बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

सोमवार, 22 मार्च 2010

एक दंगे को याद करते हुए

इन दिनों भारत का ह्रदय प्रदेश कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में दंगों का मौसम है.लहलहाता हुआ! जब भी ऐसी ख़बरें आती हैं रूह लरज़ जाती है, जिस्म कांपने लगता है.कि  उर्दू के कहानीकार ज़की अनवर का चेहरा सामने आ जाता है, जिन्हें जमशेदपुर के फसाद में उन्हीं लोगों ने उन्हें मार डाला था जिसका घर कुछ देर पहले ज़की बुझाकर आये थे.तब काशिफ़ भाई छोटे थे.लेकिन उनके मानस पर अंकित कई जलते. लरज़ते चित्र घूम जाते हैं.उनके इस संस्मरण को पढना एक ऐसी अंधेरी सुरंग में जा घुसना है, जहां इंसानियत नंगी हो अट्हास करती है.-माडरेटर 


जमशेदपुर का दंगा १९७९ : जब मैं बहुत छोटा था 













काशिफ़-उल-हुदा की क़लम से


1979 के इसी अप्रैल महीने में, जमशेदपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे ने 108 लोगों की जानें ले ली थीं. मरने वालों की संख्या 114 भी हो सकती थी, लेकिन मैं और मेरे परिवार के लोग ज़िंदा बच गये, शायद इसलिए कि आज 30 साल बाद उस दिल दहला देने वाली घटना को बयान कर सकें. 

यह दुर्भाग्यपूर्ण हादसा तब हुआ था, जब मेरी उम्र केवल 5 साल थी. परन्तु इस हादसे की यादें मेरे मस्तिष्क में साफ-साफ उभरी हुई हैं और दुर्भाग्य से ये मेरी प्रारंभिक जीवन की चुनिंदा यादों में से है. इस बात को पूरे 30 साल गुजर चुके हैं लेकिन इस हादसे के भयानक दृश्य आज भी ताज़ा हैं.

 11 अप्रैल 1979 को उस दिन हवा में तनाव के कुछ भयानक संकेत थे. पता नहीं कैसे, मेरी माँ को यह संकेत समझ में आ गए और वो रामनवमी के दिन, अपने भाई और दो छोटी बहनों के साथ पास के मुसलमान इलाके, गोलमुरी में चली गयीं. मेरे पिताजी आदर्शवादी थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि कुछ नहीं होगा. यदि कुछ हो भी गया तो पिताजी ने एक हिन्दू व मुसलमान लोगों का संयुक्त रक्षा दल बनाया हुआ था और उन्हें उम्मीद थी कि यह दल हिन्दू और मुसलमान गुटों के आक्रमण से बचायेगा.

मैं और मेरा भाई, जो मुझसे 2 साल बड़ा है, पिताजी के साथ रुक गए और मेरी माताजी और बहनें सुबह को गोलमुरी चली गयीं. जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, वैसे-वैसे लोगों की भीड़ बाहर बढ़ने लगी. मेरा भाई कुछ परेशान होने लगा और दोपहर के खाने के समय तक हमने अपने पिताजी को मना लिया कि वो हम दोनों भाइयों को माँ के पास गोलमुरी छोड़ आयें. जब हम लोग गोलमुरी में अपने रिश्तेदार कमाल चाचा के यहाँ भोजन कर रहे थे, लोगों के चिल्लाने की आवाजें आयीं कि दंगा शुरु हो गया है.

यह देखने के लिए कि क्या हो रहा है, हम लोग जल्दी से बाहर गए और देखा कि कुछ ही दूरी पर धुआं उठ रहा था. इसके बाद की घटनाएं मुझे टुकड़े-टुकड़े में याद हैं. मुझे याद है कि हम जिस घर में रह रहे थे, वहाँ पर सिर्फ़ महिलाएं और बच्चे थे. मुझे यह याद है कि मैं खाना नहीं खाना चाहता था क्योंकि वह पूरी तरह से पका हुआ नहीं होता था. बहुत कम उम्र में ही बतौर शरणार्थी मेरे लिए जीवन का यह कड़वा अनुभव था.

