बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 5 जुलाई 2010

नई किताब सीखना... दिल से






 










क्‍या आपको उन पलों की याद है जब आपने कुछ ऐसा किया जिसे करने के लिए आप लम्‍बे समय से तैयार थे? जिसे करने के लिए आपके दिल ने हज़ारों ख्‍वाब बुने थे लेकिन हकीकत में कई बाधाऍं आपका रास्‍ता रोके खड़ी थीं? जब दिल की बात मानकर कोई काम किया जाता है तो उस काम को किए जाने के दौरान आने वाली हर रुकावट अपने आप ही दूर हो जाती है। ऐसे ही एक सफर को दर्शाती है एकलव्‍य से प्रकाशित  किताब सीखना... दिल से [मूल्‍य: 80 रुपए]
। इसको लिखने वाली संयुक्‍ता ने पढ़ाई के मामले में अपने दिल की, अपनी रूचियों की सुनी और सीखा बुनकरी का काम। महँगे कॉलेज और थका देने वाली शिक्षा के बदले उसने हाथ के हुनर को आज़माना बेहतर समझा।

संयुक्‍ता की विविध रंगी इस शिक्षा यात्रा में अनेक पड़ाव आए और बहुत से परिवर्तन। अच्‍छे साथी, अच्‍छे मागदर्शकों ने उसके हौंसले को कम नहीं पड़ने दिया। और संयुक्‍ता ने पाई अपनी मंजि़ल।  बुनकरी सीखी तो ताने-बाने बुने, इग्‍नू से बी.एस.सी. की और उसमें स्‍वर्ण पदक हासिल किया। एनआईएफटी से पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा हासिल किया और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय रही। संयुक्‍ता ने अपने आपको केवल सीमित दायरों के भीतर कैद नहीं किया बल्कि हर बार किसी नई चीज़ को सीखने की उसकी प्रबल इच्‍छा उसे आगे, और आगे बढ़ने को प्रोत्‍साहित करती रही।


[जानकारी दीपाली शुक्ला ने उपलब्ध कराई है, उनका आभार!
 उनसे dplshukla9@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.] 



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27 comments: on "नई किताब सीखना... दिल से"

MLA ने कहा…

Badhia Jankari

नईम ने कहा…

आपने अच्छी जानकारी मुहैय्या कराई.शुक्रिया आपका!

shabd ने कहा…

sharoj ji..kitab achchi hi hogi ..kya eklovy ka pata mil sakta hai.

shabd ने कहा…

request hai ki aisi hi pustakon k sambandh me aap aur jankari de saken to kripa hi hoga ham sab par.

एमाला ने कहा…

sanyukta ji ne zaroor hi behtar kitab likhi hogi.ye tanzeem pahle se hi achcha kam kar rahi hai.aapka shukriya is kitab se parichay karane k liye.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

प्रेरणाप्रद जानकारी के लिए शुक्रिया

shikha varshney ने कहा…

अच्छी जानकारी दी ..शुक्रिया.

Amitraghat ने कहा…

"शुक्रिया..."

कलम ने कहा…

सीखना...दिल से को पसन्‍द करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. इस किताब के प्रकाशक एकलव्‍य का पता है -

एकलव्‍य

ई-10, शंकर नगर बीडीए कॉलोनी,

शिवाजी नगर, भोपाल म.प्र.462011

वेबसाइट www.eklavya.in

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जानकारी के लिए धन्‍यवाद बड़े भाई.

दिल से जो बातें सीखी जाती है वही दिमाक के काम आती है.

kshama ने कहा…

Dare to be different! Yahi baat kahti hai yah kitaab!

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

यानी दिल जो बात निकल ती है असर रखती है..है न शहरोज़ साहब !

राजकुमार सोनी ने कहा…

जानकारी के लिए धन्यवाद.

Sharif Khan ने कहा…

आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

रोजगार बहुत है इस मुल्क में , बस अवसर को पहचानने वाली नजर चाहिए ।

आचार्य उदय ने कहा…

सुन्दर लेखन।

Sharif Khan ने कहा…

अच्छी पोस्ट है.
मेंने वन्देमातरम पर कुछ इज़हारे ख्याल किया है देखने की ज़हमत फरमाएं तो ममनून होऊंगा.

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