बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 20 जनवरी 2010

लन्दन में लड़की

एक अकेली एक शहर में आशियाना ढूंढती है, 
आबूदाना ढूंढती है!!

उसे भी बच्चों की किलकारी और कोयल की कूक भली लगती है.उसके पास ठाठे मारता अल्हड बांकपन है! आम इंसान का दिल है. भले ग़म का हुजूम हो लेकिन खुशियों की लज्ज़तें  उसे भी चाहिए, आखिर क्यों नहीं! रंग-बिरंगी दुनिया के बीच ऐसे लोगों का भी एक कोना है जो अंधेरों से पटा है, लेकिन उनकी बदरंग  होती बेतरतीब ज़िंदगी के आँगन -गलियारे  में खिलखिलाती मासूमियत भी है! 

लंदन जो एक शहर है, आलम में इन्तिखाब यानी संसार-भर में जिसकी तूती बोलती है.वो दिन बीत गए जब अँगरेज़ और उनके देश को हिक़ारत भरी नज़र से देखा जाता था.आला पढ़े-लिखे से आधा-आखर जानकार भी शिक्षा और , इस से भी ज़्यादा रोज़ी-रोटी की जुगत के लिए इस शहर की तरफ हमारे देश से भी कूच करते हैं.लेकिन वहाँ पहुंची एक लडकी या औरत की स्थिति किन राहों से होंकर गुज़रती है,यह सर्वे इसकी बारीकबीनी करता है.
 इसे संभव किया है स्वतंत्र-पत्रकार और ब्लॉगर साथिन 
शिखा वार्ष्णेय  ने.उनका आभार!-शहरोज़ 

आर्थिक,सामाजिक और धार्मिक समस्याओं  से जूझती जान!!