मुझे याद है कि रात में हम छत के ऊपर जा कर देखते थे, जहाँ से देख कर लगता था जैसे पूरा शहर ही जल रहा हो. मुझे यह भी याद है कि कोई मुझे चेतावनी दे रहा था कि ऊपर छत पर नहीं जाना चाहिए क्योंकि हमें आसानी से गोली का निशाना बनाया जा सकता है. मुझे यह भी याद है कि मैं अपने पिताजी से बहुत ही कम मिल पाता था और बहुत सहमा हुआ रहता था.

कई सालों बाद पता लगा कि जमशेदपुर के टिनप्लेट इलाके में हमारा घर ही अनेकों स्थानीय मुसलमानों को शरण दिए हुआ था क्योंकि संयुक्त परिवारों में रहने वाले हिन्दू लोग धीरे-धीरे इस इलाके को छोड़ कर जा रहे थे.

उस दिन, मेरे पिताजी कुछ सामान देने के लिए गोलमुरी आए हुए थे परन्तु जब वो वापस जाने को हुए तब तक कर्फ्यू लग गया था. इसलिए वो वापस नहीं पहुंच सके थे.


उधर टिनप्लेट में रह रहे मुसलमानों ने देखा कि वो हर ओर से घिर रहे हैं, इसीलिए टिनप्लेट फैक्ट्री में वे लोग मदद मांगने गए. परन्तु वहाँ उन सब को उन्हीं के सहकर्मियों ने बर्बरतापूर्वक मार डाला. मेरे पिताजी सिर्फ़ इसलिए बच गए क्योंकि कर्फ्यू लग जाने की वजह से वो गोलमुरी से टिनप्लेट वापस नहीं जा सके थे.




हमारा घर तो लुट गया था पर हम लोग भाग्यशाली थे क्योंकि और लोगों का तो सब कुछ जला कर राख कर दिया गया था. महीनों बाद हम सब एक नए इलाके में रहने के लिए गए, जिसका नाम एग्रिको कालोनी था, जो मुसलमानों की एक अन्य कालोनी भालूबासा के सामने थी.

हालांकि इन घरों में नई पुती हुई सफेदी भी आग और लूट के दाग नहीं छुपा पा रही थी. हमें यह भी नहीं पता था कि इन घरों में किसी की हत्या हुई थी या नहीं, पर लूट के निशान सब तरफ साफ़ नजर आ रहे थे.

समय बीतता गया और मेरी ऐसे अनेक लोगों से मुलाकात हुई, जिन्होंने जमशेदपुर दंगे को झेला था. इनमें से हरेक के पास उनके हिस्से की दिल दहला देने वाली कहानी थी.


मुझे एक महिला याद है, जिसके शरीर पर जलने के निशान थे. यह महिला उस एंबुलेंस में भी बच गई थी, जिसको यह सोच कर जलाया गया था कि एंबुलेंस के साथ-साथ उसके भीतर बैठे सभी लोग भी जल जायेंगे.

इस दंगे के कई महीनों बाद रोज स्कूल जाते हुए हम उस जली हुई एंबुलेंस को देखते थे, जो पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी कर दी गई थी.

मरने वाले जिन 108 लोगों का मैंने जिक्र किया, उसमें 79 मुसलमान थे और 25 हिंदू. बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जो घायल हुए थे. कुछ थे, जिनका सब कुछ खत्म हो गया था.


जमशेदपुर एक औद्योगिक शहर है, जहाँ टाटा की फैक्ट्रियां हैं. इस शहर में रहने वाले अधिकाँश लोग टाटा की इन्हीं फैक्ट्रियों में काम करते हैं. शहर का बहुत बड़ा हिस्सा टाटा की जागीर है, जिसके क्वार्टर में हर मजहब के लोग शांतिपूर्वक रहते आए हैं.

