बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 25 जून 2008

श्रद्धा जैन की दो ग़ज़ल








(कवि- परिचय बक़लम ख़ुद : विदिशा एक छोटे से शहर से आई हुई श्रद्धा, बस इतना ही परिचय है मेरा शायद आप में से बहुत से लोगों ने इसका नाम भी ना सुना हो , तो बताती चलूं कि ये मध्यप्रदेश में भोपाल के पास एक बहुत छोटा सा शहर है जहाँ आज भी ब्रॉडबॅंड नही पहुँचा है अंतरजाल की उतनी जानकारी नहीं है (MSc) केमिस्ट्री में अपनी शिक्षा पूरी की और आजकल यहाँ अंतरराष्ट्रीय विद्यालय में हिन्दी अपनी भाषा को सब तक पहुँचाती हुई दिन गुज़ार रही हूँबच्चों के मुँह से I love Hindiसुनकर जो मीठी सी मुस्कान आती है जो सकुन मिलता है उसको शब्दों में कहना मुमकिन ही नहीं है वक़्त की हवा ने सिंगापुर पहुँचा दिया यहाँ आकर देश की सभ्यता की खूबियों को ,जाना जाना रिश्ते क्या हैं , अपनो का साथ कैसा होता है और अपने देश की मिट्टी में कितना सकुन है कुछ एहसास कलम से काग़ज़ पर उतर आए और मैं आप सबके बीच आ गयी .
शहरोज जी की महानता है कि उन्होंने मुझ जैसी उगती शायरा को इतना सम्मान दिया मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूं)








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काँटे आए कभी गुलाब आए
जो भी आए वो बेहिसाब आए
रंग उड़ जाए उनके चेहरे का
जब भी मेरी वफ़ा के बाब आए
अब्र दानाई का हो फिर ओझल
ज़िंदगी में जो एक अज़ाब आए
दोस्त बन कर मिले या दुश्मन हो
सामने जब तो बेनक़ाब आए
गम-ए-रोज़गार लिख रही है श्रद्धा
ऐसे आलम में कैसे ख्वाब आए


किसने जाना कि कल है क्या होगा
qurbat या कि फासला होगा
रोता जो ज़ार-ज़ार उसे रोने दो
हो ना हो खुद से वो मिला होगा
चाँद जो पल में बन गया हैं धूल
usne पैरों तले कुचला होगा
ज़ुल्म करता नहीं वो सबका रहीम
आज दुनिया का रब जुदा होगा
श्रद्धा ना यूँ सकून तलाश यहाँ
बद ओ वीरान ये रास्ता होगा

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8 comments: on "श्रद्धा जैन की दो ग़ज़ल"

Zakir ने कहा…

kaante aye kabhi gulab aye
jo bhi aye wo behisaab aye
!!!!!!!!!!!! bahut khub!!!!!!!!
konton aur phoolon se hi to bhari hai ye zindgi

श्रद्धा जैन ने कहा…

sharoz ji ka shukriya jo unhone mujh jaisi nayi shayara ko apni humzabaan main jagah di
main aapka tahe dil se shukriya adaa karti hoon

Pragya ने कहा…

bahut khoob!!
aapki sadgi aapki baaton mein jhalakti hai...
aur visheshta aapki rachnaaon mein...
aise hi likhte rahiye.

shazi ने कहा…

छोटी बहर में काम करना ज्यादा मुश्किल होता है ,लेकिन आपने कर दिखाया. क्या ख्याल है .इसे कहते हैं तगज़्ज़ुल.

श्रद्धा जैन ने कहा…

Zakir ji aapka bahut bahut shukriya aapne padha aur itna maan diya
main sada aapnki shukarguzaar rahungi

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

बन्धु,

खूबसूरत ब्लॉग के लिए बधाई. श्रद्धा जैन की ग़जलें अच्छी हैं.

तुमने जो ई मेल पता भेजा है वह सही नहीं है. परिचय में भी तुम्हारे वर्तनी की त्रुटियां हैं ठीक कर लो. और उसमें अपना पता और ई मेल भी जोड़ दो.

चन्देल

सतीश सक्सेना ने कहा…

दोस्त बन कर मिले या दुश्मन हो
सामने जब तो बेनक़ाब आए
गम-ए-रोज़गार लिख रही है श्रद्धा
ऐसे आलम में कैसे ख्वाब आए

surangini ने कहा…

Horrible likhti hain...inhe apni shaayri ko pahle mukammal kar lena chaahiye...mujhe to kisi bade urdu shaayar ka kuch churaya hua moujoon lagta hai...muaf kijiye..saaf baat boli hai!

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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