बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

आदमी को खा गयी औरत


ज़िन्दगी में आ गयी औरत

आदमी को खा गयी औरत

कौन है माँ-बाप.. भूले सब
इस तरह से छा गयी औरत

आदमी कमज़ोर है कितना
हां पता यह पा गयी औरत

चाह कर वो छूट न पाया
आ गयी फिर ना गयी औरत

रूप की ताकत समझती है.
बस यहीं उलझा गयी औरत

एक दिन जादू उतरता है
बन गयी अब माँ गयी औरत

--गिरीश पंकज

( कवि की आत्म-स्विकिर्ति मै औरतों का बहुत सम्मान करता हूँ. अच्छी औरतो से भरी है यह दुनिया. लेकिन उपर्युक्त ग़ज़ल में घरफोडू औरतो के सन्दर्भ में कुछ शेर कहने की कोशिश की गयी है. इसे स्त्री -विरोधी विचार न समझा जाये. रचना के मर्म को सुधी पाठक समझेंगे ही, ऐसा विश्वास है. )

इसी सन्दर्भ में अभी-अभी एक अखबारनवीस से बतियाते हुए ख्यात लेखिका सुधा अरोड़ा ने कहा : पुरुष हतप्रभ है ऐसी स्त्री को तो पहले कभी उसने देखा नहीं था.यह नए किस्म की स्त्री ही, जो अपने करियर के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है .माफ़ करें, यह नयी स्त्री पारिवारिक जीवन के लिए खतरा बन गयी है ...सं.


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8 comments: on "आदमी को खा गयी औरत"

Mired Mirage ने कहा…

औरत माँ नहीं हो सकती। माँ औरत नहीं हो सकती। औरत तो कुछ चुड़ेल जैसी होती है ना! फिर माँ को औरत कैसे कह सकते हो?
घुघूती बासूती

Kulwant Happy ने कहा…

जैसे पत्थर को तराशने पर वो खुदा भी बन जाता है, वैसे ही औरत जब माँ बनती है तो वो उस पत्थर की तरह ईश्वर हो जाती है। हर चीज का हर जगह पर मतलब कुछ बदल जाता है।
महिलाओं की ही क्यों सुनी जाती है तब....

Rajey Sha ने कहा…

दरअसल ये औरत का नहीं आदमी के जि‍स्‍म में रहने वाले रसायनों का असर है कि‍ कभी तो वो उर्वशी और कभी चुड़ैलि‍या नजर आती है। आपको औरत क्‍या नजर आ रही है इसमें औरत की बनि‍स्‍बत आपकी शारीरि‍क, मानसि‍क ज्‍यादा जाहि‍र होती है।
मुझे एक भूली बि‍सरी सी कहानी याद आयी।

पि‍छले जमाने में एक चि‍त्रकार था। महीनों पहाड़ों पर जाकर एक स्‍थान वि‍शेष्‍ा के सुन्‍दर सुन्‍दर चि‍त्र बनाया करता था।
उसकी पत्‍नि‍ कहती तुम्‍हारे पास दि‍न महीने मापने का तरीका तो है नहीं कैसे तुम एक नि‍यत अवधि‍ बार वापस घर लौट आते हो? वो बोला - वो स्‍थान जहां मैं चि‍त्र बनाने जाता हूं वहां एक कुरूप सी बुढ़ि‍या बकरि‍यां चराने आती है, जो अक्‍सर दि‍खाई देती है। जब वो जवान नजर आने लगती है, मैं तुम्‍हारे पास वापस लौट आता हूं।

tarannum ने कहा…

इसे कौन सी कविता कहते है जनाब ??

T.M.Ziya, delhi ने कहा…

Bahut Sahi guruji
kulwant ne sahi kaha hai

गिरीश पंकज ने कहा…

meree ghazal ko itana samman de diya..? dhanyvad. shahroz, tumhare blog ko parhane vale bahut hai bhai, achchhi baat hai. meri kavitaye lete rahana. tumhare karan bahut-se logo tak pahuch raha hu, yah badi baat hai.achchhi-buree jaisi bhi ho, har pratikriya kaa mai swagat hi karoonga. sabki apni-apni soch hai. baharhaal mai to bus itana hi kahoonga ki-
shabd tak pahuche magar kyo bhav tak pahunche nahi/ ye shahar ke log hai jo gaanv tak pahunche nahi/ mai bulataa hi raha tapti dupahar me dosto/kya karoo jo log sheetal chhanv tak pahunche nahi.

ललित शर्मा ने कहा…

girish bhaiya, aap to sab jagah chhaye huye hain, badhai,

shikha varshney ने कहा…

हर चीज़ के अच्छे और बुरे २ पहलु होते हैं....ऐसे ही औरत भी है ,उसे किसी ने देवी बना दिया तो किसी ने चुड़ैल पर एक मानव किसी ने नहीं समझा.एक मानव होने के कारण उसमें भी कमिया हो सकती हैं,दोष हो सकते हैं....कहते हैं एक औरत में इतनी क्षमता होती है की चाहे तो वो घर को स्वर्ग बना दे ,और चाहे तो नरक... इस रचना में कवि ने भाषा जरुर तल्ख़ प्रयोग की है ,परन्तु इस तरह की औरतें भी होती होंगी जरुर. शायद.

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- अल्लामा जमील मज़हरी

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