यह समझ से परे है कि ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण और बर्बर कृत्य इस शहर में आखिर कैसे हुआ, जहाँ हर धर्म के लोग सद्भावना के साथ रहते थे. यहां रहने वाले अधिकांश लोग अविभाजित बिहार या देश के दूसरे हिस्सों के थे और कंपनी में ईमानदारी से काम करते हुए अपने घर-परिवार के पालन पोषण में खुश थे. जमशेदपुर के दंगों में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं मरे, बल्कि हिन्दू भी तो मरे थे- तो फिर इस दंगे का लाभ किसको मिला था?

जमशेदपुर के इस हादसे से कोई दस रोज पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख बाला साहेब देवरस ने जमशेदपुर का दौरा किया था और आह्वान किया था कि हिंदूओं को अपने हितों की रक्षा के लिए अब उठ खड़ा होना चाहिए. उसके बाद 11 अप्रैल 1979 को जमशेदपुर दंगों की आग में जलने लगा.

तीस साल पहले जमशेदपुर में जिस व्यक्ति ने शहर को बंधक बना लिया था, उसका नाम था दीनानाथ पांडेय. स्थानीय विधायक. जीतेंद्र नारायण कमीशन ने माना कि इस दंगे में आरएसएस के विधायक दीनानाथ पांडेय की भूमिका रही है. इस घटना के बाद भाजपा ने दो बार बिहार विधानसभा के चुनाव में पांडेय को टिकट दी और पांडेय ने इस जमशेदपुर सीट को भारतीय जनता पार्टी के लिए 'सुरक्षित' सीट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

  जब हम लोग यह टिप्पणी करते हैं कि राजनीति में गुंडे या अपराधी पृष्ठभूमि के लोग आ गए हैं, तब हम यह भूल जाते है कि इन लोगों को राजनीति में वोट दे कर लाने के लिए भी हम लोग ही जिम्मेदार हैं. दीनानाथ पाण्डेय जैसे लोगों के लिए, जिन पर सामूहिक हत्या का आरोप है, राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार की टिकट काट कर कांग्रेस ने सराहनीय काम किया है, परन्तु यह वही पार्टी है, जिसके शासनकाल में आंध्र प्रदेश में युवा मुसलमानों को गैरकानूनी तरीकों से गिरफ्तार किया जा रहा था और पुलिस उनपर अमानवीय अत्याचार करते हुए ऐसे अपराधों की स्वीकरोक्ति चाहती थी, जिसके लिए वो जिम्मेवार ही नहीं थे. सरकार ने तब तक इस मामले में कार्रवाई नहीं कि जब तक लोगों ने सरकार के इस तरीके के खिलाफ आक्रोश नहीं जाहिर किया.

यदि पार्टियाँ समयोचित कदम लेने से कतरायेंगी और अपराधी पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में उतारेंगी, तो ऐसे नफरत और वैमनस्यता से भरे हुए लोगों के लिए मतदान करना हमारे जैसी आम जनता के लिए संभव नहीं होगा और हमारे पास मतदान से इंकार के सिवा कोई चारा नहीं होगा.



इसी सन्दर्भ में जमशेदपुर के वरिष्ठ नागरीक एम्.जेड.हुदा सन १९६४ और १९७९ के फसाद को कुछ इस तरह ब्यान करते हैं.आप ज़रूर सुनें. 

[लेखक-परिचय: जमशेदपुर यानी झारखंड के इस्पात नगर टाटा में बचपन बीता.लखनऊ और मुजफ्फरपुर में भी रहे.सालों से कम्ब्रिज  में रहकर शोध्य-कार्य और पत्रकारिता.आप टू सर्किल नेट  के प्रबंध संपादक हैं.आपका अंग्रेजी में  ब्लॉग है Logging life.
आपसे  kashif@urdustan पर संपर्क किया जा सकता है.]
  
