बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 3 अगस्त 2008

विकलांगता का अभिशाप झेलते आदिवासी






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अभी जल और जीने की अन्य अत्यन्त मूलभूत चीज़ें भी जिस मुल्क के लोगों को मयस्सर नहीं वहां करोड़ों की लागत से परमाणु बिजली का ओचित्य समझ से परे ही है।



और आप जानते हैं।


-इस हालिया करार से महज़ ५-७ फीसदी ही बिजली मुहय्या हो पायेगी ।

-अम्रीका की दो कंपनियों को दस साल के अन्दर चालीस खरब का कारोबारी लाभ मिलेगा।
-अपने देश में बने बिजली कारखाने से वहां के ५००० लोगों को स्थायी रोज़गार और १५००० को अस्थायी काम मिलेगा.


और हमें मिलेगा:


अब तक विश्व में हुए परमाणु परिक्षण से दुगुना विकिरण-कचरों का सोगात।सर्वों से ये सच भी आया है रेडिओधार्मिता से विकलांगता,कैंसर,नपुंसकता में इजाफा होता है।इसकी जिंदा मिसाल राजस्थान के परमाणु बिजली घर के आस-पास और झारखण्ड में जादुगोडा की आबादी है।


इसी सिलसिले की कड़ी और है जहाँ सरकार की उदासीनता की वजह्कर प्रदूषित-जल का उपयोग करने को विवश उत्तर-प्रदेश के सुल्तानपुर के टपरी गाँव और सोनभद्र जिले के दर्जन-भर गाँव विकलांगता का दंश झेल रहे हैं।


युवा पत्रकार अवेश तिवारी इलाहबाद के हैं। सम्प्रति इक अख़बार से सम्बद्ध.मूल्यों को व्यवहार और लेखन-पत्रकारिता में भी बरकरार रखने के आप हिमायती हैं.प्रतिबद्धता की खातिर इन्होने इक अख़बार की नोकरी तक त्यागने में संकोच नहीं किया.-सं.


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सोनभद्र से अवेश तिवारी की रपट

सोनभद्र सदमे मे है । अभाव,उपेक्षा और सरकारी अक्षमता की बानगी बन चुके इस जनपद में शासन एवं सत्ता की काली करतूत एक त्रासदी पर परदा डालकर समूची पीढ़ी को विकलांग,नपुंसक और नेस्तनाबूद करने जा रही है ।
यहाँ के चोपन ,दुधी व म्योरपुर ब्लाक के आधा दर्जन गाँव फ्लोराइड के चपेट में हैं. प्रदूषित जल के कारण हजारों आदिवासी स्त्री पुरूष व बच्चे स्थायी विकलांगता के शिकार हो रहे हैं ,माताओं की कोख सूनी पड़ी है । तमाम जिंदगियों में छाया अँधेरा अनवरत गहराता जा रहा है राज्य पोषित विकलांगता का हाल ये है कि जलनिधि समेत तमाम योजनाओं मे करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के बावजूद यहाँ के आदिवासी गिरिजनों के हिस्से में एक बूँद भी स्वच्छ पानी नहीं । फ्लोराइड रूपी जहर न सिर्फ़ इनकी नसों मे घूल रहा है ,बल्कि निर्बल व निरीह आदिवासियों के सामाजिक -आर्थिक ढाँचे को भी छिन्न-भिन्न कर रहा है
सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य पूर्वी इलाकों मे फ्लोरोसिस का कहर अपाहिजों की बस्ती तैयार कर रहा है । यहाँ के पड़वा-कोद्वारी ,पिप्रह्वा ,कथौदी ,कुस्मुहा ,रास्पहरी,भात्वारी,राजो,नेमा ,राज मिलन ,बिछियारी समेत २ दर्जन गावों मे हिंडालको व एन।टी,पी।सी से निकलने वाले प्रदूषित जल का भयावह असर देखने को मिल रहा है। आलम ये है की लगभग १०० परिवारों के टोले पड़वा-कोद्वारी मे हर एक स्त्री -पुरूष व बच्चे को फ्लोराइड रूपी विष रोज बरोज मौत ओर धकेल रहा है । केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा विगत पाँच वर्षों में इस समूचे क्षेत्र मे फ्लोराइड मेनेजमेंट के नाम करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद न तो ओद्योगिक प्रदुषण पर लगाम लगाई जा सकी और न ही स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को लेकर कोई कवायद की गई
इस वर्ष भी अप्रैल माह मे कहने को तो फ्लोराइड मुक्त जल की व्यवस्था के नाम पर ५० लाख रुपए खर्च किए जाने का प्रशासन दावा करता रहा ,परन्तु जमीनी हकीकत ये है कुछ भी नहीं बदला हाँ,ये जरुर है की इन इलाकों के सैकडों ,तालाबों व कुओं पर लाल रंग का निशान लगाकर लोगों को पानी न पीने देने की चेतावनी देने का थोथा ज़रूर किया गया,मगर जबरदस्त पेयजल संकट से जूझ रहे इस जनपद मे नौकरशाही से थकहार चुके आदिवासियों ने अन्य कोई समानांतर व्यवस्था के अभाव में प्रदूषित जल का सेवन जारी रखा स्थिति इस हद तक गंभीर है कि हर एक परिवार फ्लुओरोसिस की अन्तिम अवस्था से जूझ रहा है कोद्वारी के रामप्रताप का शरीर इस कदर अकडा कि वो चारपाई से कभी उठ नही पाते उनकी पत्नी व लड़का भी इस भयावह रोग की चपेट मे हैं।
कमोबेश यही हाल रामवृक्ष ,चन्द्रभान ,हरिकृष्ण समेत अन्य परिवारों का है बच्चों मे जहाँ फ्लोराइड की वजह से विषम अपंगता,व आंशिक रुग्नता देखने को मिल रहा है ,वहीं गांव के विवाहितों ने अपनी प्रजनन व कामशक्ति खो दी है गांव के रामनरेश,कैलाश आदि बताते हैं :
अब कोई भी अपने लड़के लड़कियों की शादी हमरे गांव मे नही करना चाहता ,देखियेगा एक दिन हमरे गांव टोलों का नामो,निशाँ मिट जाएगा
महिलाओं मे फ्लोराइड का विष कहर बरपा रहा है । इलाके मे गर्भस्थ शिशुओं के मौत के मामले सामने आ रहे हैं ,स्त्रियाँ मातृत्व सुख से वंचित हैं,वहीं घेंघा ,गर्भाशय के कंसर समेत अन्य रोगों का भी शिकार हो रहे हैं ,लगभग ८० फीसदी औरतों ने शरीर के सुन्न हो जाने की शिकायत की है ।
नई बस्ती की लीलावती,शांति,संतरा इत्यादी महिलाएं कहती हैं की हम बच्चे पैदा करने से डरते हैं हमें लगता हैं की वो भी कहीं इस रोग का शिकार न हो जाए ।
फ्लुओरोसिस ने आदिवासी-किसानों को पूरी तरह से तबाह कर डाला है अपंगता की वजह से स्त्री पुरूष काम पर नही जा पाते हजारों हेक्टेयर परती भूमि कौडी के भाव बेची जा रही है ,नक्सल प्रभावित इन गांव मे अब तक प्राथमिक चिकित्सा की भी सुविधा उपलब्ध नही है ,पीडितों के लिए स्वास्थ्य विभाग द्बारा एक टेबलेट भी मुहैया नही करायी गई पिपरहवा के रामधन कहते हैं की अब हमें कूच नहीं चाहिए हमने मरना सीख लिया है
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8 comments: on "विकलांगता का अभिशाप झेलते आदिवासी"

