बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

रश्मि प्रभा की कविता और उनका संसार

रश्मि प्रभा.! यानी हम जैसे अधिकाँश ब्लागरों  की दीदी.शायद ही कोई होगा जो इनकी काव्य-रश्मियों से अलक्षित रहा हो....प्रभा .यह  की सुमित्रा नंदन पन्त जैसे शिखर-आचार्य कवि ने न केवल आपका नामकरण किया अपितु  "सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन" ,जैसी अमर-पंक्ति आपको समर्पित की !  शब्दों की इस विरासत को आप बखूबी सुरक्षित रखते हुए..भारतीय-साहित्य की परम्परा को संवर्धित करने में सक्रीय योगदान दे रही हैं..इनका मन जहाँ तक जाता है, इनके शब्द उसकी अभिव्यक्ति बन जाते हैं। यकीनन ये शब्द ही इनका सुकून हैं...कब शब्द इनके साथी हुए, कब इनके ख़्वाबों के सहचर बन गए, कुछ नहीं पता.... इतना याद है कि शब्दों से खेलना इन्हें इनकी माँ ने सिखाया. जिस तरह बच्चे खिलौनेवाला घर बनाते हैं, माँ ने शब्दों की टोकरी दी और कभी शाम, कभी सुबह, कभी यात्रा के मार्ग पर शब्दों को रखते हुए ये शब्द-शिल्पी बन गईं। व्यस्तताओं का क्रम बना, पर भावनाओं से भरे शब्द दस्तक देते गए .... शब्दों की जादुई ताकत माँ ने दी, कमल बनने का संस्कार पिता (स्व.रामचंद्र प्रसाद) ने, परिपक्वता समय की तेज आँधी ने।
सपने इनकी नींव हैं - क्योंकि इनका मानना है कि सपनों की दुनिया मन की कोमलता को बरकरार रखती है...हर सुबह चिड़ियों का मधुर कलरव - नई शुरूआत की ताकत के संग इनके मन-आँगन में उतरा...ख़ामोश परिवेश में सार्थक शब्दों का जन्म होता रहा और ये अबाध गति से बढती गईं और यह एक और सौभाग्य कि आज यहाँ हैं....अपने सपने, अपने आकाश, अपने वजूद के साथ!

अपने बारे में कहती हैं: . अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते...मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं...बहुत पहले ही दीदी ने मुझे सामग्री उपलब्ध करा दी थी.महज़ एक आग्रह पर! लेकिन मैं अभागा आज आपके बीच हाज़िर हो रहा हूँ.आप और आपके रचना-संसार के मुताल्लिक कुछ कहना , फिलहाल अपुन के  वश का नहीं.आप खुद उनसे रूबरू हों.उनकी माताजी श्रीमती सरस्वती प्रसाद का संस्मरण आपको एक अलग  दुनिया में ले जाता है, जहां संघर्ष और सात्विकता की जुगलबंदी बहुत ही मोहक तथा प्रभावपूर्ण हो जाती  है. शहरोज़ 
________________पन्तजी व उनकी मानस-पुत्री यानी रश्मिजी की माताश्री



