बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 20 जुलाई 2008

प्रज्ञा राठौर की कहानी

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नए लिखने वाले कथाकारों में मुझे प्रज्ञा ने प्रभावित किया .ये वे लोग हैं जो कहानी के वर्तमान-परिदृश्य से लगभग अनजान हैं।लेकिन इनमें भरपूर संभावनाएं हैं.सोचने-विचारने और कहने का इनका एक अपना अंदाज़ है।

प्रज्ञा का आभार कि हमारे आग्रह का उन्होंने मान रखा और हमज़बान को कहानी उपलब्ध करायी

अपने बारे में वह कहती हैं:

मेरे बारे में कुछ ख़ास नहीं है बताने को. जन्म मध्य प्रदेश के शहर ग्वालियर में हुआ . घर में माँ-डैडी, १ बड़ी दीदी और १ छोटी बहन. माता-पिता शिक्षा विभाग में थे. मेरे डैडी का कहना है, लड़कियों को पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए और लड़कों को अपना पेट भरने लायक खाना बनाना आना चाहिए :) उन्होंने हम बहनों को भी अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाई. ग्वालियर की ही जीवाजी यूनिवर्सिटी से Electronics में M.Sc. किया. उसके बाद २००० से २००५ तक दिल्ली में ही एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी की. इसी बीच २००३ में शादी हुई. मेरे पति एक भारतीय Software MNC में कार्यरत हैं. २००५ में काम के सिलसिले में उन्हें जापान जाना था और हमारे घर नया मेहमान (मेरी बेटी अम्या ) भी आने वाली था. इसीलिए नौकरी छोड़ दी. २ साल जापान में रहने के बाद इसी फरवरी में USA के Iowa state के Cedar Rapids नामक छोटे से शहर में आए हैं।

पढने का शौक मुझे बचपन से ही था. माँ हिन्दी साहित्य की लेक्चरार थीं. उनके सानिध्य में अच्छी अच्छी किताबें पढने का मौका । उनकी कवितायें और कहानियाँ पढ़ना मुझे हमेशा अच्छा लगता था. मैंने लिखना अभी शुरू किया है ३-४ महीने पहले. हालाँकि बचपन में कुछ लिखा था पर वह सब बचपना ही था। अब वह डायरी पता नहीं कहाँ गयी?? या तो उन पन्नों में बच्चे अब मूंगफली खाते होंगें या फिर घुल घुल कर उसका कुछ और ही बन गया होगा :)


यह शहरोज़ भाई का बड्डपन ही है जो मुझे इस काबिल समझा और आप लोगों के सामने आने मौका दिया। आशा है आप मेरी गलतियों को नज़रंदाज़ करके मेरा हौसला बढायेंगे.

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मोहभंग



"बस!! बहुत हो गया॥ रोज़ की ही बात है। अब नहीं सहा जाता।"


पूर्णिमा ने निश्चय कर लिया।
" आर या पार। यह भी कोई जीवन है?? ना मन का खाना, न पहनना, न कहीं घुमने जाना। बस रात दिन खटते रहो ऑफिस या घर में। उस पर भी कोई क़द्र करने वाला नहीं। जब घर से चली जाऊंगी न, तब पता चलेगा सब को। अभी बैठे बैठे बहुत बातें बनाना आता है। कहते हैं न घर की मुर्गी...."