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

प्रिय शहरोज,

हमजबान का 3 अगस्त,08 का अंक पढ़ा। सामयिक विषयों की खूबसूरत प्रस्तुति है। खूब परिश्रम कर रहे हो। शुभ कामनाएं।
कभी मेरा रचना समय देखा? लिंक है : wwwrachanasamay.blogspot.com
तुम्हारी रचनाएं इसीके लिए चाहिए। तुरन्त भेजो। मेल किया है अलग से।शब्द पुष्टिकरण हटा दो।

चन्देल

seema gupta ने कहा…

"read ur detaild article on the subject, how painful it is na????good efforts'

Smart Indian ने कहा…

बहुत अच्छा विषय चुना है. बधाई स्वीकारें!
भगवान् जाने, कब तक हमारा समाज और अमला इंसानी जिन्दगी की बेकद्री करता रहेगा.
चिंताएं स्वाभाविक स्वाभाविक हैं मगर आज के नक्कारेपन को कल होने वाले समझौते पर लादा नहीं जा सकता. आज विकिरण, फ्लोराइड या आर्सेनिक के दुष्प्रभाव हैं तो हमारे निकम्मेपन की वजह से हैं - ज़रुरत है उस निकम्मेपन और गरीबों के प्रति बेरुखी को दूर करने की. देश की खुशहाली के लिए बिजली चाहिए और अगर जिम्मेदारी से काम लें तो नाभिकीय ऊर्जा सबसे कम प्रदूषण करती है. रहा सवाल नौकरी का तो जब प्लांट्स बनेंगे, लोग काम करेंगे, कच्चा माल आयेगा, ज़मीन बिकेगी तो रोज़गार हमारे लोगों को भी मिलेगा इसे झुठलाया नहीं जा सकता है.

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

बेशक ये बहुत गंभीर और चिंताजनक समाचार है और भविष्य की डरावनी रूपरेखा खींचता है,
लेकिन विकास एक सतत प्रक्रिया है जिसे रोकना जीवन को रोक देना होगा. इस लिया हमें ये इंतजाम खुद करना होगा की विकास की बयार के साथ विनाश के बगुले न उडें.

gunjesh kumar ने कहा…

kehne ko nahi rone aur chillane ka man ho rha hai, aapne jadugora ki bath ki jamshedpur se 23km dur hai. wastusthiti se parichit hun. kash ki ye aankde hmare jannayakon ko bhi nazr aate.

श्रद्धा जैन ने कहा…

Kitni ghutan kitni tootan kitna niraash hoga yaha ka har man
mout aa rahi hai jaan kar bhi mout ke aane ka intezaar
aur kahi kahi chhoti si aasha ki low dagmagati hui
aur jo roj mar jaa rahi hai
kaise zindgi ji rahe hain yaha ke log


kya hamare yaha ke NGO aur kuch achhi sanstha kuch nahi kar sakti ?


kya in sabhi ko kahi door le jakar nahi basaya jaa sakta
?

Awesh ji ko shat shat naman
jaha insaan apne sawarth ke liye apne maa - baap ko bech de aise samay main inhone dosron ke liye dard ke liye insaaf ke liye apne zindgi lagayi hai

aise log birle hi milte hain

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

यह वाकई मे एक बहुत गंभीर मसला है , आधुनिककरण की आड मे स्वास्थ की मूलभूत समस्यायें नगणय होती जा रही है ।

prem ने कहा…

priy shahroz, apke khoobsurat our purposeful blog. ke liye badhai
prem

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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