सरस्वती प्रसाद का अविस्मरणीय संस्मरण  



ज़िन्दगी के मेले में - 'अपनी खुशी न आए थे............' पर आ गए। आरा शहर की एक संकरी सी गली के तिमंजिले मकान में मेरा जन्म २८ अगस्त को हुआ था। समय के चाक पर निर्माण कार्य चलता रहा। किसी ने बुलाया 'तरु' (क्योंकि माता-पिता की इकलौती संतान होने के नाते मैं उनकी आंखों का तारा थी)। स्कूल (पाठशाला) में नामांकन हुआ 'सरस्वती' और मेरी पहचान - सरू,तरु में हुई। प्रश्नों के आईने में ख़ुद को देखूं और जाँचूं तो स्पष्टतः मुझे यही कहना होगा -
मेरे मन के करीब मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी माँ थी । खेल-खिलौने , साथी तो थे ही ,पर मैं 'उसे' नहीं भूल सकी, जिसने सबसे पहले मेरे मन को रौशन किया - वह था , मेरे कमरे का गोलाकार रोशनदान । सूरज की पहली किरणें उसी से होकर मेरे कमरे के फर्श पर फैलती थीं । किरणों की धार में अपना हाथ डालकर तैरते कणों को
मुठ्ठी में भरना मेरा प्रिय खेल था । यह खेल मेरे अबोध मन के अन्दर एक अलौकिक जादू जगाता था ।
मेरी आँखें बहुत सवेरे पड़ोस में रहनेवाली नानी की 'पराती' से खिलती थी। नानी का क्रमवार भजन मेरे अन्दर अनोखे सुख का संचार करता था । मुंह अंधेरे गलियों में फेरा लगनेवाले फ़कीर की सुमधुर आवाज़ इकतारे पर - ' कंकड़ चुन-चुन महल बनाया
लोग कहे घर मेरा है जी प्यारी दुनिया
ना घर मेरा ना घर तेरा , चिडिया रैन बसेरा जी
प्यारी दुनिया ......' । मेरे बाल-मन में किसी अज्ञात चिंतन का बीजारोपण करती गई। फ़कीर की जादुई आवाज़ के पीछे - पीछे मेरा मन दूर तक निकल जाता था। मेरे कुछ प्रश्नों पर मेरे माँ , बाबूजी गंभीर हो जाते थे। मेरा बचपन शायद वह छोटी चिडिया बन जाता था,जो अपनी क्षमता से अनभिज्ञ नभ के अछोर विस्तार को माप लेना चाहती थी। मुझे लगता था सूरज का रथ मेरी छत पर सबसे पहले उतरता है। चाँद अपनी चांदनी की बारिश मेरे आँगन में करता है। तभी मैं अपने साथियों के साथ 'अंधेरिया-अंजोरिया'का खेल खेलते हुए मुठ्ठी में चांदनी भर-भर कर फ्रॉक की जेब में डालती थी और खेल ख़त्म होने पर उस चांदनी को निकालकर माँ के गद्दे के नीचे छुपा देती थी....
मैंने पढ़ना शुरू किया तो बहुत जल्दी ही पुस्तकों ने मुझे अपने प्रबल आकर्षण में मुझे बाँधा। इस प्रकार कि देखते-ही-देखते मेरी छोटी सी आलमारी स्कूली किताबों के अलावा और किताबों से भर गई। 'बालक,चंदामामा,सरस्वती,' आदि पत्रिकाओं के अलावा मैं माँ के पूजा घर से 'सुख-सागर,प्रेम-सागर,रामायण का छोटा संस्करण ' लेकर एकांत में बैठकर पढ़ती थी। राजेंद्र बाबू की आत्मकथा (मोटी पुस्तक)मैंने बचपन में ही पढ़ी थी। आलमारी खोलकर पुस्तकें देखना , उन्हें करीने से लगाना ,उन पर हाथ फेरना मुझे अत्यन्त सुख पहुंचाता था । शायद यही वजह रही होगी या मेरे घर का एकाकीपन कि मेरे मन को कोई तलाश थी। कल्पना के ताने-बाने में कोई उद्वेग भरता था,छोटे से मन कि छोटी सी दुनिया में कोई अनजानी उदासी चक्कर काटती थी। मन के कोने में रंगीन तितली पालनेवाली तरु को किसकी खोज थी?-शायद रिश्तों की। और इसी खोज ने मेरी कल्पना को पंख दिए ,जो मैं देखती थी उससे परे जाकर भी सोचती थी।
मैं जिस मुहल्ले में रहती थी वहां हर जाति और तबके के लोग थे। बड़े-छोटे का भेदभाव क्या था,कितना था - इससे परे चाचा,भैया,काका का ही संबोधन मैं जानती थी। कई मौके मेरी आंखों के आगे आए - रामबरन,रामजतन काका को गिडगिडाते देखा -' मालिक,सूद के ५०० तो माफ़ कर देन,जनम-जनम जूतों की ताबेदारी करूँगा'......बिच में टपक कर तरु बोल उठती - 'छोड़ दीजिये बाबूजी, काका की बात मत टालें' और तरु का आग्रह खाली नहीं जाता।
कुछ कर गुजरने की खुशी को महसूस करती तरु को लगता कोई कह रहा है, ' तरु - तू घंटी की मीठी धुन है,धूप की सुगंध,पूजा का फूल ,मन्दिर की मूरत.....मेरे घर आना तेरी राह देखूंगा....' कौन कहता था यह सब?रामबरन काका ,रामजतन काका , बिलास भैया , या रामनगीना .........
अपनी ही आवाज़ से विस्मय - विमुग्ध हो जाती थी तरु। खाली-खाली कमरों में माँ माँ पुकारना और ख़ुद से सवाल करना,साथ-साथ कौन बोलता है? जिज्ञासु मन ने जान लिया यह प्रतिध्वनि है। छोटी तरु के मुंह से प्रतिध्वनि शब्द सुनकर उसके मास्टर जी अवाक रह गए थे और माथे पर हाथ रखा था ' तू नाम करेगी ' । पर किसने देखा या जाना था सिवा तरु के कि खाली-खाली कमरों से उठता सोच का सैलाब उसे न जाने कहाँ-कहाँ बहा ले जाता है। फिर वह यानी मैं - अपने एकांत में रमना और बातें करना सीख गई,शायद इसीका असर था कि उम्र के २५ वे मोड़ पर आकर मेरी कलम ने लिखा - 