"बस बस... ज्यादा मत बोलो। अगर तुम्हारे माँ-बाप होते तो?" बीच में टोका शाश्वत ने।

"मेरे माँ बाप ऐसे हर बात पर टांग नहीं अडाते। भइया भाभी को पूरी छूट है अपना जीवन जीने की।"
"अरे!! तो तुम्हें कौन सी रोक है? सारे काम तो अपने मन के ही करती हो। कभी कभी उनकी बात मान भी लोगी तो क्या बिगड़ जाएगा??"
"और अगर तुम्हारी बहन एक हफ्ते बाद आ जायेगी तो उसका क्या बिगड़ जायेगा?? अच्छा खासा प्रोग्राम बना था घूमने का... बीच में कबाब में हड्डी..."
"पूर्णिमा........." इतनी ज़ोर से चीखा शाश्वत कि माँ-बाबूजी आ गए दूसरे कमरे से।
"बस अब कुछ और कहने की कोई ज़रूरत नहीं है। जिसे आना है आए, मैं ही चली जाऊंगी यहाँ से तब रहना आप सब लोग अपनों के साथ... एक मैं ही पराई हूँ न यहाँ.." रोती हुई चली गयी पूर्णिमा दूसरे कमरे में।
माँ ने समझाया शाश्वत को "अगर हम नेहा को १ हफ्ते बाद आने को कह दें, तब ठीक रहेगा। तुम और पूर्णिमा भी घूम आओगे और उसका मन भी लग जाएगा।"
"नहीं माँ कोई ज़रूरत नहीं है नेहा को कुछ कहने की. उसका कार्यक्रम बहुत पहले तय हो गया था। पूर्णिमा ने ही बीच में गोवा जाने की रट लगा दी। उसके ऑफिस के लोग जा रहे हैं। मैं और पूर्णिमा बाद में भी जा सकते हैं। तुम नेहा को कुछ मत कहो। चुपचाप जा कर सो जाओ। वह सुबह तक ठीक हो जायेगी।"
"हम्म कल ही चली जाऊंगी तब पता चलेगा। सच ही कहा था सबने यहाँ शादी मत करो। तब तो इश्क सवार था सर पर। पता नहीं क्यों मति मारी गयी थी मेरी। सच है, रिश्ता हमेशा बराबर वालों में होना चाहिए।" सोचते सोचते सो गयी थी पूर्णिमा।



पूर्णिमा और शाश्वत.....बहुत मशहूर हो चले थे कॉलेज में। सब उन्हें 'एक दूजे के लिए' कह कर पुकारते थे।

उनके परिवारों में ज़मीन आसमान का अन्तर था।

पूर्णिमा शहर के जाने माने उद्योगपति सुदर्शन लाल गुप्ता की एकलौती और मुंहलगी बेटी थी। कई मिलें थी। शहर में कई दुकानें थीं।

शाश्वत सीधे सादे किंतु आदर्शवादी नारायण चंद अग्रवाल का पुत्र था, जो कि उसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे।


नारायण बाबु ने शाश्वत को कई बार इशारों में समझाया था कि पूर्णिमा से मिलना जुलना ज्यादा ठीक नहीं है। उसके घर वाले कभी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे। पर कुछ तो पूर्णिमा का प्रेम था और कुछ उसका साहस जो कि उसे पूर्णिमा से दूर ही नहीं होने देता था। यह सच था पूर्णिमा बहुत साहसी थी। या फिर कहें कि जिद्दी थी। बचपन से अब तक उसने जिस चीज़ पर हाथ रख दिया, वह उसकी हो जाती थी। यही कारण था कि जब शाश्वत का सवाल आया तो उसने किसी की नहीं सुनी। उसका कहना था कि प्रेम के आगे जाति-धर्म, रूपया-पैसा, खानदान-औकात जैसी बातें तुच्छ हैं। यहाँ तक कि उसने अपने माँ-बाप से कह दिया कि उसे उनकी जायदाद में से कुछ नहीं चाहिए। वह अपने बलबूते पर नौकरी करने के काबिल है। और शाश्वत से ही शादी करेगी।


यह बात सच थी कि पूर्णिमा बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रही थी। शायद यही गुण उसे शाश्वत के करीब लाया था। शाश्वत भी मेधावी होने के साथ कॉलेज की अन्य गतिविधियों में सक्रिय था। जब वह वाद-विवाद में बोलने के लिए मंच पर आता था, तब सारा माहौल खामोश हो जाता था। पूर्णिमा भी उसकी ओजस्विता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।


