बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

'लव जिहाद' कट्टर दिमाग की उपज


काफी दिनों से मैं अंतरजाल से दूर रहा. इन दिनों पुरानी मेल्स देख रहा हूँयहाँ मुझे बिहार अंजुमन नामक एक ग्रुप की मेल मिल गई.पेशे से पत्रकार और सशक्त हिन्दी कवि संजय कुंदन की इस रपट को आप लोगों के सामने लाना ज़रूरी इसलिए कि क्या ऐसा भी मुमकिन है!!!-सं.




संजय कुंदन

पिछले कुछ दिनों से केरल में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और श्रीराम सेना इस प्रचार में जुटी ह

ै कि मुस्लिम कट्टरपंथी राज्य के मुसलमान युवकों को इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि वे हिंदू लड़कियों से प्रेम-विवाह करें और उनका धर्म परिवर्तित करें। इसके लिए इन युवकों को देश के बाहर से पैसा उपलब्ध कराया जा रहा है। केरल कैथलिक बिशप काउंसिल ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि न सिर्फ हिंदू लड़कियों, बल्कि ईसाई लड़कियों को भी मुसलमान बनाने की साजिश रची जा रही है, ताकि केरल में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ सके। और इसके लिए बाकायदा 'लव जिहाद' और 'रोमियो जिहाद' नामक संगठन बनाया गया है।

लेकिन इस थिअरी के जनक कौन हैं? यह थिअरी दरअसल पुलिस की है। वहां यह सारा मामला शुरू हुआ दो शादियों से। शहंशाह नामक एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू लड़की से शादी की और उसके एक मित्र सिराजुद्दीन ने एक ईसाई लड़की से विवाह किया। इन लड़कियों ने अपना धर्म बदल लिया। उनके अभिभावक हाईकोर्ट में गए और उन्होंने आरोप लगाया किउनकी बेटियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है। लेकिन लड़कियों ने कोर्ट में आकर साफ कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से मजहब बदला है और वे अपने पति के साथ ही रहेंगी। इस पर कोर्ट ने उन लड़कियों को सलाह दी कि वे कुछ दिन अपने अभिभावकों के साथ रहें और उन्हें यह बात समझाएं कि उन्होंने शादी और धर्म-परिवर्तन अपनी मर्जी से किया है।

कोर्ट के निर्देश पर दोनों लड़कियां अपने मां-बाप के घर चली गईं। कुछ दिनों बाद जब वे अगली सुनवाई पर आईं तो उन्होंने कोर्ट से कहा कि वे अब अपने पति की बजाय अपने पैरंट्स के साथ ही रहेंगी। उनके इस तरह पलट जाने पर पुलिस ने 'लव जिहाद' की एक थिअरी पेश कर दी। इस पर अदालत ने डीजीपी को पूरे मामले की जांच का आदेश दिया। और जांच के बाद डीजीपी ने जो रिपोर्ट दी उसमें लव जिहाद या रोमियो जिहाद जैसी किसी संस्था या किसी ट्रेंड के अस्तित्व से इनकार किया गया। यह जरूर कहा गया कि धर्मांतरण के कुछ मामले हुए हैं, जिनकी जांच चल रही है, लेकिन यह कहना गलत है कि यह सब बाकायदा किसी योजना के तहत हो रहा है।

सच तो यह है कि इस मामले में पुलिस भी कठघरे में नजर आई। शहंशाह का आरोप है कि उसकी पत्नी के एक रिश्तेदार ने, जो एक सीनियर पुलिस अफसर हैं, लव जिहाद की कहानी गढ़ी है। उधर, कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी लव जिहाद की सचाई की जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट डीजीपी की रिपोर्ट से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। उसने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वह रिपोर्ट के कुछ वाक्यों को स्पष्ट करें। दो समुदायों के बीच विवाह केरल या कर्नाटक के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय से इसमें बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त नई पीढ़ी जाति या धर्म की सीमाओं को नहीं मानती। उसने इन दायरों को तोड़ा है जिसे समाज के रूढ़िवादी तत्व पचा नहीं पा रहे हैं। उन्हें मंजूर नहीं कि समुदायों और जातियों के बीच की दीवारें टूटें, उनके बीच परस्पर सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर आदान-प्रदान बढ़े। इसलिए ये दो समुदायों के बीच विवाह को रोकने पर आमादा हैं। इन्होंने इसे जिहाद से जोड़कर सनसनी फैलाने की कोशिश की है।

यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है जिस पर आसानी से लोगों को डराकर गोलबंद किया जा सकता है। अपना मकसद साधने के लिए इन्होंने तरह-तरह के दुष्प्रचार किया और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। कर्नाटक में इन्होंने आरोप लगाया कि लव जिहाद के तहत कुछ महिलाओं का अपहरण कर लिया गया है। हाल में पता चला कि उनमें से एक महिला दरअसल मोहन कुमार नामक उस शख्स का शिकार बनी है, जिसे 18 महिलाओं के कत्ल के इल्जाम में पकड़ा गया है।

आज हिंदूवादी ताकतें केरल और कर्नाटक में चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि वे हिंदू लड़कियों को साजिश से बचाना चाहती हैं। लेकिन इन्हें हरियाणा जैसे राज्यों के उन हिंदू लड़के-लड़कियों की चिंता नहीं है, जिन्हें प्रेम विवाह करने के कारण अपने समाज की भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। हरियाणा में पिछले कुछ समय में एक ही गोत्र में विवाह के कई मामलों में या तो प्रेमी की हत्या कर दी गई या प्रेमी-प्रेमिका दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया। राज्य में जाति या खाप पंचायतें किसी भी तरह से प्रेम विवाह को रोकने में जुटी हैं और वे इसके लिए तमाम नियम-कानूनों और मानवीयता की धज्जियां उड़ा रही हैं। लेकिन हिंदू हितों की बात करने वाले संगठन वहां चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं। जाहिर है, इन संगठनों और जाति पंचायतों में कोई खास फर्क नहीं हैं।

ये दोनों समाज में मध्यकालीन मूल्यों को बचाए रखना चाहते हैं। वैसे यह भी सच है कि इस तरह के लोग केवल एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि इस तरह का विचार रखने वाले तत्व सिर्फ धार्मिक-राजनीतिक संगठनों में ही नहीं, पुलिस-प्रशासन में भी हैं। पुलिस द्वारा मुसलमानों को आईएसआई एजेंट साबित कर देने या उनका संबंध किसी आतंकवादी गुट से जोड़ देने के कई झूठे मामले सामने आए हैं।

केरल और कर्नाटक में जिस तरह कुछ संगठनों ने कथित 'लव जिहाद' का हौवा खड़ा किया है, उससे एक बार फिर साफ हुआ कि हिंदूवादी ताकतें अपने सांप्रदायिक अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रही हैं, भले ही उनके तरीके अलग हों। उनका एक तबका मालेगांव और गोवा में विस्फोट कर रहा है तो दूसरा दुष्प्रचार में लगा है। संघ या बीजेपी के कुछ शीर्ष नेता भले ही कभी जिन्ना की तारीफ करके, देश के मुसलमानों की हालत पर चिंता जता करके , सेक्युलरिजम का गुणगान करके अपने उदार होने का भ्रम पैदा करें, पर सचाई यह है कि इन्होंने अपना हिंदू कार्ड छोड़ा नहीं है और इनके कार्यकर्ता मजहब के आधार पर नफरत की आग भड़काने का कहीं कोई मौका गंवाना नहीं चाहते। हैरत की बात यह है कि अक्सर इन्हीं का निशाना बनने वाला चर्च भी केरल में इनके साथ खड़ा नजर आया। यह इस बात का संकेत है कि धार्मिक संस्थाओं में असुरक्षा का भाव गहराया है और वे बदलते यथार्थ के साथ तालमेल बिठाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं।