 शून्य में भी कौन मुझसे बोलता है,
मैं तुम्हारा हूँ,तुम्हारा हूँ
किसकी आँखें मुझको प्रतिपल झांकती हैं
जैसे कि चिरकाल से पहचानती हैं
कौन झंकृत करके मन के तार मुझसे बोलता है
मैं तुम्हारा हूँ,तुम्हारा हूँ..........

 
धरती से जुड़े गीत-संगीत कि दुनिया मेरे चारों ओर थी,इसलिए मुझे गीत-संगीत से गहरा लगाव था,उसके प्रति प्रबल आकर्षण था।
चिडियों का कलरव , घर बुहारती माँ के झाडू कि खुर-खुर, रामबरन काका के घर से आती गायों के गले कीघंटियों की टूनन -टूनन , काकी के ढेंकी चलाने की आवाज़ ,नानी की पराती,गायों का रम्भाना,चारा काटने की खटर -खुट-खट ,बंसवाड़े से आती हवा की सायं-सानी (सीटियों जैसी)....... संगीत ही संगीत था मेरे चारों ओर। वकील चाचा के घर से ग्रामोफोन पर के.सी.डे और सहगल की आवाज़ बराबर आती। सहगल का यह गीत आज भी याद आता है तो अपनी सोच पर हँसी आ जाती है , 'करेजवा में हाय राम लग गई चोट ' , सुनकर मुझे दुःख होता था किकिसने इसे इस प्रकार ज़ोर से मारा कि बराबर गाता है लग गई चोट ! यह बात तो बचपन की थी,पर बरसों बाद जाना कि चोट जो दिल पर लगती है,वह जाती नहीं। दिनकर जी के शब्दों में "आत्मा में लगा घाव जल्दी नहीं सूखता"।
इन्ही भावनाओं में लिपटी मैं घर गृहस्थी के साथ १९६१ में कॉलेज की छात्रा बनी । हिन्दी प्रतिष्ठा की छात्रा होने के बाद कविवर पन्त की रचनाएं मेरा प्रिय विषय बनीं । ६२ में साथियों ने ग्रीष्मावकाश के पहले सबको टाइटिल दिया ।कॉमन रूम में पहुँची तो सबों ने समवेत स्वर में कहा ' लो, पन्त की बेटी आ गई'...... अब ना मेरी माँ थी और ना बाबूजी । साथियों ने मुझे पन्त की बेटी बनाकर मेरी भावनाओं को पिता के समीप पहुँचा दिया। उस दिन कॉलेज से घर जाते हुए उड़ते पत्तों को देखकर होठों पर ये पंक्तियाँ आई ," कभी उड़ते पत्तों के संग,मुझे मिलते मेरे सुकुमार"......

 
"उठा तब लहरों से कर मौन
निमंत्रण देता मुझको कौन"..........