उन दोनों की शादी हालाँकि परिवार वालों की उपस्थिति में हुई थी। किंतु जहाँ एक ओर शाश्वत के घर वालों में खुशी का माहौल था, वहीँ पूर्णिमा के परिवार में किसी को इस शादी से खुशी नहीं थी। उन्हें चिंता थी कि बाकी रिश्तेदारों के आगे उनकी गर्दन झुक गयी। पूर्णिमा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
शादी के बाद कुछ दिन तो सही निकले पर उसके बाद पूर्णिमा को एहसास होने लगा कि उसके घर और ससुराल में ज़मीन आसमान का अन्तर है। उसे कई बार खीज होती थी जब देखती कि ऑफिस से आने के बाद सब उसके इन्तेज़ार में भूखे बैठे हैं। शुरू शुरू में उसने कहा कि वह लोग उसका इंतज़ार ना किया करें। उसे समय पर खाने कि आदत है। इसीलिए जब देर हो रही होती है तो वह ऑफिस की कैंटीन में खा सकती है। पर शाश्वत ने उसे बोला कि दिन का खाना तो हर कोई अलग ही खाता है इसीलिए परिवार के लोग रात का खाना साथ ही खाना पसंद करते हैं। शुरू-शुरू में उसे यह बात अच्छी लगी पर धीरे धीरे यह बंधन लगने लगा। इस वजह से शाश्वत रात को बाहर खाना पसंद नहीं करता था। उसे बहुत बुरा लगता था। उसके घर तो ऐसा कुछ नहीं था। सब आज़ाद थे। जिसको जो करना है करे। शाश्वत का कहना था कि आज़ादी और लापरवाही दो अलग अलग बातें हैं। पूर्णिमा ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाती थी पर धीरे धीरे उसने फ़ोन करना शुरू कर दिया कि ऑफिस में देर हो रही है और खाने के मामले में समय की पाबन्द होने के कारण वह ऑफिस में ही खाना खा लेगी। कोई उसका इंतज़ार नहीं करे।


शाश्वत की एक बड़ी बहन थी। उनका ससुराल चेन्नई में था। दूरी ज्यादा होने के कारण वह २-३ सालों में ही आ पाती थीं मायके। जबसे उनके बच्चे बड़े हो गए थे, उन्हें उनके स्कूल का कार्यक्रम भी देखना पड़ता था। इसीलिए उनका आना बहुत कम हो पाता था। इस बार वह शाश्वत की शादी के बाद ही आ रहीं थीं। सारा घर खुश था। पूर्णिमा को भी अच्छा लग रहा था। कुछ दिनों के लिए ही सही, घर में कुछ रौनक तो होगी। वरना इस घर में तो वह अपने दोस्तों को बुलाने की, पार्टी करने की सोच भी नहीं सकती। कोई भी आयोजन हो, मन्दिर से शुरू और खीर पर ख़तम। इसी बीच उसके ऑफिस के सहयोगियों का गोवा जाने का कार्यक्रम बना। उन लोगों ने उसको भी बोला साथ चलने को। उसने बिना सोचे समझे हाँ कर दी। बाद में याद आया कि उसी समय तो दीदी आ रहीं हैं। अब मन करने में उसकी शान के खिलाफ होता। ऐसा कितनी बार हुआ कि कोई न कोई कार्यक्रम बना और बाद में उसने मना किया। इस बार उसने निश्चय किया कि चाहे कुछ हो जाए, वो जायेगी ही जायेगी। शाश्वत ने सुना तो वही हुआ जिसका डर था। बात नोंक-झोंक से शुरू हुई और अबोले पर समाप्त हुई।


अगले ही दिन उसने घोषणा की कि वह अपने मायके जा रही है। और तभी लौटेगी जब शाश्वत उसके साथ गोवा जाने को मान जाएगा। माँ-बाबूजी ने कितना रोका?? पर वह भी पूरी जिद्दी ही थी। हाँ शाश्वत के रोकने का इंतज़ार ज़रूर किया। पर ऐसा ना तो होना था, ना ही हुआ। और अगले घंटे वह अपने मायके की दहलीज़ पर खड़ी थी। माँ ने पूछा भी कि ऐसे कैसे अचानक?? कोई फ़ोन नही, कोई सूचना नहीं?? पूर्णिमा ने बता दिया कि वह रूठ कर आयी है। शायद उसे पूरा विश्वास था कि शाश्वत उसे लेने आज नहीं तो कल ज़रूर आएगा।