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

ज़िन्दगी मौत न बन जाय संभालो यारो








शहर की बोलती इबारत
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फ़िल्म जागो के बहाने





मध्य- बिहार माओवादियों की हिंसक वारदातों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है . शेरशाह सूरी मार्ग,जिसे अब एन.एच-2 कहा जाता है पर स्थित है मध्य -बिहार का प्राचीन शहर शेरघाटी.वैदिक काल में भी इसका ज़िक्र मिलता है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं.एतिहासिक सन्दर्भ मुग़ल काल के अवश्य मिलते हैं.किव्न्दंती है कि शेरशाह ने यहाँ एक वार से शेर के दो टुकड़े किए थे। जंगलों और टापुओं से घिरे इस इलाके को तभी से शेरघाटी कहा जाने लगा.शेरशाह ने यहाँ कई मस्जिदें , जेल , कचहरी और सराय भी बनवाया था.तब ये मगध संभाग का मुख्यालय था.संभवता बिहार-विभाजन तक यही दशा रही.कालांतर में धीरे-धीरे ये ब्लाक बनकर रह गया। 1983में इसे अनुमंडल बनाया गया.मुस्लिम संतों और विद्वानों की ये स्थली रही है. वहीँ प्राचीन शिवालयों से मुखरित ऋचाएं इसके सांस्कृतिक और अद्यात्मिक कथा को दुहराती रहती हैं। १८५७ के पहले विद्रोह से गाँधी जी के '४२ के असहयोग आन्दोलन में इलाके के लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी हैं.हिन्दी साहित्य में पंडित नर्मदेश्वर पाठक,यदु नंदनराम, विजय दत्त युवाओं में प्रदीप, सुभाष और उदय आदि की सक्रियता है लेकिन उर्दु अदब यहाँ का काफी उर्वर और संग्रहणीय है। ख्वाजा अब्दुल करीम से असलम सादीपुरी , ज़हीर tishna,सिराज शम्सी से आज के नुमान -उल -हक ,फर्दुल हसन तक लम्बी फेहरिस्त है.शहर से लगे हमजापुर में भी कई नामवर शायर-अदीब रहते हैं।

जब हम चड्डी पकड़ कर दौड़ा करते थे तो रिक्शे के पीछे चिपकी रंगीन तस्वीरें आकर्षण थीं.और ये रिक्शा कस्बे की पहली टाकीज भूषन का रहता.कुछ ही दिनों बाद ये हाल बंद हो गया.टूरिंग सिनेमा हाल के नाम पर बने राजहाल को तीन दशक हुए होंगे, करीब इतना ही कमोबेश यहाँ मंचित हुए किसी नाटक को हुआ.इप्टा यहाँ कभी सक्रीय नहीं रहा , न ही रामलीलाओं की ही परम्परा रही है.लेकिन ऐसी पृष्ठभुमी में भी कई प्रतिभाएं ऐसी हैं जो न सिर्फ़ चमत्कृत करती हैं बल्कि लबरेज़ अपनी संभावनाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़े सूरमाओं को ललकारती भी हैं.इमरान अली भी इसमें एक hain .इक्कीसवीं सदी के इस उपभोक्तावादी दौर में आपादमस्तक समाज के लिए प्रतिबद्ध होना, निसंदेह जिंदादिली का काम है.इमरान में ऐसी ही खूबी है.स्थानीय समाचार चैनलों के लिए काम कर चुके सक्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता इमरान ने -जागो का निर्देशन कर अपनी तमन्ना को श्रम के बूते साकार किया, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने मिशन में सफल रहा यह युवा फिलहाल बहुरुप्या और शेरघाटी -गाथा नामक दो फिल्मों के लिए काम कर रहा है ।

दो शब्दों का युग्म जागो जहाँ आकर्षक और मोहक भी है वहीँ इस शब्द में उसकी गंभीरता भी निहित है। आम से लगते इस शब्द का इस फ़िल्म में निर्णायक अर्थों में इस्तेमाल हुआ है ।