 
अगले ही दिन मैंने पन्त जी को पत्र लिखा , पत्रोत्तर इतनी जल्दी मिलेगा-इसकी उम्मीद नहीं थी। कल्पना ऐसे साकार होगी,ये तो सोचा भी नहीं था.....'बेटी' संबोधन के साथ उनका स्नेह भरा शब्द मुझे जैसे सपनों की दुनिया में ले गया। अब मैं कुछ लिखती तो उनको भेजती थी,वे मेरी प्रेरणा बन गए । वे कभी अल्मोडा भी जाते तो वहां से मुझे लिखते.......हमारा पत्र-व्यवहार चलता रहा। पिता के प्यार पर उस दिन मुझे गर्व हुआ , जिस दिन प्रेस से आने पर 'लोकायतन' की पहली प्रति मेरे पास भेजी,जिस पर लिखा था 'बेटी सरस्वती को प्यार के साथ'
........
M.A में नामांकन के बाद ही मेरे साथ बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई,अचानक ही हम भंवर में डूब गए - इसके बाद ही हम इलाहबाद गए थे। पिता पन्त जब सामने आए तो मुझे यही लगा , जैसे हम किसी स्वर्ग से उतरे देवदूत को देख रहे हैं। उनका हमें आश्वासित करना,एक-एक मृदु व्यवहार घर आए कुछ साहित्यकारों से मुझे परिचित करवाना,मेरी बेटी को रश्मि नाम देना, और बच्चों के नाम सुंदर पंक्तियाँ लिखना और मेरे नाम एक पूरी कविता....
जिसके नीचे लिखा है 'बेटी सरस्वती के प्रयाग आगमन पर' यह सबकुछ मेरे लिए अमूल्य धरोहर है। उन्होंने मुझे काव्य-संग्रह निकालने की सलाह भी दी,भूमिका वे स्वयं लिखते,पर यह नहीं हो पाया।
अंत में अपने बच्चों के दिए उत्साह और लगन के फलस्वरूप , उनके ही सहयोग से मेरा पहला काव्य-संग्रह "नदी पुकारे सागर" प्रकाशित हुआ। उस संग्रह का नामकरण मेरे परम आदरनिये गुरु भूतपूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ पूर्णेंदु ने किया....भूमिका की जगह उन्होंने लिखा " इन रचनाओं के बीच से गुजरते हुए...." मैं हमेशा आभारी रहूंगी- 


 कौन से क्षण थे वे
जो अपनी अस्मिता लिए
समस्त आपाधापी को परे हटा
अनायास ही अंकित होते गए
मैं तो केवल माध्यम बनी............! 
 


रश्मि प्रभा की कवितायें 













एक सपना,एक मुस्कान.......

मेरे पास सपने हैं,
खरीदोगे?
आसमानी , रूमानी , ख्याली.....
कीमत तो है कुछ अधिक ,
पर कोई सपने बेमानी नहीं.......
जो भी लो-हकीकत बनेंगे,
शक की गुंजाइश नहीं!
.....कीमत है - एक मुस्कान,
सच्ची मुस्कान,
झरने-सी खिलखिलाती,
हवाओं - सी गुनगुनाती,
बादलों- सी इठलाती.......
आज की भागमभाग में
इसी की ज़रूरत है !
तुम एक सपना लो-
और मेरे पास एक मुस्कान दे जाओ,
.......
इनसे ही मेरे घर का चूल्हा जलता है!


स्वयं का आह्वान...........

हम किसे आवाज़ देते हैं?
और क्यूँ?
क्या हम में वो दम नहीं,
जो हवाओं के रुख बदल डाले,
सरफरोशी के जज्बातों को नए आयाम दे जाए,
जो -अन्याय की बढती आंधी को मिटा सके...........
अपने हौसले, अपने जज्बे को बाहर लाओ,
भगत सिंह,सुखदेव कहीं और नहीं
तुम सब के दिलों में हैं,
उन्हें बाहर लाओ...........
बम विस्फोट कोई गुफ्तगू नहीं,
दुश्मनों की सोची-समझी चाल है,
उसे निरस्त करो,
ख़ुद का आह्वान करो,
ख़ुद को पहचानो,
भारत की रक्षा करो !...........

आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ...........