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14 comments: on "एक दंगे को याद करते हुए"

kshama ने कहा…

Dangon me hamesha masoom mare jate hain..ek aur danga jo Jamshedpur me hua tha...jiska aankhon dekha haal maine suna,to laga aie logon ki kya apni vivek buddhee hotihi nahi? 'Jab naash manujpe chhata hai, pahle vivek mar jata hai'

shikha varshney ने कहा…

Ahhh behad marmik dil dahla dene wala anubhav ..poora to padha hi nahi gaya...kaise jhela hoga masumon ne.

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

kashif saahab aur buzurgwaar huda saahab kee baten sunkar yaqenan jism laraz jaata hai.
allah saari insaaniyat ko in fasadon se bachaye.aameen.

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

tata ke fasad me hamare bhi rishtedaar apne shikaar huye the.ye danda na hokar siyasi fasad tha aur police ne isme achcha role nahin nibhaya tha.
kashif sahab ne aankhin dekhi byaan ki hai.

Yusuf Kirmani ने कहा…

मैं आपके दर्द को समझ सकता हूं। मैंने कई दंगों को कवर किया है और इंसान को इंसाने से दुश्मनी निभाते सामने से देखा है। आपने अच्छा ही किया जो इसे हिंदी में लिखा और भाई शाहरोज के जरिए हम लोगों तक पहुंचाया। इसी तरह कलम चलती रहे।

बेनामी ने कहा…

kya bat kaha sir ji
really aacha article hai

बेनामी ने कहा…

rudrnath sinh: pahli bar kisi blog par aya hun aur kuch likhna chhat hun.lekh se ye to sabit ho hi jata hai ki danga kisi ke bhi hit me nahin hota.ye ham log abhi barely me dekh rahe hain.aur maare jate hain bebas majboor.
ishvar ham sab ko budhdhi de.

emala ने कहा…

kashif sahab ki is yaad ne barson se qaid kai naasoor ko hara kar diya.tata me rahne wale har log hindu ho ya musalman is dard ko samajh sakte hain.

Suman ने कहा…

sriman ji,
aapki tippani tatha sujhaav prapt hui iske liye aapko dhanyvaad yadi sambhav ho to kripya hamare mobile number 09450195427 par baat karne ka kast karein hamko accha lagega.

sadar
suman
loksangharsha.blogspot.com

Fauziya Reyaz ने कहा…

insaan se bada jaanwar koi nahi hai...ye baat der sawer saabit ho hi jaati hai

Ashish (Ashu) ने कहा…

आह मत पूछिये आप ने दंगो की याद दिला दी बरेली याद आ जाता हॆ....आपने सही कहा कि अपराधियो को राजनिति मे लाने के लिये हम खुद ही जिम्मेदार हॆ..

पनिहारन ने कहा…

जानें किस गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी हमें सुनाकर बचपन का वो मासूम वक्त खराब किया गया..जिसमें तारों को गिनते हुए वहां से परियों के आने-जाने का रास्ता खोज सकते थे...क्योंकि दंगों के इतिहास में गंगा-जमुनी तस्वीर मुझे तो कहीं भी नजर नहीं आती है...और पिछली कई पीढ़ियां इसकी गवाही देती है...अगर गंगा-जमुनी तहजीब को एक विज्ञापन मान लिया जाये...तो इसके बार-बार दोहराने का मतलब समझना आसान हो जायेगा...इस विज्ञापन का प्रचारकर लाशों की पूंजी तैयार करना और उससे सत्ता के बाजार में खरीददारी करने का व्यवसाय पुराना है... लेकिन आज भी जारी है...

Amitraghat ने कहा…

हैबतअंगेज़ वर्णन....."
amitraghat.blogspot.com

सैयद | Syed ने कहा…

मेरी अम्मी अक्सर जमशेदपुर के इन दंगों को याद करके भावुक हो उठती हैं... वो जमशेपुर से ही हैं. उन्होंने भी अपना बहुत कुछ खोया है उन दंगों में...

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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