ग्रामीण कस्बाई परिवेश और उसमें तीन स्कूली बच्चों के अपहरण के मामले से शुरू हुई यह फ़िल्म भ्रष्ट ,लचर प्रशासन , और आम-जन की असहाय स्थिति को सामने लाती है। यह बताती है कि अपराधियों की राजनीतिज्ञों के संग की जुगलबंदी किस तरह समाज के ताने-बाने को भंग कर रही है । स्थानिय बोली-भाषा में बनी इस फ़िल्म का विषय भले बिहार जैसे प्रांत के लिए चिर-परिचित हो लेकिन इसकी प्रस्तुति यह प्रश्न अवश्य खड़ा करती है कि आख़िर कब-तक यह सब देखा और सहा जायगा ?उपभोक्तावादी संस्कृति के रोज़ हावी होते जाने और असमानता की खाई चौड़ी से चौड़ी होते जाने के चलते समाज में उपजी रोजी-रोटी की हताशा और कही जाति तो कहीं वर्ग संघर्ष । और बेकार नवजवानों को प्रलोभन देकर अपराध के बीहड़ में उतार देना--संघर्ष नित्य नए आयाम ले रहा है.फ़िल्म की विशेषता स्थानीय कलाकारों (नवीन सिंह ,जे.पी.पाटली , विष्णुदेव प्रजापति , अमृत अग्रवाल , कंचन गुप्ता,कुंजन कुमार सिन्हा , रामस्वरूप स्वर्णकार, नवीन सिन्हा वंदना,चंद्रभूशन , सचिदानंद ठाकुर ),पत्रकारों (एस.अहमद, एस.के.उल्लाह, कौशलेन्द्र कुमार, मुहम्मद अली बैदावी, ), राजनेताओं (सुशील गुप्ता ,अजित सिंह , शाहिद इमाम ,लखन पासवान ) और कलमकारों (रज़ा शेरघाटवी , रामचंद्र यादव,नुमान-उल-हक,हिलाल हमज़ापुरी, इश्राक़ हमज़ापुरी ,समी-उर रहमान ) के अभिनय से और बढ़ गई है.यूँ तो भोजपुरी फिल्मों के धर्मेन्द्र यादव, बांगला रंगमंच के संजू और वालीवुड के अली खान जैसे नामचीनों ने भी अभिनीत पात्रों को जीवंत किया है.लेकिन बाल कलाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति हर फ्रेम में बरक़रार राखी है।

फ़िल्म अंत में यह संदेश अवश्य देती है कि अपराध को धर्म और जाति के खाने से हरगिज़ न देखा जाय। मौजूदा हालत के मद्देनज़र फ़िल्म सरफ़रोश के मशहूर गीत ज़िन्दगी मौत बन जाय , संभालो यारो....का इस्तेमाल बेहद सामयिक और महत्वपूर्ण हो जाता है.फ़िल्म में घटनाओं और स्थितियों का क्रमिक दृश्यांकन बहुत सहज लगता है। निर्देशक का श्रम बाल-कलाकारों अनम इमरान , सादिया एमाला और गौरव गुप्ता के अभिनय में कमाल होकर मुखर होता है.शेरघाटी के सिनेतिहास की इस पहली टेली -फ़िल्म में उर्दू के चर्चित शायर नदीम जाफरी aur लेखक- रंगकर्मी विजय दत्त ने भावप्रवण अभिनय किया है.


साजसज्जा ,संगीत और दूसरे पहलुओं में इतनी बारीकी और, भव्यता न बरती गई है.बावजूद व्यवसायिक फूहड़ता से फ़िल्म कोसों दूर है.फ़िल्म में संगीत पटना दूरदर्शन के कलाकार राजू लहरी ने और गया घराने के शास्त्रीय गायक राजेन्द्र सिजुवार ने प्रात: अलाप को स्वर दिया है।
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रविवार, 1 नवंबर 2009

जागो ...

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जागो-2

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जागो-3

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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)