एक कहावत है कि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती ..मुझे ये कहावत  लन्दन  में  बसी भारतीय मूल की महिलाओं पर एकदम चरितार्थ जान पड़ती है,
 भले ही भारत में रहने वाली महिलाएं यहाँ लन्दन में रहने वाली महिलाओं की किस्मत पर रश्क करें , परन्तु यहाँ रहने वाली भारतीय मूल की महिलाओं के लिए ये जीवन  कदापि सहज नहीं होता...., ......यहाँ रहने वाली महिलाओं को आर्थिक,सामाजिक और धार्मिक कई तरह की समस्याओं  से जूझना  पड़ता है.सबसे पहले आती है आर्थिक समस्या - जिससे यहाँ आते के साथ ही दो चार होना पड़ता है क्योंकि परिवार में एक की कमाई  से यहाँ नहीं निर्वाह किया  जा सकता ऐसे  में सभी को अपने लिए आर्थिक साधन ढूँढने  पड़ते हैं जो की यहाँ के क़ानूनी अधिकार और  नियमों की जानकारी न होने से बहुत ही जटिल होता है.. आप चाहे कितने भी पढ़े लिखे हो जरुरी नहीं कि आपकी योग्यता के  अनुसार  आपको यहाँ काम मिल जाये खासकर तब जब आपको ज़रुरत हो .इसलिए  अधिकाशंत:  महिलाओं को  मजबूरी में टेस्को जैसे किसी सुपर स्टोर में ही काम करना पड़ता  हैं
35 वर्षीय नुबला जो अपने देश में प्रवक्ता के पद  पर कार्य करती थीं ,उनका कहना है की वह अपने को यहाँ बहुत बेबस पाती हैं उनकी सिक्षा और अनुभव का यहाँ कोई मोल नहीं और यहाँ आकर मोटी  फीस देकर यहाँ का course   करके भी उन्हें किसी शिक्षण संसथान में कोई काम नहीं मिला  अंतत उन्हें एक सुपर स्टोर में एक मामूली सा काम करना पड़ा और फिर वे आर्थिक बोझ के चलते वहीँ अटक कर  रह गईं हैं. जिसके चलते वो अपने आप को कभी संतुष्ट नहीं पाती और मानसिक तनाव झेलती हैं..
और फिर इसी से जुडती है सामाजिक समस्याएँ. जो एक समस्या  आमतौर पर देखने में आती है वो है ... confusion ....आम तौर पर भारतीय महिलाएं - भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के बीच  अपने आपको फंसा पाती है ...यहाँ आने के बाद उसे सामना करना पड़ता है  एक अलग परिवेश का .....जहाँ वह एक तरफ पाश्चात्य महिला की तरह बाहर  काम करके कुछ पैसे कमा कर आत्म निर्भर होकर,आजादी से  जीना चाहती है , वहीँ अपने घर में भारतीय परिवेश को निभाने का मोह भी  नहीं छोड़ पाती और बदले में पाती है दोहरा बोझ , बाहर  सारा दिन काम करने के वावजूद घर पर आकर उसे एक भारतीय  घरेलू  महिला का  दायित्व  भी निभाना पड़ता है, घरेलू  कामों में कोई मदद न मिलने की वजह से और  अपनी  भारतीय आदतों की वजह से वो मजबूर होती है दोहरे मापदंड जीने के लिए .....वो चाहती तो है कि भारत से दूर यहाँ विदेशी परिवेश में आकर उन लोगों में घुल मिल जाये उनकी तरह ही बन जाये ,परन्तु उसकी मानसिकता उसे वहां तक पहुँचने नहीं देती ....और उसका व्यक्तित्व  लटक जाता है अधर में .ऐसी ही एक भारतीय महिला ने बताया की "हम भारतीय महिलाएं अपने आप को अपनी  ही संस्कृति और मूल्यों में क़ैद महसूस करती हैं और गोरे रंग  में ढलने के चक्कर में अपना रंग भी गवां देती हैं..."  यही वजह है कि भारत से दूर रह रहे भारतीय मूल के लोगों  में हमें ज्यादा भारतीयता का दिखावा देखने को मिलता है ..आपने  कभी भारत के किसी डिस्को में या किसी modren पार्टी में किसी युवती को साड़ी  में देखा है? परन्तु यहाँ आपको किसी भी डांस पार्टी में भारतीय  युवतियां  साड़ी  में डांस करती हुई दीख जाएँगी.आज की किसी भी भारतीय महिला से ज्यादा धार्मिक यहाँ की एशियन महिलाएं आपको नजर आयेंगीं.  आज आप यहाँ आकर देखें तो पाएंगे की ये महिलाएं कहीं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं आज की हिन्दुस्तानी महिलाओं से, क्योंकि उनके लिए भारतीयता के पैमाने आज भी वही  हैं जो आज से ३० -३५ साल पहले थे और इस विदेशी धरती पर वो उसे अपनी  मूल पहचान के तौर पर सहेजकर रखना चाहती हैं   ....वे  ये तो चाहती है कि उसकी बेटी भी यहाँ रह रहे बाकी लोगों की तरह पढ़े ,बोले परन्तु उन्हीं की तरह आचरण करते हुए उसे देखना उन्हें  गंवारा नहीं होता , वहीँ वो बेटी परेशान रहती है इस दोहरे मापदंड से उसे समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों है? जब वो उन्हीं बच्चों के साथ उसी स्कूल में एक ही तरह से पढ़ती हैं  तो वो उनकी ही तरह आचरण क्यों नहीं कर सकती ? और इन सबका नतीजा होता है एक अजीब असमंजस की स्तिथी एक मानसिक उलझन  . ..जिससे यहाँ रहने वाली ज्यादातर महिलाओं  को मैने  जूझते  देखा है.. ...इसके अलावा जो एक बात यहाँ की महिलाओं को सालती है वो है अकेलापन...... एक मर्द तो फिर भी यहाँ आकर यहाँ के परिवेश, काम काज में घुलमिल जाता है  ..परन्तु एक भारतीय महिला लाख कोशिशें करने के वावजूद यहाँ की  संस्कृति नहीं अपना पाती. और अपने परिवेश और अपने लोगों के साथ की कमी हर क्षण महसूस करती है.....भारतीय तीज त्यौहार ,उत्सव आदि पर अपने लोगों में शामिल न हो पाने की विवशता उसे हमेशा ही सताती रहती है .और इससे उपजती हैं अवसाद ,आत्मविश्वास की कमी, और  निराशा वादी दृष्टिकोण जैसी समस्याएं. यहाँ तक की कुछ तबके की औरतों को यहाँ घरेलु हिंसा का शिकार होता भी पाया जाता है जो यहाँ की व्यवस्था और कानून की जानकारी के बिना एक विवशता  भरा जीवन जीने  को मजबूर होती हैं.

