बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 3 मार्च 2010

पगडंडी वापस नहीं लौटती



 














ख़ालिद ए ख़ान की क़लम से


पहले की  तरह
धुंधली आँखों से
बस देखती रहती है
गाँव की सीमा से लगती 
बडी सड़क की ओर
 
अब   पगडंडी वापस नहीं लौटती

चौपाल में फैला हुआ है
मरघट सा सन्नाटा
शाम को बैठे रहते है
कुछ पुरनिया
हुक्के के साथ
अपनी शेष स्मृति
को धुएँ  में  उड़ाते  हुए


खूँटी  से लटके
ढोल मंजीरे
रह रह कर हिल
उठते है
हवा के झोके के साथ
अब इनेह कोई नहीं पूछता है

गाँव के चौराहे की
चाय की दुकान पर
अब नहीं लगता
लोगो का मजमा
वो बुढ़ा पंडित
खुद से ही बतियाता
रहता है

गाँव को छुकर निकलती
दुबली सी नदी
ठिठक कर ठहर सी गयी है
अब नहीं आता कोई
बच्चो का झुंड
करने इससे अठखेलियाँ


गाँव का सबसे बुढ़ा
बरगद
उसकी डालियाँ
अतीत से छनती
रहती है कुछ यादे
उससे चिमटी
एक पुरानी पतंग
की सरसराहट
उसे भविष्य में
ला पटकती है
और वह देखने लगता है
इधर से उधर

शहर से आती हवा ने
भर दिए नए सपने
यहाँ की  नयी पीढ़ी में
और यह उड़ पहुँचे
बड़े से शहर के बड़े से
कारखानों में
 
 
अब यहाँ
जवान होती नस्लों
में भी शहर के ख्वाब
तैरते रहते है


जब ये गाँव से कटे लोग
कारखानों से लौटते हैं
अपनी अपनी मांदों में
थक कर
रात को करवट
बदलते  हुए

 
गाँव का झोंका
छु जाता है इनकी देह से
तो आकार लेने लगता है
इनके बहुत अन्दर बैठ हुआ
इनका गाँव


ढोल मंजीरे की
थाप तेज होने लगती है
बरगद की छाँव
ढक लेती है
 
इन्हें
पूरा का पूरा


दुबली सी नदी का
पानी
गिला कर देता
इनकी आँखों को


अब यह सभी
उड़ जाना चाहते हैं
वापस
पर

अब




 









पगडंडी वापस नहीं लौटती .







[कवि-परिचय: जन्म सुल्तानपुर में.और शिक्षा लखनऊ से वाणिज्य स्नातक .गत कई सालों से दिल्ली में रहकर रोज़ी-रोटी की तलाश.साहित्य,कला में रूचि.]


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19 comments: on "पगडंडी वापस नहीं लौटती"

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह भई बहुत सुंदर.

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

laut ti zaroor hai pagdandi bhai..lekin ab gaon bhi vo gaon nahin raha jiski aap charcha kar rahe hain,

sangeeta swarup ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति है....गांव से बाहर निकल कर लोग जीवन की आप धापी में लौटना भूल जाते हैं....पर गांव तो हर पल याद आता होगा...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

खालिद साहब, आदाब
गांव और शहर के ताने बाने में बुनी ये नज़्म असरदार है.
मेरा एक शेर है-
वहां की सादगी में दर्स है रिश्तों की अज़मत का
जिसे तुम गांव कहते हो, वो मक़तब याद आता है.

शारदा अरोरा ने कहा…

बड़ी ख़ूबसूरती से यादों में डुबकी लगा आई है आपकी ये कलम , कितना दर्द छुपा है इस पगडंडी के वापस न लौटने की सोच में | दमदार !

shikha varshney ने कहा…

प्रभावशाली अभिव्यक्ति

anand pandey ने कहा…

bahaut achche se kaha aapne.

Jaaved saab ka ek sher hai " Tum apne kasbon mein jaa ke dekho, wahaan bhi ab shehar hi base hain, ke khojte ho jo zindagi tum, vo zindagi ab kahin nahi hai..."

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...सुन्दर रचना,बहुत बहुत बधाई!!!

soni ने कहा…

bahut achha likhte hai.....sundar rachna.....badhai.

शेरघाटी ने कहा…

शहरोज़ भाई...फिर से ब्लॉग पूरा नहीं खुल रहा...बड़ी मुश्किल से रिफ्रेश कर कर के कविता पढ़ी है....कमेन्ट नहीं पोस्ट कर पा रही.मेल से भेज रही हूँ आप पब्लिश कर दीजियेगा

"गाँव की सौंधी महक समेटे हुए है,ये रचना....वो पगडण्डी,झाल मजीरे,दुबली सी नदी...बहुत कुछ अपना सा और छूटा छूटा सा लगा...ऐसा लगता है...ये निर्दोष समाँ बस हमारी यादों में ही जिंदा है....शहर की हवा ने गाँव के निर्मल बयार को मटमैला कर दिया है....बहुत ही अच्छी लगी सादगी भरी ये रचना "
RASHMI RAVIJA

shama ने कहा…

Apna gaanv...vahan kee pagdandi yaad aa gayi aur aankhen nam ho gayin...

kshama ने कहा…

Sach to yah hai ki, chhodi huee pagdandipe ham nahi laut pate...dilme wo dard simta rahta hai..

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

phool sir chadha jo chaman se nikal gaya

izzat use mili jo watan se nikal gaya

munna jee ने कहा…

kabile tarif khalid sahab , rachna dil ko chhu gaI , AUR GAON KI YAD TAJA HO GAI ................MUBARAK ITNI SUNDAR RACHNA KE LIYE

Amitraghat ने कहा…

"बहुत बढ़िया जनाब......"
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

anita agarwal ने कहा…

pehli baar aapke blog per ayi hoon...bahut sunder aur sachhi rachna...kuch lines to behat sunder ban padi hain..jaisae ki..."gaav ko chuti dubli si nadi......."
sach hai ab gaanv gaanv nahi rahe..sab kuch badal sa gaya hai...shaher ki tez hawa gaanv ke peepal ko chu chuki hai....
ek bahut sashakt rachna ke liye badhai sweekaar karein.....
aur haan .ye photo aapki hi hai na?

anita

Dr. RAMJI GIRI ने कहा…

pagdandi ke prateek se bahut hi sufiyana bat kah dali hai....

Amit K Sagar ने कहा…

काफी वक़्त से कोई कविता नहीं पढ़ी थी, सच कहूं तो आज यह रचना पढ़कर लगा कि मैं कुछ ऐसे ही रचना पढ़ना चाहता था.
बहुत-बहुत शुक्रिया. पढने में मजा आया वहीँ बदलते दौर से फिर फिर एकाएक टकराया हूँ. उम्दा रचना. जारी रहें.

rashmi ने कहा…

gaun ki yaad dila gayi....per sach ab gaun gaun nahi lagta aur hamari bhi drishti badal gayi hai....hum subhidhabhogi ho gaye hai...

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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