बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

मंगलवार, 24 जून 2008

नसर हमीद ख़लिश की ग़ज़ल







(कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि उर्दू को जिंदा रखने में बिहार सरे-फ़ेहरिस्त है .ज़ाहिर इसकी तहज़ीब को बरक़रार रखने में अदब का अदब यानी सम्मान ग़ज़ल चहारसु शमा- शमा है . शायरी के नाते भी वहां की ज़मीन zarkhez yaani उर्वर है .हालत की सितम ज़रिफी कि कईयों को वो मक़ाम न मिल सका जिसके वो हक़दार रहे .असलम सादीपुरी , सिराज शम्सी और रम्ज़ अज़ीमाबादी जैसे कई अहम लोग हुए जिन्हें गर्दिशे-दोरां ने भुला दिया .नसर हमीद ख़लिश भी चरागां से दूर तामीर- फ़न में लगें हैं .इनका अपना इक अलग अंदाज़ है .आप की पैदाइश तो लक्मनिया , बेगुसराय में हुई ,लेकिन शिक्षा- दीक्षा और रोज़ी -रोटी की तलाश में कई शहर के कूचों की ख़ाक नसीब हुई लेकिन आपने अपना आबो-ताब कायम रखा .अंग्रेज़ी में मास्टर डिग्री और कीट्स जैसे कवि के प्रेम पत्रों पर डॉक्टरेट की सनद हासिल की .गया में बरसों रहे .वहीँ के मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज से अंग्रेज़ी के प्रोफेसर पड़ से सेवामुक्त हो फिलहाल हजारीबाग में रहकर स्वतंत्र -लेखन ।)







खुलूस दिल की रिफ़ाक़त की बात करता है
वो शख्श मुझसे मुहब्बत की बात करता है
उजाला आता है जब भी गरीब खाने में
तमाम शब् तेरी चाहत की बात करता है


नक़ब लगा के जो आया पड़ोस के घर में
वो शख्श मेरी हिफाज़त की बात करता है
ये इसकी लत है कि जंगल हो शहर हो कुछ हो
वो क़त्लो -खूँ की हलाकत की बात करता है

दिखाए मुझ को कभी ख़ुद भी आदमी बनकर
जो देवताओं की अज़मत की बात करता है

तुम्हारे शहर में बिखरा हुआ हर इक पत्थर
मेरे लहू की हरारत की बात करता है


निगाह दिल में गए मोस्मों का अक्स लिए
ख़लिश तुम्हारी इनायत की बात करता है

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6 comments: on "नसर हमीद ख़लिश की ग़ज़ल"

Atir ने कहा…

It is one my favourites poetry written by my beloved Respected father.

talib ने कहा…

दिखाए मुझ को कभी ख़ुद भी आदमी बनकर
जो देवताओं की अज़मत की बात करता है

वह जनाब !क्या अंदाज़ है !! हिंदी के ग़ज़ल कारों को आप जैसे उस्ताद शायरों से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है . आप की ग़ज़ल पढने को मिलती रहे .इनायत रखियेगा .

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

नक़ब लगा के जो आया पड़ोस के घर में
वो शख्श मेरी हिफाज़त की बात करता है
!!!!!!!!!!!!!
दिखाए मुझ को कभी ख़ुद भी आदमी बनकर
जो देवताओं की अज़मत की बात करता है
!!!!!!!!!!!शानदार! बहुत दिनों मैं कोई अच्छी ग़ज़ल पढ़ने को मिली
अफ़सोस कि देर से नज़र पड़ी

zeashan zaidi ने कहा…

क्या खूब ग़ज़ल है.

shikha varshney ने कहा…

एक एक शेर लाजबाब है ..बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा पढ़ा.

NARESH KUMAR ने कहा…

बहुत बढ़िया गजल

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न स्याही के हैं दुश्मन, न सफ़ेदी के हैं दोस्त
हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)