हाल  ही में अपने पति की बीमारी की वजह से तंजानिया से आई ४५ वर्षीय रिया का हाल तो बहुत ही दयनीय  है २ बेटियों की ये माँ के लिए एक तरफ  घर,बच्चों और पति की जिम्मेदारी है ,दूसरी तरफ आर्थिक रूप से संबल होने के लिए अपनी पढाई और नौकरी   .इन सब में एक साथ वो बिना किसी मदद के कैसे सामंजस्य  बिठाये  उसकी समझ में नहीं आता और  अपनी बेबसी का उसे कोई हल दिखाई नहीं देता.
अर्थार्त भारतीय स्त्रियों जीवन यहाँ भी फूलों की सेज नहीं है उसमें भी बहुत संघर्ष है ,त्याग है, जिम्मेदारियां हैं .शायद अपनी धरती से ज्यादा ही.
(लन्दन में रह रहीं  कुछ भारतीय और पाकिस्तानी मूल की महिलाओं पर किये, सर्वे पर आधारित .)


 [लेखिका-परिचय - जन्म: नई दिल्ली में , स्कूली शिक्षा :रानीखेत से हुई
च्च शिक्षा :मास्को  स्टेट यूनिवर्सिटी से TV जर्नलिस्म  में गोल्ड मेडल के साथ मास्टर्स डिग्री
अनमोल वचन: अँग्रेज़ी अथवा अन्य भाषाएँ जानना उतने गर्व की बात नही है , जितना अपनी मातृ भाषा को महत्व देना ।
पसंदीदा कवि: हरिवंश राय बच्चन और रामधारी सिंह दिनकर
रूचि: ग़ज़ल सुनना, कविताएँ लिखना , पेंटिंग करना , ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करना आदि
आज प्रासांगकिक:  अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा माध्यम ब्लॉग्स
सम्प्रति: सॉफ़्टवेयर इंजीनियर  पति श्री पंकज गुप्ता  के साथ लन्दन में रहकर स्वतंत्र लेखन ]
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22 comments: on "लन्दन में लड़की"

sangeeta swarup ने कहा…

शिखा जी के मद्ध्यम से जो जानकारी मिली है, उससे मन विह्वल हो गया ...सच दूर बैठ कर यही लगता है की वहाँ लोग बहुत सुकून से रहते होंगे....ये प्रस्तुति सोचने पर मजबूर करती है की कितना कठिन जीवन है वहाँ पर स्त्रियों का.....

इस जानकारी के लिए आभार

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

शिखा वार्ष्णेय जी का सर्वे आलेख पढ़ कर लगा कि वाकई भारतीय संस्कारों में पली नारी विश्व के किसी भी देश में क्यों ना चली जाए, अपने संस्कारों और परंपराओं को बड़ी मुश्किल से भूल पाएँगी.
इसीलिए शायद यह कहा जाता है कि भारतीय लोग रिश्तों को महत्ता समझते हैं.
यह तो सच है कि इसके कारण उन्हें अनेकानेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है , फिर भी वे इन्हे निभाने की और भारतीयता की पहचान को संजोए रहती हैं.
बावजूद इसके ऐसा नहीं है कि भारतीय महिलाएँ अपनी साख और अपनी पद-प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं कर रही हैं. एक बारीक अध्ययन ने ये ज़रूर बताया है कि भारतीय महिलाओं का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन यह उतना भी असंभव नहीं है कि लक्ष्य की प्राप्ति ना की जा सके.
- विजय

