बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 20 जून 2008

जाकिर हुसैन की कविता

(मुराद नगर में १९ फ़रवरी १९७४ को जन्मे जाकिर दिल्ली में
एक विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राईटर हैं .विज्ञान में स्नातक
इस युवा रचनाकार ने हिन्दी में स्नातकोत्तर करने के बाद
जामिया मिल्लिया से जन -संचार और सर्जनात्मक लेखन
में डिप्लोमा हासिल किया ।)

सपनों पर प्रतिबन्ध नहीं
अच्छा -बुरा
छोटा -बड़ा
कलर या ब्लैक एंड व्हाइट
जैसी मर्ज़ी देखो
आँखें तुम्हारी हैं
और नींद भी
सपने भी तो तुम्हारे ही हैं
साकार हों ये जिद क्यों
जिंदगी को नींद में नहीं
जगी हालत में देखो
सपनों से उलट
लेकिन खूबसूरत हैं
सपने तालाब हैं
और जिंदगी
संघर्षों के बहाव में
बहने वाली
नदी का नाम है .
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2 comments: on "जाकिर हुसैन की कविता"

manish ने कहा…

A well thought,Well carved and full of life realities...................good work!!! Keep up the good show......looking for the next!!!!

श्रद्धा जैन ने कहा…

sapne waqyi sapne hote hain sabke jine ka sahara ab kam se kam un par to patibandh na hi lage behatar hai

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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