धीरे धीरे दिन बीतने लगे। पूर्णिमा का विश्वास कमज़ोर पड़ता जा रहा था। पर उसमें भी गज़ब का गुरूर था। उसने कोई कोशिश नहीं की शाश्वत से संपर्क करने की। उसके घरवालों का कहना था कि अगर वो झुक जाती है तो उसका कोई मान नहीं रह जाएगा ससुराल में। शुरू शुरू में तो पूर्णिमा को अच्छा लग रहा था घर में। किसी बात पर कोई रोक-टोक नहीं। ऑफिस के बाद अक्सर सहेलियों के साथ कहीं घूमने निकल जाती थी। इसी बीच गोवा वाला टूर भी हो गया। वह अकेली ही चली गयी। हालाँकि वहां जाकर उसे पछतावा हुआ कि उसे नहीं आना चाहिए था। वहां सभी जोडियों में थे। बस पूर्णिमा ही अकेली थी। सब जैसे तरस खाते थे उसपर। वह बीच टूर से ही वापस आ गई। माँ को आश्चर्य हुआ कि वह जल्द ही लौटा आई। भाभी ने भी सवालिया नज़रों से उसे देखा। पर उसने महसूस कर लिया कि भाभी की नज़रों में सवाल के साथ जवाब भी है और जवाब पता होने के कारण भाभी नज़रों में ही मुस्कुरा रही थीं। पूर्णिमा से वह मुस्कराहट सहन नहीं हुई। चुपचाप अपने कमरे में चली गयी। अब उसे हर दिन उस फ़ोन का इंतज़ार रहता जो नही आता। उसे खीज होने लगी थी अपने निर्णय पर। घर में जब भी कोई आने वाला होता, माँ किसी ना किसी बहाने से कोशिश करतीं कि पूर्णिमा उनके सामने नहीं पड़े वरना फिर अनचाहे सवालों का जवाब देना पड़ेगा। वह भी अपना ज्यादा से ज्यादा समय ऑफिस में बिताती। हालाँकि सहकर्मियों की नज़रों में भी उसे ताने, सवाल दिखते पर वहां कम से कम काम तो रहता था उन सबको भूलने के लिए। छुट्टी का दिन उसके ऊपर भारी पड़ता। सारा दिन या तो कमरे की सफाई में लगी रहती या फिर फालतू की खरीदारी करती रहती।
इसी बीच उसके घर की कामवाली ने छुट्टी मांगी। भाभी ने साफ़ इनकार कर दिया। उसने कामवाली का पक्ष लेते हुए भाभी से कहा कि उन्हें छुट्टी दे देनी चाहिए। भाभी ने खीजते हुए बोला कि वह चुपचाप ही बैठी रहे। इस घर का काम उसके घर के जैसा नहीं है कि कैसे भी चल जायेगा। रोज़ कोई न कोई आता है, चाय नाश्ता, कई काम होते हैं।

वह अवाक रह गयी!! यह वही भाभी थीं जो उसे पलकों पर बैठा कर रखती थीं। उसने माँ को बोला कि भाभी को समझाए कि उसके साथ कैसे पेश आना चाहिए। माँ ने कहा कि गलती भाभी की नहीं, पूर्णिमा की है जो दूसरों के घर के मामले में बोल रही है।

पहली बार एहसास हुआ कि अब यह उसका घर नहीं है।
अगले दिन कामवाली ने भाभी को बोल दिया कि वह यह नौकरी नहीं कर सकती। उसकी जितनी पगार बनती हो, दे दें।

पूर्णिमा ने पूछा -- नौकरी क्यों छोड़ रही है??
"दीदी, मेरी ननद की शादी है। भाभी छुट्टी नही दे रहीं। तो मैं क्या करूँ?"
"अरे तो ननद की शादी है तो नौकरी छोड़नी जरूरी है? तेरे घरवाले क्या कर रहे हैं?" पूर्णिमा ने पूछा। "घर वाले सभी व्यस्त होंगे न?? मेरी एक ही ननद है। उसको ही ढंग से विदा नहीं कर पाऊंगी तो जिंदगी भर मुझे ख़राब लगेगा। वैसे भी बेटियाँ पराई ही होती हैं। अब जितने दिन बचे हैं शादी में, मैं उसके साथ हमेशा रहना चाहती हूँ. नौकरी तो और भी मिल जायेगी। ननद तो विदा होकर पता नहीं कब आयेगी??"
कुछ अन्दर से दरक गया पूर्णिमा के भीतर।