rashmi ravija ने कहा…

थोडा बहुत अंदाजा तो था,विदेशों में भारतीय महिलाओं की स्थिति का,पर शिखा जी की आँखों देखी बातों ने मजबूर कर दिया सोचने को...'दूर के ढोल कितने सुहावने लगते हैं'...अपना देश अपने रिश्तेदारों से दूर...ये महिलायें कितना बेबस और लाचार पाती हैं,खुद को.बहुत ही संजीदगी से इनकी पैनी नज़र ने कई समस्याओं से जूझती महिलाओं के सच को उजागर किया है.
और ये तो बिलकुल सच है...विदेश में बस जाने वाले लोग अपनी पहचान खो जाने के डर से अपनी संस्कृति की डोर जरा ज्यादा ही मजबूती से थामे होते हैं....और भारतीय समाज में आ रहें बदलाव से अनभिज्ञ रह जाते हैं
बहुत ही यथार्थपरक आलेख.

राज भाटिय़ा ने कहा…

शहरोज भाई शिखा वार्ष्णेय जी का लेख बस आईने का एक तरफ़ का हिस्सा ही दिखाता है, ओर वो भी पीछे वाला, लेकिन कई बातो से सहमत भी हुं.
यहां सभी भारतिया ऒरते काम नही करती, बस वही ओरते काम करती है जिन के मर्द लालच के बस मै हो, जिन्होने अपना मकान खरीदा हो, या अन्य कर्जा लिया हो, हमारे यहां ९९% भारतिया ओरते काम पर नही जाती, हाऊस वाईफ़ बन कर घर पर रहती है, बच्चो को ओर घर को सम्भालती है, यहां घर पर भी ओरतो को इतना समय नही मिलता की वो आस पडोस मै जाये,
हां यहां के लोग जो ३०, ४० साल पहले के संस्कार साथ लाये है उन्ही मै रचे बसे है, बच्चे यहां पढे लिखे है ओर दोनो ही समाज को बहुत अच्छी तरह से समझते है, ओरते पार्टी बगेरा मै साडी मै जाना ज्यादा पसंद करती है, सब मिला कर यहां की ओरते बहुत खुश है, अगर लेखिका अभी लंडन मै है या कही युरोप मै है तो आप उन्हे मेरा मेल का पता दे दे, मै उन्हे आईने का असली हिस्सा दिखा दुंगा,

Udan Tashtari ने कहा…

साफ चित्र प्रस्तुत किया है...

बहुत अच्छा लगा यह आलेख पढ़्ना!!


शहरोज भाई का आभार और शिखा जी को बेबाक लेखन की बधाई!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

shikha tumne jo vichaar preshit kiye hain, unse us duniya ko gahrayi se janne ka mauka mila hai...tumhe aur shahroz ji ko badhaai

शेरघाटी ने कहा…

हर का अपना नज़रिया होता है.किसी को गिलास आधा भरा दीखता है तो किसी दुसरे को आधा khaali भी !लेकिन सच दोनों है.लन्दन में लडकी, या यूँ कहें किसी और परदेस में jaddojihad करती किसी औरत की व्यथा अलग -अलग भले हो लेकिन उसके दर्द और विषाद या हर्ष और सुख में बहुत सूक्ष्म अंतर नहीं हो सकता.मैं चाहता हूँ कि आप दूसरा पक्ष ज़रूर लिखें. लेकिन यहाँ ही कमेन्ट kee शक्ल में पोस्ट करें.हाँ यदि विस्तृत लिखने का मन है तो मुझे अवश्य ही मेल करें, आभार होगा!
@ राज साहब!

my e-mail id: shahroz_wr@yahoo.com

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

शिखा साहिबा ने बहुत ही उम्दा मज़मून लिखा है.राज जी भी गर अपना ख्याल तफसील से दर्ज कर दें तो बात मुकम्मल हो सकती है.उनका कहना सही नहीं कि लेखिका को ही वो दूसरा पक्ष बताएँगे.