रात रोज आती है,
हर रात नए सपनों की होती है,
या - किसी सपने की अगली कड़ी.....
मैं तो सपने बनाती हूँ
लेती हूँ एक नदी,एक नाव, और एक चांदनी........
...नाव चलाती हूँ गीतों की लय पर,
गीत की धुन पर सितारे चमकते हैं,
परियां मेरी नाव में रात गुजारती हैं...
पेडों की शाखों पर बने घोंसलों से
नन्ही चिडिया देखती है,
कोई व्यवधान नहीं होता,
जब रात का जादू चलता है.....
ब्रह्म-मुहूर्त में जब सूरज
रश्मि रथ पर आता है-
मैं ये सारे सपने अपने
जादुई पोटली में रखती हूँ...
परियां आकर मेरे अन्दर
छुपके बैठ जाती हैं कहीं
उनके पंखों की उर्जा लेकर
मैं सारे दिन उड़ती हूँ,
जब भी कोई ठिठकता है,
मैं मासूम बन जाती हूँ.......
अपनी इस सपनों की दुनिया में मैं अक्सर
नन्हे बच्चों को बुलाती हूँ,
उनकी चमकती आंखों में
जीवन के मतलब पाती हूँ!
गर है आंखों में वो बचपन
तो आओ तुम्हे चाँद पे ले जायें
एक नदी,एक नाव,एक चाँदनी -
तुम्हारे नाम कर जायें..........................


मैं हौसला हूँ.......

मैं हौसला हूँ,
मेरी ऊँगली थाम के तुम चल सकते हो,
ऐसा नहीं कि मैं अनाम सुनामियों से नहीं गुजरता,
पर , उसके छींटे मैं तुम पर नहीं पड़ने दूंगा...
मुझे अंधेरों से डर भी लगता है,
पर अंधेरों की ठेस से तुम्हे बचा लूँगा...
आँखें भर जाती हैं कभी,
पर तुम्हारे लिए वह मोती बन जायेंगे,
यकीन तो करो हौसले का,
हौसला बनता ही है गिरने के बाद.......
मैं एक बार नहीं.......कई बार गिरा हूँ,
अँधेरे रास्तों को भी पहचान गया हूँ,
तुम मेरी ऊँगली थाम सकते हो,
मेरे पदचिन्हों पर भरोसा कर सकते हो......
-


आलोचना होती रही है.......

सतयुग हो,द्वापरयुग या कलयुग!
आलोचना होती रही है॥
राम ने राज्य का परित्याग किया,
पिता के वचन को उनकी आज्ञा मान-
कैकेयी का मान रखा,
१४ वर्ष का वनवास लिया..............
सीता के मनुहार में,
स्वर्ण-मृग का पीछा किया,
सीता हरण से व्याकुल रावण का संहार किया,
फिर प्रजा हितबध होकर ,
सारे सुखों का त्याग किया...........................

कृष्ण ने राम से अलग दिखाई नीति,
लीला के संग छल का जवाब छल से दिया,
'महाभारत' के पहले-
कुरुक्षेत्र का दृश्य दिखाया,
दुर्योधन से संधि-प्रस्ताव रखा,
स्वयं और पूरी सेना का चयन भी
उसके हाथ दिया-
दुर्योधन ने जाना इसे कृष्ण की कमजोरी,
ग्वाले को बाँध लेने की ध्रिष्ठता दिखलाई...
कृष्ण ने विराट रूप लिया,
महाभारत के रूप में,
रिश्तों का रक्त तांडव चला...

फिर आया कलयुग!
१०० वर्षों की गुलामी का चक्र चला-
गाँधी का सत्याग्रह ,नेहरू की भक्ति,
भगत सिंह का खून शिराओं में दौड़ा ......
एक नहीं,दो नहीं-पूरे १०० वर्ष,
शहीदों की भरमार हो गई,
जाने-अनजाने कितने नाम मिट गए-
'वंदे-मातरम्' की आन पर!
हुए आजाद हम अपने घर में,
१०० वर्षों के बाद
और जन-गण-मन का सम्मान मिला...........

सतयुग गया,गया द्वापर युग,
हुए आजादी के ६० साल........
स्वर उभरे-
राम की आलोचना,
कृष्ण की आलोचना,
गाँधी की खामियां...
दिखाई देने लगीं-
क्या करना था राम को,
या श्री कृष्ण को,
या गाँधी को.............
इसकी चर्चा चली!

