकाशन.
दो तीन किताबें जल्द प्रकाश्य 
सम्प्रति  :नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादकीय विभाग से संबद्ध.ट्रस्ट के मुख्य पत्र संवाद का सम्पादन 
संपर्क  : kamalahmad26@gmail.com ]

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14 comments: on "शहर आया कवि गाँव की गोद में"

kshama ने कहा…

Maa ko leke likhi rachana behad pasand aayi! Duniyame karodon maayen hoti hain,phirbhi wo ek ajooba bani rahti hai!

girish pankaj ने कहा…

maa par kendrit kavitaa me kavi kaa ek badaa chintan samane aataa hai. badhai... iss kavitaa k liye. kamal se kabhi mulaqat hogee hi. kyonki dilli aata hu to nbt jata hi jataa hu aksar.

शेरघाटी ने कहा…

कमाल की कवितायें एक ऐसे संसार का परिचय कराती हैं जहां निम्न मध्य वर्ग की चिंताएं हैं. समाज और देश की चिंता हैं.विसगतियों के प्रति एक गहर विषाद है ,दबते दबते उभरता आक्रोश है.

शेरघाटी ने कहा…

माँ के लिए लिखी उनकी कविता ज़्यादा ध्यान इसलिए भी खींचती है कि उसका ट्रीटमेंट औरों से अलग है.अपनी सहजता में एक अलग संवेदना का सृजन करती है.

shabd ने कहा…

कमाल साहब की कविता हमें अच्छी लगी.बधाई !!
माँ कविता का ट्रीटमेंट अलग है.

shabd ने कहा…

एम.चौक और बी.चौक
अस्तित्व में आया
लोगों ने सोचा
हम अपनी सुविधा से
इन शब्दों का इस्तिमाल कर लेंगे.

kya kahna !!!

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

कमाल साहब ने माशा अल्लाह खूब अदब नवाज़ी की है.गाँव की मंज़र कशी एक कवी के बहाने या उस कवी की बेचैनी को जिस खुश उस्लूबी से उभारा है, भाई कमाल है कमाल !!

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

हम कह सकते हैं कि कमाल ने अपने नाम के तासीर को बरक़रार रखा है.खुदा उन्हें क़ायम दायम रखे आमीन !

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

शहरोज़ साहब आपके मेल दोपहर ही मिल गयी थी.माफ़ी दें ज़रा ताखीर हुई आने में.वैसे आप ने यह अच्छा तरीका निउकाला है.खबर तो हो जाती है.मैं कहाँ आप लोगों की जमात में आ पता हूँ.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

तीनों कविताएँ अलग रंग लिए हुए ....माँ पर लिखी रचना को पाठक आत्मसात कर लेता है..

गाँव से आया कवि ...बहुत पसंद आई

'अदा' ने कहा…

तीनों कवितायें बहुत पसंद आयीं हैं...
विशेषकर माँ पर लिखी गयी कविता..
आभारी हूँ...

Rahul Singh ने कहा…

कहा जाता है कभी बरसाती रात में अस्‍सी बरस के बुद्ध ने यहां गंगा पार की थी, अब गांधी सेतु है. वैसे मैंने हाजीपुर को इस पार से ही महसूसा है, आपकी कविता में झलक भी दिख गई.

nilesh mathur ने कहा…

कमाल कि अभिव्यक्ति! बहुत खूब! बेहतरीन!

Ashish (Ashu) ने कहा…

गजब का मेल हॆ इन तीनो कवितावो मे..
सर्वप्रथम मां हे तो दूसरी तरफ भारत मां की दो सतांन मुस्लिम ऒर हिन्दू..वाकई मजा आ गया

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