shikha varshney ने कहा…

राज़ भाटिया जी ! सबसे पहले आपने लेख पढ़ा और इतना समय निकल कर प्रतिक्रिया दी उसके लिए शुक्रिया....
अब आते हैं आईने के रुख की तरफ ...तो मॉफ कीजियेगा आपने लेख भी एक नजर से ही पढ़ा है ....बात या समस्या कोई भी हो हर चीज़ के २ रुख होते ही हैं और वे अपने अपने अनुभवों पर ही आधारित होते हैं ....मुझे आपकी बात से इंकार नहीं ..बेशक वहां भी औरतें बहुत खुश होंगी ..में भी एक हॉउस वाइफ ही हूँ और बहुत खुश हूँ ....यूं तो हमारे भारतीय समाज में भी एक तबके की औरतें बहुत खुश हैं उनकी कोई समस्या नहीं ..तो क्या हम ये मान लें की भारत में महिलाओं की कोई समस्या ही नहीं? या हर काम काम पर जाने वाली महिला का पति लालची होता है? आप का कहना है की ९९% महिलाएं हॉउस वाइफ हैं और उन्हें पड़ोस तक जाने का टाइम भी नई मिलता ...इसे आज के परिवेश में क्या कहेंगे आप ? क्या कोई भी महिला काम सिर्फ इसलिए करती है क्योंकि उसका पति लालची है ? माफ़ कीजियेगा पर आज की महिला भी पढ़ती लिखती है और अपने पेरों पर खड़ा होना चाहती है ..वो अपने पति की आर्थिक मदद करके अपने बच्चों को बेहतर जिन्दगी देना चाहती है .सिर्फ घर बैठकर घर और बच्चे ही नहीं संभालना चाहती कभी एक औरत के नजरिये से देखिये तो शायद आपको चीज़ें कुछ अलग लगें....मैं यहाँ लन्दन में ४ साल से हूँ और ये मेरा यहाँ किया /देखा हुआ अनुभव है ...आप जिस तबके की बात कर रहे हैं वो वे हैं जो यहाँ पूरी तरह स्थापित हो गए हैं ...मैं उनलोगों की बात कर रही हूँ जो अब आ रहे हैं या जब आते हैं तब उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है ...क्या यहाँ रहने के लिए मकान नहीं चाहिए ? क्या यहाँ फ्री में घर मिलता है रहने के लिए...हाँ उनलोगों की समस्या जरुर कम हो जाती है जो किसी तरह सरकारी मदद लेने में सफल हो जाते हैं..
मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है जानकार की जिस जगह आप रहते हैं वहां महिलाएं बहुत खुश हैं ...उनकी कोई समस्याएं नहीं...पर जो मैने इस लेख मैं लिखा है वो भी कटु सत्य है और जो उदहारण मैंने दिए हैं उनका प्रतिशत ९९% नहीं तो ५०% तो अवश्य है और आप यहाँ (लन्दन ) आयें तो ये सच मैं आपको भी दिखा दूंगी..
बाकी तो नजरिया अपना अपना ..और दृष्टि अपनी अपनी
एक बार फिर से बहुत शुक्रिया आपका

शहरोज़ ने कहा…

राज साहब कहाँ है आप!! लोगों पता करो, जल्दी खबर करो,मुझे एक शे'र याद आ रहा है:
कमेन्ट दे तो दिया है गुरूर-ओ-क़हर के साथ
मेरा जवाब भी लौट दो मेरे असर के साथ!!

हाहाहा!!अन्यथा न लें!!

GAURAV VASHISHT ने कहा…

Shikha ji ko is articleke liye dehron badhaian, unhone jo paksh rakha , jis tarha se unhone aaina dikhaya, ya kahe ki ek message diya, har us navagantuk ko, jo europe me basna chahta hai ya job karna chahta hi, bead hi upyogi hai, mere vichar se unhone ek samajik sachhaie ko ujagar karke, ek bahut hi himmat ka kam kiya hai, iskle liye teh dil se shukriya.