अगले दिन उसका खाना खाने का मन नहीं हुआ। किसी ने ज्यादा कहा भी नहीं। सब जानते थे कि उसे मनाना कोई आसान काम नहीं है और फिर सबको अपने अपने ज़रूरी काम थे। वह पानी पीने के लिए अपने कमरे से बाहर निकली तो उसके कानों में घरवालों की बातें पड़ीं।
"ऐसे कब तक चलेगा?? उसे अपने घर तो जाना ही होगा न??" माँ की आवाज़ थी।
"मैंने पहले ही कहा था कि यह लड़की उस घर में नहीं रह पाएगी। आखिर इतना अन्तर है हमारे और उस घर में। " पापा बोले।
"क्षमा करें पापा पर पूर्णिमा किसी भी घर में जाती तो ऐसा ही होता। गुस्सा तो नाक पर रखा रहता है। किसी की बात नहीं मानना। हमेशा अपने हिसाब से सबको चलाना।" यह भाभी थीं जो कभी उसकी बहुत अच्छी सहेली हुआ करती थीं और जिनका हिसाब वह पिछले कुछ दिनों से माँ के साथ, अपने साथ किए जा रहे बर्ताव में देख रही थी।
"मैं आज ही बात करता हूँ शाश्वत से। कुछ पैसे वैसे का नाटक है तो ले जाओ पैसे और अपनी बीवी को भी। भई हमें भी समाज में उठना बैठना है।" भइया ने अपना मत दिया।
पूर्णिमा सन्न रहा गयी। शाश्वत पर इतना घिनौना आरोप!!!! और माँ-बाबूजी भी कुछ नहीं कह रहे??आखिर उससे और नहीं सुना गया।

सामने आकर बोली "आप लोगों को किसी से कुछ कहने कि ज़रूरत नहीं है। शाश्वत इतने गिरे हुए नहीं हैं कि पैसे के लिए अपनी बीवी को अलग करें। मैं ही बेवकूफ थी जो आप लोगों को अपना समझ कर यहाँ आ गयी थी। अब समझ आया कि अपना घर क्या होता है?? आप लोगों को धन्यवाद ।"
आगे नहीं बोल पायी। सबको वहीँ छोड़ कर शाश्वत को फ़ोन करने चल दी।


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8 comments: on "प्रज्ञा राठौर की कहानी"

Smart Indian ने कहा…

प्रज्ञा, बहुत खूब. ऐसे ही लिखती रहो.
बहुत अच्छी कहानी है. घर-घर में रोज़ाना होने वाली छोटी-छोटी बातें भी ज़रा सी बेध्यानी से कितनी बड़ी बन जाती हैं. लेकिन सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते.

शुभकामनाएं!

Jindagi ने कहा…

bahut achchhi kahani likhi hai aapne, wastwikta k bilkul kareeb.....!!

shazi ने कहा…

acchi koshish hai prgya.janmjaat lekhak maloom hoti ho.choti si lagti baat bhi badi kahani ho sakti hai.kya kamaal hai!wah!!!

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

प्रज्ञा जी बहुत ही सुन्‍दर कहानी है यह । वर्ततान में परिवार में यही सब घट रहा है । कहानी नें बखूबी अपने लक्ष्‍य को पाया है ।
भारतीय प्रेम और इसमें निहित ईष्‍या व परंपराओं का सटीक चित्रण ।

प्रज्ञा जी को धन्‍यवाद एवं शहरोज जी का बहुत बहुत आभार।

दीपक ने कहा…

शहरोज जी सर्वप्रथम आपको इस अनुठे प्रयास के लिये आभार ॥ मानवीय भावनाओ और रिश्तो के बदलते रंग का सुक्ष्म चित्रण करने के लिये प्रज्ञा जी को बधाई !!

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

काफी अच्छी कहानी है
कहानी मैं जिस मुद्दे को पेश किया है वो वर्तमान में बहुत कामन हो चला है और कई बार इस मामूली वजह से घर भी टूट जाते हैं
लेखिका ने बड़े शानदार ढंग से मुद्दे को उठाकर एक अच्छा समाधान पेश किया है
लेखिका के साथ-साथ शहरोज़ भाई को भी इतनी अच्छी कहानी पेश करने के लिए बधाई!

pallavi trivedi ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी लिखी है...अंत तक बांधे रखा कहानी ने!

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

सीधे सरल शब्दों में एक भावपूर्ण कहानी !बहुत अच्छा लिख रहीं हैं आप !निरंतरता बनाए रखें !

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