आलोचकों का क्या है,
आलोचना करते रहेंगे...
आलोचना करने में वक्त नहीं लगता,
राम,कृष्ण,गाँधी बनने को,
जीवन का पल दूसरो को देना होता है,
मर्यादा,सत्य,स्वतन्त्रता की
राहों को सींचना होता है....

गर डरते हो आलोचनाओं से,
देवदार नहीं बन सकते हो,
नहीं संभव है फिर चक्र घुमाना-
सतयुग नहीं ला सकते हो!!!!!!!!!!!!

[ कवयित्री परिचय:जन्म- 13 फरवरी, सीतामढ़ी (बिहार)
शैक्षणिक योग्यता- स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)
रुचि- कलम और भावनाओं के साथ रहना।
प्रकाशन- "कादम्बिनी" , "वांग्मय", "अर्गला", "गर्भनाल" और कुछ महत्त्वपूर्ण अखबारों में रचनायें  तथा अनमोल संचयन नामक संकलन  प्रकाशित]







Digg Google Bookmarks reddit Mixx StumbleUpon Technorati Yahoo! Buzz DesignFloat Delicious BlinkList Furl

15 comments: on "रश्मि प्रभा की कविता और उनका संसार"

shikha varshney ने कहा…

आह मन आनंदित हो गया ....और इससे ज्यादा कुछ कहना मेरी क्षमता में नहीं..

शेरघाटी ने कहा…

शिखा जी से सहमत!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

भाई बहुत सुन्दर प्रस्तुति .. रश्मिजी बहुत अच्छी कलमकार है और अच्छी कविताएं लिखती है ...आभार

sangeeta swarup ने कहा…

माँ सरस्वती की कृपा श्रद्ध्येय सरस्वती जी पर रही...उनका जीवन परिचय पा कर मन आल्ल्हादित हुआ...

रश्मि जी की लेखनी के बारे में कुछ कहने की सामर्थ्य मेरी लेखनी में नहीं है....यहाँ संगृहित एक एक रचना बहुत सुन्दर हैं और मन को प्रेरित करने वाली हैं...उनकी लेखनी को नमन

Dipak 'Mashal' ने कहा…

aapke bare me padhna sukhad laga mammy ji..

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji ka vistrit sansaar aur parichay jaankar man aanandit hua. shubhkamnayen.

rashmi ravija ने कहा…

रश्मि दी की कविताओं से तो पहले से ही परिचय था...आज उनकी शख्सियत के बारे में जान और उनकी माता जी के संस्मरण सुनना सौभाग्य ही है.और उस पर यह दुर्लभ चित्र,संग्रह करने योग्य.बहुत बहुत शुक्रिया आपका ऐसे अभूतपूर्व व्यक्तित्व से रु-ब-रु करवाने का

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

bahut hi khoobsurat prastuti!
rashmi ji kee maata ji ka sansmaran dekar aapne bahut hi achcha kiya.

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

@shabnamji

main bhi aanandit hui!

Shayaar ने कहा…

Kya baat hai kya baat hai....aapne bahut hi achha kaam kiya..di ki itni rachnayein ek saath padhne ko mili...waah ek se badhkar ek chuninda moti :)

--Gaurav

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप के लेख से रशिम जी के बारे ओर उन के परिबार के बारे बहुत कुछ नया पधने को मिला, बहुत सुंदर लेख आप का धन्यवाद

ρяєєтι ने कहा…

Sunder Prastuti...!
Shukriya @ Shahroz ji...!

ρяєєтι ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ρяєєтι ने कहा…

मैं एक बार नहीं, कई बार गिरा हूँ,
अँधेरे रास्तो को भी पहचान गया हूँ,
तुम मेरी ऊँगली थाम सकते हो,
मेरे पदचिन्हों पर भरोसा कर सकते हो ...!

@रश्मि माँ - यही कहेंगे......
हमें रास्तो की जरुरत नहीं है,
हमें तेरे पैरो के निशान मिल गए है...Ilu..!

सतीश सक्सेना ने कहा…

रश्मि जी के बारे में बताने ले लिए शुक्रिया शहरोज भाई !

एक टिप्पणी भेजें

रचना की न केवल प्रशंसा हो बल्कि कमियों की ओर भी ध्यान दिलाना आपका परम कर्तव्य है : यानी आप इस शे'र का साकार रूप हों.

न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)