mene isme koi"Raj bhaita" sahib hai shayad wo bhi kahi europe me hi rehte honge, jaisa ki prateet hota hai, aur mujhe unke commetns padhkar bahut hi dukh hua, ki bina samjhe hue ya yun kahe ki gehrai me gaye hue hi unhone apne adh-kachche dimaag ka parichey diya, sorry Mr.Raj bhatia, aap europr me rehtehue europe to kya aapko ab India ke bare me bhi koi khas jaankari nhi rahi, aapke cooments padhkar to yahi prateet hota hai, aapke comments se aapke sankeern mansikta ka parichay milta hai. Appne shikah ji ke article ko positively nhi liya, aur aapka ye kehna ki mahilaye wahi kam per jaati hain jinke pati lalchi hote hain. nihayat hi ek bimar mansik pravatti ke vyakti hi aisa keh sakte hain. aur kya kahu, iska matlab mahilaon ko padh lik kar job me nhi aana chahiye. sorry Mr.RAj bhatia, i m really sorry and sad wid ur cheap comments..

jenny shabnam ने कहा…

shikha ji,
gyaan-chakshu kholne wala aalekh hai. mujhe yahi lagta ki aurat kisi bhi desh mein ho kam ya jyada uski durgati ek see hin hai. apne desh mein to fir bhi maanya rudhigat niyamon ke tahat kabhi kabhi kuchh paristhitiyon mein samman bhi paa jati hain, maslan...dhaarmik kaarya, putra-janm, ya fir gharelu kaarya ka utkrisht sampaadan. parantu videsh mein rahne wali mahila chautarfa maansik dwand jhelti hain. waha ki paristhiti se saamnajasya bithana, aur apne desh ki parampara ka nirwaahan karte hue dohre maandand ke sath jina. kyunki jis purush ke sath wo waha rah rahi hai wo purush us soch se bahar hin nahin nikal sakta jo pidhiyon se use mili hai.
na sirf europe ki baat hai ye balki kisi bhi desh ki baat karen to haalaat ek se hin hai.
jo bhi mahilaayen baahar kaam karti hain, unpar kaam ka dohra bojh padta hai. ghar aur bachche ki jimmewari unki hi rahti hai. main aam madhyawargiye pariwaar ki baat kah rahi hun.
ek mahodaye ne aaine ka jo dusra hissa dikhaya hai, padhkar achambhit rah gai ki auraten pati ke laalachi hone ki wajah se kaam karti hain. agar aurat kaam karti hai to wo pati aur ghar ke aarthik sahyog ke sath hin apni yogyata aur shiksha ka sadupyog karti hai.
auraten kahin ki bhi ho khush nahin rah sakti kyunki saamajik maanyataayen purush stree keliye ek nahi hai.
bahut bahut badhai, uttam lekhan keliye.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

विदेश की तो छोड़ो अपने ही देश के दूसरे शहर में रहना ही कहां इतना आसान है

आवेश ने कहा…

मैंने शिखा का लेख उसी दिन पढ़ लिया था जिस दिन इसे पोस्ट किया गया था ,कमेन्ट देर में देना अब समीचीन लग रहा है |@ राज जी मै नहीं जनता आप किस देश से हैं ,लेकिन एक मौलिक बात आपसे कहना चाहूँगा ,एक हिन्दुस्तानी स्त्री की आत्मा चाहे वो किसी भी देश में क्यूँ न रहे कभी नहीं बदलती है ,पत्रकारिता की भाषा में हम इसे "जेनेटिक ट्रांस्फोर्मेशन ऑफ़ कल्चर "कहते हैं |किसी आम हिन्दुस्तानी स्त्री की तरह वो अपने पति और बच्चों को मुश्किलों में नहीं देख सकती ,अगर घर में पैसों की जरूरत है तो वो काम पर जाएगी ,और हाँ ,एक पुरुष तो उम्र का बहाना बनाकर बैठ जायेगा लेकिन स्त्री चाहे बीमार हो या वृद्ध हो अपनी परवाह किये बगैर काम करती रहेगी |ये बातें लन्दन में रहने वाली स्त्री पर भी उतनी ही लागू है जितनी बिहार के किसी गाँव में रहने वाली औरत पर |आपने जो एक बात कही है उसमे स्त्रियों को लेकर आपकी अपनी मानसिकता दृष्टिगोचर होती है ,ऐसा लगता है आप भी उस एक आम भारतीय पुरुष की तरह है जो स्त्रियों को घर की चाहरदीवारी में कैदकर ,खुद ड्राइंग रूम में बैठकर स्त्री सशक्तिकरण ,भारतीय संस्कृति जैसे विषयों पर मित्रों को चाय पीते हुए व्याख्यान देता है ,और सच है ऐसे परिवारों में महिलाओं को समय नहीं मिलता,अगर समय निकालने कि वो कोशिश करे तो इसे पुरुष विद्रोह मानता है |
जहाँ तक शिखा के इस लेख का प्रश्न है में उनके बारे में सिर्फ एक सच जानता हूँ वो एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की परास्नातक हैं और अपनी सारी उपलब्धियों को धत्ता बताते हुए यूरोप में अपने परिवार का पालन पोषण करते हुए कलम की ताकत को जिन्दा रखे हुए हैं ,ये जीवन उस जीवन से निसंदेह बहुत कठिन है जो हम आप जी रहे हैं, वो हमारे मोहल्ले की किसी आम औरत की तरह हर पल संघर्ष कर रही है ,ऐसी महिला जब कुछ लिखती हैं तो हम उसे नजीर मानते हैं ,आशा है आप कामकाजी स्त्रियों के प्रति अपनी मानसिकता को बदलकर कुछ अच्छा लिखेंगे ,सोचेंगे और पढेंगे

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

शिखा वार्ष्णेय जी को सलाम.

महफूज़ अली ने कहा…

शिखा जी के इस पोस्ट पर मैं लेट हो गया..... ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ.....

'अदा' ने कहा…

शिखा,
तुम्हारी बातों से सौ प्रतिशत सहमत हूँ...
जाके पाँव न फटे बिवाई सो का जाने पीर पराई...
आज से ३०-४० वर्ष पहले जो लोग विदेशों में बसे है उनके लिए सभी कुछ ठीक है...समस्या नए लोगों को है...
पहले जितनी सुविधायें और जितने अवसर थे अब नहीं हैं...अगर हैं भी तो स्पर्धा ज्यादा है....फिर एकाकीपन और मौसम की मार तो है ही....कोई outlet नहीं है अपने frustration का...अपनों से दूरी है ही जो साथ हैं उनको भी दूर जाने में समय नहीं लगता है...किसी भी तरह की समस्या आप खुद भुगतते हैं और खुद ही सुलझाते हैं....न सुलझे तो अपना कर बैठ जाते हैं...इस मुद्दे पर मैं इतना लिख सकती हूँ की छपने के लिए ब्लॉग कम हो जाए...इसलिएफिलहाल ..
मेरी एक कविता है...इसी बात पर पढ़ लें तो अच्छा रहेगा...

http://swapnamanjusha.blogspot.com/2010/01/blog-post_20.html

सुशीला पुरी ने कहा…

शहरोज़ जी सबसे पहले तो आपका हार्दिक आभार ...
मै भी यहाँ पहली बार आई और सुखद लगा ,शिखा जी ने बड़ी बेबाकी से 'दूर के ढोल सुहाने ' की पोल खोली है .

HARI SHARMA ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
HARI SHARMA ने कहा…

दूरस्थित स्वर्गो की छाया से विश्व गया है बहलाया
हम क्यू उनपर विश्वास करे जब देख नही कोई आया
(बच्चन)

जीवन है तो दुख है और दुख का कारण लोभ मोह है
तुलसी बाबा कह गये - मोह सकल ब्याधिन कर मूला
देश हो चाहे विदेश जिन्दगी का नाम सन्घर्ष ही है
लेख अच्छा था और टिप्पणी भी बढिया थी. राज सहाब से सिर्फ़ उनकी इस बात से असहमति कि जिनके पति लालची होते है वो महिलाये नौकरी करती है.
भाईगौरव बशिष्ट ने जिस भाषा मे राज साहब का मजाक बनाया है वो उनके सुसन्सकार का परिचायक है. अधिक नही कहुन्गा क्योकि लीगल नोटिस से मुझे भी डर लगता है.

rahil ने कहा…

Shikha ji ko is articleke liye dehron badhaian,lekh aacha laga ....

Sanjiv Kavi ने कहा…

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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